सलीम दुर्रानी: दर्शकों की फरमाइश पर छक्के लगाने वाला क्रिकेटर

Story by  ओनिका माहेश्वरी | Published by  onikamaheshwari | Date 24-08-2026
Salim Durani: When he used to hit a six at the spectators' request.
Salim Durani: When he used to hit a six at the spectators' request.

 

ओनिका माहेश्वरी/ नई दिल्ली  

“सलीम दुर्रानी को छक्का मारने के लिए कहिए… और वह छक्का मार देते थे।” भारतीय क्रिकेट के उस दौर में, जब न टीवी का इतना विस्तार था और न क्रिकेट आज की तरह करोड़ों लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा था, मैदान में बैठे दर्शकों और खिलाड़ी के बीच एक अनोखा रिश्ता हुआ करता था। उन दिनों स्टेडियम से उठती आवाजें सीधे बल्लेबाज तक पहुंचती थीं। और जब दर्शक पुकारते थे“सलीम, एक छक्का!” तो सलीम दुर्रानी अक्सर अपने बल्ले से उसका जवाब देते थे।

यही वजह थी कि सलीम दुर्रानी सिर्फ क्रिकेटर नहीं थे। वहक्रिकेट के शोमैन, दर्शकों के खिलाड़ी और भारत के उन शुरुआती ऑलराउंडरों में से एक थे, जिनकी मौजूदगी मैदान में रोमांच पैदा कर देती थी।लेकिन इस चमकदार छवि के पीछे एक ऐसी कहानी थी, जिसमें अफगानिस्तान में जन्मा एक बच्चा, जमनगर में पला-बढ़ा युवा, एक क्रिकेटर पिता की विरासत और भारतीय क्रिकेट में अपनी जगह बनाने का संघर्ष शामिल था।

सलीम दुर्रानी का जन्म11 दिसंबर 1934 को काबुल, अफगानिस्तानमें हुआ था। उनके पिता अब्दुल अजीज दुर्रानी क्रिकेट से जुड़े हुए थे और बाद में परिवार जमनगर आ गया। सलीम ने बचपन में क्रिकेट के अलावा टेनिस और फुटबॉल भी खेला, लेकिन क्रिकेट उनका पहला प्यार बन गया।और फिर एक दिन यही लड़का भारतीय क्रिकेट का इतिहास बदलने वाले नामों में शामिल हो गया।

सलीम दुरानी का निधन: क्रिकेटर के बारे में 5 तथ्य

काबुल से जमनगर तक

सलीम दुर्रानी का बचपन सामान्य क्रिकेटर की तरह नहीं था।उनका जन्म भारत से बाहर हुआ, लेकिन उनकी क्रिकेट की पहचान भारत में बनी। उनके पिता अब्दुल अजीज भी क्रिकेटर थे और जमनगर के शासक के लिए काम करते थे। इसी वजह से परिवार का जुड़ाव जमनगर से हुआ।

बंटवारे के बाद उनके पिता कराची चले गए और वहां क्रिकेट कोच के रूप में काम करने लगे, जबकि सलीम भारत में ही रहे। उनके पिता के क्रिकेट से जुड़े होने ने बेटे के खेल को शुरुआती दिशा जरूर दी, लेकिन सलीम की अपनी प्रतिभा ने उन्हें आगे पहुंचाया। उनके खेल में बचपन से ही विविधता थी।

वह सिर्फ बल्लेबाज नहीं थे। वह बाएं हाथ से बल्लेबाजी करते थे और धीमी बाएं हाथ की ऑर्थोडॉक्स स्पिन गेंदबाजी करते थे।यानी एक ऐसा खिलाड़ी जो बल्ले से भी मैच बदल सकता था और गेंद से भी।

घरेलू क्रिकेट से भारतीय टीम तक

दुर्रानी ने 1953-54 में फर्स्ट-क्लास क्रिकेट में कदम रखा। उन्होंने सौराष्ट्र, गुजरात और राजस्थान के लिए क्रिकेट खेला और लगभग 23 वर्षों के फर्स्ट-क्लास करियर में 170 मैच खेले। उनके नाम8,545 रन और 484 विकेटरहे। यह आंकड़े बताते हैं कि सलीम दुर्रानी केवल लोकप्रिय खिलाड़ी नहीं थे, बल्कि लंबे समय तक उच्च स्तर का प्रदर्शन करने वाले गंभीर ऑलराउंडर भी थे।उनकी बल्लेबाजी आक्रामक थी। गेंदबाजी में वह बाएं हाथ के स्पिनर थे। और सबसे बड़ी बात—वह मैच की दिशा बदलने की क्षमता रखते थे।

