मलिक असगर हाशमी
भारत में अल्पसंख्यकों की बात होते ही अक्सर ध्यान केवल बड़े धार्मिक समुदायों पर जाता है। लेकिन देश में जैन, सिख और पारसी जैसे छोटे संप्रदाय भी रहते हैं। इनमें सबसे ज्यादा चिंताजनक स्थिति पारसी समुदाय की है। एक तरफ जहां अन्य समुदायों की आबादी स्थिर है या बढ़ रही है, वहीं पारसी यानी जोरोस्ट्रियन समाज की जनसंख्या तेजी से घट रही है। स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि अब इस समाज के अस्तित्व को बचाने की नौबत आ गई है। इसी संकट को देखते हुए केंद्र सरकार के अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय ने एक खास पहल की है, जिसका नाम 'जियो पारसी' योजना है।
यह योजना पारसी समुदाय की घटती आबादी को रोकने और उसे बढ़ाने के लिए शुरू की गई है। इस सरकारी योजना का लाभ कैसे उठाया जा सकता है और इसमें क्या-क्या वित्तीय मदद शामिल है, आइए इसे विस्तार से समझते हैं।
क्यों पड़ी इस योजना की जरूरत?
साल 1941 की जनगणना के अनुसार भारत में पारसियों की कुल आबादी लगभग 1,14,000 थी। साल 2011 की जनगणना में यह संख्या घटकर महज 57,264 रह गई। इस गंभीर गिरावट को रोकने के लिए भारत सरकार ने साल 2013-14 में 'जियो पारसी' योजना की शुरुआत की।
केंद्रीय अल्पसंख्यक कार्य मंत्री किरेन रीजीजू ने हाल ही में संसद में बताया कि इस योजना को अगले वित्त आयोग के चक्र में भी जारी रखने पर विचार किया जा रहा है। 15वें वित्त आयोग (2021-22 से 2025-26) के लिए इस योजना का कुल बजट 50 करोड़ रुपये रखा गया है। यह शत-प्रतिशत केंद्र सरकार द्वारा वित्तपोषित योजना है।
Through the #JiyoParsi Scheme, the Ministry of Minority Affairs continues its efforts to support the well-being and sustainability of the Parsi community through targeted interventions and assistance.
— Ministry of Minority Affairs (@MOMAIndia) June 19, 2026
A steadfast commitment to community development and inclusion.… pic.twitter.com/CrfJ8h7qms
योजना के तीन मुख्य स्तंभ और वित्तीय सहायता
जियो पारसी योजना मुख्य रूप से तीन हिस्सों में बंटी है। इसके तहत पारसी जोड़ों को अलग-अलग स्तर पर सीधे नकद मदद दी जाती है।
1. चिकित्सा सहायता (Medical Assistance)
यह हिस्सा उन जोड़ों के लिए है जो बांझपन या गर्भधारण से जुड़ी समस्याओं से जूझ रहे हैं। इसके तहत आईवीएफ (In-Vitro Fertilization), आईसीएसआई (Intra Cytoplasmic Sperm Injection) और सरोगेसी जैसी आधुनिक तकनीकों के लिए पैसे दिए जाते हैं।
2. समुदाय का स्वास्थ्य (Health of Community)
पारसी जोड़े आर्थिक बोझ के डर के बिना अधिक बच्चे पैदा कर सकें, इसके लिए सरकार बच्चों और बुजुर्गों की देखभाल का खर्च उठा रही है।
3. जागरूकता और वकालत (Advocacy)
इसके तहत पारसी युवाओं और जोड़ों की काउंसलिंग की जाती है। सेमिनार, मेडिकल कैंप, सोशल मीडिया अभियान और लघु फिल्मों के जरिए लोगों को इस योजना के लाभों के प्रति जागरूक किया जाता है।
योजना का बजट और खर्च का लेखा-जोखा
सरकार इस योजना पर हर साल एक निश्चित राशि खर्च कर रही है। पिछले कुछ वर्षों का सालाना बजट आवंटन और खर्च इस प्रकार रहा है:
|
वित्त वर्ष |
जागरूकता (करोड़ ₹) |
चिकित्सा घटक (करोड़ ₹) |
समुदाय स्वास्थ्य (करोड़ ₹) |
कुल बजट (करोड़ ₹) |
|---|---|---|---|---|
|
2021-22 |
2.11 |
3.62 |
4.27 |
10.00 |
|
2022-23 |
2.11 |
3.62 |
4.27 |
10.00 |
|
2023-24 |
2.11 |
3.62 |
4.27 |
10.00 |
|
2024-25 |
2.11 |
3.62 |
4.27 |
10.00 |
|
2025-26 |
2.11 |
3.62 |
4.27 |
10.00 |
|
कुल योग |
10.55 |
18.10 |
21.35 |
50.00 |
जमीन पर क्या रहा असर?
इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर पापुलेशन साइंसेज (IIPS) ने साल 2025 में इस योजना का एक मूल्यांकन अध्ययन किया था। इस रिपोर्ट के मुताबिक योजना अपने उद्देश्य में काफी हद तक सफल रही है। पारसी समुदाय के लोगों ने माना है कि इस योजना से समाज की आबादी बढ़ाने में मदद मिली है।
पिछले पांच वर्षों (2020-21 से 2024-25) के दौरान इस योजना के तहत 17.64 करोड़ रुपये खर्च किए गए। इस अवधि में योजना की मदद से 232 बच्चों का जन्म हुआ। अगर योजना की शुरुआत (2013-14) से बात करें तो अब तक 400 से ज्यादा पारसी बच्चों का जन्म इस पहल के माध्यम से हो चुका है। महाराष्ट्र और गुजरात जैसे राज्यों में जहां पारसी आबादी अधिक है, वहां इस योजना का लाभ सबसे ज्यादा उठाया जा रहा है।
हाल के वर्षों में लाभार्थियों की संख्या और जारी किए गए फंड के आंकड़े नीचे दिए गए हैं:
पारदर्शिता के लिए ऑनलाइन पोर्टल और डीबीटी
इस योजना का लाभ सीधे हकदार लोगों तक पहुंचे, इसके लिए सरकार ने पूरी प्रक्रिया को डिजिटल कर दिया है। 'जियो पारसी' का एक समर्पित ऑनलाइन पोर्टल शुरू किया गया है। इस पोर्टल पर जाकर पारसी जोड़े सीधे आवेदन कर सकते हैं। वे अपने आवेदन की स्थिति की जांच भी ऑनलाइन ही कर सकते हैं।
पैसों का भुगतान सीधे लाभार्थी के बैंक खाते में डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर यानी डीबीटी (DBT) के जरिए किया जाता है। राज्य सरकारें और संबंधित पारसी संस्थान आवेदन करने वाले जोड़ों का बायोमेट्रिक सत्यापन करते हैं। इस कड़े वेरिफिकेशन के कारण योजना में किसी भी तरह की गड़बड़ी की गुंजाइश नहीं बचती है।

चुनौतियां अभी भी हैं बरकरार
भले ही इस योजना के आर्थिक और चिकित्सा परिणाम अच्छे दिख रहे हैं, लेकिन केवल पैसों की मदद से इस जनसांख्यिकीय संकट को पूरी तरह हल नहीं किया जा सकता। पारसी समाज में आबादी घटने के पीछे कुछ गहरे सामाजिक कारण भी हैं।
इस समाज में लोग बहुत देर से शादी करते हैं। कई लोग शादी न करने का फैसला भी चुनते हैं। जो लोग शादी करते हैं, वे छोटा परिवार रखना पसंद करते हैं। शहरी जीवनशैली और करियर को प्राथमिकता देने के कारण भी बच्चों की संख्या कम हो रही है।
केवल चिकित्सा और वित्तीय सहायता देने से इन सामाजिक प्राथमिकताओं को नहीं बदला जा सकता। इसके लिए समाज के भीतर एक सांस्कृतिक बदलाव की भी जरूरत महसूस की जा रही है।
आगे की राह और सुझाव
विशेषज्ञों का मानना है कि इस योजना को और अधिक प्रभावी बनाने के लिए कुछ नए कदम उठाने होंगे:
जियो पारसी योजना ने निश्चित रूप से एक खत्म हो रहे समाज को नई उम्मीद दी है। सरकार की इस वित्तीय संजीवनी के साथ अगर समाज खुद अपनी रूढ़ियों को छोड़कर आगे आए, तभी पारसियों की इस अनूठी और गौरवशाली संस्कृति को भारत की धरती पर हमेशा के लिए सुरक्षित रखा जा सकेगा।