ओनिका माहेश्वरी/ नई दिल्ली
यह कहानी एक ऐसी शख्सियत के जीवन और विचारों की झलक पेश करती है, जिन्होंने शिक्षा और साहित्य दोनों क्षेत्रों में अपनी अलग पहचान बनाई है। यह संवाद उनके अनुभवों, प्रेरणाओं और रचनात्मक यात्रा की उस शुरुआत को सामने लाता है, जहाँ साहित्य के प्रति लगाव धीरे-धीरे एक गहरी अभिव्यक्ति में बदलता गया। इसमें उनके जीवन के उन पहलुओं की झलक मिलती है, जो उन्हें लेखन, शिक्षण और समाज को देखने के एक संवेदनशील दृष्टिकोण से जोड़ते हैं। यह परिचय पाठक को उनकी सोच और रचनात्मक दुनिया की ओर ले जाता है, बिना पूरी कहानी को उजागर किए।
एक विशेष संवाद कार्यक्रम में कवयित्री और शिक्षिका रेनू शाहनवाज़ हुसैन ने अपने जीवन, लेखन यात्रा और समाज के प्रति अपने दृष्टिकोण को विस्तार से साझा किया। कार्यक्रम की शुरुआत में एंकर अंजली अदा ने उनका स्वागत करते हुए उनके भीतर की कवयित्री के जन्म और प्रेरणा के बारे में सवाल किया, जिस पर रेनू जी ने बताया कि लेखन की शुरुआत अक्सर स्कूल जीवन से ही हो जाती है।
उन्होंने कहा कि जब वे नौवीं कक्षा में थीं, तब पाठ्यक्रम में शामिल कहानियों और कविताओं ने उन्हें गहराई से प्रभावित किया। खासतौर पर प्रेमचंद, अज्ञेय, महादेवी वर्मा और निराला जैसे साहित्यकारों की रचनाओं ने उनके मन में साहित्य के प्रति आकर्षण पैदा किया। धीरे-धीरे उन्होंने लिखना शुरू किया और अपनी रचनाएं शिक्षकों को दिखाईं, जिन्होंने उन्हें लगातार प्रोत्साहित किया। यही प्रेरणा उनके लेखन को आगे बढ़ाती रही।
गौरतलब है कि रेनू हुसैन, भाजपा नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री सैयद शाहनवाज़ हुसैन की पत्नी हैं। इनकी प्रेम कहानी 1986 में दिल्ली की डीटीसी बस में शुरू हुई थी, जो 9 साल के संघर्ष के बाद शादी में बदली। रेणु (हिंदू) और शाहनवाज़ (मुस्लिम) का विवाह अंतरधार्मिक प्रेम का एक चर्चित उदाहरण है। रेणु एक शिक्षिका हैं और दोनों के दो बेटे और एक बेटी हैं।

अपनी पहली कविता के बारे में बताते हुए रेणु शाहनवाज़ हुसैन ने कहा कि शुरुआती रचनाएं सरल तुकबंदी वाली थीं, लेकिन वही उनकी नींव बनीं। उनकी पहली प्रकाशित काव्य पुस्तक “पानी प्यार” रही, जिसने उन्हें एक नई पहचान दी।
इसके बाद उन्होंने कई काव्य गोष्ठियों, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और साहित्यिक मंचों पर सक्रिय भागीदारी की। रेनू जी ने अपनी प्रेरणाओं का जिक्र करते हुए बताया कि वे महादेवी वर्मा, प्रेमचंद और निराला से बेहद प्रभावित रही हैं, वहीं समकालीन कवियों और ग़ज़लकारों से भी उन्हें प्रेरणा मिलती है। उन्होंने अपनी रचनाओं को अपने “बच्चों” की तरह बताया और कहा कि हर पुस्तक उनके लिए समान रूप से प्रिय है, हालांकि पहली पुस्तक का उत्साह अलग ही होता है।
उन्होंने अपने लेखन के विकास पर प्रकाश डालते हुए कहा कि शुरुआती दौर में लेखक अपनी व्यक्तिगत भावनाओं और अनुभवों को लिखता है, लेकिन समय के साथ उसका दृष्टिकोण व्यापक होता जाता है और वह समाज की समस्याओं, घटनाओं और संघर्षों को भी अपनी रचनाओं में शामिल करने लगता है।
