दौलत रहमान/गुवाहाटी
असम की जानी-मानी अधिवक्ता और स्तंभकार ज़ेबा ज़ोहरिया ने पूर्व बॉलीवुड अभिनेत्री ज़ायरा वसीम के उस बयान पर कड़ी आपत्ति जताई है जिसमें उन्होंने कश्मीर में स्कूली लड़कियों के स्वतंत्रता दिवस नृत्य पर सवाल उठाए थे। ज़ोहरिया ने इस सोच को इस्लाम के बढ़ते कट्टरपंथ और मुस्लिम महिलाओं की शिक्षा तथा पहचान की गलत व्याख्या करार दिया है। यह पूरा मामला सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बन गया है और इस पर तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं।
क्या था ज़ायरा वसीम का बयान
ज़ायरा वसीम ने साल 2019 में अपने धर्म का हवाला देकर अभिनय की दुनिया छोड़ दी थी। हाल ही में उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट लिखकर जम्मू-कश्मीर वक्फ बोर्ड की भूमिका पर सवाल खड़े किए थे। उन्होंने कश्मीर के एक स्कूल में हुए स्वतंत्रता दिवस कार्यक्रम में स्कूली बच्चियों के मंच पर नृत्य करने के वीडियो पर अपनी प्रतिक्रिया दी थी। वसीम का कहना था कि मुस्लिम समुदाय की सेवा के लिए बनी धार्मिक संस्थाओं को ऐसे आयोजनों का समर्थन नहीं करना चाहिए जहां बच्चे और खासकर बच्चियां मंच पर परफॉर्म करती हैं।
उनका तर्क था कि शिक्षण संस्थानों और धार्मिक इदारों को बच्चों को सोचने, सीखने, रचने और देश में योगदान देने के लिए प्रेरित करना चाहिए। वसीम ने कहा कि कश्मीर की एक समृद्ध आध्यात्मिक और बौद्धिक विरासत रही है और संस्थाओं को उसी दिशा में काम करना चाहिए। हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया था कि उनकी यह आपत्ति बच्चों से नहीं बल्कि ऐसे कार्यक्रमों का आयोजन करने वाली व्यवस्था से है।
ज़ेबा ज़ोहरिया का कड़ा विरोध
ज़ोहरिया ने इस तर्क को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि यह मामला केवल एक डांस परफॉर्मेंस पर असहमति का नहीं है, बल्कि इससे कहीं अधिक गंभीर है। एक असमिया मुस्लिम महिला के रूप में अपनी बात रखते हुए उन्होंने कहा कि यह बहस उस डांस से कहीं ज्यादा परेशान करने वाली है जिस पर वसीम को आपत्ति हुई है।
उन्होंने इस बात पर भी हैरानी जताई कि यह बयान उस व्यक्ति की तरफ से आया है जिसने खुद फिल्मों और ग्लैमर की दुनिया में अपना सार्वजनिक करियर बनाया था।
ज़ोहरिया ने सवाल किया कि आखिर स्वतंत्रता दिवस के मौके पर नृत्य करने वाली कश्मीरी बच्चियों को महज मंच की सजावट या प्रोप्स के रूप में क्यों देखा जा रहा है। उन्होंने कहा कि यदि तर्क यह होता कि स्कूलों को बच्चियों को वाद-विवाद, विज्ञान, इतिहास, साहित्य और खेलकूद में आगे बढ़ाना चाहिए, तो वह इसका पूरा समर्थन करतीं।
लेकिन वक्फ बोर्ड और इस्लामी मूल्यों को इस तरह से बीच में लाना ताकि ऐसा लगे कि भारत के स्वतंत्रता दिवस में शामिल होने वाली मुस्लिम बच्चियों के सामने कोई धार्मिक संकट खड़ा हो गया है, पूरी तरह गलत है।
As an Assamese Muslim woman, I find this argument more disturbing than the dance she is offended by. And coming from a former Bollywood actor, the irony is difficult to miss.
