डॉ. उज़मा क़मर: मानसिक स्वास्थ्य, समावेशी शिक्षा और संवेदनशील समाज की पैरोकार

Story by  ओनिका माहेश्वरी | Published by  onikamaheshwari | Date 12-07-2026
Dr. Uzma Qamar: A Journey of Education, Health, Child Development, and Building a Compassionate Society
Dr. Uzma Qamar: A Journey of Education, Health, Child Development, and Building a Compassionate Society

 

ओनिका माहेश्वरी/ नई दिल्ली  

बरेली से आने वाली हेल्थकेयर एक्सपर्ट, काउंसलर और एंटरप्रेन्योर डॉ. उज़मा क़मर का जीवन एक ऐसी बहुआयामी यात्रा को दर्शाता है, जिसमें शिक्षा, स्वास्थ्य, बाल विकास और मानसिक स्वास्थ्य जैसे विषय केवल पेशेवर क्षेत्र नहीं बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी के रूप में सामने आते हैं। उनकी सोच इस बात को रेखांकित करती है कि यदि विज्ञान, संवेदनशीलता और अनुभव को साथ लेकर चला जाए, तो समाज में गहरा और स्थायी बदलाव लाया जा सकता है।

उनकी शुरुआती शिक्षा और व्यक्तित्व निर्माण में उनकी माता की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही। डॉ. उज़मा बताती हैं कि उनकी मां हमेशा चाहती थीं कि वे अच्छी शिक्षा प्राप्त करें और एक वर्किंग प्रोफेशनल बनें। यही प्रेरणा उनके जीवन की दिशा बन गई। आगे चलकर उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से भी शैक्षणिक जुड़ाव रखा और फिर प्रतिष्ठित Aligarh Muslim University के जेएन मेडिकल कॉलेज से फिजियोथैरेपी एंड रिहैबिलिटेशन में अध्ययन किया। उनके अनुसार, एएमयू में पढ़ाई करना केवल एक शैक्षणिक अनुभव नहीं था, बल्कि एक पूरी जीवनशैली थी, जिसने उनकी सोच, व्यवहार और दृष्टिकोण को गहराई से बदल दिया।

जिला जेल महिला सेल में काउंसलिंग सत्र के लिए तत्कालीन जेलर द्वारा सम्मानित

एएमयू के अपने अनुभवों को साझा करते हुए वे बताती हैं कि वहां उन्होंने जीवन का एक महत्वपूर्ण कौशल नेटवर्किंग और लोगों से जुड़ने की कला सीखी, जो आज के समय में करियर और प्रोफेशन दोनों के लिए बेहद जरूरी है। फिजियोथैरेपी की पढ़ाई के दौरान ही उनका ध्यान धीरे-धीरे बाल मनोविज्ञान और बाल विकास की ओर बढ़ने लगा। इस दौरान उन्होंने बच्चों की शारीरिक और मानसिक दोनों तरह की समस्याओं को नजदीक से समझा और यह महसूस किया कि स्वास्थ्य केवल शरीर का नहीं, बल्कि मन और शरीर दोनों का संतुलन है। यहीं से उनके भीतर यह विचार और मजबूत हुआ कि स्वस्थ शरीर और स्वस्थ मन एक-दूसरे के पूरक हैं और दोनों के बीच संतुलन बेहद आवश्यक है।

अपनी शैक्षणिक यात्रा के साथ-साथ उनका दृष्टिकोण शिक्षा व्यवस्था को लेकर भी विकसित हुआ। डॉ. उज़मा का मानना है कि वर्तमान शिक्षा प्रणाली में आज भी रटने (rote learning) और प्रतिस्पर्धा पर अत्यधिक जोर दिया जाता है, जबकि बच्चों की वास्तविक क्षमता जैसे रचनात्मकता, खेल, व्यावहारिक समझ और बहुआयामी बुद्धिमत्ता (multiple intelligence)—को पर्याप्त महत्व नहीं दिया जाता। वे मानती हैं कि आज के बच्चे पहले की तुलना में अधिक आत्मविश्वासी, संवादशील और तेजी से सीखने वाले हैं, लेकिन उनमें धैर्य की कमी और तुरंत प्रतिक्रिया देने की प्रवृत्ति भी बढ़ी है। इसका कारण वे बदलते सामाजिक ढांचे, न्यूक्लियर फैमिली सिस्टम, अत्यधिक सुविधा और डिजिटल उपकरणों की उपलब्धता को मानती हैं।

