कतरनी चूड़ा और पेड़े का स्वादिष्ट संगम

Story by  मंजीत ठाकुर | Published by  onikamaheshwari | Date 26-04-2026
The scent of memories of Anga, and the courtyard of Anga, Katarni rice flakes and the Peda of Deoghar
The scent of memories of Anga, and the courtyard of Anga, Katarni rice flakes and the Peda of Deoghar

 

मंजीत ठाकुर

कुछ खुशबुएँ ऐसी होती हैं जो समय की धूल में भी धुंधली नहीं पड़तीं। वे हमारी इंद्रियों के किसी गुप्त झरोखे में दुबक कर बैठ जाती हैं और एक मामूली से स्पर्श मात्र से पूरे अतीत को पुनर्जीवित कर देती हैं। पिछली बार जब मैंने गोविंदभोग चावल पर लिखा था तो कई लोगों ने उस चावल जैसा चावल देश के अन्य हिस्सों में होने की बात कही थी। लेकिन यकीन मानिए, गोविंदभोग चावल यूनीक है और इसलिए उसे जीआइ टैग मिला है।  बहरहाल, कुछ लोगों ने कतरनी चावल की याद दिलाते हुए उस पर लिखने के लिए भी कहा था। और कतरनी के बारे में सोचते हुए मुझे सबसे पहले उसकी खुशबू याद आई।

बिहार के ‘अंग क्षेत्र’ (भागलपुर और बांका) के खेतों में जब कतरनी का धान पकता है, तो उसकी सोंधी महक केवल हवा में नहीं तैरती, बल्कि वह उस माटी के संस्कार और आतिथ्य का उद्घोष करती है। यह केवल एक अन्न नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक अस्मिता है। आज के इस मशीनी जमाने में जब ‘फास्ट फूड’ ने थालियों पर कब्ज़ा कर लिया है, तब कतरनी चूड़ा और देवघर के पेड़े का मिलन एक ऐसी सात्विक तृप्ति प्रदान करता है, जिसकी तुलना किसी भी वैश्विक व्यंजन से नहीं की जा सकती।

कतरनी: सुगंध का स्वर्ण-अक्षत

भागलपुर और बांका की जलोढ़ मिट्टी में जब कतरनी धान के पौधे लहलहाते हैं, तो उनकी सुगंध दूर-दूर तक फैल जाती है। कतरनी चावल अपने छोटे कद, तीखे और सुगंधित दानों के लिए विश्वविख्यात है। इसे जीआई टैग प्राप्त है, जो इसके विशिष्ट होने की मुहर लगाता है। लेकिन इसका महत्व केवल सरकारी दस्तावेज़ों तक सीमित नहीं है। यह टैग क्यों महत्वपूर्ण है? जीआई टैग मिलने का अर्थ यह है कि ‘कतरनी’ नाम का उपयोग केवल उसी चावल के लिए किया जा सकता है जो भागलपुर और बांका के भौगोलिक क्षेत्र में पारंपरिक विधियों से उगाया गया हो। यह अंतरराष्ट्रीय बाजार में इसकी शुद्धता की गारंटी देता है और स्थानीय किसानों को उनकी फसल का सही मूल्य दिलाने में मदद करता है।

कतरनी चावल को 28 मार्च, 2018 को आधिकारिक तौर पर भारत सरकार के भौगोलिक उपदर्शन रजिस्ट्री (जीआइ रजिस्ट्री) द्वारा जीआई टैग प्रदान किया गया था। इस चावल के पंजीकृत रूप से मालिकाना हक भागलपुर जिला कतरनी धान उत्पादक संघ के पास है और उसके उत्पादन का इलाका भागलपुर, बांका और मुंगेर जिलों के विशिष्ट क्षेत्र हैं। बिहार कृषि विश्वविद्यालय सबौर ने कतरनी चावल के जीआई टैगिंग की प्रक्रिया में मुख्य तकनीकी भूमिका निभाई थी। मार्च, 2018 की सरकारी रिपोर्टों में बिहार के चार कृषि उत्पादों (कतरनी चावल, जर्दालु आम, मगही पान और शाही लीची) को एक साथ जीआई टैग मिलने का उल्लेख है।