1960: भारत की टेस्ट जर्सी

सलीम दुर्रानी को भारत के लिए टेस्ट क्रिकेट खेलने का मौका 1960 में मिला।उन्होंने मुंबई में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ अपना टेस्ट डेब्यू किया। वह उस समय 25 वर्ष के थे। संयोग भी दिलचस्प थाभारत के प्रमुख ऑफ स्पिनर जसु पटेल के बीमार पड़ने के बाद दुर्रानी को टीम में मौका मिला।यहीं से उनके अंतरराष्ट्रीय करियर की शुरुआत हुई।

अगले 13 वर्षों में उन्होंने भारत के लिए29 टेस्ट मैचखेले। इन मैचों में उन्होंने1,202 रनबनाए, जिसमें एक शतक और सात अर्धशतक शामिल थे। गेंदबाजी में उन्होंने75 विकेटलिए।लेकिन सलीम दुर्रानी के आंकड़ों को देखकर उनकी लोकप्रियता को पूरी तरह समझना मुश्किल है।क्योंकि उनका असर स्कोरकार्ड से कहीं ज्यादा बड़ा था।

1961-62: इंग्लैंड के खिलाफ वह सीरीज जिसने उन्हें स्टार बनाया

सलीम दुर्रानी के करियर का एक निर्णायक मोड़ आया1961-62 में इंग्लैंड के खिलाफ टेस्ट सीरीजमें।पांच टेस्ट मैचों की उस सीरीज के शुरुआती तीन मुकाबले ड्रॉ रहे। इसके बाद भारत ने कोलकाता और चेन्नई में लगातार दो टेस्ट जीतकर सीरीज2-0 से अपने नाम की।

इन दोनों जीतों में दुर्रानी की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रही।कोलकाता टेस्ट में उन्होंने8 विकेटलिए।इसके बाद चेन्नई टेस्ट में उन्होंने10 विकेटचटकाए।यानी भारत की लगातार दो जीतों में एक ऑलराउंडर ने गेंद से निर्णायक भूमिका निभाई।यही वह दौर था जब सलीम दुर्रानी भारतीय क्रिकेट के बड़े नामों में शामिल हो गए।

salim durani india's most handsome cricketer untold stories - लड़कियों की  मांग पर उड़ाते थे छक्के, लोग कहते थे अहंकारी, भारत के सबसे हैंडसम का  एटीट्यूड ही अलग था

वह खिलाड़ी जो दर्शकों की आवाज सुनता था

सलीम दुर्रानी की सबसे मशहूर पहचान थीछक्का।वह लंबे-लंबे छक्के लगाने के लिए मशहूर थे और खास बात यह थी कि दर्शकों को लगता था कि वे उनकी फरमाइश सुनते हैं।ईडन गार्डन्स में जब हजारों दर्शक एक साथ “Sixerrrrr!” चिल्लाते थे, तो दुर्रानी के बल्ले से अगली गेंद पर छक्का निकलने की कहानियां आज भी भारतीय क्रिकेट की सबसे खूबसूरत यादों में गिनी जाती हैं।

इसी वजह से उनकी लोकप्रियता केवल क्रिकेट प्रेमियों तक सीमित नहीं थी।उनका व्यक्तित्व भी बेहद आकर्षक था। स्टाइलिश अंदाज, लंबे कद-काठी, आत्मविश्वास और मैदान पर बेफिक्र खेल]दुर्रानी अपने दौर के उन क्रिकेटरों में थे जिन्हें देखकर लोग सिर्फ मैच नहीं, एक किरदारदेखने आते थे।उन्हें अक्सर “पीपुल्स मैन” कहा गया, क्योंकि वह दर्शकों के साथ उस दौर में वैसा जुड़ाव बना चुके थे, जैसा क्रिकेट में बहुत कम खिलाड़ियों को नसीब हुआ।