मानसिक स्वास्थ्य पर अपने विचार रखते हुए डॉ. उज़मा एक संतुलित दृष्टिकोण प्रस्तुत करती हैं। उनके अनुसार, समाज में मानसिक स्वास्थ्य को लेकर दो चरम दृष्टिकोण मौजूद हैं एक जो इसे पूरी तरह नकारता है और दूसरा जो इसे कभी-कभी अत्यधिक सामान्य बनाकर प्रस्तुत करता है। वे स्पष्ट रूप से कहती हैं कि डिप्रेशन या किसी भी मानसिक स्थिति को केवल भावनात्मक आधार पर नहीं, बल्कि चिकित्सकीय लक्षणों के आधार पर समझना चाहिए। इसमें लगातार उदासी, नींद और भूख में बदलाव, रुचि का खत्म होना और निराशा जैसी स्थितियां शामिल होती हैं, और आमतौर पर इसके लिए कई लक्षणों का एक साथ होना आवश्यक होता है।

वे यह भी मानती हैं कि आज की युवा पीढ़ी मानसिक स्वास्थ्य के प्रति अधिक जागरूक है, जो एक सकारात्मक बदलाव है, लेकिन इसके साथ सही जानकारी और संतुलित समझ का होना भी उतना ही जरूरी है। उनके अनुसार, आज के बच्चे अधिक प्रश्न पूछने वाले, लॉजिक-आधारित सोच रखने वाले और स्वतंत्र विचारों वाले हैं, जिसके कारण शिक्षक और छात्र के संबंधों में भी बड़ा बदलाव आया है। अब यह संबंध कई जगहों पर “सेवा प्रदाता और क्लाइंट” जैसे रूप में बदल रहा है, जहां जिम्मेदारी और अपेक्षाएं दोनों पक्षों पर समान रूप से बढ़ गई हैं।

डॉ. उज़मा क़मर का काउंसलिंग के क्षेत्र में अनुभव बेहद व्यापक और विविध रहा है। उन्होंने बच्चों, किशोरों, महिलाओं, अभिभावकों और शिक्षकों के साथ विभिन्न संस्थानों में मनोवैज्ञानिक परामर्श और प्रशिक्षण का कार्य किया है। उन्होंने हिंदू कॉलेज, मुरादाबाद, महात्मा ज्योतिबा फुले रुहेलखंड विश्वविद्यालय (एमजेपीआरयू), बरेली कॉलेज के समाजशास्त्र एवं भूगोल विभाग, आईएफटीएम विश्वविद्यालय, मुरादाबाद, आर्मी पब्लिक स्कूल, बरेली सहित अनेक शैक्षणिक संस्थानों में काउंसलिंग और जागरूकता सत्र आयोजित किए हैं। इसके अलावा उन्होंने जिला कारागार, बरेली के महिला प्रकोष्ठ (Women Cell) तथा नारी निकेतन में भी महिलाओं के मानसिक स्वास्थ्य, भावनात्मक सशक्तिकरण और पुनर्वास से जुड़े विषयों पर कार्य किया है।
 
