मोदी-शी मुलाकात से पहले चीन पहुंचे डोभाल, सीमा पर अहम वार्ता
Story by ओनिका माहेश्वरी | Published by onikamaheshwari | Date 24-08-2026
Doval arrives in China ahead of Modi-Xi meeting; crucial talks on the border.
नई दिल्ली/बीजिंग
भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजित डोभाल सोमवार, 24 अगस्त को चीन की राजधानी बीजिंग पहुंच गए हैं। उनका यह दो दिवसीय दौरा भारत-चीन संबंधों के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। डोभाल 25 अगस्त को चीन के पोलित ब्यूरो सदस्य और विदेश मंत्री वांग यी के साथ भारत-चीन सीमा विवाद पर विशेष प्रतिनिधि (Special Representatives) स्तर की 25वें दौर की वार्ता में हिस्सा लेंगे। यह बातचीत ऐसे समय हो रही है, जब अगले महीने नई दिल्ली में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन होने वाला है और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की भारत यात्रा की संभावना को लेकर दोनों देशों में तैयारियां चल रही हैं।
डोभाल और वांग यी दोनों भारत-चीन सीमा प्रश्न पर विशेष प्रतिनिधि हैं। दोनों देशों के बीच करीब 3,488 किलोमीटर लंबी सीमा को लेकर दशकों से विवाद चला आ रहा है। इसी जटिल सीमा विवाद का व्यापक राजनीतिक समाधान तलाशने के लिए वर्ष 2003 में विशेष प्रतिनिधि वार्ता तंत्र बनाया गया था। यह तंत्र सीमा विवाद का अब तक अंतिम समाधान तो नहीं निकाल पाया है, लेकिन भारत और चीन के बीच तनाव के दौर में संवाद बनाए रखने तथा मतभेदों को नियंत्रित करने का एक महत्वपूर्ण माध्यम बना हुआ है।
डोभाल की मौजूदा यात्रा की सबसे बड़ी अहमियत यह है कि यह संभावित मोदी-शी मुलाकात से कुछ सप्ताह पहले हो रही है। भारत 12 और 13 सितंबर को नई दिल्ली में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेजबानी करेगा। चीन ने अभी तक शी जिनपिंग की भारत यात्रा की आधिकारिक पुष्टि नहीं की है, लेकिन दोनों पक्षों के अधिकारियों के बीच इसे लेकर सकारात्मक संकेत हैं। अगर शी जिनपिंग भारत आते हैं तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ उनकी द्विपक्षीय बैठक की संभावना भी बन सकती है। ऐसे में डोभाल और वांग यी के बीच होने वाली बातचीत को उस संभावित उच्चस्तरीय मुलाकात से पहले संबंधों की जमीनी स्थिति का आकलन करने और विवादित मुद्दों पर प्रगति तलाशने के प्रयास के तौर पर देखा जा रहा है।
2024 की मोदी-शी मुलाकात से शुरू हुआ था संबंध सुधार का दौर
भारत और चीन के रिश्तों में मौजूदा सुधार की प्रक्रिया को अक्टूबर 2024 में रूस के कजान में हुए ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और शी जिनपिंग की मुलाकात से जोड़कर देखा जाता है। उस मुलाकात ने दोनों देशों के बीच लंबे समय से जमे तनाव को कम करने और संबंधों को धीरे-धीरे सामान्य बनाने की प्रक्रिया का रास्ता खोला।
