मलिक असगर हाशमी
यदि आप अंग्रेजी गानों के शौकीन हैं तो 1977 का वह मशहूर गाना 'वी विल रॉक यू' आपने जरूर सुना होगा। उस दौर में यह गाना रॉक एंड रोल संगीत की दुनिया का एक बड़ा एंथम बन गया था। इस गाने को सुरों से सजाया था ब्रिटेन के मशहूर गायक फ्रेडी मर्करी ने। लेकिन आज अचानक इस गाने और फ्रेडी मर्करी की चर्चा करने के पीछे एक बेहद दिलचस्प और चौंकाने वाली वजह है।
बहुत कम लोग जानते हैं कि रॉक संगीत की दुनिया पर राज करने वाले फ्रेडी मर्करी का असली नाम फारुख बुलसारा था। उनका परिवार मूल रूप से भारत के गुजरात राज्य में स्थित वलसाड का रहने वाला था।
यह एक पारंपरिक गुजराती पारसी परिवार था जो काम के सिलसिले में पहले जांजीबार गया और वहां आई क्रांति के बाद ब्रिटेन के मिडलसेक्स में जाकर बस गया। फ्रेडी मर्करी की यह कहानी केवल एक रॉक स्टार की सफलता की गाथा नहीं है। यह असल में भारत के गौरवशाली पारसी समुदाय के उस सफर का हिस्सा है जिसने दुनिया भर में अपनी एक अलग पहचान बनाई।

फारुख बुलसारा से फ्रेडी मर्करी बनने का सफर
फारुख बुलसारा का जन्म 5 सितंबर 1946 को जांजीबार के एक पारसी परिवार में हुआ था। उनके पिता बोमी बुलसारा ब्रिटिश औपनिवेशिक कार्यालय में कैशियर के पद पर कार्यरत थे। जांजीबार उस समय ब्रिटिश संरक्षित क्षेत्र था। इस वजह से फारुख को जन्म से ही ब्रिटिश नागरिकता मिल गई थी।
फारुख का बचपन ज्यादातर भारत में ही बीता। महज आठ साल की उम्र में उन्हें पढ़ाई के लिए मुंबई के पास पंचगनी के एक मशहूर ब्रिटिश बोर्डिंग स्कूल सेंट पीटर्स में भेज दिया गया। भारत में रहते हुए ही उन्होंने सात साल की उम्र से ही अपने रिश्तेदारों के साथ पियानो बजाना सीखना शुरू कर दिया था।
उन्हें अपने पिता से डाक टिकट जमा करने का अनोखा शौक भी विरासत में मिला था। उन्होंने बचपन में ब्रिटिश कॉमनवेल्थ के कई दुर्लभ डाक टिकटों का संग्रह किया था।
साल 1964 में जांजीबार में सुल्तान की सरकार के खिलाफ एक हिंसक क्रांति भड़क उठी। इस हिंसा से बचने के लिए बुलसारा परिवार को अपना सब कुछ छोड़कर इंग्लैंड भागना पड़ा। वहां वे लंदन के पास मिडलसेक्स के एक छोटे से घर में रहने लगे। स्कूल की पढ़ाई पूरी करने के बाद फारुख ने ईलिंग कॉलेज ऑफ आर्ट्स में दाखिला लिया जहां उन्होंने ग्राफिक डिजाइनिंग के साथ संगीत की बारीकियाँ सीखीं।
उस दौर में वे लंदन के स्थानीय बैंड्स और मशहूर गिटारिस्ट जिमी हेंड्रिक्स के संगीत से काफी प्रभावित थे। इसी दौरान उनकी मुलाकात गिटार बजाने वाले ब्रायन मे और ड्रम बजाने वाले रोजर टेलर से हुई।
साल 1971 में जब उनके पुराने बैंड 'स्माइल' के लीड सिंगर ने ग्रुप छोड़ दिया तब फारुख को मुख्य गायक के रूप में शामिल किया गया। इसी मोड़ पर उन्होंने अपना नाम फारुख बुलसारा से बदलकर फ्रेडी मर्करी रख लिया। बाद में जब जॉन डीकन भी इस ग्रुप से जुड़ गए तब इस नए रॉक बैंड का नाम 'क्वीन' रखा गया।
क्वीन बैंड की ऐतिहासिक सफलता
क्वीन बैंड का पहला एल्बम साल 1973 में रिलीज हुआ था। इस एल्बम के गानों को बैंड के चारों सदस्यों ने मिलकर लिखा था। उनके गानों का अंदाज काफी नाटकीय और ओपेरा जैसा होता था। इसी अनूठी शैली ने बहुत जल्द पूरे यूरोप और फिर पूरी दुनिया में उनके प्रशंसकों की एक भारी फौज खड़ी कर दी।
इसके बाद आए एल्बम्स ने सफलता के नए कीर्तिमान स्थापित किए। साल 1975 में आया 'अ नाइट एट द ओपेरा' और साल 1977 का 'न्यूज़ ऑफ़ द वर्ल्ड' संगीत के चार्ट्स पर शीर्ष स्थानों पर रहे।
साल 1980 में रिलीज हुए एल्बम 'द गेम' को पॉप चार्ट पर पहला स्थान मिला जो इस बैंड की सबसे बड़ी कामयाबी थी। फ्रेडी मर्करी की आवाज में चार ऑक्टेव की एक अद्भुत वोकल रेंज थी। मंच पर उनका प्रदर्शन इतना दमदार होता था कि लोग मंत्रमुग्ध हो जाते थे।
उन्होंने 'बोहेमियन रैप्सोडी' और 'वी आर द चैंपियंस' जैसे कालजयी गाने लिखे और गाए। साल 1991 में महज 45 वर्ष की आयु में एड्स से जुड़ी जटिलताओं के कारण इस महान गायक का निधन हो गया। उनके जाने के बाद भी उनका संगीत अमर रहा। उन्हें मरणोपरांत यूके म्यूजिक हॉल ऑफ फेम में शामिल किया गया और ब्रिटिश संगीत में उनके योगदान के लिए कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों से नवाजा गया।

