सॉफ्टवेयर के कमाल से चार राज्यों के तीन धर्मों के किडनी मरीजों को मिली नई जिंदगी

Story by  मलिक असगर हाशमी | Published by  [email protected] | Date 20-08-2026
Patients suffering from various ailments across four states have been given a new lease on life, thanks to the wonders of software.
Patients suffering from various ailments across four states have been given a new lease on life, thanks to the wonders of software.

 

आवाज द वाॅयस/ नई दिल्ली

अस्पताल की चारदीवारी के बाहर चाहे जितनी नफरत की दीवारें खड़ी की जाएं, लेकिन वार्ड के भीतर जिंदगी और मौत से जंग लड़ते वक्त हर चेहरा एक जैसा हो जाता है। वहां न कोई हिंदू होता है, न मुसलमान और न ही ईसाई। वहां केवल एक ही पहचान होती है और वह है इंसानियत। हाल ही में देश की राजधानी दिल्ली में कुछ ऐसा ही मानवीय चमत्कार देखने को मिला है, जिसने मजहब और राज्यों की सारी सरहदों को पार कर एक मिसाल कायम की है।

यह पूरी कहानी एक ऐसे सॉफ्टवेयर के इर्द-गिर्द घूमती है जिसने चार अलग-अलग धर्मों और चार दूर-दराज के राज्यों के परिवारों को आपस में जोड़ दिया। इस पूरी मेडिकल प्रक्रिया को फोर-वे किडनी स्वैप ट्रांसप्लांट कहा गया है। उत्तर भारत में इस तरह का यह पहला मामला बताया जा रहा है, जहां सॉफ्टवेयर की मदद से डोनर और मरीजों की सही जोड़ियां तय की गईं और एक ही दिन में कई सफल ऑपरेशन किए गए।

क्या था पूरा मामला और कैसे बनी बात

देश के अलग-अलग कोनों से चार ऐसे परिवार इस प्रक्रिया में जुड़े जिनके मरीजों को किडनी ट्रांसप्लांट की सख्त जरूरत थी। इन सभी मरीजों के पास अपने परिवार से डोनर भी मौजूद थे, लेकिन मेडिकल कारणों, अलग ब्लड ग्रुप या एंटीबॉडी मैच न होने की वजह से वे अपनों को सीधे किडनी नहीं दे पा रहे थे। ऐसी स्थिति में मरीजों की जान बचाना बेहद मुश्किल हो जाता है।

लेकिन आधुनिक तकनीक और एक खास सॉफ्टवेयर ने इस मुश्किल को आसान बना दिया। इस तकनीक का नाम एलायंस फॉर पेयर्ड किडनी डोनेशन यानी एपीकेडी सॉफ्टवेयर है। इसी सॉफ्टवेयर की मदद से चारों परिवारों के डोनर्स और मरीजों के मेडिकल डेटा का मिलान किया गया। इसके बाद एक ऐसा चक्र बना जिसमें हर परिवार का डोनर किसी अनजान मरीज के लिए मसीहा बन गया।

चार राज्यों और चार धर्मों की अनोखी चेन

इस मेडिकल चेन में जम्मू-कश्मीर, दिल्ली, बिहार और नागालैंड के परिवार शामिल थे। नागालैंड की 34 वर्षीय त्सुत्संगला पोंगेन को दूसरी बार किडनी ट्रांसप्लांट की जरूरत थी। उनके भाई एरिकोकबा की किडनी उनके शरीर से मैच नहीं हो रही थी क्योंकि उनके शरीर में एंटीबॉडी बन चुकी थीं।

इसी तरह जम्मू-कश्मीर के 47 वर्षीय अब्दुल रऊफ भट और उनकी बहन नाजनीन रहमान की किडनी का मिलान नहीं हो पा रहा था। दिल्ली की 46 वर्षीय शिवानी खुराना को उनके पति वरुण खुराना चिकित्सकीय कारणों से अपनी किडनी नहीं दे सकते थे। बिहार के 34 वर्षीय लाल बहादुर और उनकी पत्नी निधि कुमारी का ब्लड ग्रुप आपस में मेल नहीं खा रहा था।

जब सॉफ्टवेयर ने इन सभी के आंकड़ों का विश्लेषण किया तो एक अद्भुत और सटीक जोड़ी सामने आई। दिल्ली के वरुण खुराना ने अपनी किडनी नागालैंड की त्सुत्संगला पोंगेन को दी। नागालैंड के एरिकोकबा पोंगेन ने बिहार के लाल बहादुर की जान बचाई। बिहार की निधि कुमारी ने जम्मू-कश्मीर के अब्दुल रऊफ भट को अपनी किडनी दान की।

