मलिक असगर हाशमी/नई दिल्ली
कभी-कभी इतिहास अपने आप को बहुत दिलचस्प तरीके से दोहराता है। भारत में जब भी सड़कों, चौराहों या शहरों के नाम बदले जाते हैं, तो एक बड़ी बहस छिड़ जाती है। राजनीति गरमा जाती है और लोग इसे इतिहास को बदलने की कोशिश बताने लगते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अक्सर कहते हैं कि किसी भी देश को अपनी विरासत को नहीं भूलना चाहिए। पुरानी गलतियों को सुधारना और अपनी जड़ों की तरफ लौटना आत्मसम्मान की निशानी है।

भारत में इसी सोच के तहत कई ऐतिहासिक जगहों के पुराने नाम वापस रखे जा रहे हैं। लेकिन अब ठीक ऐसा ही कुछ भारत के पड़ोसी और धुर विरोधी देश पाकिस्तान में भी हो रहा है। पाकिस्तान के पंजाब प्रांत की सरकार ने एक ऐसा बड़ा फैसला लिया है, जिसे सुनकर भारत के वो लोग जरूर चौंक जाएंगे जो नाम बदलने की प्रक्रिया का हमेशा विरोध करते हैं।
पाकिस्तान के ऐतिहासिक शहर लाहौर में एक बड़ी सांस्कृतिक हलचल देखने को मिल रही है। वहां की सरकार ने नौ प्रमुख जगहों के नाम बदलकर उनके पुराने और ऐतिहासिक नाम वापस रख दिए हैं। इनमें कई नाम ऐसे हैं जो हिंदू, सिख, जैन और ब्रिटिश काल की याद दिलाते हैं।
विभाजन के बाद के दशकों में इन जगहों के नाम बदलकर इस्लामी या पाकिस्तानी पहचान दे दी गई थी। अब करीब आठ दशकों के बाद लाहौर अपनी पुरानी साझी विरासत को गले लगा रहा है। सबसे खास बात यह है कि इस बदलाव को लेकर वहां किसी कट्टरपंथी संगठन ने कोई हंगामा या विरोध प्रदर्शन नहीं किया है।
लाहौर के जिन नौ इलाकों और चौराहों के नाम बदले गए हैं, उनकी सूची काफी दिलचस्प है। इस बदलाव के तहत 'इस्लामपुरा' का नाम अब फिर से बदलकर 'कृष्णनगर' कर दिया गया है। इसी तरह 'बाबरी मस्जिद चौक' का नाम अब दोबारा 'जैन मंदिर चौक' रख दिया गया है।
'सुन्नतनगर' को अब उसके पुराने नाम 'संतनगर' से जाना जाएगा। 'मुस्तफाबाद' का नाम बदलकर एक बार फिर 'धर्मपुरा' कर दिया गया है। इसके अलावा 'मौलाना जफर अली खान चौक' का नाम बदलकर 'लक्ष्मी चौक' कर दिया गया है।
लाहौर में 9 जगहों के नाम बदले: इस्लामपुरा का नाम बदलकर कृष्णनगर हुआ, बाबरी चौक बना जैन मंदिर चौक...