दूध में चीनी की तरह घुलने की दास्तान
फ्रेडी मर्करी के जीवन को गहराई से समझने के लिए उनके पारसी समुदाय के इतिहास को जानना बेहद जरूरी है। पारसी मूल रूप से प्राचीन फारस यानी आज के ईरान के रहने वाले थे। यह समुदाय आर्यों की इंडो-यूरोपीय शाखा से संबंध रखता है।
सातवीं शताब्दी में जब अरब आक्रमणकारियों ने फारस पर विजय प्राप्त की तब वहां के मूल निवासियों को जबरन धर्म परिवर्तन के लिए मजबूर किया जाने लगा। अपने धर्म और संस्कृति की रक्षा के लिए पारसियों का एक बड़ा समूह नावों में सवार होकर समुद्र के रास्ते भारत की ओर निकल पड़ा। वे सबसे पहले गुजरात के दक्षिणी तट पर स्थित एक छोटे से बंदरगाह संजान पहुंचे।
संजान के स्थानीय राजा जाधव राणा को जब इन विदेशी शरणार्थियों के आने की सूचना मिली तो वे थोड़े असमंजस में थे। उनके राज्य की आबादी पहले से ही काफी अधिक थी। राजा ने पारसी पुरोहितों को अपनी बात समझाने के लिए एक संदेश भेजा। उन्होंने पारसियों के पास दूध से लबालब भरा एक कटोरा भेजा जिसका सीधा मतलब था कि उनके राज्य में अब नए लोगों के लिए कोई जगह खाली नहीं है।
पारसी समुदाय के वृद्ध और बुद्धिमान पुरोहित ने राजा के इस संकेत को तुरंत समझ लिया। उन्होंने बेहद चतुराई से उस भरे हुए दूध के कटोरे में एक चुटकी चीनी डाल दी। चीनी दूध में इस तरह घुल गई कि दूध का एक कतरा भी बाहर नहीं गिरा।
इस प्रतीकात्मक संदेश का मतलब था कि पारसी लोग स्थानीय समाज पर बिना कोई बोझ बने यहां की संस्कृति में दूध और चीनी की तरह घुलमिल जाएंगे और जीवन में मिठास घोलेंगे। राजा जाधव राणा इस बुद्धिमत्ता से बेहद प्रभावित हुए और उन्होंने पारसियों को अपने राज्य में बसने की सहर्ष अनुमति दे दी।

