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पुणे पुलिस महकमे में अपनी खिदमात दे रहे सोहेल शमसुद्दीन शेख महाराष्ट्र की इस शानदार इतिहास के ज़िंदा गवाह हैं। वह छत्रपति शिवाजी महाराज के स्वराज्य कायम करने में अहम किरदार निभाने वाले काज़ी हैदर के 13वें वंशज हैं। सोहेल शेख के खानदान ने शिवाजी महाराज के दौर से शुरू हुई इस देश-सेवा की रिवायत को पिछले 14 पुश्तों से लगातार कायम रखा है।
अलग-अलग जातियों और मज़हबों के लोगों को इकट्ठा करके स्वराज्य कायम करने वाले छत्रपति शिवाजी महाराज हिंदुस्तानी तारीख के एक महान राजा थे। महाराज के अष्टप्रधान मंडल और प्रशासन में कई वफादार मुस्लिम सरदार शामिल थे। काज़ी हैदर उन्हीं में से एक थे। सोहेल शेख ने आवाज़-द-वॉयस को दिए गए इंटरव्यू में ऐसे सुबूत पेश किए हैं जिनसे साबित होता है कि काज़ी हैदर महाराज के पारसनीस (फारसी के जानकार/सचिव) और बेहद भरोसेमंद वकील थे।

सोहेल शेख की तरफ से पेश किए गए ऐतिहासिक सुबूतों के मुताबिक, महाराज ने खुद अपने एक 'महज़र' (कानूनी दस्तावेज़) में उनका ज़िक्र 'इज़्ज़त महाब काज़ी हैदर पारसनीस' के तौर पर किया है। पुरंदर की संधि हो या साल्हेर का मामला, वकील के तौर पर महाराज ने काज़ी हैदर पर ही बड़ी ज़िम्मेदारी सौंपी थी। क्योंकि वह सूफी कादरी पंथ से ताल्लुक रखते थे, इसलिए कई जगहों पर उनका नाम 'काज़ी हैदर अली कादरी' भी लिखा हुआ मिलता है।
कुछ इतिहासकारों का यह दावा है कि महाराज के इंतकाल के बाद काज़ी हैदर औरंगज़ेब के पाले में चले गए थे। लेकिन, सोहेल शेख ने अपने पास मौजूद दस्तावेज़ों की बुनियाद पर इस दावे को पूरी तरह गलत साबित कर दिया है।
सोहेल शेख के पास मौजूद फारसी दस्तावेज़ों के मुताबिक, काज़ी हैदर का इंतकाल महाराज के निधन के महज़ एक या दो साल बाद पर्वती (पुणे) में उनके अपने घर पर हुआ था। उनके इंतकाल की खबर उनके भाई काज़ी इस्माइल ने 29 मुहर्रम 1093 (8 फरवरी 1682) को एक खत के ज़रिए दी थी। इस खत में साफ तौर पर लिखा है कि काज़ी हैदर को पर्वती में ही सुपुर्द-ए-खाक किया गया था।
सोहेल शेख ने आवाज़-द-वॉयस को दिए इंटरव्यू में बताया, “काज़ी हैदर महाराज के बेहद वफादार और सच्चे सेवक थे। उनके औरंगज़ेब के दरबार में जाने के जो दस्तावेज़ बताए जाते हैं, उनमें भाषा की कई गलतियां हैं। इसके उलट, मेरे पास इस बात के पक्के सुबूत मौजूद हैं कि वह आखिर तक स्वराज्य के लिए ही लड़ते रहे।”
छत्रपति संभाजी महाराज की शाही मुहर वाला ताज़ियती खत (शोक पत्र)
काज़ी हैदर के इंतकाल के बाद छत्रपति संभाजी महाराज ने 12 फरवरी 1682 को सोहेल शेख के खानदान को एक खत भेजा था। इस खत पर संभाजी महाराज की 16 बुर्जों वाली और पीपल के पत्ते की शक्ल की शाही मुहर (राजमुद्रा) लगी हुई है। हालांकि सोहेल बताते हैं कि इस बात का कोई पक्का सुबूत नहीं है कि यह खत खुद छत्रपति संभाजी महाराज ने अपने हाथों से लिखा था या नहीं।
