आवाज द वाॅयस ब्यूरो/ नई दिल्ली
परवाज' का यह अंक समर्पित है उन बुलंद हौसलों को, जिन्होंने अपनी कलम, आवाज और शख्सियत से भारतीय मीडिया के फलक पर एक नई इबारत लिखी है। हम रूबरू हो रहे हैं देश की उन नामचीन मुस्लिम महिला पत्रकारों से, जिन्होंने न केवल इस चुनौतीपूर्ण पेशे को चुना, बल्कि रूढ़ियों की हर बेड़ी को तोड़कर खुद को साबित भी किया।
इन महिलाओं की यात्रा किसी करिश्मे से कम नहीं है। टीवी के चकाचौंध भरे स्टूडियो से लेकर युद्ध के मैदानों की धूल तक, और रेडियो की गूंज से लेकर डिजिटल मीडिया के नए दौर तक—इनका सफर साहस और जिद की एक अनकही दास्तान है। जब समाज और परंपराएं उनके कदम रोकने की कोशिश कर रही थीं, तब इन जांबाज महिलाओं ने सच के प्रति अपनी ईमानदारी और सामाजिक प्रगति के जुनून को अपनी ढाल बनाया।
आज ये देश के उस गौरवशाली समूह का प्रतिनिधित्व करती हैं, जिन्होंने साबित कर दिया कि प्रतिभा किसी संस्कृति या माहौल की मोहताज नहीं होती। अपनी मेहनत से एक मील का पत्थर गाड़ने वाली ये हस्तियां आज लाखों लड़कियों के लिए प्रेरणा का सबसे बड़ा स्रोत हैं। इनका नाम आज सिर्फ एक पहचान नहीं, बल्कि भारतीय मीडिया और साहित्य के इतिहास में बदलाव की एक गूंज बन चुका है।

याना मीर
याना मीर कश्मीर की एक बुलंद आवाज बनकर उभरी हैं। उन्होंने पत्रकारिता और सामाजिक कार्यों के जरिए पाकिस्तान समर्थित दुष्प्रचार को कड़ी चुनौती दी है। मुंबई में पढ़ी-लिखी और कश्मीर की मिट्टी से जुड़ी याना साल 2020 में घाटी वापस लौटीं। उन्होंने उन कहानियों को दुनिया के सामने रखा जिन्हें अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता था, जैसे आतंकियों के हाथों मारे गए पुलिसकर्मियों के परिवार का दर्द। 'रियल कश्मीर ग्रुप' की सीईओ के तौर पर वे धमकियों के बावजूद बदलाव की दास्तां लिख रही हैं। साल 2024 में ब्रिटिश संसद में दिए उनके भाषण ने अंतरराष्ट्रीय ध्यान खींचा, जहां उन्होंने भारत में खुद को सुरक्षित और आजाद बताया। अपने उद्यम 'नूरज़ु' के माध्यम से वे कश्मीरी कारीगरों को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर भी बना रही हैं।

सीमा मुस्तफा
सीमा मुस्तफा भारत की सबसे निडर पत्रकारों में गिनी जाती हैं। उनका करियर करीब पांच दशकों का है। महज उन्नीस साल की उम्र में 'द पायनियर' से शुरुआत करने वाली सीमा ने 'द इंडियन एक्सप्रेस', 'द टेलीग्राफ' और 'द एशियन एज' जैसे बड़े संस्थानों में काम किया। उन्होंने बेरूत और कारगिल जैसे युद्ध क्षेत्रों से रिपोर्टिंग की, जिसके लिए उन्हें प्रेम भाटिया पुरस्कार मिला।
डिजिटल प्लेटफॉर्म 'द सिटीजन' की संस्थापक सीमा स्वतंत्र पत्रकारिता की पुरजोर पैरोकार हैं।
एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया की पहली निर्वाचित अध्यक्ष के रूप में उन्होंने इस सिद्धांत को मजबूत किया कि पत्रकारिता का काम सत्ता से सवाल पूछना है, उसकी चापलूसी करना नहीं।

सायमा रहमान
सायमा रहमान, जिन्हें लोग 'आरजे सायमा' के नाम से प्यार करते हैं, भारत की सबसे चहेती रेडियो आवाजों में से एक हैं।
नाइजीरिया में जन्मी और दिल्ली में पली-बढ़ी सायमा को बचपन से ही भाषा और संगीत का शौक था। उनकी यात्रा 'युव वाणी' से शुरू हुई और प्रतिष्ठित शो 'पुरानी जींस' के जरिए वे हर दिल की धड़कन बन गईं। 'उर्दू की पाठशाला' के माध्यम से उन्होंने लोगों को उर्दू साहित्य की खूबसूरती से जोड़ा। उनकी आवाज आज भी यादों, संगीत और सामाजिक जागरूकता का एक बेहतरीन संगम है।