1971: वेस्टइंडीज में भारत की ऐतिहासिक जीत

अगर 1961-62 की इंग्लैंड सीरीज ने दुर्रानी को स्टार बनाया था, तो1971 का वेस्टइंडीज दौराउनके करियर को अमर कर गया।भारत ने पहली बार वेस्टइंडीज में टेस्ट सीरीज जीती।और इस ऐतिहासिक जीत में दुर्रानी ने गेंद से ऐसा प्रदर्शन किया जिसे भारतीय क्रिकेट आज भी याद करता है।पोर्ट ऑफ स्पेन टेस्ट की दूसरी पारी में उन्होंने कुछ ही गेंदों के अंतराल मेंक्लाइव लॉयड और गैरी सोबर्सजैसे दिग्गज बल्लेबाजों को आउट कर दिया।

सोबर्स तो खाता भी नहीं खोल सके।दुर्रानी ने उस पारी में 17 ओवर गेंदबाजी की और सिर्फ 21 रन दिए। भारत ने वह टेस्ट सात विकेट से जीता।और यह वही टेस्ट था जिसमेंसुनील गावस्कर ने अपना टेस्ट डेब्यूकिया था। भारत के लिए यह सिर्फ एक मैच की जीत नहीं थी। यह भारतीय क्रिकेट के आत्मविश्वास में एक बड़ा बदलाव था।और उस ऐतिहासिक क्षण में सलीम दुर्रानी की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण थी।

अर्जुन अवॉर्ड: इतिहास में दर्ज हुआ नाम

सलीम दुर्रानी का नाम सिर्फ भारतीय क्रिकेट के इतिहास में नहीं, बल्किअर्जुन पुरस्कार के इतिहास में भी सबसे पहले दर्ज नामों में से एक है।सरकार की आधिकारिक अर्जुन अवॉर्ड सूची के अनुसार, 1961 में सलीम दुर्रानी को क्रिकेट के लिए अर्जुन पुरस्कार दिया गया था।उसी वर्ष पहली बार अर्जुन पुरस्कार प्रदान किए गए थे।

इसका अर्थ है कि दुर्रानीअर्जुन अवॉर्ड पाने वाले पहले क्रिकेटरबने।आज जब भारत में क्रिकेटरों को अर्जुन अवॉर्ड मिलना एक स्थापित परंपरा है, तब यह याद करना जरूरी है कि इस परंपरा की शुरुआत जिन नामों से हुई, उनमें सलीम दुर्रानी सबसे आगे खड़े थे।उनका सम्मान केवल उनके प्रदर्शन की पहचान नहीं था।यह उस दौर में भारतीय क्रिकेट की बढ़ती ताकत की भी पहचान थी।

आंकड़ों से आगे था सलीम दुर्रानी का असर

सलीम दुर्रानी ने भारत के लिए सिर्फ 29 टेस्ट खेले।लेकिन उनके बारे में बात करते समय क्रिकेट लेखक अक्सर आंकड़ों से आगे जाते हैं। क्यों? क्योंकि वह मैच मेंएक्स-फैक्टरलेकर आते थे।वह बल्लेबाजी कर सकते थे।

गेंदबाजी कर सकते थे।मैच पलट सकते थे।और दर्शकों को रोमांचित कर सकते थे।BCCI ने उनके निधन पर उन्हें ऐसा करिश्माई ऑलराउंडर बताया, जो बड़े छक्के लगाने की अनोखी क्षमता रखते थे और जिनकी आक्रामक बाएं हाथ की बल्लेबाजी की बड़ी फैन फॉलोइंग थी।

Salim Durani: Life and career in pictures - Sportstar

क्रिकेट से सिनेमा तक

सलीम दुर्रानी की लोकप्रियता इतनी थी कि उनका आकर्षण क्रिकेट के मैदान से बाहर भी दिखाई दिया।उन्होंने फिल्मों में भी काम किया।1969 में वह“Ek Masoom” में नजर आए और 1973 में“Charitra” में भी दिखाई दिए। उनका व्यक्तित्व और स्क्रीन प्रेजेंस भी उनके दौर की लोकप्रिय संस्कृति का हिस्सा बन गया था।यानी दुर्रानी सिर्फ क्रिकेट के स्टार नहीं थे वह उस दौर के एक लोकप्रिय सार्वजनिक व्यक्तित्व थे।