प्रकृति पूजा और सनातन धर्म से गहरा नाता
पारसी धर्म दुनिया के सबसे प्राचीन एकेश्वरवादी धर्मों में से एक है। इसकी स्थापना पैगंबर जरथुस्ट्र ने की थी। इसी कारण इसे जरथुस्त्री या जोरोस्ट्रियन धर्म भी कहा जाता है। पारसी समाज में ईश्वर को 'अहुरा मजदा' कहा जाता है जिसका अर्थ है महान जीवन दाता।
इस धर्म का पवित्र ग्रंथ 'जेंद अवेस्ता' है। दिलचस्प बात यह है कि प्राचीन पारसी परंपराओं और भारत के वैदिक सनातन धर्म में बहुत सी समानताएं देखने को मिलती हैं। पारसी लोग किसी मूर्ति की पूजा नहीं करते हैं। वे अग्नि, सूर्य और वायु जैसे प्राकृतिक तत्वों को ईश्वर की शक्ति का प्रतीक मानकर उनकी उपासना करते हैं। उनके मंदिरों को 'अग्नि मंदिर' या फायर टेम्पल कहा जाता है जहां पवित्र अग्नि हमेशा जलती रहती है।
जेंद अवेस्ता की भाषा और ऋग्वेद की संस्कृत में इतना गहरा साम्य है कि कई शब्दों के उच्चारण और अर्थ बिल्कुल एक जैसे हैं। अवेस्ता में हफ्तहिन्दु यानी सप्तसिंधु, हरव्वेती यानी सरस्वती और हरयू यानी सरयू जैसी भारतीय नदियों और क्षेत्रों के नाम साफ तौर पर मिलते हैं।
समय के साथ भारत में बसने के बाद पारसियों ने पूरी तरह से गुजराती भाषा और यहां के रहन-सहन को अपना लिया। उन्होंने अपने काम और व्यवसाय के आधार पर अपने उपनाम तय किए जैसे इत्र बेचने वाले गांधी कहलाए और शराब का कारोबार करने वाले दारूवाला बन गए।

एक छोटा समुदाय और देश के विकास में बड़ा योगदान
पारसी समुदाय की आबादी हमेशा से बहुत कम रही है लेकिन भारत के विकास में उनका योगदान किसी भी अन्य बड़े समुदाय से कम नहीं है। उन्होंने कला, विज्ञान, उद्योग और देश की सुरक्षा के क्षेत्र में अपना सर्वोच्च योगदान दिया है। साल 1790 में जब गुजरात में भारी अकाल पड़ा था तब बड़ी संख्या में पारसी परिवार मुंबई में आकर बस गए थे। मुंबई की व्यावसायिक ऊर्जा ने पारसियों की उद्यमशीलता को एक नया मंच दिया।
भारत को आधुनिक बनाने में इस समुदाय के कई दिग्गजों का नाम इतिहास के पन्नों में दर्ज है:

घटती आबादी की गंभीर चुनौती
आज यह ऐतिहासिक और प्रगतिशील समुदाय जनसांख्यिकीय संकट के एक बेहद नाजुक दौर से गुजर रहा है। पूरी दुनिया में पारसियों की कुल आबादी अब महज एक लाख से डेढ़ लाख के बीच सिमट कर रह गई है।
इस आबादी का एक बहुत बड़ा हिस्सा भारत में ही रहता है। भारत में भी लगभग 70 फीसदी पारसी मुंबई में और करीब 20 फीसदी अहमदाबाद सहित गुजरात के अन्य हिस्सों में रहते हैं। देश के कई हिस्सों में अब उनकी संख्या उंगलियों पर गिनने लायक बची है।
उदाहरण के लिए जमशेदपुर जैसे औद्योगिक शहर में जहां कभी आठ सौ से ज्यादा पारसी परिवार हुआ करते थे वहां अब केवल 70 के करीब परिवार ही बचे हैं। कई घरों में तो केवल एक या दो बुजुर्ग ही रह रहे हैं।
आबादी के इस संकट के बावजूद पारसी समुदाय की साख और उनका गौरव आज भी उतना ही मजबूत है। फारस की प्राचीन घाटियों से लेकर भारत के संजान तट तक और फिर वहां से वेम्बली स्टेडियम में गूंजने वाली फ्रेडी मर्करी की धुनों तक पारसियों ने राजा जाधव राणा को दिया अपना वचन पूरी शिद्दत से निभाया है। वे आज भी दुनिया के ताने-बाने में मिठास घोलने का काम बखूबी कर रहे हैं।