अंग की लोक-संस्कृति में कहा जाता है कि कतरनी का धान जब घर आता है, तो पड़ोसी को बताने की ज़रूरत नहीं पड़ती; खुशबू खुद गवाही दे देती है। यह चावल जब पकता है, तो इसके दाने किसी श्वेत मोती की भांति चमकते हैं। इसकी मिठास और कोमलता इसे ‘चावलों की महारानी’ बनाती है। यह वह चावल है जिसे केवल पेट भरने के लिए नहीं, बल्कि मन को तृप्त करने के लिए खाया जाता है।

चूड़ा: सघन तपस्या का मधुर फल

कतरनी के धान से जब ‘चूड़ा’ (चिड़वा, पोहा) तैयार किया जाता है, तो यह एक लंबी प्रक्रिया और सघन धैर्य का परिणाम होता है। कतरनी के धान को हल्के गर्म पानी में भिगोकर, भूनकर और फिर लकड़ी के ओखल या मिल में कूटकर जो पतले, कागज़ जैसे झिलमिलाते चूड़े निकलते हैं, वे अद्भुत होते हैं। कतरनी चूड़ा की विशेषता यह है कि यह अत्यंत सुपाच्य और स्निग्ध होता है। इसकी महक कच्चे धान की सोंधी खुशबू को समेटे रहती है। बिहार के खान-पान में ‘दही-चूड़ा’ का स्थान सर्वोपरि है। मकर संक्रांति हो या जेठ की दुपहरी में मेहमान का स्वागत, चूड़ा-दही और चीनी/गुड़ का मेल एक मुकम्मल भोजन है। लेकिन जब यह चूड़ा कतरनी का हो, तो वह भोजन से ऊपर उठकर एक ‘अनुभव’ बन जाता है।

अंग से बाबाधाम: कतरनी और पेड़े का दिव्य संबंध

अब बात करते हैं उस ‘त्रिवेणी’ की, जो भागलपुर, सुल्तानगंज और देवघर के बीच बहती है। अंग प्रदेश की सीमाएं देवघर (झारखंड) की पहाड़ियों से जा मिलती हैं। यह संबंध केवल भौगोलिक नहीं, बल्कि आध्यात्मिक और स्वादजन्य भी है। सावन का महीना हो और सुल्तानगंज की उत्तरवाहिनी गंगा से जल भरकर कांवड़िए जब बाबाधाम (देवघर) की ओर प्रस्थान करते हैं, तो उनकी पोटली में अक्सर ‘कतरनी का चूड़ा’ होता है। यात्रा के दौरान जब वे विश्राम करते हैं, तो मोटी मलाई वाली दही और कतरनी चूड़ा उनका मुख्य संबल बनता है। लेकिन इस स्वाद की पूर्णता तब होती है, जब इसमें देवघर के विश्वविख्यात ‘पेड़े’ का समावेश होता है।  देवघर का पेड़ा, जो शुद्ध खोया और चीनी के मंद आंच पर कैरेमलाइज्ड होने से बनता है, अपनी एक विशिष्ट भूरी आभा और सोंधी मिठास के लिए जाना जाता है। 

स्वाद का रसायन: चूड़ा-दही और पेड़ा

अंग क्षेत्र की मेहमानी में एक विशिष्ट परंपरा है—’दही-चूड़ा-पेड़ा’। कतरनी चूड़ा: जो आधार है, जो सुगंधित और हल्का है। गाढ़ा दही: जो शीतलता और क्रीमी टेक्सचर प्रदान करता है। और इसके साथ देवघर का पेड़ा, जो मिठास का वह चरम है, जो इस पूरे भोजन को एक ‘शाही डेजर्ट’ में बदल देता है। अक्सर लोग दही-चूड़ा में चीनी या गुड़ मिलाते हैं, लेकिन पारखी लोग पेड़े को चूड़े के साथ मसलकर खाते हैं।  पेड़े की वह सोंधी मिठास जब कतरनी की खुशबू और दही की खटास के साथ मिलती है, तो मुँह में रसों का एक ऐसा विस्फोट होता है जिसे शब्दों में बांधना कठिन है। पेड़े का दानेदार होना और चूड़े का करारापन एक अद्भुत विरोधाभास पैदा करता है जो स्वाद की ग्रंथियों को झंकृत कर देता है।

