आवाज द वॉयस/नई दिल्ली
पिछले दिनों कश्मीर के एक स्कूल में Independence Day celebration का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ। वीडियो में छोटी बच्चियां देशभक्ति के माहौल में डांस करती दिखाई दे रही थीं। पहली नजर में यह एक सामान्य सांस्कृतिक कार्यक्रम का वीडियो था, लेकिन पूर्व अभिनेत्री ज़ायरा वसीम की एक सोशल मीडिया पोस्ट के बाद यह मामला बहस का बड़ा मुद्दा बन गया।
पूर्व बॉलीवुड एक्ट्रेस ज़ायरा वसीम ने सवाल उठाया कि जिस कार्यक्रम को वक्फ बोर्ड से जोड़ा जा रहा है और जिसकी अध्यक्षता BJP नेता दरख्शां अंद्राबी करती हैं, अगर वह एक धार्मिक संस्था है तो ऐसे सांस्कृतिक कार्यक्रम के आयोजन को लेकर सवाल उठना चाहिए। ज़ायरा ने बाद में साफ किया कि उनका सवाल बच्चियों से नहीं, बल्कि कार्यक्रम आयोजित करने वाली संस्था और उसके जिम्मेदार लोगों से है। लेकिन सोशल मीडिया पर मामला इतनी आसानी से शांत होने वाला नहीं था।
जैसे ही ज़ायरा की पोस्ट सामने आई, लोगों की प्रतिक्रियाओं की बाढ़ आ गई। कई यूजर्स ने उनके सवाल पर आपत्ति जताई और कहा कि कश्मीर की संस्कृति में संगीत और नृत्य कोई नई बात नहीं है। एक यूजर ने लिखा कि कश्मीर में शादियों और दूसरे सामाजिक कार्यक्रमों में लोग लंबे समय से गाते और नाचते रहे हैं। ऐसे में अगर Independence Day के मौके पर स्कूल की बच्चियां डांस करती हैं तो इसमें आपत्ति की क्या बात है?
एक दूसरे सोशल मीडिया यूजर ने ज़ायरा के बॉलीवुड करियर का जिक्र करते हुए कहा कि उन्होंने अपनी मर्जी से फिल्मों में काम किया और अपनी मर्जी से फिल्म इंडस्ट्री छोड़ी। ऐसे में दूसरे बच्चों और खासकर लड़कियों के अपनी कला दिखाने पर सवाल उठाना ठीक नहीं है।
कुछ लोगों ने इस बहस को सीधे देशभक्ति से भी जोड़ दिया। उनका कहना था कि वक्फ बोर्ड या कोई दूसरी धार्मिक संस्था होने का मतलब यह नहीं कि Independence Day मुसलमानों के लिए कोई अलग या पराया दिन बन जाता है। मुस्लिम होना किसी व्यक्ति को आजादी का जश्न मनाने, राष्ट्रीय पर्व में हिस्सा लेने या अपनी प्रतिभा दिखाने से नहीं रोकता।
सोशल मीडिया पर एक और प्रतिक्रिया ने लोगों का ध्यान खींचा। उसमें कहा गया कि जम्मू-कश्मीर में पहले भी Independence Day और Republic Day पर बड़े सांस्कृतिक कार्यक्रम होते रहे हैं। मुश्किल दौर में भी मार्च-पास्ट, गीत और सांस्कृतिक प्रस्तुतियां होती थीं, जिनमें मुस्लिम, हिंदू और सिख समुदाय के बच्चे मिलकर हिस्सा लेते थे।
यानी कई लोगों के लिए यह वीडियो सिर्फ बच्चियों के डांस का वीडियो था, लेकिन सोशल मीडिया की बहस ने इसे धर्म, पहचान और आजादी के बड़े सवाल में बदल दिया।
इस पूरे विवाद में एक और प्रतिक्रिया खूब चर्चा में रही। एक महिला यूजर ने सवाल किया कि ज़ायरा वसीम ने बॉलीवुड से मिली पहचान, शोहरत और सफलता का अनुभव किया, लेकिन उन्हें स्टेज पर अपनी प्रतिभा दिखाती लड़कियों को लेकर परेशानी क्यों हो रही है? इसके बाद जानी-मानी लेखिका आमना बेगम की प्रतिक्रिया ने बहस को एक नया मोड़ दे दिया।
आमना बेगम ने सवाल उठाया कि आखिर लड़कियों के स्टेज पर आने, अपनी कला दिखाने या सार्वजनिक रूप से अपनी प्रतिभा पेश करने पर ही इतनी बहस क्यों शुरू हो जाती है? उन्होंने कहा कि कश्मीर की बेटियों को सम्मान पाने के लिए अपनी कला या अपनी पहचान छिपाने की जरूरत नहीं होनी चाहिए।
उन्होंने ज़ायरा वसीम की मशहूर फिल्म Secret Superstar का भी जिक्र किया। फिल्म में ज़ायरा ने एक ऐसी मुस्लिम लड़की का किरदार निभाया था, जो मुश्किल परिस्थितियों के बावजूद गायिका बनने का सपना देखती है।
यहीं से सोशल मीडिया पर एक बड़ा सवाल उभरकर सामने आया क्या एक लड़की एक साथ पढ़-लिख नहीं सकती, अपने सपने पूरे नहीं कर सकती, अपनी धार्मिक पहचान से जुड़ी नहीं रह सकती और अपनी कला भी नहीं दिखा सकती?