अपने अनुभवों को साझा करते हुए डॉ. उज़मा बताती हैं कि उनके करियर में कई ऐसे मामले आए हैं, जिन्होंने उन्हें गहरा संतोष दिया। नैतिक कारणों से वे किसी व्यक्ति की पहचान उजागर नहीं करतीं, लेकिन उन्होंने बताया कि कई ऐसे विशेष आवश्यकता वाले बच्चे, जिन्हें परिवार और समाज ने लगभग घर तक सीमित कर दिया था, उनकी काउंसलिंग और मार्गदर्शन के बाद सामान्य विद्यालयों में प्रवेश पा सके और मुख्यधारा की शिक्षा से जुड़ सके। उनका मानना है कि किसी बच्चे को समाज की मुख्यधारा में वापस लाना किसी भी पुरस्कार से बड़ा संतोष देता है।
 
समावेशी शिक्षा (Inclusive Education) के क्षेत्र में भी उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा है। उन्होंने एक सामाजिक संगठन के साथ मिलकर उत्तर प्रदेश के लगभग 1,800 सरकारी शिक्षकों को स्वैच्छिक रूप से प्रशिक्षण दिया, ताकि वे विशेष आवश्यकता वाले बच्चों को सामान्य कक्षाओं में प्रभावी ढंग से पढ़ा सकें। इस पहल ने शिक्षकों को समावेशी शिक्षा की अवधारणा को व्यवहारिक रूप से समझने और उसे लागू करने में काफी मदद की। इस कार्य को राष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान मिली और जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के रेडियो कार्यक्रम "मन की बात" के 100 एपिसोड पूरे होने पर एक स्मारक पुस्तक प्रकाशित हुई, तो उसमें उनके समूह की तस्वीर भी शामिल की गई।
 
मानसिक स्वास्थ्य और नशामुक्ति के क्षेत्र में भी उन्होंने कई उल्लेखनीय कार्य किए हैं। उन्होंने कई ऐसे किशोरों की काउंसलिंग की, जो ड्रग्स और शराब की लत का शिकार हो चुके थे और उन्हें सामान्य जीवन की ओर लौटने में सहायता की। वे एक ऐसे परिवार का उदाहरण भी साझा करती हैं, जहां पिता की आत्महत्या और चाचा की नशे की लत के कारण हुई दुर्घटना के बाद परिवार पूरी तरह टूट चुका था। उस परिवार के इकलौते बेटे को लगातार पैनिक अटैक आते थे और वह गंभीर मानसिक तनाव से गुजर रहा था। नियमित काउंसलिंग और मनोवैज्ञानिक सहयोग के माध्यम से डॉ. उज़मा ने उसे भावनात्मक रूप से संभलने में मदद की। आज वह न केवल अपने परिवार के व्यवसाय को सफलतापूर्वक संभाल रहा है, बल्कि अपनी मां और दादा की जिम्मेदारी भी निभा रहा है। डॉ. उज़मा के अनुसार, ऐसे अनेक उदाहरण हैं, जहां सही समय पर मनोवैज्ञानिक सहयोग ने लोगों के जीवन की दिशा बदल दी।
 
आज के किशोरों में बढ़ती आक्रामकता और हिंसक प्रवृत्तियों पर चिंता व्यक्त करते हुए डॉ. उज़मा कहती हैं कि इसका समाधान केवल बच्चों को समझाने में नहीं, बल्कि उन्हें समझने में है। उनका मानना है कि नई पीढ़ी नई तकनीक, नए विचारों और अलग सोच के साथ बड़ी हो रही है, लेकिन अधिकांश अभिभावक पहले से तय कर लेते हैं कि उनके बच्चे को क्या बनना है और किस दिशा में जाना है। इस प्रक्रिया में बच्चों को अपनी रुचियों और क्षमताओं को खोजने का अवसर नहीं मिल पाता। वे कहती हैं कि सुरक्षा और देखभाल के नाम पर बच्चों को इतना अधिक संरक्षण दिया जा रहा है कि वे स्वयं निर्णय लेना, समस्याओं का समाधान करना और प्रयास करना नहीं सीख पाते।
 
