An example of five generations of brotherhood: A Muslim family from Akola crafts traditional ‘Dev Rakhi’.
भक्ति चालक
महाराष्ट्र के अकोला जिले के बालापुर में ताज मोहम्मद और उनका परिवार पिछले पांच पीढ़ियों से पारंपरिक ‘देव राखी’ बनाने का काम कर रहा है। यह वही राखी है, जिसे रक्षाबंधन के दिन घर-घर में सबसे पहले भगवान को अर्पित किया जाता है। एक मुस्लिम परिवार द्वारा पीढ़ियों से हिंदू त्योहार के लिए राखियां तैयार करना सामाजिक सौहार्द और भाईचारे की अनोखी मिसाल पेश करता है।
ताज मोहम्मद बताते हैं कि उनके परिवार में राखी बनाने की परंपरा उनके पूर्वजों के समय से चली आ रही है। उनका नाम भी उनके दादा के नाम पर रखा गया था। दादा के निधन के बाद जन्मे ताज आज उसी विरासत को पूरी श्रद्धा के साथ आगे बढ़ा रहे हैं। ताज मोहम्मद कहते हैं, “हमारी यह पांचवीं पीढ़ी है जो राखियां बना रही है। रक्षाबंधन के लिए इस्तेमाल होने वाली देव राखी हमारे यहां ही तैयार होती है। हमारे पूर्वजों के समय से यह काम चलता आ रहा है।” उनका परिवार केवल राखियां ही नहीं बनाता। वे दीपावली के लिए करदोड़, दुर्गा पूजा के लिए पूजा सामग्री और साड़ियां समेत अलग-अलग हिंदू त्योहारों से जुड़ी वस्तुएं भी तैयार कर बाजार में बेचते हैं।
सफेद धागे से तैयार होती है देव राखी
आज बाजार में प्लास्टिक और चीनी राखियों की भरमार है, लेकिन बालापुर के इस परिवार की पारंपरिक देव राखी की अपनी अलग पहचान है। मान्यता है कि रक्षाबंधन के दिन भाई की कलाई पर राखी बांधने से पहले घर के देवता को राखी अर्पित की जाती है। इस पारंपरिक राखी को तैयार करना जितना आसान दिखाई देता है, उसके पीछे उतनी ही मेहनत छिपी होती है। देव राखी बनाने की शुरुआत बाजार से खरीदे गए सफेद सूती धागे से होती है। सबसे पहले धागे को अलग-अलग पारंपरिक रंगों में रंगा जाता है। इसके बाद उसे उबालकर रंग को पक्का किया जाता है। फिर धागों को सुखाया जाता है और लाल, पीले तथा अन्य रंगों के सुंदर धागे तैयार किए जाते हैं। रक्षाबंधन का त्योहार नजदीक आते ही पूरा परिवार करीब दो महीने तक दिन-रात मेहनत करता है।
काम में धर्म नहीं, इंसान देखा जाता है
इतनी बड़ी मात्रा में राखियां अकेले एक परिवार के लिए तैयार करना संभव नहीं है। इसलिए ताज मोहम्मद अपने आसपास के परिवारों को भी यह काम देते हैं। खास बात यह है कि काम बांटते समय वे यह नहीं देखते कि काम करने वाला व्यक्ति हिंदू है या मुस्लिम। ताज बताते हैं, “हम अपने पुराने कारीगरों को 80 रुपये और नए कारीगरों को 60 रुपये देकर सामान तैयार करवाते हैं। इससे त्योहार के दिनों में हमारे पड़ोसी भी कुछ कमा लेते हैं। हमारा कारोबार सभी को साथ लेकर चलने का है।” इस तरह राखी बनाने का यह काम केवल ताज मोहम्मद के परिवार की आजीविका नहीं है, बल्कि आसपास के कई परिवारों के लिए त्योहार के मौसम में अतिरिक्त कमाई का जरिया भी बन जाता है।
मुनाफे से ज्यादा भावनाओं की कीमत
आज के दौर में जहां कारोबार का उद्देश्य अक्सर ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाना होता है, वहीं ताज मोहम्मद का परिवार इस काम को अलग नजरिए से देखता है। उनका कहना है, “जिनकी जरूरतें बड़ी होती हैं, लालच भी उन्हीं का बड़ा होता है। हम ऐसे नहीं हैं। हमें अपनी रोज की मजदूरी मिल जाए, हमारा काम चलता रहे और हमारे साथ जुड़े पड़ोसी भी थोड़ा कमा लें, तो हम संतुष्ट हैं।”
वह आगे कहते हैं, “10 रुपये की चीज से 50 रुपये कमाना हमारी सोच नहीं है। यह हमारे पूर्वजों का कारोबार है और लोगों की आस्था से जुड़ा हुआ है। इसी भावना को ध्यान में रखकर हम यह काम करते हैं।” रक्षाबंधन से एक दिन पहले बालापुर स्थित उनकी कार्यशाला में सभी राखियां तैयार कर ली जाती हैं और उन्हें अकोला के मुख्य बाजार में पहुंचाया जाता है।
पीढ़ियों से कायम है भरोसा
अकोला के कई गुजराती, मारवाड़ी और सिंधी व्यापारी इस परिवार से पीढ़ियों से देव राखियां खरीदते आ रहे हैं। पुराने व्यापारियों ने अपने बच्चों और अगली पीढ़ी को भी यही परंपरा सौंपी है। वे अपने परिवार के युवाओं से कहते हैं कि “बालापुर में इसी परिवार से सामान लेना, क्योंकि इनका सामान अच्छी गुणवत्ता का है और इनके साथ हमारा पीढ़ियों पुराना रिश्ता है।” यह भरोसा केवल व्यापार का रिश्ता नहीं है, बल्कि कई दशकों से चले आ रहे आपसी विश्वास और सम्मान का प्रतीक बन चुका है।
‘कोई काम किसी धर्म का नहीं होता’
ताज मोहम्मद इस बात को लेकर भावुक हो जाते हैं। वे कहते हैं कि उनके पूर्वजों ने कभी उन्हें यह नहीं सिखाया कि कोई काम किसी दूसरे धर्म का है और इसलिए उसे नहीं करना चाहिए। “हमारे लिए यह हमारी रोजी-रोटी है। लोगों की आस्था से जुड़े काम को करने में हमें बहुत खुशी मिलती है।” वर्तमान समय में समाज में बढ़ती नफरत और धार्मिक तनाव के माहौल पर ताज कहते हैं कि अगर उनकी कहानी हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदायों के लोगों तक पहुंचे और इससे लोगों की सोच बदले, तो उन्हें सबसे ज्यादा खुशी होगी।
उनका संदेश बेहद सरल है:
“कोई काम किसी एक धर्म का नहीं होता। कोई भी काम किसी को छोटा नहीं बनाता। जो काम आपके हाथ में आए, उसे ईमानदारी और पूरी मेहनत से करना चाहिए।” अकोला का यह परिवार दिखाता है कि रिश्ते केवल खून या धर्म से नहीं, बल्कि भरोसे, मेहनत और भावनाओं से भी बनते हैं। रक्षाबंधन भाई-बहन के प्रेम का त्योहार है, लेकिन ताज मोहम्मद का परिवार अपनी पांच पीढ़ियों से यह संदेश भी दे रहा है कि प्रेम, परंपरा और भाईचारे का धागा धर्म की सीमाओं से कहीं बड़ा होता है।