इसके बाद दोनों नेताओं की पिछली मुलाकात पिछले साल अगस्त में चीन के तियानजिन में हुए शंघाई सहयोग संगठन (SCO) शिखर सम्मेलन के दौरान हुई थी। उस बैठक में दोनों नेताओं ने भारत-चीन संबंधों में आए सकारात्मक माहौल और लगातार हो रही प्रगति का स्वागत किया था। दोनों पक्षों ने यह भी दोहराया था कि भारत और चीन विकास साझेदार हैं, प्रतिद्वंद्वी नहीं, और दोनों देशों के मतभेदों को विवादों में तब्दील नहीं होने देना चाहिए। अब एक साल के भीतर डोभाल-वांग वार्ता और उसके बाद संभावित मोदी-शी बैठक को भारत-चीन संबंधों के अगले चरण के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
6 अगस्त की WMCC बैठक के बाद हो रही है विशेष प्रतिनिधि वार्ता
डोभाल की बीजिंग यात्रा से पहले 6 अगस्त को नई दिल्ली में भारत और चीन के बीच सीमा मामलों पर Working Mechanism for Consultation and Coordination (WMCC) की 36वीं बैठक हुई थी। भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व विदेश मंत्रालय में पूर्वी एशिया प्रभाग के संयुक्त सचिव सुजीत घोष ने किया था, जबकि चीनी प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व चीन के विदेश मंत्रालय के सीमा एवं महासागर मामलों के विभाग की महानिदेशक होउ यानछी ने किया।
इस बैठक में दोनों पक्षों ने वास्तविक नियंत्रण रेखा यानी LAC की स्थिति की समीक्षा की और सीमा क्षेत्रों में शांति एवं स्थिरता बनाए रखने को व्यापक द्विपक्षीय संबंधों के विकास के लिए आवश्यक बताया। दोनों देशों ने लंबित मुद्दों को सुलझाने तथा LAC पर गलतफहमी और किसी तरह की गलत गणना से बचने के लिए मौजूदा राजनयिक और सैन्य संवाद तंत्रों का इस्तेमाल जारी रखने पर सहमति जताई। इसमें WMCC के अलावा स्थानीय कमांडर स्तर की बैठकें और अन्य सहमत तंत्र भी शामिल हैं।
6 अगस्त की बैठक में सीमा निर्धारण, सीमा प्रबंधन, नए संस्थागत तंत्रों के निर्माण और सीमा पार सहयोग जैसे मुद्दों पर भी विस्तार से चर्चा हुई थी। इसके अलावा भारत ने सीमा पार नदियों से जुड़े विशेषज्ञ स्तरीय तंत्र की अगली बैठक जल्द बुलाने और चीन से उसकी ऊपरी धारा में चल रही परियोजनाओं से संबंधित तकनीकी जानकारी साझा करने की जरूरत भी दोहराई थी। यही WMCC बैठक अब 25वें दौर की विशेष प्रतिनिधि वार्ता के लिए आधार तैयार करने वाली महत्वपूर्ण कड़ी बन गई है।
सीमा निर्धारण पर ‘अर्ली हार्वेस्ट’ की संभावना
मौजूदा वार्ता का एक महत्वपूर्ण पहलू सीमा निर्धारण (boundary delimitation) है। पिछले साल अगस्त में नई दिल्ली में हुई 24वें दौर की विशेष प्रतिनिधि वार्ता में दोनों देशों ने 2005 में हुए ‘Agreement on Political Parameters and Guiding Principles for Settlement of the India-China Boundary Question’ को आधार बनाते हुए सीमा विवाद के समाधान के लिए निष्पक्ष, उचित और दोनों पक्षों को स्वीकार्य ढांचे की दिशा में आगे बढ़ने पर सहमति जताई थी।
भारत-चीन सीमा विवाद के समाधान की प्रक्रिया को व्यापक रूप से तीन चरणों में देखा जाता है। 2005 का समझौता पहले चरण का महत्वपूर्ण पड़ाव था। इसके बाद दोनों देश विवाद के समाधान के लिए एक व्यापक ढांचा तैयार करने पर बातचीत करते रहे हैं। अंतिम चरण में सीमा को नक्शों और जमीन पर निर्धारित एवं चिह्नित करना शामिल होगा। हाल के संवादों में ‘बॉर्डर डिलिमिटेशन’ यानी सीमा निर्धारण को लेकर लगातार चर्चा इस ओर संकेत करती है कि दोनों पक्ष पूरे सीमा समाधान के अंतिम ढांचे पर सहमति बनने से पहले कुछ क्षेत्रों में ‘अर्ली हार्वेस्ट’ यानी शुरुआती स्तर पर सीमित समझौते की संभावनाएं तलाश रहे हैं।