सोहेल शेख ने अपने पास मौजूद उस फारसी खत का तर्जुमाकरवाया है। उनकी दी गई जानकारी के मुताबिक, उस खत में लिखा गया है, "काज़ी हैदर हमारे वालिद (छत्रपति शिवाजी महाराज) के वफादार और सच्चे सेवक थे। उन्होंने मुझे फारसी ज़बान सिखाई थी, उन यादों को मैं आज भी अपने ज़हन में ताज़ा महसूस करता हूँ।"
उस खत में इस बात का ज़िक्र है कि संभाजी महाराज को 16 भाषाओं का इल्म था, जिसमें फारसी ज़बान की शुरुआती तालीम उन्हें काज़ी हैदर से ही मिली थी। सोहेल बताते हैं कि संभाजी महाराज ने भरोसा दिलाया था कि इस दुख की घड़ी में पूरा स्वराज्य काज़ी हैदर के खानदान के साथ खड़ा है।
हुकूमत और इंसाफ के काम में पुश्तों का योगदान
काज़ी हैदर के इंतकाल के बाद भी यह खानदान मराठा हुकूमत में सक्रिय रहा। उनके पांच भाई थे-इब्राहिम, इस्माइल, अब्दुल वहाब, अब्दुल्ला और महमूद। ये सभी इंसाफके काम से जुड़े हुए थे। पुणे के देशपांडे और कुलकर्णी दफ्तरों के रिकॉर्ड्स में आज भी काज़ी इस्माइल और काज़ी इब्राहिम के नाम दर्ज हैं।
पेशवा रिकॉर्ड्स के मुताबिक, काज़ी हैदर के बेटे काज़ी मुजीब साहेब और पोते काज़ी हबीबुल्लाह भी सरकारी खिदमत में थे। 1707 तक रायगढ़ किले पर इस खानदान का रिकॉर्ड मिलता है, जो इस खानदान की मराठा हुकूमत के प्रति वफादारी को साबित करता है।
बर्तानवी दौर से लेकर आज तक: वर्दी में 5 पुश्तों की खिदमत
वक्त के साथ-साथ इस खानदान ने इंसाफ (न्यायपालिका) के काम से निकलकर पुलिस महकमे में कदम रखा। इस खानदान के पहले पुलिस सूबेदार काज़ी शेख निज़ाम थे। उन्होंने अंग्रेज़ों की पहली 50 पुलिस वालों की टुकड़ी की कयादत (नेतृत्व) की थी। तब से लेकर आज तक, लगातार 5 पुश्तों से यह खानदान पुलिस महकमे में मौजूद है।
फिलहाल सोहेल शेख पुणे पुलिस में काम कर रहे हैं, और उनके खानदान के कुल 26 लोग इस वक्त पुलिस या फौज में अपनी खिदमात दे रहे हैं। इनमें महाराष्ट्र पुलिस के साथ-साथ आर्मी मेंदेश की हिफाज़त करने वाले जवान भी शामिल हैं। यह रिवायत सिर्फ खानदान के मर्दों तक ही महदूद (सीमित) नहीं है, बल्कि सोहेल शेख की दोनों बेटियां भी पुलिस में जाने का ख्वाब देख रही हैं।
सोहेल शेख के पास मौजूद मोड़ी लिपि (Modi script) के दस्तावेज़ और उनके बुज़ुर्गों के फौजी वर्दी वाले फोटो उनके खानदान की एक महान विरासत की गवाही देते हैं। 'महज़र - महाराष्ट्र के इतिहास के दस्तावेज़' जैसी किताबों में उनके बुज़ुर्गों के कारनामों की जमकर तारीफ की गई है।

सोहेल शेख बहुत फख्र के साथ कहते हैं, “देश सबसे पहले है, यही हमारा कर्म है और यही हमारा मज़हब भी। वर्दी पहनने के बाद हम सिर्फ देश के रक्षक होते हैं। जात-पात और मज़हब से ऊपर उठकर मुल्क के लिए ईमानदारी से खिदमत करने की तालीम हमें अपने बुज़ुर्गों से मिली है और हम उसी रिवायत को आगे बढ़ा रहे हैं।"