गुलाब खान के नासिक ढोल की धुन पर झूमता महाराष्ट्र

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  onikamaheshwari | Date 26-09-2026
The syncretic legacy of 85-year-old Gulab Khan resonates to the rhythm of the Nashik Dhol.
The syncretic legacy of 85-year-old Gulab Khan resonates to the rhythm of the Nashik Dhol.

 

भक्ति चालक
 
महाराष्ट्र में गणेशोत्सव के जुलूस दुनिया भर में मशहूर हैं। इन जुलूसों में शामिल होने वाले ढोल-ताशा मंडलों की बात ही कुछ और है। एक ऐसा ताल और सुर जो बड़े-बड़ों को थिरकने पर मजबूर कर देता है। ढोल-ताशा की इस दुनिया में 'नासिक ढोल' एक ऐसा अलग स्टाइल है, जिसका जादू सिर्फ महाराष्ट्र पर ही नहीं, बल्कि पूरे देश और बॉलीवुड पर भी चला है। क्या आपको पता है कि करोड़ों लोगों को अपने ताल पर नचाने वाले इस नासिक ढोल की शुरुआत एक मुस्लिम शख्स ने की थी? 85 साल की उम्र पार कर चुके गुलाब खान आज भी उसी जोश के साथ ढोल बजाते हैं। 'आवाज़-द-वॉयस' से बात करते हुए गुलाब खान ने नासिक ढोल के अपने पूरे सफर को साझा किया।

ऐसे शुरू हुआ नासिक ढोल का सफर

महज़ आठ साल की उम्र में गुलाब खान बाकी बच्चों की तरह डिब्बे बजाकर खेलते थे। उन डिब्बों से निकलने वाली धुनें लोगों को पसंद आने लगीं। नासिक के मुस्लिम समाज, खास तौर पर अंसारी समाज में मोहर्रम के दौरान ढोल बजाने की पुरानी रिवायत थी। वहां बजने वाले तालों की बारीकियों को उन्होंने करीब से सीखा। मोहर्रम के जुलूस में ढोल बजाते-बजाते उनके ताल का जादू नासिक के सर्राफा बाज़ार तक पहुंच गया। उन लोगों ने गुलाब खान को अपने प्रोग्रामों में बुलाना शुरू कर दिया। यहीं से नासिक ढोल का सफर शुरू हुआ।
 
शुरुआती दौर में गुज़ारे के लिए वे तांगा चलाते थे। इसके साथ ही उन्होंने ढोल बजाने के अपने शौक को भी ज़िंदा रखा। अपने साथियों को इकट्ठा करके उन्होंने प्रोग्रामों में ढोल बजाना शुरू कर दिया। मोहर्रम के 10 दिनों में तैयार हुई यह टीम बाद में अलग-अलग संस्कृतियों के ताल सीखने लगी। गुजराती, सिंधी, मारवाड़ी और पंजाबी लोक संस्कृति के ताल सीखकर उन्होंने नासिक ढोल को एक मल्टीकल्चरल रूप दे दिया।
 
उसके बाद मुंबई, गुजरात और राजस्थान होते हुए यह पूरी टीम देश भर में मशहूर हो गई। 1960-65 के दौर में उनके ढोल की आवाज़ फिल्म इंडस्ट्री तक जा पहुंची। 1979 में आई फिल्म ‘औलिया इस्लाम’ उनकी पहली फिल्म थी। इसके बाद सुनील दत्त की फिल्म ‘काले धंधे गोरे लोग’ में भी उन्हें पर्दे पर दिखाया गया। अनिल कपूर की सुपरहिट फिल्म ‘राम लखन’ के गाने में इस्तेमाल की गई ढोल की आवाज़ भी गुलाब खान की टीम की ही थी। उसे डब करके बैंड में इस्तेमाल किया गया था। इतना ही नहीं, उस दौर में सुनील दत्त के घर गणपति पूजा में ढोल बजाने का सम्मान भी इन्हीं को मिलता था। सामाजिक भाईचारे और अपने इस सफर के बारे में बताते हुए गुलाब खान कहते हैं, “संगीत और कला की कोई जात या मज़हब नहीं होता। हमने हमेशा हर धर्म के त्योहार में लोगों का दिल जीतने के लिए ही ढोल बजाया है।”
 
