विदुषी गौड़/ नई दिल्ली
अकादमिक दुनिया में किसी विद्वान की पहचान केवल डिग्रियों और शोध पत्रों से नहीं होती, बल्कि इस बात से होती है कि वह कितनी पीढ़ियों को प्रेरित कर पाता है। डॉ. सैयद मुबीन ज़हरा ने अपनी मेहनत, विद्वता और सामाजिक प्रतिबद्धता से ऐसी ही एक अलग पहचान बनाई है। वह एक प्रतिष्ठित इतिहासकार, चर्चित स्तंभकार, जानी मानी लेखिका और वरिष्ठ शिक्षाविद हैं।
वर्तमान में डॉ. ज़हरा दिल्ली विश्वविद्यालय के आत्मा राम सनातन धर्म कॉलेज में इतिहास विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हैं। पिछले पंद्रह वर्षों से वह दिल्ली विश्वविद्यालय के शैक्षणिक माहौल में छात्रों को नई सोच और दृष्टि दे रही हैं।

उनकी कक्षाएं केवल इतिहास पढ़ाने तक सीमित नहीं रहतीं, बल्कि अतीत को वर्तमान की चुनौतियों से जोड़ने का माध्यम बन जाती हैं। उनके छात्र अक्सर कहते हैं कि उनकी क्लास किसी यात्रा की तरह होती है, जहां इतिहास जीवंत हो उठता है, सवालों को महत्व मिलता है और चुप्पी के लिए कोई जगह नहीं होती।
डॉ. ज़हरा कहती हैं, “मैं हमेशा से यही करना चाहती थी और मेरा यह सपना पूरा हुआ। यह सबसे बेहतरीन पेशा है। मेरी मां कहा करती थीं कि अगर आप पढ़ाते हैं तो आने वाली कई पीढ़ियों की नींव तैयार करते हैं। शिक्षण सबसे सम्मानजनक, समाज के लिए उपयोगी और आत्मिक संतोष देने वाला कार्य है। इसमें आप दूसरों को सिखाते भी हैं और खुद भी लगातार सीखते रहते हैं। एक विद्वान के रूप में यह सबसे सुखद काम है। यह देश, दुनिया और इंसानियत की सबसे बड़ी सेवा है।”
डॉ. ज़हरा ने मुंबई विश्वविद्यालय और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त की। उनकी शैक्षणिक यात्रा देश की सीमाओं तक सीमित नहीं रही। उन्हें दो बार अमेरिकी विदेश विभाग के प्रतिष्ठित इंटरनेशनल विजिटर लीडरशिप प्रोग्राम यानी आईवीएलपी फेलोशिप से सम्मानित किया गया।

इस दौरान उन्होंने अमेरिका और दक्षिण कोरिया में कई शैक्षणिक और पेशेवर कार्यक्रमों में भारत का प्रतिनिधित्व किया। इन अंतरराष्ट्रीय अनुभवों ने उनके शोध और सोच को और व्यापक बनाया। साथ ही विभिन्न संस्कृतियों के बीच संवाद और सहयोग की उनकी आस्था को भी मजबूत किया।
डॉ. ज़हरा का योगदान केवल शिक्षा और शोध तक सीमित नहीं है। वह लैंगिक समानता, महिलाओं के अधिकार और हिंसक कट्टरवाद के खिलाफ मजबूत आवाज़ बनकर उभरी हैं। जेंडर सेंसिटाइजेशन और कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न रोकथाम यानी पॉश विषय पर उनके व्याख्यान देश भर के सरकारी संस्थानों, शिक्षण संगठनों और सामाजिक मंचों पर बेहद सराहे जाते हैं। उनकी बातों में शोध की गंभीरता के साथ नैतिक दृढ़ता भी दिखाई देती है। यही वजह है कि सामाजिक चेतना और नीतिगत चर्चाओं में उनकी राय को गंभीरता से सुना जाता है।
उनकी सामाजिक प्रतिबद्धता कई महत्वपूर्ण संस्थानों से जुड़ाव में भी दिखाई देती है। वह राष्ट्रीय उर्दू भाषा विकास परिषद के धर्म और संस्कृति पैनल की सदस्य हैं। यहां वह भारत की समृद्ध भाषाई और सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाने में योगदान दे रही हैं। इससे पहले वह संस्था की आंतरिक शिकायत समिति की सदस्य भी रह चुकी हैं, जहां उन्होंने संस्थागत जवाबदेही और कार्यस्थल की गरिमा को मजबूत करने के लिए काम किया।
उनकी विद्वता और सामाजिक सेवाओं को देखते हुए उन्हें कई प्रतिष्ठित जिम्मेदारियां सौंपी गई हैं। हाल ही में उत्तर प्रदेश के राज्यपाल ने उन्हें ऐतिहासिक रामपुर रज़ा लाइब्रेरी की प्रकाशन सलाहकार समिति का सदस्य नामित किया। यह लाइब्रेरी भारत की इंडो इस्लामिक बौद्धिक विरासत का एक महत्वपूर्ण केंद्र मानी जाती है।
इसके अलावा जामिया मिल्लिया इस्लामिया के कुलपति ने उन्हें डॉ. के आर नारायणन सेंटर फॉर दलित एंड माइनॉरिटीज की केंद्रीय शोध समिति में बाहरी सदस्य नियुक्त किया है। यह उनकी शैक्षणिक समझ और समावेशी सोच पर संस्थानों के भरोसे को दर्शाता है।

एक लेखिका के रूप में भी डॉ. ज़हरा का प्रभाव व्यापक है। उनकी बीस से अधिक अकादमिक पुस्तकें और पाठ्य सामग्री देश के कई विश्वविद्यालयों में पढ़ाई जाती हैं। उनके लेखन ने असंख्य छात्रों और शोधार्थियों की सोच को प्रभावित किया है। वह अन्नामलाई विश्वविद्यालय के अंतरराष्ट्रीय पीएचडी शोध पैनल की सदस्य भी हैं, जहां वह नए शोधार्थियों का मार्गदर्शन करती हैं और वैश्विक स्तर पर ज्ञान के आदान प्रदान में योगदान देती हैं।
टेलीकॉम रेगुलेटरी अथॉरिटी ऑफ इंडिया से लेकर मौलाना आजाद नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी, केरल के विश्वविद्यालयों, कश्मीर के शैक्षणिक संस्थानों और देश के कई सांस्कृतिक मंचों तक, डॉ. ज़हरा लगातार अलग अलग वर्गों से संवाद कर रही हैं। वह शिक्षा और समाज के बीच एक मजबूत पुल का काम कर रही हैं।
लेकिन डॉ. सैयद मुबीन ज़हरा की सबसे बड़ी पहचान उनके पद, पुरस्कार या जिम्मेदारियां नहीं हैं। उनकी असली पहचान है भारत की उस शाश्वत भावना में उनका विश्वास, जिसे “वसुधैव कुटुम्बकम” कहा जाता है। ऐसे समय में जब समाज अक्सर विभाजन और तनाव से जूझता दिखाई देता है, डॉ. ज़हरा अपनी शिक्षा, लेखन और विचारों के माध्यम से इंसानियत, समानता और साझा भविष्य की बात करती हैं।

डॉ. सैयद मुबीन ज़हरा ने केवल कांच की छत को नहीं तोड़ा, बल्कि उसे एक ऐसे दरवाजे में बदल दिया, जिससे होकर अब कई और लोग आत्मविश्वास, साहस और उम्मीद के साथ आगे बढ़ रहे हैं।