— The Credible News (@TCNLive2025) May 18, 2026
इन 9 जगहों के बदले नाम -
- सुन्नतनगर का नाम बदलकर संतनगर कर दिया गया है।
- मौलाना जफर चौक का नाम बदलकर लक्ष्मी चौक कर दिया गया है।
- बाबरी मस्जिद चौक का नाम बदलकर जैन मंदिर चौक… pic.twitter.com/49msT15ciB
'सर आगा खान रोड' को अब उसका पुराना नाम 'डेविस रोड' मिल गया है। 'फातिमा जिन्ना रोड' का नाम बदलकर 'क्वींस रोड' किया गया है। मशहूर 'बाग-ए-जिन्ना' को अब उसके पुराने औपनिवेशिक नाम 'लॉरेंस रोड' या लॉरेंस गार्डन के रूप में पहचान मिली है। इसके साथ ही 'काफिला गुर्जर' का नाम अब 'केसर रोड' हो गया है।
इस बड़े फैसले के पीछे पाकिस्तान के पंजाब प्रांत की मुख्यमंत्री मरियम नवाज की सरकार है। कुछ दिनों पहले मुख्यमंत्री मरियम नवाज की अध्यक्षता में हुई पंजाब कैबिनेट की बैठक में इस योजना को मंजूरी दी गई थी। सरकार का मुख्य मकसद लाहौर की उस पुरानी विरासत को वापस लाना है जो विभाजन के बाद वक्त के साथ धुंधली पड़ गई थी।
सरकारी अधिकारियों के मुताबिक पिछले दो महीनों के भीतर लाहौर के कई हिस्सों में इन पुराने नामों के नए साइनबोर्ड भी लगा दिए गए हैं। यह पूरी मुहिम लाहौर की उस बहुसांस्कृतिक पहचान को स्वीकार करने की कोशिश है,जिसमें कभी मुस्लिम, हिंदू, सिख, जैन और ईसाई सभी एक साथ रहते थे।
दिलचस्प बात यह है कि कागजों में नाम बदलने के बावजूद लाहौर के आम लोगों के दिल और जुबान से ये पुराने नाम कभी गायब ही नहीं हुए थे। लाहौर की ऐतिहासिक दीवारों वाले शहर के मामलों से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि प्रशासन ने भले ही सालों पहले इन जगहों के नाम बदल दिए थे, लेकिन जनता इन्हें हमेशा पुराने नामों से ही बुलाती रही।
चाय बेचने वाले, दुकानदार, रिक्शा चालक और स्थानीय निवासी आपस में बातचीत के लिए हमेशा लक्ष्मी चौक या कृष्णनगर जैसे नामों का ही इस्तेमाल करते थे। लोगों के लिए यह नाम किसी धर्म से ज्यादा उनकी पीढ़ियों की यादों और शहर के भूगोल से जुड़े हुए थे। लाहौर के एक विश्वविद्यालय के शिक्षक ने इस पर खुशी जताते हुए कहा कि वे हमेशा से इसे लक्ष्मी चौक ही कहते आए हैं, क्योंकि उनके पिता भी इसे इसी नाम से पुकारते थे। नगर निगम के कागजों में चाहे जो भी नाम रहा हो, आम लोगों के लिए लक्ष्मी चौक उनकी साझी विरासत का हिस्सा है।
लाहौर शहर का उपमहाद्वीप के इतिहास में एक बेहद खास और भावुक स्थान रहा है। अमृतसर से महज 50किलोमीटर दूर स्थित यह शहर कभी सभी धर्मों के पंजाबियों का एक साझा सांस्कृतिक घर था। इसके तंग बाजार, पुराने कॉलेज, खूबसूरत बाग-बगीचे, अखाड़े, मंदिर और गुरुद्वारे उस दौर के गवाह हैं जब सरहदें नहीं खिंची थीं।
साल 1947में हुए विभाजन के बाद लाहौर का ताना-बाना पूरी तरह बदल गया। हिंसा के दौर में बहुसंख्यक हिंदू और सिख परिवारों को अपना यह प्यारा शहर छोड़कर भारत आना पड़ा। इसके बाद के सालों में वहां एक तरह का इस्लामीकरण का दौर चला। हिंदू और सिख इतिहास से जुड़े प्रतीकों और जगहों के नाम धीरे-धीरे मिटाकर नए नाम रख दिए गए। लेकिन शहर की रूह ने इस बदलाव को पूरी तरह कभी स्वीकार नहीं किया।
One news report says Lahore is witnessing a symbolic renaming drive, with several places reverting from Islamic era names to older Hindu or colonial era identities.
