ओनिका माहेश्वरी/ नई दिल्ली
“यह खबर अगर सबसे पहले किसी को बतानी थी, तो वह मेरी उम्माची थीं।”मोहम्मद अजमल के लिए अर्जुन अवॉर्ड की खबर सिर्फ खुशी लेकर नहीं आई। यह खबर उनके जीवन के सबसे गर्व भरे पलों में से एक थी, लेकिन उसी पल उनकी आंखों के सामने उनकी मां आसिया की तस्वीर भी आ गई, वह मां, जो उनकी हर कामयाबी की सबसे बड़ी दुआगो थीं और जो यह सम्मान मिलने से महज कुछ दिन पहले इस दुनिया से चली गईं।
अजमल ने कहा, “मेरी उम्माची मेरी कामयाबी के लिए सबसे ज्यादा दुआ करती थीं। लेकिन 19 दिन पहले उनका इंतकाल हो गया। अब मुझे उनकी बहुत याद आती है। अगर वह जिंदा होतीं तो यह खबर सबसे पहले उन्हीं के साथ साझा करता।” पालक्काड के चेरपुलास्सेरी के मरयामंगलम से निकलकर भारत के सबसे बड़े एथलेटिक्स मंच तक पहुंचने वाले मोहम्मद अजमल की कहानी इसलिए भी खास है क्योंकि इसमें पदक और रिकॉर्ड जितने महत्वपूर्ण हैं, उतनी ही महत्वपूर्ण वह मां है जिसकी दुआएं अब उनके साथ नहीं, बल्कि उनकी यादों में हैं।मोहम्मद अजमल को 2026 में अर्जुन पुरस्कार के लिए चुना गया है। ट्रैक एंड फील्ड में 400 मीटर के इस धावक ने पिछले कुछ वर्षों में भारतीय एथलेटिक्स में अपनी अलग पहचान बनाई है।
फुटबॉल पसंद था, लेकिन शिक्षक ने पहचान ली दौड़ की रफ्तार
अजमल का शुरुआती सपना ट्रैक से ज्यादा फुटबॉल से जुड़ा था। चेरपुलास्सेरी के GHSS में पढ़ाई के दौरान उनका ज्यादा ध्यान फुटबॉल पर रहता था। लेकिन स्कूल के शारीरिक शिक्षा शिक्षक नंदन ने उनकी तेज रफ्तार को पहचान लिया।उन्होंने अजमल को Kalladi HS जाने के लिए प्रेरित किया।यही फैसला उनके जीवन का टर्निंग पॉइंट बन गया। अजमल ने स्कूल स्तर पर 100 मीटर और 200 मीटर में राज्य और राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में स्वर्ण पदक जीते। जिस लड़के की शुरुआत फुटबॉल से हुई थी, वह धीरे-धीरे ट्रैक पर अपनी पहचान बनाने लगा।स्कूल के बाद उन्होंने MA College, Kothamangalam का रुख किया। यहां प्रसिद्ध कोच Peter Paul ने उनके एथलेटिक्स करियर को दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।आज अजमल कोच Jaison Dawson की निगरानी में प्रशिक्षण लेते हैं और लगातार अपने प्रदर्शन को बेहतर बनाने की कोशिश कर रहे हैं।

100 मीटर से 400 मीटर तक का सफर
अजमल ने अपने करियर की शुरुआत 100 मीटर स्प्रिंटर के रूप में की थी। लेकिन कोचों ने उनकी क्षमता को देखते हुए उन्हें 400 मीटर की ओर मोड़ा।और 400 मीटर की पहली ही रेस ने संकेत दे दिया कि इस धावक में कुछ खास है।नेशनल सर्विसेज चैंपियनशिप में उन्होंने 46.91 सेकंड का समय निकालकर स्वर्ण पदक जीता। अपने इवेंट बदलने के फैसले को लेकर अजमल ने एक इंटरव्यू में कहा था कि भारत में 400 मीटर में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने का मौका अपेक्षाकृत ज्यादा है, जबकि 100 मीटर में जगह बनाने के लिए असाधारण स्तर का प्रदर्शन करना पड़ता है।यानी यह सिर्फ इवेंट बदलने की कहानी नहीं थी। यह अपने लिए सही रास्ता चुनने की कहानी भी थी।