वहीं, जम्मू-कश्मीर की नाजनीन रहमान भट ने दिल्ली की शिवानी खुराना को नया जीवन दिया। इस तरह चारों परिवारों ने एक-दूसरे का हाथ थाम लिया और किसी भी रिश्ते या खून के बंधन के बिना एक मजबूत मानवीय श्रृंखला तैयार हो गई।

ff

मेडिकल के साथ कानूनी चुनौतियां भी थीं बड़ी

इस तरह के फोर-वे किडनी एक्सचेंज को अमलीजामा पहनाना आसान नहीं था। मेडिकल जांच के साथ-साथ कानूनी अड़चनें भी बहुत थीं। भारत के नियमों के तहत ऑर्गन ट्रांसप्लांट के लिए कई तरह की कानूनी और प्रशासनिक प्रक्रियाएं पूरी करनी होती हैं। दस्तावेजों की लंबी फेरिस्त थी और बार-बार कोर्ट के सामने प्रस्तुतियां देनी पड़ीं।

मामले की जटिलता को देखते हुए दिल्ली उच्च न्यायालय का रुख करना पड़ा। कई महीनों की कानूनी और प्रशासनिक मशक्कत के बाद जब अदालत से हरी झंडी मिली, तब जाकर आगे की मेडिकल तैयारियां शुरू हो सकीं। इस पूरी प्रक्रिया में डॉक्टरों की टीम ने दिन-रात मेहनत की।

मैक्स अस्पताल में चली मैराथन सर्जरी

दक्षिणी दिल्ली के साकेत स्थित मैक्स सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल में यह पूरा ट्रांसप्लांट हुआ। अस्पताल के नेफ्रोलॉजी एवं रीनल ट्रांसप्लांट मेडिसिन विभाग के प्रमुख प्रोफेसर डॉक्टर दिनेश खुल्लर और यूरोलॉजी विभाग के प्रमुख प्रोफेसर डॉक्टर अनंत कुमार के नेतृत्व में डॉक्टरों की विशेषज्ञ टीम ने इस काम को अंजाम दिया।

अस्पताल से मिली जानकारी के अनुसार, गत 13 जुलाई को सुबह करीब सात बजे से यह सिलसिला शुरू हुआ। पांच अलग-अलग ऑपरेशन थिएटर में एक साथ आठ सर्जरी की गईं। सुबह सात बजे से लेकर शाम करीब छह बजे तक चले इस मैराथन ऑपरेशन में चार डोनर्स के शरीर से सुरक्षित तरीके से किडनी निकाली गई और फिर चार अलग-अलग मरीजों में उनका प्रत्यारोपण किया गया।

डॉक्टरों के मुताबिक यह प्रक्रिया बेहद संवेदनशील थी। हर एक मरीज और डोनर के लिए जरूरी इम्यूनोलॉजिकल जांच की गई ताकि किसी भी तरह का जोखिम न रहे। सर्जरी पूरी होने के बाद सभी मरीजों और डोनर्स की सेहत पर लगातार नजर रखी गई। अस्पताल के डॉक्टरों ने बताया कि सभी चारों मरीज और उनके डोनर अब पूरी तरह स्वस्थ हैं और उन्हें अस्पताल से छुट्टी मिल चुकी है।

तकनीक और इंसानियत की बड़ी जीत

यह घटना साबित करती है कि अगर तकनीक का सही इस्तेमाल किया जाए तो यह वरदान साबित हो सकती है। आज के दौर में जब समाज को बांटने वाली खबरें अक्सर सुर्खियों में रहती हैं, तब इस तरह की घटनाएं यह भरोसा दिलाती हैं कि इंसानियत अभी जिंदा है। जम्मू-कश्मीर से लेकर नागालैंड तक और बिहार से लेकर दिल्ली तक के लोगों का इस तरह आपस में जुड़ना इस बात का प्रमाण है कि दर्द और राहत का कोई मजहब नहीं होता।

डॉक्टरों का मानना है कि पेयर किडनी एक्सचेंज उन हजारों मरीजों के लिए एक बहुत बड़ी उम्मीद है जो डोनर होने के बावजूद मेडिकल मैचिंग न होने की वजह से इलाज नहीं करा पाते। यदि देश के अन्य बड़े अस्पताल भी इस तरह के सॉफ्टवेयर और स्वैप ट्रांसप्लांट की प्रक्रिया को बड़े पैमाने पर अपनाएं, तो हर साल अनगिनत लोगों कीमती जिंदगियां बचाई जा सकती हैं।