— Ashok Upadhyay (@ashoupadhyay) May 17, 2026
Some of the reported changes:
• Islampura → Krishnanagar
• Babri Chowk → Jain Mandir Chowk
• Mustafabad →…
अब सरकार की तरफ से जो सुधार की कोशिशें हो रही हैं, वे सिर्फ नाम बदलने तक सीमित नहीं हैं। लाहौर में इस समय 100से ज्यादा मान्यता प्राप्त ऐतिहासिक इमारतों के जीर्णोद्धार का काम चल रहा है। इनमें ब्रिटिश काल की इमारतों के साथ-साथ कई पुराने चर्च और सिख साम्राज्य के समय के ढांचे भी शामिल हैं।
महाराजा रणजीत सिंह के काल से जुड़ी ऐतिहासिक धरोहरों को भी सहेजा जा रहा है। लाहौर के मशहूर शाही किले में सिख शाही परिवार की आखिरी वंशज राजकुमारी बंबा सदरलैंड की एक पुरानी पेंटिंग को भी पूरी तरह से रिस्टोर किया गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि अतीत में महाराजा रणजीत सिंह की प्रतिमा को नुकसान पहुंचाने जैसी घटनाएं हुई थीं, लेकिन हाल के वर्षों में वहां का माहौल काफी बदला है। अब लोग अपनी पुरानी और साझी कला-संस्कृति के प्रति अधिक उदार और संवेदनशील हो रहे हैं।
यह सांस्कृतिक पुनरुत्थान लाहौर के खेल और मनोरंजन के इतिहास को भी नया जीवन दे रहा है। पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने भी लाहौर के ऐतिहासिक क्रिकेट मैदानों और मिन्टो पार्क के पुराने कुश्ती अखाड़े को दोबारा शुरू करने का प्रस्ताव दिया है।
मिन्टो पार्क को अब ग्रेटर इकबाल पार्क कहा जाता है। विभाजन से बहुत पहले इस मैदान ने उपमहाद्वीप को कई महान खिलाड़ी दिए थे। पाकिस्तान के दिग्गज बल्लेबाज इंजमाम-उल-हक से लेकर भारत के महान क्रिकेटर लाला अमरनाथ तक ने कभी इसी जमीन पर अपनी ट्रेनिंग की थी। इस पार्क में बना वो मशहूर अखाड़ा भी कभी गामा पहलवान और इमाम बख्श जैसे महान पहलवानों की कुश्ती के दौरों से गूंजता था। विभाजन से पहले लाहौर के हिंदू परिवार हर साल इसी मैदान में बड़े पैमाने पर दशहरा का त्योहार मनाने के लिए इकट्ठा होते थे।
लाहौर के परकोटा शहर के सभी आठ ऐतिहासिक द्वारों का भी जीर्णोद्धार किया जा रहा है। इनमें भारत की तरफ खुलने वाला मशहूर दिल्ली गेट भी शामिल है। सूत्रों के मुताबिक नाम बदलने और विरासत को सहेजने का यह सिलसिला सिर्फ लाहौर तक ही सीमित नहीं रहने वाला है।
कयास लगाए जा रहे हैं कि इस मुहिम के दूसरे चरण में पाकिस्तान के सिंध और खैबर पख्तूनख्वा प्रांतों में भी कई ऐतिहासिक जगहों के पुराने और मूल नाम वापस घोषित किए जा सकते हैं। सिंध में भी विभाजन से पहले की एक समृद्ध हिंदू और सूफी विरासत मौजूद है, जिसे मुख्यधारा में लाने की मांग उठती रही है।
पाकिस्तान में हो रहा यह बदलाव भारत के उन बुद्धिजीवियों के लिए एक बड़ा सबक है जो ऐतिहासिक नाम बदलने की हर प्रक्रिया को सिर्फ राजनीति के चश्मे से देखते हैं। जब खुद को विशुद्ध इस्लामिक देश घोषित करने वाला पाकिस्तान अपनी जड़ों की ओर लौट सकता है, तो भारत में तो यह अपनी गौरवशाली सांस्कृतिक विरासत को सहेजने का एक बेहद स्वाभाविक कदम है।
इतिहास की गलतियों को सुधारना किसी समुदाय के खिलाफ नहीं, बल्कि अपनी असली पहचान को सम्मान देने का तरीका है। लाहौर की सड़कों पर लौटे ये पुराने नाम इस बात का सबूत हैं कि सियासत चाहे जितनी भी दीवारें खड़ी कर दे, लोक संस्कृति और इतिहास की जड़ें बहुत गहरी होती हैं। उन्हें हमेशा के लिए मिटाना किसी भी सरकार के लिए मुमकिन नहीं होता।