24वें दौर की वार्ता में दोनों देशों ने WMCC के तहत एक विशेषज्ञ समूह बनाने पर सहमति जताई थी, जिसका उद्देश्य भारत-चीन सीमा के उपयुक्त क्षेत्रों में सीमा निर्धारण के संबंध में ‘अर्ली हार्वेस्ट’ की संभावनाओं का अध्ययन करना था। इसके साथ ही सीमा प्रबंधन को प्रभावी बनाने के लिए एक कार्य समूह और पश्चिमी क्षेत्र में मौजूद जनरल लेवल मैकेनिज्म के अलावा पूर्वी और मध्य क्षेत्रों में भी ऐसे तंत्र स्थापित करने पर सहमति बनी थी।
पूर्वी लद्दाख के बाद रिश्तों में आया था चार साल से ज्यादा का ठहराव
भारत-चीन संबंधों में सबसे बड़ा झटका अप्रैल 2020 से पूर्वी लद्दाख में पैदा हुए सैन्य तनाव के बाद लगा था। इस तनाव ने दोनों देशों के संबंधों को चार साल से अधिक समय तक प्रभावित किया। सीमा पर सैन्य तैनाती और गतिरोध के कारण राजनीतिक, आर्थिक और राजनयिक संबंधों में भी व्यापक ठहराव आया।
पश्चिमी क्षेत्र में तनाव के अलावा पूर्वी क्षेत्र यानी अरुणाचल प्रदेश को लेकर भी दोनों देशों के बीच मतभेद बने हुए हैं। इस महीने अरुणाचल प्रदेश को लेकर दोनों पक्षों के बीच तीखी बयानबाजी भी देखने को मिली है। सीमा पर तनाव की खबरों के बीच भारत ने लगातार कहा है कि वास्तविक नियंत्रण रेखा पर शांति और स्थिरता बनाए रखना द्विपक्षीय संबंधों के लिए बुनियादी आवश्यकता है।
इसके बावजूद अब दोनों देश कुछ ऐसे क्षेत्रों की तलाश कर रहे हैं, जहां सीमित स्तर पर व्यावहारिक प्रगति संभव हो सकती है। मध्य क्षेत्र में उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और सिक्किम से जुड़े हिस्सों को इस संदर्भ में संभावित अवसरों के रूप में देखा जा रहा है।
नाथू ला और लिपुलेख से फिर शुरू हुआ सीमा व्यापार
भारत-चीन संबंधों में धीरे-धीरे सामान्य स्थिति लौटने का एक संकेत सीमा व्यापार को फिर से शुरू करना भी है। इसी महीने दोनों देशों ने सिक्किम के नाथू ला दर्रे और उत्तराखंड के लिपुलेख दर्रे के जरिए सीमा व्यापार फिर शुरू किया है। यह कदम ऐसे समय आया है जब दोनों देश एक तरफ सीमा विवाद के संवेदनशील मुद्दों पर बातचीत जारी रखे हुए हैं और दूसरी तरफ सीमित आर्थिक एवं सीमा-पार संपर्क को धीरे-धीरे बहाल करने की कोशिश कर रहे हैं। पिछले साल की 24वीं विशेष प्रतिनिधि वार्ता में दोनों देशों ने तीन पारंपरिक सीमा व्यापार बाजारों को फिर से खोलने पर भी सहमति जताई थी।
अरुणाचल प्रदेश पर मतभेद भी रहेंगे अहम
विशेष प्रतिनिधि वार्ता में अरुणाचल प्रदेश से जुड़े मुद्दे भी महत्वपूर्ण रह सकते हैं। चीन अरुणाचल प्रदेश पर अपना दावा करता रहा है और इसे ‘दक्षिण तिब्बत’ का हिस्सा बताता है। वह समय-समय पर राज्य के विभिन्न स्थानों के नाम बदलने की कोशिश भी करता रहा है। भारत ने चीन के इन दावों को लगातार खारिज किया है और स्पष्ट किया है कि अरुणाचल प्रदेश भारत का अभिन्न और अटूट हिस्सा है। नई दिल्ली का रुख है कि किसी भी तरह के एकतरफा दावे या नाम बदलने की कार्रवाई से जमीन पर वास्तविक स्थिति नहीं बदल सकती।