एक खिलाड़ी, जो सिर्फ रिकॉर्ड नहीं छोड़ गया

दुर्रानी का करियर 1970 के दशक में आगे बढ़ता रहा और उन्होंने 1972-73 तक भारत के लिए टेस्ट क्रिकेट खेला।फर्स्ट-क्लास क्रिकेट में उनका सफर इससे भी लंबा चला और 1977-78 तक उन्होंने क्रिकेट खेला।कुल मिलाकर फर्स्ट-क्लास क्रिकेट में उनके नाम 170 मैचों में 8,545 रन और 484 विकेट रहे।2011 में उन्हें BCCI काC.K. Nayudu Lifetime Achievement Award भी मिला।यह सम्मान उनके लंबे क्रिकेट जीवन की एक और बड़ी स्वीकृति थी।

आखिरी दौर: क्रिकेट से दूर, लेकिन क्रिकेट से अलग नहीं

सलीम दुर्रानी ने अपने जीवन के अंतिम वर्षों में गुजरात केजामनगरमें समय बिताया।2 अप्रैल 2023 को 88 वर्ष की उम्र में उनका निधन हो गया। उस समय वह अपने छोटे भाई जहांगीर दुर्रानी के साथ जामनगर में रह रहे थे।

वर्ष की शुरुआत में गिरने के कारण उनकी जांघ की हड्डी में चोट आई थी और उनकी सर्जरी भी हुई थी।उनके निधन के साथ भारतीय क्रिकेट ने सिर्फ एक पूर्व खिलाड़ी को नहीं खोया।उसने उस दौर के एक ऐसे किरदार को खो दिया, जिसकी बराबरी आज के क्रिकेट में करना मुश्किल है।

 
 

 

 
 
 
 
 

 

 
 
 
 
 
 
 
 
 

 

 
 
 

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सलीम दुर्रानी की सबसे बड़ी प्रेरणा क्या है?

सलीम दुर्रानी की कहानी हमें बताती है कि महान खिलाड़ी सिर्फ रिकॉर्ड से महान नहीं बनते।कुछ खिलाड़ी इसलिए याद रहते हैं क्योंकि उन्होंने क्रिकेट कोखिलाड़ियों का खेल नहीं, दर्शकों का उत्सवबना दिया।दुर्रानी ऐसे ही खिलाड़ी थे।उन्होंने दर्शकों की आवाज सुनी।उनकी फरमाइश पर छक्के लगाए।बड़े मौकों पर बड़े विकेट लिए।भारत की ऐतिहासिक जीतों में योगदान दिया। और अर्जुन पुरस्कार पाने वाले पहले क्रिकेटर बने।लेकिन उनकी सबसे बड़ी विरासत शायद यह थी कि उन्होंने अपने खेल मेंखुशी और जुनूनको कभी पीछे नहीं छोड़ा।

सलीम दुरानी: तस्वीरों में उनका जीवन और करियर - स्पोर्टस्टार

आज सलीम दुर्रानी क्या कर रहे हैं?

सलीम दुर्रानी का2 अप्रैल 2023 को निधन हो चुका है, इसलिए आज वह हमारे बीच नहीं हैं। लेकिन भारतीय क्रिकेट में उनका नाम और उनकी कहानियां आज भी जिंदा हैं। उनकी विरासत उनके रिकॉर्ड में है।उनके अर्जुन अवॉर्ड में है।1971 की ऐतिहासिक वेस्टइंडीज जीत में है।

उनके 75 टेस्ट विकेटों में है।उनके 1,202 टेस्ट रनों में है।और सबसे ज्यादा उन हजारों दर्शकों की यादों में है, जो स्टेडियम से एक ही आवाज लगाते थे सलीम… एक छक्का!” और दुर्रानी का बल्ला जवाब देता था।शायद यही वजह है कि भारतीय क्रिकेट में कुछ नाम आंकड़ों से नहीं, कहानियों से अमर होते हैं।सलीम दुर्रानी उन्हीं नामों में से एक हैं।