रुबिका लियाकत
रुबिका लियाकत ने अपनी अनुशासनप्रिय और तीखी रिपोर्टिंग से टीवी पत्रकारिता में एक मजबूत पहचान बनाई है। 'लाइव इंडिया' से शुरुआत कर 'न्यूज24', 'ज़ी न्यूज' और 'एबीपी न्यूज' तक का उनका सफर उनकी काबिलियत का सबूत है।
न्यूज रूम के बाहर भी वे हिंदू-मुस्लिम सद्भाव और आपसी सम्मान के संदेशों के लिए जानी जाती हैं। उनकी यात्रा इस बात का उदाहरण है कि ध्रुवीकरण के इस दौर में भी अपनी योग्यता और सह-अस्तित्व के विचार से कैसे पहचान बनाई जा सकती है।
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राणा सिद्दीकी ज़मां
राणा सिद्दीकी ज़मां ने पत्रकारिता, विशेषकर सिनेमा और संस्कृति के क्षेत्र में अपनी एक अलग जगह बनाई है। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से पढ़ी राणा ने उस दौर में पत्रकारिता चुनी जब महिलाओं के लिए यह आसान नहीं था। 'द हिंदू' में उनके कॉलम और कलाकारों के इंटरव्यू काफी मशहूर हुए। आर्थिक तंगी और पेशेवर उतार-चढ़ाव के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी। आज वे 'चिल्ड्रन बुक ट्रस्ट' के साथ काम कर रही हैं। उनकी कहानी साहस और खुद को दोबारा साबित करने के अटूट संकल्प की कहानी है।

नगमा सहर
नगमा सहर को टीवी पत्रकारिता की सबसे संतुलित और गंभीर आवाजों में गिना जाता है। पटना में जन्मी और जेएनयू से पढ़ी नगमा ने अपनी रिपोर्टिंग में अकादमिक गहराई को शामिल किया।
'एनडीटीवी इंडिया' में उन्होंने सुनामी से लेकर कश्मीर के चुनावों तक हर बड़ी घटना को कवर किया। उनका शो 'सलाम जिंदगी' नशाखोरी, भेदभाव और ट्रांसजेंडर अधिकारों जैसे मुद्दों को मुख्यधारा में लाया। उनका करियर ईमानदारी और सार्थक पत्रकारिता का आईना है।

हीना कौसर खान
हीना कौसर खान ने मुस्लिम समुदाय की आंतरिक हकीकत को मराठी विमर्श का हिस्सा बनाया है। पुणे में विज्ञान की पढ़ाई छोड़कर पत्रकारिता में आईं हीना ने 'लोकमत' और 'लोकसत्ता' जैसे अखबारों के जरिए पहचान बनाई।
उन्होंने अपनी किताबों 'इत्रनामा' और 'इज्तिहाद' के माध्यम से समाज में सुधार और नई चेतना की बात की। उन्हें उनके काम के लिए कई सम्मान भी मिले हैं। वे आज भी मानवता और आपसी समझ की वकालत कर रही हैं।

अतिका फारूकी
अतिका फारूकी का मीडिया करियर दो दशकों से ज्यादा का है। वे अपनी समझदार मेजबानी और सलीकेदार बातचीत के लिए जानी जाती हैं।
उन्होंने सनसनीखेज खबरों के बजाय रचनात्मकता और लोगों की व्यक्तिगत यात्राओं पर ध्यान केंद्रित किया। एक कवयित्री और लेखिका के तौर पर वे कई भाषाओं पर पकड़ रखती हैं। टीवी से लेकर डिजिटल युग तक, उन्होंने खुद को हर दौर के हिसाब से बहुत खूबसूरती से ढाला है।

डॉ. फिरदौस खान
डॉ. फिरदौस खान को 'लफ्जों के जजीरे की शहजादी' कहा जाता है। वे एक विद्वान, कवयित्री, पत्रकार और अनुवादक हैं जिनका काम आध्यात्मिकता और साहित्य को जोड़ता है।
सूफी परंपरा से जुड़ी फिरदौस ने 'फहम अल-कुरान' और 'गंगा-जमुनी संस्कृति के पुरोधा' जैसी किताबें लिखी हैं। दूरदर्शन और आकाशवाणी से जुड़ी रहीं फिरदौस ने उर्दू, हिंदी, पंजाबी और अंग्रेजी में लिखकर सद्भाव और सेवा का संदेश दिया है।

शहताज खान
शहताज खान, जिन्हें शहताज बेगम खान के नाम से भी जाना जाता है, एक प्रतिष्ठित उर्दू लेखिका और पत्रकार हैं। पुणे में रहकर उन्होंने करीब पच्चीस वर्षों तक प्रिंट, ब्रॉडकास्टिंग और साहित्य के क्षेत्र में काम किया है।
'ईटीवी न्यूज' के बुलेटिन 'खास बात' और 'नई दुनिया उर्दू' जैसे संस्थानों में उनकी भूमिका सराहनीय रही है। उन्होंने 'सीन से साइंस' और 'पिकनिक' जैसी विज्ञान आधारित उर्दू किताबों के जरिए बच्चों के लिए जटिल विषयों को आसान बनाया है। उनके इस काम को राष्ट्रीय उर्दू भाषा विकास परिषद का भी समर्थन मिला है।