अजमल ने इसके बाद पीछे मुड़कर नहीं देखा।2021 में उन्होंने इंटर-सर्विसेज चैंपियनशिप में 46.91 सेकंड के समय के साथ स्वर्ण पदक जीता।2022 में Indian Grand Prix में 46.78 सेकंड के समय के साथ स्वर्ण अपने नाम किया।इसके बाद National Inter-State Senior Athletics Championship में उन्होंने 46.48 सेकंड का समय निकालकर रजत पदक जीता।तुर्की के Atatürk University Stadium में आयोजित 7th International Sprint & Relay Cup में उन्होंने 46.04 सेकंड के समय के साथ तीसरा स्थान हासिल किया। लेकिन अजमल के लिए लक्ष्य केवल पदक जीतना नहीं था।उनकी नजर केरल के ही धावक मोहम्मद अनस याहिया के 45.21 सेकंड के राष्ट्रीय रिकॉर्ड पर थी।
“Hear the bang and just run”
अजमल का एक छोटा-सा मंत्र है“Hear the bang and just run.” यानी स्टार्टर की आवाज सुनो और बस दौड़ पड़ो।शायद यही सादगी उनके खेल की पहचान भी है। ट्रैक पर कोई अनावश्यक दिखावा नहीं—सिर्फ स्टार्टिंग ब्लॉक, 400 मीटर की चुनौती और फिनिश लाइन तक खुद को पूरी तरह झोंक देने का संकल्प।400 मीटर में उनका व्यक्तिगत सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन 45.36 सेकंड है, जो उन्होंने 2023 में एशियन एथलेटिक्स चैंपियनशिप में दर्ज किया था।
जब अजमल सिर्फ धावक नहीं, इतिहास का हिस्सा बन गए
अजमल की पहचान केवल व्यक्तिगत 400 मीटर धावक के तौर पर नहीं बनी। भारतीय 4×400 मीटर रिले टीम ने उन्हें देश के सबसे महत्वपूर्ण रिले धावकों में शामिल कर दिया। 2023 में भारतीय टीम—मोहम्मद अनस याहिया, अमोज जैकब, मोहम्मद अजमल वेरियाथोडी और राजेश रमेश—ने एशियन गेम्स में 4×400 मीटर रिले का स्वर्ण पदक जीता।
भारतीय टीम ने 3:01.58 सेकंड का समय निकाला और भारत के लिए एथलेटिक्स में एक और शानदार स्वर्ण जोड़ा।इसी वर्ष एशियन एथलेटिक्स चैंपियनशिप में भारत ने 4×400 मीटर रिले में 3:01.80 सेकंड के साथ रजत पदक जीता। अजमल उस टीम का हिस्सा थे। लेकिन उनकी सबसे बड़ी अंतरराष्ट्रीय उपलब्धियों में से एक आई बुडापेस्ट में आयोजित 2023 World Athletics Championships में।भारतीय 4×400 मीटर रिले टीम ने 2:59.05 सेकंड का समय निकाला।
इस प्रदर्शन के साथ टीम ने उस समय का एशियाई रिकॉर्ड तोड़ा और विश्व चैंपियनशिप के फाइनल में पहुंचकर इतिहास रच दिया। यह पहली बार था जब भारत की पुरुष 4×400 मीटर रिले टीम विश्व चैंपियनशिप के फाइनल तक पहुंची थी। World Athletics के रिकॉर्ड में 2:59.05 सेकंड का प्रदर्शन भारतीय राष्ट्रीय रिकॉर्ड के रूप में दर्ज है।
अजमल उस ऐतिहासिक चौकड़ी का हिस्सा थे मोहम्मद अनस याहिया, अमोज जैकब, मोहम्मद अजमल वेरियाथोडी और राजेश रमेश।उस रात उन्होंने सिर्फ 400 मीटर नहीं दौड़ा था।उन्होंने भारतीय एथलेटिक्स के इतिहास में अपना नाम दर्ज कराया था।

एशियन गेम्स में स्वर्ण, फिर एशिया की बड़ी चुनौती
2023 उनके करियर का बेहद महत्वपूर्ण साल रहा।एशियन गेम्स में पुरुषों की 4×400 मीटर रिले टीम ने स्वर्ण पदक जीता। इसके अलावा अजमल ने मिश्रित 4×400 मीटर रिले में भी भारत का प्रतिनिधित्व किया और रजत पदक जीतने वाली टीम का हिस्सा रहे। एशियन एथलेटिक्स चैंपियनशिप में 400 मीटर व्यक्तिगत स्पर्धा में उन्होंने 45.36 सेकंड के साथ चौथा स्थान हासिल किया।यानी अजमल का सफर केवल रिले की सफलता तक सीमित नहीं था। वह व्यक्तिगत 400 मीटर में भी लगातार भारत के शीर्ष धावकों के बीच अपनी जगह मजबूत कर रहे थे।
