मलिक असगर हाशमी/ नई दिल्ली
बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों पर बढ़ते हमलों और धार्मिक स्थलों में तोड़फोड़ की घटनाओं के बीच वहां की नई सरकार ने पहली बार सख्त राजनीतिक संदेश दिया है। धार्मिक मामलों के मंत्री काजी शाह मोफज्जल हुसैन कैकोबाद ने साफ कहा है कि अगर देश में हिंदू, बौद्ध और ईसाई अल्पसंख्यकों पर अत्याचार नहीं रुके तो वह मंत्री पद छोड़ने तक के लिए तैयार हैं। उनका यह बयान ऐसे समय आया है जब बांग्लादेश में कट्टरपंथी संगठनों की गतिविधियों और सांप्रदायिक तनाव को लेकर लगातार चिंता बढ़ रही है।

ढाका सचिवालय में बांग्लादेश सेक्रेटेरिएट रिपोर्टर्स फोरम के कार्यक्रम में बोलते हुए कैकोबाद ने कहा कि सरकार किसी भी अल्पसंख्यक समुदाय के खिलाफ हिंसा, अन्याय और उत्पीड़न को बर्दाश्त नहीं करेगी। उन्होंने कहा कि अगर जरूरत पड़ी तो वह मंत्री पद छोड़ देंगे लेकिन अल्पसंख्यकों के खिलाफ अत्याचार स्वीकार नहीं करेंगे। उनका यह बयान बांग्लादेश की राजनीति में एक महत्वपूर्ण संदेश माना जा रहा है क्योंकि पिछले कुछ वर्षों में अल्पसंख्यकों पर हमलों की घटनाएं लगातार सामने आती रही हैं।
बांग्लादेश में हिंदू सबसे बड़ा अल्पसंख्यक समुदाय है। उनकी आबादी करीब आठ प्रतिशत मानी जाती है। इसके अलावा बौद्ध और ईसाई समुदाय भी वहां मौजूद हैं। देश की कुल आबादी में मुस्लिम समुदाय लगभग 91प्रतिशत है। मानवाधिकार संगठनों और विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार बीते दो वर्षों में अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा में तेजी आई है। खासकर अगस्त 2024में शेख हसीना सरकार के पतन के बाद हालात और बिगड़े।
रिपोर्टों के अनुसार अल्पसंख्यकों के घरों, दुकानों और मंदिरों को निशाना बनाया गया। कई इलाकों में आगजनी और लूटपाट की घटनाएं हुईं। महिलाओं के खिलाफ हिंसा और धमकाने के मामले भी सामने आए। बांग्लादेश हिंदू बौद्ध ईसाई एकता परिषद का कहना है कि इन हमलों के पीछे अक्सर जमीन कब्जाने और सामाजिक दबाव बनाने की कोशिश होती है। परिषद के मुताबिक करीब 70से 75प्रतिशत घटनाएं संपत्ति और जमीन हड़पने से जुड़ी होती हैं।
भारतीय विदेश मंत्रालय ने भी मार्च 2026 में संसद में जानकारी दी थी कि अगस्त 2024से फरवरी 2026के बीच बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों के खिलाफ 3100से अधिक घटनाएं दर्ज हुईं। इनमें घरों और व्यापारिक प्रतिष्ठानों पर हमले, मंदिरों में तोड़फोड़ और शारीरिक हिंसा शामिल है। भारत ने ढाका प्रशासन से इन मामलों में सख्त कार्रवाई की मांग की है।
साल 2026 की शुरुआत से ही कई गंभीर घटनाएं सामने आ चुकी हैं। अप्रैल में कॉक्स बाजार में हिंदू पुजारी और मंदिर के देखरेख करने वाले नयन साधु का शव पेड़ से लटका मिला। मार्च में गोपाल चंद्र नामक व्यक्ति की गला रेतकर हत्या कर दी गई। रंगपुर और रंगुनिया क्षेत्रों में अफवाहों के बाद हिंदू परिवारों और मंदिरों को निशाना बनाया गया। इन घटनाओं ने अल्पसंख्यक समुदाय में डर का माहौल पैदा कर दिया है।
