बरेली में कांवड़ और उर्स साथ-साथ

Story by  ओनिका माहेश्वरी | Published by  onikamaheshwari | Date 12-08-2026
A Confluence of Faith and Devotion in Bareilly: A Scene of Social Harmony Amidst the Kanwar Yatra and Urs
A Confluence of Faith and Devotion in Bareilly: A Scene of Social Harmony Amidst the Kanwar Yatra and Urs

 

ओनिका माहेश्वरी/ नई दिल्ली  

बरेली में सावन की कांवड़ यात्रा और उर्स-ए-आला हजरत एक ही समय में होने के बावजूद प्रशासन ने दोनों धार्मिक आयोजनों को शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न कराने के लिए रूट प्लानिंग, भीड़ प्रबंधन और सामुदायिक संवाद पर जोर दिया। उर्स की तारीखों में बदलाव से लेकर शाकाहारी भोजन परोसने के फैसले तक, दोनों समुदायों के बीच आपसी सम्मान की कई तस्वीरें सामने आईं। हालांकि, इसी दौरान बहेड़ी में बिरयानी की दुकान पर हुई बुलडोजर कार्रवाई ने प्रशासनिक दावों के सामने कुछ गंभीर सवाल भी खड़े किए।

बरेली इन दिनों एक ऐसी तस्वीर के कारण चर्चा में है, जिसमें एक ही शहर में दो अलग-अलग धार्मिक आयोजनों की भीड़, दो अलग-अलग आस्थाएं और उनके बीच शांति बनाए रखने की कोशिश दिखाई देती है। उत्तर प्रदेश पुलिस के आधिकारिक एक्स हैंडल से जारी एक वीडियो में सावन की कांवड़ यात्रा और उर्स-ए-आला हजरत के दौरान बरेली में कायम सामाजिक सौहार्द को सामने रखा गया है। वीडियो के साथ पुलिस का संदेश है “आस्था भी, अकीदत भी, अमन भी।”
 
Bareilly Urs Kanwar Yatra
 
यह संदेश महज एक प्रशासनिक दावे के तौर पर नहीं, बल्कि उस चुनौती की पृष्ठभूमि में भी देखा जाना चाहिए जिसमें एक ही समय पर बड़ी संख्या में कांवड़िए और जायरीन शहर में मौजूद थे। पुलिस के मुताबिक, दोनों आयोजनों के लिए पहले से रूट प्लानिंग की गई और भीड़ प्रबंधन की व्यवस्था तैयार की गई। साझा रास्तों पर किसी तरह का विवाद न हो, इसके लिए दोनों समुदायों के लोगों से लगातार संवाद स्थापित किया गया।
 
इस पूरी व्यवस्था में सबसे उल्लेखनीय पहल सामुदायिक सहभागिता की रही। प्रशासन के अनुसार, उर्स में शामिल होने वाले जायरीनों की ओर से साझा मार्गों पर मांसाहारी भोजन का वितरण नहीं करने की अपील की गई। धार्मिक संवेदनशीलता को ध्यान में रखते हुए लिया गया यह फैसला आपसी सम्मान और सामाजिक समन्वय की मिसाल के तौर पर सामने आया।

 
उर्स की तारीख बदली, भोजन में भी बड़ा फैसला

बरेली के एसपी मानुष पारीक के मुताबिक, जिला प्रशासन की टीम ने आला हजरत दरगाह के प्रमुख से मुलाकात की थी। प्रशासन ने उनसे उर्स की तारीखों में बदलाव का अनुरोध किया था। वजह थी 10 अगस्त को बड़ी संख्या में कांवड़ियों के बरेली पहुंचने की संभावना और उससे पैदा होने वाली यातायात संबंधी चुनौती। प्रशासन ने दरगाह प्रबंधन से यह भी अनुरोध किया कि उर्स में आने वाले श्रद्धालुओं को भोजन के दौरान केवल शाकाहारी व्यंजन परोसे जाएं। दरगाह प्रबंधन ने दोनों अनुरोधों को स्वीकार कर लिया।
 