ऐसे में डोभाल-वांग वार्ता में जहां सीमा प्रबंधन और तनाव कम करने के व्यावहारिक उपायों पर चर्चा हो सकती है, वहीं सीमा निर्धारण और पूर्वी क्षेत्र से जुड़े मतभेद भी बातचीत के महत्वपूर्ण हिस्से बने रहेंगे।
भारत का फोकस: LAC पर शांति, फिर संबंधों में सुधार
भारत लगातार यह संदेश देता रहा है कि चीन के साथ संबंधों में वास्तविक और स्थायी सुधार के लिए सीमा पर शांति और स्थिरता अनिवार्य है। 6 अगस्त की WMCC बैठक में भी दोनों पक्षों ने माना था कि सीमा क्षेत्रों में शांति एवं स्थिरता व्यापक द्विपक्षीय संबंधों के विकास के लिए आवश्यक है। इसलिए डोभाल की बीजिंग यात्रा का उद्देश्य केवल सीमा विवाद पर बातचीत करना नहीं है। बातचीत के दौरान व्यापक भारत-चीन संबंधों की स्थिति, सीमा पर सैन्य और राजनयिक संवाद, तनाव कम करने के उपाय, सीमा प्रबंधन, सीमा निर्धारण और दोनों देशों के बीच भरोसा बढ़ाने के रास्तों का भी जायजा लिया जा सकता है।
हालांकि, 25वें दौर की वार्ता से भारत-चीन सीमा विवाद का तत्काल और व्यापक समाधान निकलने की उम्मीद करना जल्दबाजी होगी। विवाद बेहद जटिल है और इसके अंतिम समाधान के लिए लंबी राजनीतिक एवं कूटनीतिक प्रक्रिया की आवश्यकता है। लेकिन अगर दोनों पक्ष कुछ क्षेत्रों में ‘अर्ली हार्वेस्ट’, सीमा प्रबंधन और तनाव कम करने के उपायों पर आगे बढ़ते हैं, तो यह संबंधों को सामान्य बनाने की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है।
मोदी-शी मुलाकात की जमीन तैयार करने की कोशिश?
डोभाल की यह यात्रा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसके कुछ ही सप्ताह बाद भारत ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेजबानी करने जा रहा है। अगर शी जिनपिंग नई दिल्ली आते हैं तो 2024 के कजान और पिछले साल के तियानजिन संवाद के बाद मोदी और शी की यह अगली महत्वपूर्ण आमने-सामने की मुलाकात होगी।
ऐसी स्थिति में डोभाल-वांग वार्ता दोनों देशों के बीच संवेदनशील मुद्दों पर बातचीत की दिशा और माहौल तय करने में मदद कर सकती है। सीमा पर तनाव कम करने, संवाद के चैनल सक्रिय रखने और कुछ व्यावहारिक मुद्दों पर प्रगति हासिल करने से संभावित मोदी-शी बैठक के लिए सकारात्मक वातावरण तैयार हो सकता है।
फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत और चीन दोनों ने बातचीत के रास्ते को खुला रखा है। 6 अगस्त की WMCC बैठक के बाद 25वें दौर की विशेष प्रतिनिधि वार्ता और उसके बाद संभावित उच्चस्तरीय राजनीतिक संपर्क यह संकेत देते हैं कि दोनों देश सीमा विवाद को नजरअंदाज किए बिना संबंधों को धीरे-धीरे सामान्य बनाने की कोशिश कर रहे हैं।
डोभाल का बीजिंग दौरा इसलिए सिर्फ एक सीमा वार्ता नहीं, बल्कि भारत-चीन संबंधों के अगले चरण की दिशा तय करने वाली अहम कड़ी है। भारत की प्राथमिकता स्पष्ट है LAC पर शांति और स्थिरता कायम रहे, लंबित सीमा मुद्दों पर सार्थक बातचीत आगे बढ़े और तभी व्यापक द्विपक्षीय संबंधों में स्थायी सुधार की जमीन तैयार हो।