ज़ायरा वसीम ने बाद में अपनी बात दोहराते हुए कहा कि उनकी आलोचना बच्चियों की नहीं है। उनके मुताबिक बच्चे वही करते हैं, जो स्कूल और संस्थाएं उन्हें करने के लिए कहती हैं। इसलिए उनका सवाल उन संस्थाओं और लोगों से है, जो ऐसे कार्यक्रमों का आयोजन करते हैं।
लेकिन आलोचकों का कहना था कि जब बच्चियों के डांस को धार्मिक पहचान और संस्था के नजरिए से देखा जाता है, तो बहस सीधे उनकी व्यक्तिगत आजादी और प्रतिभा तक पहुंच जाती है। उनके अनुसार, किसी लड़की का डांस करना उसकी धार्मिक पहचान खत्म नहीं करता और न ही उसका राष्ट्रीय पर्व में हिस्सा लेना उसकी आस्था पर सवाल खड़ा करता है। इस तरह एक वायरल वीडियो से शुरू हुई बहस अब सिर्फ डांस तक सीमित नहीं रही।
यह बहस मुस्लिम लड़कियों की आजादी, उनकी पहचान, उनकी कला और देशभक्ति तक पहुंच गई। सोशल मीडिया पर एक पक्ष का कहना है कि धार्मिक संस्थाओं की भूमिका और उनके आयोजनों पर सवाल उठाना जरूरी है। वहीं दूसरा पक्ष इसे लड़कियों की आजादी और उनकी प्रतिभा को लेकर अनावश्यक विवाद बता रहा है।
लेकिन इस पूरे मामले में एक सवाल और है, जिस पर शायद सबसे ज्यादा चर्चा होनी चाहिए। क्या यह सचमुच सिर्फ धार्मिक सिद्धांतों और लड़कियों की आजादी की बहस है, या इसके पीछे राजनीति भी है?
क्योंकि अगर यही कार्यक्रम वक्फ बोर्ड से नहीं, बल्कि किसी दूसरे मजहबी या गैर-सरकारी इदारे की ओर से आयोजित किया गया होता, तो क्या ज़ायरा वसीम की प्रतिक्रिया यही होती? यही सवाल इस पूरे विवाद को और दिलचस्प बनाता है।
एक तरफ छोटी बच्चियां हैं, जो शायद सिर्फ अपने स्कूल के Independence Day कार्यक्रम में डांस कर रही थीं। दूसरी तरफ बड़े लोग हैं, संस्थाएं हैं, धर्म है, राजनीति है और सोशल मीडिया है और सोशल मीडिया की दुनिया में अक्सर यही होता है एक छोटा सा वीडियो वायरल होता है और उसके बाद बहस इतनी बड़ी हो जाती है कि असली मुद्दा पीछे छूट जाता है। तो सवाल सिर्फ इतना है क्या हमें इन बच्चियों के डांस में एक सांस्कृतिक प्रस्तुति देखनी चाहिए, या फिर हर मंच पर धर्म और सियासत का चश्मा लगाकर देखना चाहिए?