मां का जाना: सबसे बड़ी खुशी के बीच सबसे बड़ा दर्द
लेकिन खेल की दुनिया में रिकॉर्ड और पदक सब कुछ नहीं होते।कभी-कभी एक फोन कॉल पूरी जिंदगी बदल देता है।अजमल की मां आसिया का 19 जुलाई को निधन हो गया।अजमल बताते हैं कि उनकी मां उस दिन तक बिल्कुल स्वस्थ दिखाई दे रही थीं। रात में अचानक उनके सीने में दर्द हुआ। परिवार उन्हें अस्पताल लेकर पहुंचा, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।
अजमल के लिए यह सिर्फ मां को खोना नहीं था।उन्होंने अपने सफर की सबसे बड़ी समर्थक को खो दिया था।वह अपने माता-पिता और भाइयों से बेहद करीब रहे हैं। अपने करियर के उतार-चढ़ाव में परिवार का विश्वास उनके लिए लगातार ताकत बना रहा।और फिर आया अर्जुन अवॉर्ड का सम्मान।एक तरफ देश का प्रतिष्ठित खेल सम्मान।
दूसरी तरफ मां की अनुपस्थिति।इसलिए अजमल के लिए यह पुरस्कार केवल ट्रॉफी या प्रमाणपत्र नहीं है। यह उस परिवार के विश्वास की पहचान है जिसने एक छोटे शहर के लड़के के सपने पर भरोसा किया।उन्होंने कहा, “मैंने इस सम्मान की उम्मीद नहीं की थी। जब मुझे यह मिला तो यह मेरे लिए बहुत खास एहसास था। मैं अपने माता-पिता और भाइयों का बेहद आभारी हूं, जिन्होंने मुझ पर विश्वास किया। उनके समर्थन के बिना मैं यहां तक नहीं पहुंच सकता था।”
परिवार की दुआ से देश की उम्मीद तक
अजमल की कहानी को केवल एक मुस्लिम खिलाड़ी की सफलता के तौर पर देखना शायद उनकी कहानी को छोटा कर देना होगा।यह एक ऐसे भारतीय खिलाड़ी की कहानी है जो केरल के पालक्काड से निकलता है, स्कूल में फुटबॉल खेलना चाहता है, एक शिक्षक उसकी दौड़ की रफ्तार पहचानता है, 100 और 200 मीटर से शुरुआत करता है, फिर 400 मीटर चुनता है और धीरे-धीरे भारतीय रिले टीम की रीढ़ का हिस्सा बन जाता है।
यह उस खिलाड़ी की कहानी है जिसने 400 मीटर में 45.36 सेकंड का व्यक्तिगत सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया, एशियन गेम्स में स्वर्ण जीता, एशियन एथलेटिक्स चैंपियनशिप में रजत जीता और विश्व चैंपियनशिप में भारत की ऐतिहासिक 4×400 मीटर रिले टीम का हिस्सा बना।और यह उस बेटे की कहानी भी है जो आज जब अपने सबसे बड़े सम्मानों में से एक को देखता है, तो उसे सबसे पहले अपनी मां की याद आती है।
अभी मंजिल बाकी है
अर्जुन अवॉर्ड अजमल की यात्रा का अंत नहीं है।यह उस सफर में एक पड़ाव है, जहां उनकी निगाह अब और तेज समय, बड़े अंतरराष्ट्रीय पदकों और राष्ट्रीय रिकॉर्ड पर है।वह मोहम्मद अनस याहिया के 45.21 सेकंड के राष्ट्रीय रिकॉर्ड को पीछे छोड़ना चाहते हैं।ट्रैक पर उनकी कहानी अभी जारी है।स्टार्टिंग गन की आवाज अभी बाकी है।और अजमल का मंत्र भी वही है“Hear the bang and just run.”
क्योंकि शायद यही अजमल की पूरी कहानी हैदौड़ते रहो, चाहे पीछे छूटती चीजें कितनी भी अपनी क्यों न हों।मां अब साथ नहीं हैं, लेकिन उनकी दुआओं की याद अजमल के हर कदम में है।और जब वह अगली बार ट्रैक पर उतरेंगे, तो शायद 400 मीटर की उस दौड़ में सिर्फ एक एथलीट नहीं दौड़ेगा।एक बेटे का सपना भी दौड़ेगा अपनी उम्माची के लिए।