दरगाह प्रशासन के अनुसार, उर्स में करीब 10 लाख लोगों के पहुंचने की संभावना थी। इनमें देश के विभिन्न हिस्सों से आने वाले जायरीनों के अलावा ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण अफ्रीका, दुबई, सऊदी अरब, नेपाल, बांग्लादेश, अमेरिका, मॉरीशस और श्रीलंका समेत कई देशों से आने वाले लोग भी शामिल होने वाले थे। पहले उर्स 7 से 9 अगस्त तक आयोजित होना था, लेकिन कांवड़ यात्रा को देखते हुए इसकी तारीख बदलकर 6 से 8 अगस्त कर दी गई। इस तरह तीन दिन का आयोजन दो दिन में सीमित किया गया।
 
आयोजकों ने प्रशासन और पुलिस के निर्देशों के अनुरूप उर्स के दौरान मांसाहारी व्यंजन नहीं परोसने का भी फैसला किया। आला हजरत दरगाह के मीडिया प्रभारी नासिर कुरैशी के अनुसार, बड़ी संख्या में कांवड़ियों की मौजूदगी को देखते हुए तारीखों में बदलाव किया गया।
 
इसका उद्देश्य यातायात व्यवस्था को सुचारु रखना और दोनों समुदायों के धार्मिक आयोजनों के दौरान किसी तरह की असुविधा या तनाव की स्थिति पैदा होने से रोकना था। यह पहल इस मायने में महत्वपूर्ण है कि धार्मिक आयोजनों के बीच टकराव की आशंका वाले माहौल में समाधान केवल पुलिस बल बढ़ाकर नहीं, बल्कि संवाद, समझ और परस्पर संवेदनशीलता के जरिए तलाशा गया।
 
पुलिस ने दिखाई ‘आस्था और अकीदत’ की तस्वीर

उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा साझा किए गए वीडियो में बरेली की इसी व्यवस्था को प्रमुखता से दिखाया गया। पुलिस का कहना है कि मजबूत रूट प्लानिंग और प्रभावी भीड़ प्रबंधन के कारण दोनों बड़े धार्मिक आयोजनों को एक साथ संभालना संभव हुआ। सोशल मीडिया पर पुलिस के इस संदेश को मिली प्रतिक्रिया भी दिलचस्प रही। कुछ लोगों ने इसे प्रशासन की सफलता और सामाजिक सौहार्द का उदाहरण बताया। जितेंद्र सिंह भाटिया नाम के एक यूजर ने दोनों आयोजनों को शांतिपूर्ण तरीके से आयोजित कराने के लिए यूपी पुलिस को बधाई दी।
 
वहीं, कुछ प्रतिक्रियाओं में राजनीतिक व्यंग्य भी देखने को मिला। आरके त्यागी नाम के यूजर ने टिप्पणी की कि, “कुछ नहीं है योगी बाबा जी का बुलडोजर है तो सब अच्छा है।” इसके उलट साहिल खान नाम के यूजर ने राजनीतिक बहस से अलग इंसानियत को केंद्र में रखते हुए लिखा, “बिना राजनीति के भारत ऐसा ही दिखता है साहब, जहां कांवड़िए अपनी आस्था निभाते हैं और दूसरे समुदाय अपनी इंसानियत।”
 
इन प्रतिक्रियाओं से साफ है कि बरेली की तस्वीर को सोशल मीडिया पर लोग अपने-अपने नजरिए से देख रहे हैं। किसी के लिए यह प्रशासनिक प्रबंधन और धार्मिक सौहार्द की सफलता है, तो किसी के लिए यह सवाल भी है कि क्या ऐसी शांति को समानता और निष्पक्षता के पैमाने पर भी परखा जाना चाहिए।
 
 
सोशल मीडिया पर यूपी पुलिस का वीडियो वायरल, बरेली में कांवड़ और उर्स का साझा रास्ता, मगर बैकग्राउंड में बुलडोजर का साया
 