— Zeba Zoariah (@ZZoariah) August 17, 2026
You built part of your own public career in an industry of cinema, music, dance and performance. Nobody… https://t.co/PUPyK2sv38
मेरा इस्लाम भारत से दूरी साबित करने को नहीं कहता
असम के मूल मुस्लिम समाज का उदाहरण देते हुए ज़ोहरिया ने कहा कि मुस्लिम पहचान का यह मतलब कतई नहीं है कि समाज और देश से सांस्कृतिक दूरी बना ली जाए। असम में स्वदेशी मुस्लिम समुदायों का इतिहास यहां की मिट्टी और संस्कृति से गहराई से जुड़ा हुआ है।
उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि उनकी असमिया पहचान उनके इस्लाम को कमजोर नहीं करती और उनका धर्म उन्हें यह साबित करने के लिए नहीं कहता कि वह भारत से दूर हैं। ज़ोहरिया ने वक्फ बोर्ड को एक तरह की वैचारिक या धार्मिक चौकी मानने से भी इनकार किया, जो यह तय करे कि कोई मुसलमान कितनी देशभक्ति दिखा सकता है।
उनके अनुसार, यदि छात्र देश का स्वतंत्रता दिवस मनाते हैं, तो कोई शैक्षणिक संस्थान अपनी मुस्लिम पहचान नहीं खो देता। उन्होंने यह तीखा सवाल भी उठाया कि आखिर किस बात ने लाइन पार की है, वह नृत्य, वे बच्चियां, तिरंगा या फिर कश्मीरी मुस्लिम बच्चियों का राष्ट्रीय ध्वज के साथ सहज होना।
एक लड़की पढ़ भी सकती है और नाच भी सकती है
ज़ोहरिया ने उस सोच को भी चुनौती दी जो बौद्धिक विकास और कलात्मक अभिव्यक्ति के बीच एक झूठा फर्क पैदा करती है। समाज में अक्सर यह मान लिया जाता है कि जो मुस्लिम लड़की मंच पर कला पेश करती है, वह कभी वैज्ञानिक या विद्वान नहीं बन सकती। उन्होंने सवाल किया कि किसी भी लड़की की बुद्धिमत्ता को उसकी कलात्मक प्रस्तुति से क्यों तौला जाना चाहिए।
उनका मानना है कि मुस्लिम लड़कियों को ऐसी तंग सीमाओं में नहीं बांधा जाना चाहिए जहाँ शिक्षा, आस्था और सार्वजनिक जीवन में हिस्सेदारी को एक-दूसरे का विरोधी मान लिया जाए। एक लड़की सुबह कुरान पढ़ सकती है, दोपहर में गणित के सवाल हल कर सकती है, शाम को अपनी कला दिखा सकती है और बड़ी होकर सरकार की नीतियों से असहमति भी जता सकती है। इनमें से कोई भी बात दूसरी चीज को खारिज नहीं करती।

मुस्लिम पहचान इतनी कमजोर नहीं है
ज़ोहरिया ने इस बात पर जोर दिया कि मुस्लिम पहचान कोई इतनी नाजुक चीज़ नहीं है कि एक गीत, एक नृत्य या देश का झंडा उसे किसी भी तरह से प्रभावित कर सके। उन्होंने अपील की कि मुस्लिम पहचान को इतना कमजोर न दिखाया जाए। उन्होंने अपनी बात दोहराते हुए कहा कि वह असमिया हैं, मुस्लिम हैं और भारतीय हैं। उन्हें अपनी एक पहचान को साबित करने के लिए दूसरी पहचान को छोड़ने की कभी कोई जरूरत नहीं पड़ी।
अंत में उन्होंने कहा कि असली चिंता की बात यह नहीं है कि मुस्लिम बच्चियां स्वतंत्रता दिवस के जश्न में हिस्सा ले रही हैं, बल्कि चिंता इस बात की है कि वयस्क लोग बच्चों को सुरक्षा का हवाला देकर एक कृत्रिम पहचान का संकट थमा रहे हैं।
तिरंगे के साथ नाचती बच्चियों में कोई त्रासदी नहीं है, असली त्रासदी यह है कि कुछ लोग अपनी संकीर्ण सोच बच्चों पर थोप रहे हैं। इस पूरी बहस ने एक बार फिर से यह साबित कर दिया है कि आधुनिक समाज में महिलाओं की स्वतंत्रता, शिक्षा और राष्ट्र प्रेम को लेकर रूढ़िवादी सोच के खिलाफ मुखर होना कितना जरूरी हो गया है।