वे इस बात पर भी जोर देती हैं कि आज के न्यूक्लियर परिवारों में समय की कमी के कारण माता-पिता अक्सर बच्चों की हर मांग तुरंत पूरी कर देते हैं। इससे बच्चों में धैर्य विकसित नहीं हो पाता और वे छोटी-छोटी असफलताओं या देरी को भी स्वीकार नहीं कर पाते। डॉ. उज़मा का सुझाव है कि बच्चों की हर इच्छा तुरंत पूरी करने के बजाय उन्हें छोटे-छोटे कार्य और जिम्मेदारियां दी जानी चाहिए। यदि वे उन कार्यों को पूरा करें, तभी उन्हें उनकी पसंद की चीज़ पुरस्कार के रूप में मिले। उनका मानना है कि यही सकारात्मक प्रोत्साहन (Positive Reinforcement) बच्चों में मेहनत, जिम्मेदारी और धैर्य विकसित करता है। इसके विपरीत, यदि हर मांग बिना किसी प्रयास के पूरी कर दी जाए, तो बच्चों में अधीरता बढ़ती है और यही अधीरता आगे चलकर आक्रामकता, गुस्से और हिंसक व्यवहार का कारण बन सकती है। उनके अनुसार, बच्चों को समय देना, उन्हें सुनना और उन्हें जीवन के छोटे-छोटे अनुभव स्वयं अर्जित करने देना ही स्वस्थ और संतुलित व्यक्तित्व निर्माण की सबसे महत्वपूर्ण कुंजी है।
 

डिजिटल युग और तकनीकी जीवनशैली पर बात करते हुए वे चिंता व्यक्त करती हैं कि जहां एक ओर बच्चों को सुरक्षा और सुविधा के नाम पर अत्यधिक आराम दिया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर वही बच्चे मोबाइल, स्क्रीन और डिजिटल माध्यमों पर अत्यधिक निर्भर होते जा रहे हैं। यह स्थिति बच्चों के सामाजिक, मानसिक और भावनात्मक विकास को प्रभावित कर सकती है। उनके अनुसार, बच्चों के विकास के लिए स्वतंत्रता और सुरक्षा के बीच संतुलन बनाए रखना बेहद जरूरी है, अन्यथा विकास की प्रक्रिया असंतुलित हो सकती है।

महिलाओं के सशक्तिकरण पर डॉ. उज़मा क़मर का दृष्टिकोण पारंपरिक सोच से अलग है। वे मानती हैं कि असली सशक्तिकरण केवल शारीरिक मजबूती या बाहरी संघर्ष नहीं है, बल्कि असली बदलाव मानसिकता और सोच में आता है। उनके अनुसार, इस बदलाव की शुरुआत घर से होनी चाहिए। वे यह भी कहती हैं कि समाज अक्सर महिलाओं को सशक्त बनाने के नाम पर संघर्ष और लड़ाई की दिशा तो दिखाता है, लेकिन असल जरूरत सोच, समझ और दृष्टिकोण को बदलने की होती है।

पेरेंटिंग और चाइल्ड डेवलपमेंट पर उनके विचार बहुत महत्वपूर्ण हैं। उनका मानना है कि माता-पिता बनने की प्रक्रिया केवल बच्चे के जन्म के बाद शुरू नहीं होनी चाहिए, बल्कि गर्भावस्था के समय से ही शुरू होनी चाहिए। इस चरण में ही बच्चे के विकास और मानसिक संरचना को समझने की जरूरत होती है। वे यह भी कहती हैं कि आज के समय में अधिकांश लोग अनुभव के आधार पर पेरेंटिंग करते हैं, जबकि वैज्ञानिक और प्रोफेशनल पेरेंटिंग शिक्षा की अत्यधिक आवश्यकता है।