सांस्कृतिक ताना-बाना और विरासत

भागलपुर का रेशम और यहाँ की कतरनी, दोनों ही सूक्ष्मता के प्रतीक हैं। वहीं देवघर का पेड़ा उस भक्ति और श्रद्धा का अंश है जो बाबा बैद्यनाथ के चरणों से जुड़ा है। जब कोई व्यक्ति देवघर से लौटता है, तो उसके पास प्रसाद के रूप में पेड़े होते हैं और जब वह भागलपुर से गुजरता है, तो झोले में कतरनी चूड़ा। इन दोनों का साथ होना दो संस्कृतियों के मिलन का प्रतीक है। जाहिर है, यह सब लिखते हुए मैं उस समय में लौट गया हूं, जब जीवन की गति धीमी थी। जब खेतों से अनाज सीधे ओखल तक आता था और पेड़े शुद्ध दूध से घंटों कढ़ाई में जलकर बनते थे। आज ‘पैकेज्ड’ और ‘इंस्टेंट’ के युग में कतरनी और देवघर के पेड़े का यह मेल हमें अपनी जड़ों की ओर लौटने का निमंत्रण देता है।

कतरनी चूड़ा और देवघर के पेड़े का यह कनेक्शन केवल भोजन की बात नहीं है; यह अंग और संथाल परगना के बीच के मधुर रिश्तों का सेतु है। यह माँ के हाथों से सानकर खिलाए गए उस ग्रास की याद है, जिसमें ममता का नमक और संस्कार की खुशबू मिली होती है। यदि आप कभी अंग प्रदेश की यात्रा पर हों और दोपहर की सुनहरी धूप में आपको कोई कतरनी चूड़ा, गाढ़ी दही और देवघर के पेड़े परोस दे, तो समझियेगा कि आप केवल खाना नहीं खा रहे, बल्कि आप उस प्राचीन सभ्यता का हिस्सा बन रहे हैं जिसने स्वाद को भी ईश्वर की आराधना के समान पवित्र माना है। कतरनी की महक और पेड़े की मिठास, यही है हमारे अंग का असली गौरव, जो सदियों से हमारी जीभ पर एक मीठी याद बनकर अमर है।

अंग की धरती पर कतरनी का उगना केवल एक कृषि प्रक्रिया नहीं, बल्कि माटी के साथ किया जाने वाला एक प्रेम-अनुष्ठान है। आधुनिकता की आंधी के बावजूद, भागलपुर और बांका के गाँवों में आज भी कतरनी को सहेजने की विधियाँ वैसी ही हैं जैसी पूर्वजों के समय में थीं।  असल में, कतरनी चावल की पैदावार विशिष्ट पारंपरिक विधियों से की जाती है जो इस चावल की सुगंध और स्वाद को अक्षुण्ण रखती हैं:

पहली बात कि कतरनी की पैदावार के लिए विशिष्ट भूखंड का चयन किया जाता है। स्थानीय (और भौगोलिक रूप से) इसे दिआरा और तारी की माटी कहा जाता है। कतरनी हर कहीं नहीं उग सकती। अंग के किसान आज भी पारंपरिक रूप से उन्हीं खेतों को चुनते हैं जहाँ गंगा या उसकी सहायक नदियों का पानी लौट चुका हो। विशेषकर ’तारी’ (ऊँची भूमि) और ’बलगाथ’ (हल्की दोमट) मिट्टी इसके लिए श्रेष्ठ मानी जाती है। 