बहेड़ी की बुलडोजर कार्रवाई ने खड़े किए सवाल

बरेली में जहां एक तरफ पुलिस धार्मिक सौहार्द और आपसी सम्मान की तस्वीर पेश कर रही थी, वहीं दूसरी तरफ बहेड़ी इलाके में हुई एक कार्रवाई ने इस पूरी कहानी का दूसरा पहलू सामने ला दिया। कांवड़ यात्रा मार्ग पर स्थित चिकन बिरयानी की एक दुकान के एक हिस्से को प्रशासन ने बुलडोजर से गिरा दिया। कार्रवाई के पीछे कांवड़ मार्ग पर मांसाहारी भोजन की बिक्री का तर्क बताया गया।
 
हालांकि, इस कार्रवाई को लेकर सोशल मीडिया पर कुछ दावे भी सामने आए। आरोप लगाया गया कि कुछ कार्यकर्ताओं ने पहले ग्राहक बनकर बिरयानी मंगवाई और उसके बाद पुलिस को बुलाया। इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है, इसलिए इसे आरोप के स्तर पर ही देखा जाना चाहिए।
 
लेकिन इस घटनाक्रम ने एक बड़ा सवाल जरूर खड़ा किया है अगर किसी दुकान या प्रतिष्ठान पर नियमों के उल्लंघन का आरोप है, तो कार्रवाई के लिए क्या स्पष्ट प्रशासनिक प्रक्रिया, दस्तावेजी प्रमाण और कानून के तहत निर्धारित प्रक्रिया पर्याप्त नहीं होनी चाहिए? यही वह बिंदु है जहां बरेली की कहानी सिर्फ सांप्रदायिक सौहार्द की कहानी नहीं रह जाती, बल्कि प्रशासनिक निष्पक्षता, कानून के समान अनुपालन और नागरिक विश्वास का सवाल भी बन जाती है।
 
 
सौहार्द केवल साथ चलने का नाम नहीं

बरेली की घटनाएं एक महत्वपूर्ण संदेश देती हैं। भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में सामाजिक सौहार्द का अर्थ केवल यह नहीं है कि दो धार्मिक जुलूस एक ही शहर से बिना विवाद निकल जाएं। असली कसौटी यह भी है कि प्रशासन हर समुदाय के धार्मिक अधिकारों, भावनाओं और नागरिक अधिकारों के बीच संतुलन कायम करे।
 
कांवड़ियों की आस्था का सम्मान हो और जायरीनों की अकीदत का भी यह भारत की उस सामाजिक संस्कृति की तस्वीर है जिसमें विविधता के बावजूद साथ रहने की परंपरा रही है। उर्स की तारीख में बदलाव और भोजन संबंधी स्वैच्छिक निर्णय इस बात का उदाहरण हैं कि संवाद के जरिए धार्मिक आयोजनों के बीच रास्ता निकाला जा सकता है।
 
साथ ही, बहेड़ी की कार्रवाई यह याद दिलाती है कि सौहार्द की सबसे मजबूत नींव निष्पक्ष कानून-व्यवस्था होती है। यदि किसी समुदाय को यह महसूस हो कि उसके साथ अलग व्यवहार हो रहा है, तो बड़े से बड़ा प्रशासनिक सौहार्द संदेश भी सवालों के घेरे में आ सकता है।
 
बरेली की कहानी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें भारत की दो तस्वीरें एक साथ दिखाई देती हैं एक तस्वीर जहां कांवड़िए अपनी आस्था के साथ आगे बढ़ते हैं, जायरीन अपनी अकीदत के साथ आते हैं और दोनों के बीच रास्ता बनाने के लिए संवाद होता है; और दूसरी तस्वीर जहां एक प्रशासनिक कार्रवाई अपने पीछे पारदर्शिता और प्रक्रिया से जुड़े सवाल छोड़ जाती है।
 
“आस्था भी, अकीदत भी, अमन भी” तभी एक स्थायी सामाजिक संदेश बन सकता है, जब इसके साथ न्याय भी, निष्पक्षता भी और कानून का समान सम्मान भी सुनिश्चित हो। यही वह संतुलन है जो बरेली जैसे शहरों को केवल धार्मिक आयोजनों के सफल प्रबंधन से आगे ले जाकर वास्तविक सामाजिक सौहार्द की मिसाल बना सकता है।