 
गणेशोत्सव में ढोल बजाने की 65 सालों की परंपरा

गणेशोत्सव में नासिक ढोल की एंट्री कैसे हुई, इसकी कहानी भी काफी दिलचस्प है। मुंबई के ज़वेरी बाज़ार में गणपति के पहले दिन ढोल बजाते हुए चेंबूर के एक बड़े सेठजी ने उन्हें देखा और विसर्जन के जुलूस के लिए बुलाया। आज चेंबूर के ‘श्री गणेश बालमित्र मंडल’ और सिंधी समाज के ‘झूलेलाल मंदिर’ में गुलाब खान की तीसरी पीढ़ी पिछले 65 सालों से लगातार ढोल बजा रही है। अपनी अलग-अलग संस्कृतियों के तालों के बारे में बात करते हुए गुलाब खान ज़ोर देकर कहते हैं, “हमारे ढोल पर सिंधी, गुजराती, मारवाड़ी, पंजाबी, राजस्थानी, हैदराबादी और मराठी. हर ज़बान के हिसाब से ताल बजती है। हम सबके लिए ढोल बजाते हैं, इस बात की हमें बहुत ज़्यादा खुशी है।”
 
सिर पर बोतल रखकर हैरतअंगेज़ स्टंट्स

गुलाब खान के नासिक ढोल की सबसे बड़ी खासियत संगीत के साथ-साथ उनके हैरतअंगेज़ स्टंट्स हैं। भले ही सामने कोई नाचने वाला न हो, लेकिन सिर पर कांच की बोतल रखकर डांस करना, या ढोल लेकर नीचे लेटे हुए इंसान पर दो-तीन लोगों का खड़ा होना—ऐसे मुश्किल स्टंट्स उनकी टीम आज भी करती है। ये मुश्किल स्टंट्स पूरी ट्रेनिंग के बाद ही सुरक्षित तरीके से किए जाते हैं। असली और नकली नासिक ढोल के बीच का फर्क बताते हुए वे कहते हैं, “नकली ढोल वालों को हमारे जैसे महज़ 3-4 ताल ही आते हैं। लेकिन हमारे पास तालों का बहुत बड़ा खज़ाना है। हमारे स्टंट्स ही हमारा हुकुम का इक्का हैं, जो कोई और नहीं कर सकता।”
 
150 कलाकारों की टीम में महिलाओं का भी हिस्सा

गुलाब खान के कारवां में आज 150 कलाकारों की एक बड़ी टीम है, जिसमें 20 से 30 महिलाएं भी शामिल हैं। खास बात यह है कि इस टीम में 40 फीसद गैर-मुस्लिम और 60 फीसद मुस्लिम कलाकार हैं। महिलाओं की टीम में तो 30 गैर-मुस्लिम और 10 मुस्लिम महिलाएं हैं। ट्रेनिंग के दौरान गरीब घरों के नौजवान लड़के-लड़कियों को खास प्राथमिकता दी जाती है। आज इस टीम में काम करने वाले ढोल वादकों की तीन-तीन पीढ़ियां एक साथ ढोल बजा रही हैं। कॉरपोरेट इवेंट्स हों, शादियां हों, नामकरण संस्कार हो या मंदिरों के त्योहार... इस नासिक ढोल की पूरे साल ज़बरदस्त डिमांड रहती है।
 

 
देशभक्त परिवार की ऐतिहासिक विरासत

गुलाब खान के बेटे कादिर खान ने अपने परिवार का एक ऐतिहासिक पहलू भी साझा किया। गुलाब खान एक जाने-माने और फौजी बैकग्राउंड वाले परिवार से ताल्लुक रखते हैं। जब देश आज़ादी की दहलीज़ पर था, तब उनके पूर्वजों ने अंग्रेज़ों के कब्ज़े वाली जगह को छुड़ाने के लिए एक बड़ी लड़ाई लड़ी थी। आज़ादी मिलने के बाद, अंग्रेज़ों से किराया हासिल करने वाली उस अहम जगह को उनके दादा ने भारत सरकार को मेडिकल कैंप और पुलिस चौकी के लिए मुफ्त में इस्तेमाल करने के लिए दे दिया था। उस दौर की किराए की रसीदें और ताम्रपत्र आज भी उनके पास सुरक्षित हैं।
 
नासिक ढोल की धुन

बाद के दौर में पुणे में ‘पुणेरी ढोल-ताशा पथक’ (टीम) के मशहूर होने से वहां नासिक ढोल की डिमांड भले ही थोड़ी कम हुई हो, लेकिन मुंबई, गुजरात, कर्नाटक और हैदराबाद में आज भी गुलाब खान के नासिक ढोल का ही डंका बजता है। 85 साल की उम्र में भी उसी जोश के साथ ढोल बजाने वाले गुलाब खान और उनकी तीन पीढ़ियों की टीम महाराष्ट्र की सामाजिक एकता और मिली-जुली तहज़ीब की एक जीती-जागती मिसाल है। आज के डीजे वाले दौर में भी जब-जब बप्पा के जुलूस में नासिक ढोल की गूंज सुनाई देगी, तब-तब एक मुस्लिम फकीर द्वारा रचे गए तालों का यह इतिहास आसमान में हमेशा के लिए अमर हो जाएगा।