उनके अनुसार साहित्य समाज का दर्पण है और इसमें समय के साथ बदलाव स्वाभाविक रूप से झलकता है। कार्यक्रम के दौरान उन्होंने अपनी कुछ पंक्तियां भी प्रस्तुत कीं, जिनमें मां के प्रति भावनाएं, समाज में दिखावे की प्रवृत्ति और आम आदमी के दर्द को व्यक्त किया गया। उनकी कविता “आवाज़” में उन्होंने मजदूरों, गरीबों और किसानों की समस्याओं को उठाने की बात कही और लेखकों से समाज के सच को लिखने का आह्वान किया।
शिक्षिका के रूप में अपने अनुभव साझा करते हुए रेनू जी ने कहा कि आज के विद्यार्थी उन्हें एक शिक्षक के रूप में अधिक पसंद करते हैं क्योंकि उनका मुख्य कार्य बच्चों में साहित्य के प्रति रुचि पैदा करना है।
उन्होंने चिंता जताई कि आज के दौर में सोशल मीडिया के कारण बच्चों की पढ़ने की आदत कम हो गई है। पहले जहां किताबें मनोरंजन का माध्यम थीं, वहीं अब मोबाइल और इंटरनेट ने उनकी जगह ले ली है। उन्होंने कहा कि आज के बच्चों को पढ़ाई में रुचि जगाना सबसे बड़ी चुनौती है। वे उन्हें कहानियों और कविताओं के माध्यम से जोड़ने की कोशिश करती हैं और बताती हैं कि साहित्य जीवन को समझने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है।

शॉर्ट स्टोरी लेखन के बारे में उन्होंने बताया कि कहानी और कविता में अंतर होता है। कविता सीमित शब्दों में गहरी बात कहती है, जबकि कहानी में विस्तार की गुंजाइश होती है। उन्होंने कहा कि उनकी कहानियां काल्पनिक नहीं बल्कि समाज से उठाए गए वास्तविक पात्रों पर आधारित होती हैं, जिनमें आम लोगों के संघर्ष, दर्द और जीवन की सच्चाइयां झलकती हैं।
समाज में साहित्य की भूमिका पर उन्होंने कहा कि कवियों और लेखकों ने हमेशा समाज में बदलाव लाने की कोशिश की है और आगे भी करते रहेंगे। उन्होंने विशेष रूप से स्त्री विमर्श, सामाजिक अन्याय और मानसिक तनाव जैसे मुद्दों पर लिखने की आवश्यकता पर जोर दिया।
युवाओं को संदेश देते हुए रेनू जी ने कहा कि वे पढ़ना और लिखना शुरू करें क्योंकि इससे मानसिक तनाव कम होता है और आत्म-अभिव्यक्ति का मार्ग मिलता है। उन्होंने डायरी लेखन को एक प्रभावी माध्यम बताते हुए कहा कि जब बात करने के लिए कोई न हो, तो कागज और कलम सबसे अच्छे दोस्त बन सकते हैं। उन्होंने आज के युवाओं में बढ़ते अकेलेपन और तनाव पर चिंता व्यक्त की और कहा कि शिक्षक केवल पढ़ाने वाला नहीं, बल्कि एक मार्गदर्शक और काउंसलर भी होता है। वे अपने विद्यार्थियों को प्रोत्साहित करती हैं कि किसी भी कठिन परिस्थिति में गलत कदम उठाने से पहले उनसे संपर्क करें।
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लड़कियों के लिए उन्होंने विशेष संदेश देते हुए कहा कि उन्हें हर चुनौती से आगे बढ़ना चाहिए और समाज की बाधाओं से डरना नहीं चाहिए। उन्होंने अपनी पंक्तियों के माध्यम से आत्मनिर्भरता और साहस का संदेश दिया।
लेखन के अलावा अपनी रुचियों के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा कि उन्हें पेंटिंग और सिंगिंग का भी शौक है। खासतौर पर प्रकृति से प्रेरित लैंडस्केप बनाना उन्हें पसंद है। कार्यक्रम के अंत में उन्होंने अपनी एक ग़ज़ल को तरन्नुम में प्रस्तुत किया, जिसे दर्शकों ने खूब सराहा। इस प्रकार यह संवाद न केवल एक साहित्यकार की यात्रा को उजागर करता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि कैसे साहित्य समाज, शिक्षा और व्यक्तिगत जीवन को गहराई से प्रभावित करता है।