मान्यता है कि इस मिट्टी में मौजूद विशिष्ट खनिजों के कारण ही कतरनी में वह ‘2-AP’ नामक सुगंधित तत्व विकसित होता है। पारंपरिक खेती में कतरनी के साथ यूरिया या रासायनिक खाद का प्रयोग वर्जित माना जाता है। 

गाँवों में किसान आज भी ’गोबर की खाद’ और ’खेत की पुरानी कचवा’ (सड़ी हुई घास-फूस) का उपयोग करते हैं। तकनीकी रूप से यह सच है कि अधिक नाइट्रोजन (यूरिया) डालने से धान की लंबाई तो बढ़ जाती है, लेकिन उसकी मूल सुगंध कम हो जाती है। इसीलिए अंग के किसान ‘कम पैदावार’ मंजूर करते हैं, लेकिन ‘कम सुगंध’ नहीं। कतरनी की रोपाई का समय बहुत महत्वपूर्ण है। सावन के आगमन के साथ ही इसके ’बिचड़े’ (नर्सरी) तैयार किए जाते हैं। पारंपरिक विधि में रोपाई के समय दो पौधों के बीच एक निश्चित दूरी रखी जाती है, ताकि हवा का संचार सही हो। किसान रोपाई के समय अक्सर लोकगीत (कजरी) गाते हैं, जो इस थकाऊ काम को एक उत्सव बना देता है। साथ ही, बरहमासा गीत भी होते हैं। 

फसल की कटाई और ‘अदहन’ का ध्यान

कतरनी को काटने का एक विशिष्ट समय होता है। जब बालियां सुनहरी हो जाएं और उनमें दूध सूखकर दाना कड़ा हो जाए, तभी इसे काटा जाता है। अधिक देर करने पर दाने खेत में ही झड़ने लगते हैं। कटाई के बाद इसे धूप में सुखाया जाता है जिसे स्थानीय भाषा में ’अदहन देना’ कहते हैं।

 

 
 

 

 
 
 
 
 

 

 
 
 
 
 
 
 
 
 

 

 
 
 

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कतरनी चूड़ा बनाने की प्राचीन ‘भट्टी’ विधि

कतरनी का असली जादू उसके चूड़े में है, जिसे बनाने की पारंपरिक विधि आज भी मशीनों को मात देती है। सबसे पहले धान को बड़े लोहे के कड़ाहों में रात भर भिगोने के बाद आधा उबाला जाता है। यह प्रक्रिया बहुत सावधानी से की जाती है ताकि दाना फटे नहीं। उबले हुए धान को मिट्टी के चूल्हे पर बालू के साथ भूना जाता है। यहाँ ‘अंदाज’ ही सब कुछ है; जरा सी चूक चूड़े को जला सकती है या उसे कच्चा छोड़ सकती है। हालाँकि अब मशीनें आ गई हैं, लेकिन आज भी कुछ पुराने घरों में ’ढेंकी’ (लकड़ी का भारी लीवर) का प्रयोग होता है। ढेंकी से कूटा हुआ चूड़ा मोटा होता है, लेकिन उसकी मिठास और खुशबू मशीन वाले चूड़े से कहीं अधिक होती है। 

कतरनी को लोहे के साइलो में नहीं, बल्कि मिट्टी से बनी ‘कोठी’ या ’बखार’ में रखा जाता है। मिट्टी के ये पात्र तापमान को नियंत्रित रखते हैं, जिससे कतरनी की सुगंध लंबे समय तक सुरक्षित रहती है। अंग के गाँवों में कतरनी का उत्पादन कोई ‘बिजनेस’ नहीं, बल्कि एक ‘विरासत’ है। यहाँ का किसान अपनी फसल को संतान की तरह पालता है। कतरनी की वह विशिष्ट महक दरअसल उस किसान के पसीने, गंगा की माटी और ढीकी की थाप का सामूहिक संगीत है।