ईमान सकीना
आज जब इस्लाम में महिलाओं की भूमिका पर चर्चा होती है तो अक्सर बात केवल हिजाब, पर्दा या घरेलू जिम्मेदारियों तक सीमित कर दी जाती है। बहुत कम लोग इस्लामी इतिहास के उस मजबूत अध्याय को याद करते हैं जिसमें मुस्लिम महिलाओं ने शिक्षा, ज्ञान और बौद्धिक नेतृत्व के क्षेत्र में बड़ी भूमिका निभाई। सच यह है कि इस्लामी सभ्यता की नींव रखने वालों में महिलाओं का योगदान भी उतना ही महत्वपूर्ण रहा जितना पुरुषों का।
इस्लाम के शुरुआती दौर से ही ज्ञान को सबसे बड़ी नेमत माना गया। कुरआन की पहली वह्यी का पहला शब्द था “इक़रा” यानी पढ़ो। यह केवल एक आदेश नहीं था। यह पूरी इंसानी सभ्यता के लिए संदेश था कि ज्ञान इंसान की तरक्की का रास्ता है। पैगंबर मुहम्मद ने भी इल्म हासिल करने को हर मुसलमान के लिए जरूरी बताया। इसमें कहीं यह नहीं कहा गया कि ज्ञान केवल पुरुषों का अधिकार है।

पैगंबर के दौर में महिलाएं मस्जिदों में आती थीं। धार्मिक बैठकों में हिस्सा लेती थीं। सवाल पूछती थीं। कई रिवायतों में आता है कि महिलाओं ने पैगंबर से अलग समय तय करने की गुजारिश की ताकि वे आसानी से धार्मिक बातें सीख सकें। यह उस समाज की तस्वीर थी जहां महिलाओं की शिक्षा को महत्व दिया जा रहा था।
उम्मुल मोमिनीन हजरत आयशा इस्लामी इतिहास की सबसे बड़ी महिला विद्वानों में गिनी जाती हैं। उन्होंने हजारों हदीसों को आगे पहुंचाया। बड़े बड़े सहाबी उनसे मसले पूछने आते थे। फिक्ह, हदीस, समाज और पारिवारिक जीवन से जुड़े कई महत्वपूर्ण ज्ञान उन्हीं के जरिए उम्मत तक पहुंचे। उनकी विद्वता इतनी गहरी थी कि इस्लामी इतिहास में उन्हें पहली महिला फकीहों में शामिल किया जाता है।
हजरत आयशा अकेली मिसाल नहीं थीं। इस्लामी इतिहास में हजारों महिलाओं ने हदीस, तफ्सीर, फिक्ह और अरबी साहित्य के क्षेत्र में योगदान दिया। मक्का, मदीना, दमिश्क, बगदाद, काहिरा और अंदलुस जैसे शहरों में महिला विद्वानों की बड़ी मौजूदगी थी। वे केवल छात्राएं नहीं थीं। वे शिक्षिका भी थीं। उनके पास पुरुष छात्र भी पढ़ने आते थे।
करीमा अल मरवजिया का नाम इस संदर्भ में बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। वह सहीह अल बुखारी की बड़ी विद्वान थीं। कई मशहूर पुरुष आलिमों ने उनसे हदीस की शिक्षा ली। उनकी रिवायत को भरोसेमंद माना जाता था। इसी तरह फातिमा अल समरकंदी इस्लामी कानून और फिक्ह की विशेषज्ञ मानी जाती थीं। उनके ज्ञान का सम्मान दूर दूर तक था।
पुराने इस्लामी दस्तावेज बताते हैं कि कई महिला विद्वानों ने बाकायदा इजाजत यानी शिक्षण प्रमाण पत्र जारी किए। इसका मतलब यह था कि वे दूसरों को पढ़ाने और धार्मिक ज्ञान आगे बढ़ाने के योग्य मानी जाती थीं। यह उस दौर की बात है जब दुनिया के कई हिस्सों में महिलाओं को औपचारिक शिक्षा तक का अधिकार नहीं मिला था।
इस्लामी सभ्यता में शिक्षा केवल नौकरी पाने का जरिया नहीं थी। उसे इबादत समझा जाता था। यही वजह थी कि पुस्तकालय, मदरसे और अध्ययन केंद्र तेजी से विकसित हुए। महिलाएं भी इस माहौल का हिस्सा बनीं। कुछ महिलाओं ने शिक्षण संस्थान स्थापित किए। कुछ ने छात्रों को पढ़ाया। कुछ ने धार्मिक और सामाजिक ज्ञान को संरक्षित किया।