वे “सेल्फलेस मदर” की पारंपरिक अवधारणा को भी चुनौती देती हैं। उनके अनुसार, पूरी तरह निस्वार्थ होना एक आदर्श विचार हो सकता है, लेकिन वास्तविक जीवन में हर व्यक्ति, यहां तक कि माता-पिता भी, कहीं न कहीं अपेक्षाएं रखते हैं। उनका मानना है कि माता-पिता की सबसे बड़ी जिम्मेदारी बच्चे को केवल सफल बनाना नहीं है, बल्कि उसे एक अच्छा इंसान बनाना है। इसके लिए बच्चे की भावनाओं, मानसिक स्थिति और उसकी व्यक्तिगत इच्छाओं को समझना बेहद आवश्यक है, न कि केवल अपने सपनों और अपेक्षाओं को उस पर थोपना।

अपने लंबे अनुभवों के आधार पर वे बताती हैं कि उन्होंने कई ऐसे मामलों पर काम किया है जहां मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं, नशे की आदतों या सामाजिक उपेक्षा से जूझ रहे बच्चों और परिवारों के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आया है। ऐसे अनुभव उनके लिए केवल पेशेवर उपलब्धियां नहीं हैं, बल्कि गहरा मानवीय संतोष भी प्रदान करते हैं। उनके अनुसार, किसी व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाना ही इस क्षेत्र की सबसे बड़ी सफलता है।

अंत में डॉ. उज़मा क़मर युवा लड़कियों को संदेश देती हैं कि उन्हें अपनी आंतरिक आवाज को सुनना चाहिए, अपने विज़न और मिशन को स्पष्ट रखना चाहिए और बिना रुके अपने लक्ष्य की ओर आगे बढ़ते रहना चाहिए। उनके अनुसार, जब कोई व्यक्ति अपने उद्देश्य के प्रति ईमानदार होता है, तो सफलता धीरे-धीरे उसका साथ देती है, और वही चुनौतियां जो कभी बाधा लगती थीं, आगे चलकर उसकी सफलता की कहानी का हिस्सा बन जाती हैं।

 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 

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डॉ. उज़मा क़मर को शिक्षा, सामाजिक सेवा, महिला नेतृत्व और मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में उनके उल्लेखनीय योगदान के लिए अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों और जिम्मेदारियों से नवाज़ा गया है। उन्हें सामाजिक सेवा के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य के लिए सरोजिनी नायडू अवॉर्ड फॉर सोशल सर्विसेज़ तथा शिक्षा के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए रवीन्द्रनाथ टैगोर अवॉर्ड फॉर एजुकेशन एक्सीलेंस से सम्मानित किया जा चुका है। वर्ष 2023 में उन्हें आरबीटीसी (RBTC) उत्तर प्रदेश चैप्टर द्वारा प्रदेश की "100 मोस्ट इन्फ्लुएंशियल मुस्लिम वीमेन" की सूची में शामिल किया गया। इसके अतिरिक्त, यूएन वीमेन (UN Women) उत्तर प्रदेश की पहल "SHE Leads" के अंतर्गत उन्हें नेतृत्व क्षमता रखने वाली 52 चयनित राजनीतिक और गैर-राजनीतिक महिलाओं में स्थान मिला। वर्ष 2024 में उन्हें अमर उजाला नारी शक्ति सम्मान से भी सम्मानित किया गया।

सम्मानों के अलावा डॉ. उज़मा क़मर कई महत्वपूर्ण सामाजिक और पेशेवर संगठनों में नेतृत्वकारी भूमिका निभा रही हैं। वे WICCI (Women’s Indian Chamber of Commerce and Industry) के उत्तर प्रदेश साइकोलॉजिकल काउंसिल की प्रेसिडेंट हैं। साथ ही, वे ह्यूमन चेन वेलफेयर ऑर्गेनाइजेशन की जनरल सेक्रेटरी के रूप में कार्यरत हैं। महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान से जुड़े मुद्दों पर भी उनकी सक्रिय भागीदारी है। वे बरेली के तीन केंद्रीय विद्यालयों में गठित Council Against Women Harassment की सदस्य हैं, जहां वे सुरक्षित और संवेदनशील शैक्षणिक वातावरण सुनिश्चित करने की दिशा में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।