हालांकि बांग्लादेश सरकार कई मामलों को सांप्रदायिक हिंसा मानने से बचती रही है। प्रशासन अक्सर इन्हें व्यक्तिगत विवाद या सामान्य आपराधिक घटनाएं बताता है। लेकिन अब धार्मिक मामलों के मंत्री का बयान सरकार के भीतर चिंता और दबाव दोनों को दिखाता है। कैकोबाद ने कहा कि सरकार सभी नागरिकों की सुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध है और किसी को भी कानून हाथ में लेने की अनुमति नहीं दी जाएगी।
भारत में मुसलमानों की स्थिति से जुड़े सवाल पर भी कैकोबाद ने टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि वह भारत का सम्मान करते हैं क्योंकि वहां लोकतांत्रिक व्यवस्था मजबूत है। लेकिन भारत को और अधिक सम्मान तब मिलेगा जब वहां अल्पसंख्यकों को बराबरी और सुरक्षा का पूरा अधिकार मिलेगा। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि भारत में जो कुछ हो रहा है उसे बांग्लादेश में दोहराने की अनुमति नहीं दी जाएगी।
उनके इस बयान को बांग्लादेश के कट्टरपंथी संगठनों के लिए सीधी चेतावनी माना जा रहा है। हाल के दिनों में पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव और भारत में मुसलमानों से जुड़े मुद्दों को लेकर बांग्लादेश में कई कट्टरपंथी समूह सक्रिय दिखाई दिए थे। ऐसे माहौल में मंत्री का यह कहना कि बांग्लादेश में किसी भी समुदाय पर अत्याचार नहीं होने दिया जाएगा, राजनीतिक रूप से अहम माना जा रहा है।
अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों ने मंत्री के बयान का स्वागत किया है लेकिन साथ ही आशंका भी जताई है कि सिर्फ बयान से स्थिति नहीं बदलेगी। ढाका के एक हिंदू संगठन के नेता ने कहा कि मंत्री की बात से कुछ भरोसा जरूर बढ़ा है लेकिन असली परीक्षा दुर्गा पूजा जैसे बड़े धार्मिक आयोजनों के दौरान होगी। उनका कहना है कि जब तक समाज की सोच नहीं बदलेगी तब तक डर बना रहेगा।
विश्लेषकों का मानना है कि बांग्लादेश में सांप्रदायिक तनाव केवल धार्मिक मुद्दा नहीं है। इसके पीछे राजनीति, स्थानीय सत्ता संघर्ष और जमीन कब्जाने की मानसिकता भी बड़ी वजह है। कई बार चुनावी माहौल या राजनीतिक अस्थिरता के दौरान अल्पसंख्यक सबसे आसान निशाना बन जाते हैं। दोषियों को सजा नहीं मिलने से भी ऐसे तत्वों का मनोबल बढ़ता है।
मानवाधिकार संगठनों ने बांग्लादेश सरकार से मांग की है कि अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के लिए विशेष कानून लागू किए जाएं और मंदिरों तथा धार्मिक स्थलों की सुरक्षा बढ़ाई जाए। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इस मुद्दे पर चिंता जताई जा रही है। भारत समेत कई देशों ने ढाका प्रशासन से निष्पक्ष जांच और दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग की है।

काजी शाह मोफज्जल हुसैन कैकोबाद का बयान फिलहाल बांग्लादेश के अल्पसंख्यकों के लिए उम्मीद की एक नई किरण माना जा रहा है। लेकिन असली सवाल यह है कि क्या सरकार जमीन पर हालात बदल पाएगी। क्या कट्टरपंथी समूहों पर वास्तव में लगाम लगेगी। क्या अल्पसंख्यक बिना डर के अपने त्योहार मना पाएंगे। आने वाले महीनों में इन सवालों के जवाब ही तय करेंगे कि मंत्री की चेतावनी केवल बयान थी या फिर बदलाव की शुरुआत।