फातिमा अल फिहरी का नाम इतिहास में खास महत्व रखता है। उन्होंने मोरक्को के फ़ेज़ शहर में अल कराविय्यीन विश्वविद्यालय की स्थापना की। इसे दुनिया के सबसे पुराने लगातार चलने वाले विश्वविद्यालयों में गिना जाता है। यह केवल एक इमारत नहीं थी। यह उस सोच का प्रतीक था जिसमें एक मुस्लिम महिला शिक्षा को समाज की सबसे बड़ी जरूरत मान रही थी।
धीरे धीरे कई समाजों में संस्कृति ने धर्म पर असर डालना शुरू किया। कुछ सामाजिक परंपराओं ने महिलाओं की शिक्षा को सीमित कर दिया। ज्ञान को पुरुषों का क्षेत्र समझा जाने लगा। जबकि इस्लामी इतिहास खुद इस सोच के खिलाफ था। यही कारण है कि बाद की पीढ़ियों में यह गलत धारणा पैदा हुई कि महिलाओं का धार्मिक शिक्षा में आगे आना कोई नई या विवादित बात है।
आज दुनिया भर में मुस्लिम महिलाएं फिर से अपने इस बौद्धिक इतिहास को पहचान रही हैं। वे कुरआन, हदीस, अरबी भाषा और इस्लामी कानून पढ़ा रही हैं। विश्वविद्यालयों, मदरसों, ऑनलाइन मंचों और सामाजिक संस्थाओं में उनकी सक्रिय भूमिका दिखाई दे रही है। कई महिलाएं रिसर्चर हैं। कई लेखिका हैं। कई काउंसलर और शिक्षिका के रूप में नई पीढ़ी का मार्गदर्शन कर रही हैं।
आधुनिक दौर में मुस्लिम समाज कई चुनौतियों का सामना कर रहा है। सोशल मीडिया पर गलत जानकारियां तेजी से फैलती हैं। धार्मिक मुद्दों को लेकर भ्रम बढ़ता है। पहचान का संकट भी सामने आता है। ऐसे समय में शिक्षित महिलाओं की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। क्योंकि परिवार और समाज की पहली शिक्षा अक्सर मां के हाथों से ही शुरू होती है।
मुस्लिम महिलाएं आज केवल घर तक सीमित भूमिका नहीं निभा रहीं। वे लेखन कर रही हैं। रिसर्च कर रही हैं। सामाजिक कार्यों में हिस्सा ले रही हैं। मानसिक स्वास्थ्य, शिक्षा और नैतिक मार्गदर्शन जैसे क्षेत्रों में भी उनका योगदान बढ़ रहा है। यह इस्लाम की मूल भावना के अनुरूप है जहां ज्ञान को इंसान की सबसे बड़ी ताकत माना गया।
असल सवाल यह नहीं है कि मुस्लिम महिलाओं को शिक्षा की अनुमति दी जाए या नहीं। इस्लाम ने तो सदियों पहले ही उन्हें यह सम्मान दे दिया था। जरूरत इस बात की है कि समाज अपने इतिहास को ईमानदारी से याद करे। महिलाओं की शिक्षा को आधुनिक फैशन या पश्चिमी सोच मानने के बजाय उसे इस्लामी परंपरा का हिस्सा समझे।
मस्जिदों, मदरसों और शिक्षण संस्थानों को ऐसा माहौल बनाना चाहिए जहां महिलाएं सम्मान के साथ पढ़ सकें और पढ़ा सकें। परिवारों को बेटियों की शिक्षा को भी उतनी ही अहमियत देनी चाहिए जितनी बेटों की पढ़ाई को दी जाती है। ज्ञान केवल रोजगार का साधन नहीं है। यह इंसान की सोच और समाज की दिशा तय करता है।
इस्लामी इतिहास की महिला विद्वान यह साबित करती हैं कि शिक्षा और आस्था एक दूसरे के विरोध में नहीं हैं। बल्कि दोनों मिलकर समाज को मजबूत बनाते हैं। एक ऐसी सभ्यता जिसने हजारों महिला विद्वान पैदा कीं, वह यह दावा नहीं कर सकती कि शिक्षित मुस्लिम महिलाएं कोई अपवाद हैं। सच यह है कि वे उसी गौरवशाली परंपरा की निरंतरता हैं जिसने इस्लामी इतिहास को ज्ञान, संतुलन और सभ्यता की पहचान दी।