ओनिका माहेश्वरी/ नई दिल्ली
बरेली से आने वाली हेल्थकेयर एक्सपर्ट, काउंसलर और एंटरप्रेन्योर डॉ. उज़मा क़मर का जीवन एक ऐसी बहुआयामी यात्रा को दर्शाता है, जिसमें शिक्षा, स्वास्थ्य, बाल विकास और मानसिक स्वास्थ्य जैसे विषय केवल पेशेवर क्षेत्र नहीं बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी के रूप में सामने आते हैं। उनकी सोच इस बात को रेखांकित करती है कि यदि विज्ञान, संवेदनशीलता और अनुभव को साथ लेकर चला जाए, तो समाज में गहरा और स्थायी बदलाव लाया जा सकता है।
उनकी शुरुआती शिक्षा और व्यक्तित्व निर्माण में उनकी माता की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही। डॉ. उज़मा बताती हैं कि उनकी मां हमेशा चाहती थीं कि वे अच्छी शिक्षा प्राप्त करें और एक वर्किंग प्रोफेशनल बनें। यही प्रेरणा उनके जीवन की दिशा बन गई। आगे चलकर उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से भी शैक्षणिक जुड़ाव रखा और फिर प्रतिष्ठित Aligarh Muslim University के जेएन मेडिकल कॉलेज से फिजियोथैरेपी एंड रिहैबिलिटेशन में अध्ययन किया। उनके अनुसार, एएमयू में पढ़ाई करना केवल एक शैक्षणिक अनुभव नहीं था, बल्कि एक पूरी जीवनशैली थी, जिसने उनकी सोच, व्यवहार और दृष्टिकोण को गहराई से बदल दिया।

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एएमयू के अपने अनुभवों को साझा करते हुए वे बताती हैं कि वहां उन्होंने जीवन का एक महत्वपूर्ण कौशल नेटवर्किंग और लोगों से जुड़ने की कला सीखी, जो आज के समय में करियर और प्रोफेशन दोनों के लिए बेहद जरूरी है। फिजियोथैरेपी की पढ़ाई के दौरान ही उनका ध्यान धीरे-धीरे बाल मनोविज्ञान और बाल विकास की ओर बढ़ने लगा। इस दौरान उन्होंने बच्चों की शारीरिक और मानसिक दोनों तरह की समस्याओं को नजदीक से समझा और यह महसूस किया कि स्वास्थ्य केवल शरीर का नहीं, बल्कि मन और शरीर दोनों का संतुलन है। यहीं से उनके भीतर यह विचार और मजबूत हुआ कि स्वस्थ शरीर और स्वस्थ मन एक-दूसरे के पूरक हैं और दोनों के बीच संतुलन बेहद आवश्यक है।
अपनी शैक्षणिक यात्रा के साथ-साथ उनका दृष्टिकोण शिक्षा व्यवस्था को लेकर भी विकसित हुआ। डॉ. उज़मा का मानना है कि वर्तमान शिक्षा प्रणाली में आज भी रटने (rote learning) और प्रतिस्पर्धा पर अत्यधिक जोर दिया जाता है, जबकि बच्चों की वास्तविक क्षमता जैसे रचनात्मकता, खेल, व्यावहारिक समझ और बहुआयामी बुद्धिमत्ता (multiple intelligence)—को पर्याप्त महत्व नहीं दिया जाता। वे मानती हैं कि आज के बच्चे पहले की तुलना में अधिक आत्मविश्वासी, संवादशील और तेजी से सीखने वाले हैं, लेकिन उनमें धैर्य की कमी और तुरंत प्रतिक्रिया देने की प्रवृत्ति भी बढ़ी है। इसका कारण वे बदलते सामाजिक ढांचे, न्यूक्लियर फैमिली सिस्टम, अत्यधिक सुविधा और डिजिटल उपकरणों की उपलब्धता को मानती हैं।
मानसिक स्वास्थ्य पर अपने विचार रखते हुए डॉ. उज़मा एक संतुलित दृष्टिकोण प्रस्तुत करती हैं। उनके अनुसार, समाज में मानसिक स्वास्थ्य को लेकर दो चरम दृष्टिकोण मौजूद हैं एक जो इसे पूरी तरह नकारता है और दूसरा जो इसे कभी-कभी अत्यधिक सामान्य बनाकर प्रस्तुत करता है। वे स्पष्ट रूप से कहती हैं कि डिप्रेशन या किसी भी मानसिक स्थिति को केवल भावनात्मक आधार पर नहीं, बल्कि चिकित्सकीय लक्षणों के आधार पर समझना चाहिए। इसमें लगातार उदासी, नींद और भूख में बदलाव, रुचि का खत्म होना और निराशा जैसी स्थितियां शामिल होती हैं, और आमतौर पर इसके लिए कई लक्षणों का एक साथ होना आवश्यक होता है।
वे यह भी मानती हैं कि आज की युवा पीढ़ी मानसिक स्वास्थ्य के प्रति अधिक जागरूक है, जो एक सकारात्मक बदलाव है, लेकिन इसके साथ सही जानकारी और संतुलित समझ का होना भी उतना ही जरूरी है। उनके अनुसार, आज के बच्चे अधिक प्रश्न पूछने वाले, लॉजिक-आधारित सोच रखने वाले और स्वतंत्र विचारों वाले हैं, जिसके कारण शिक्षक और छात्र के संबंधों में भी बड़ा बदलाव आया है। अब यह संबंध कई जगहों पर “सेवा प्रदाता और क्लाइंट” जैसे रूप में बदल रहा है, जहां जिम्मेदारी और अपेक्षाएं दोनों पक्षों पर समान रूप से बढ़ गई हैं।


डिजिटल युग और तकनीकी जीवनशैली पर बात करते हुए वे चिंता व्यक्त करती हैं कि जहां एक ओर बच्चों को सुरक्षा और सुविधा के नाम पर अत्यधिक आराम दिया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर वही बच्चे मोबाइल, स्क्रीन और डिजिटल माध्यमों पर अत्यधिक निर्भर होते जा रहे हैं। यह स्थिति बच्चों के सामाजिक, मानसिक और भावनात्मक विकास को प्रभावित कर सकती है। उनके अनुसार, बच्चों के विकास के लिए स्वतंत्रता और सुरक्षा के बीच संतुलन बनाए रखना बेहद जरूरी है, अन्यथा विकास की प्रक्रिया असंतुलित हो सकती है।
महिलाओं के सशक्तिकरण पर डॉ. उज़मा क़मर का दृष्टिकोण पारंपरिक सोच से अलग है। वे मानती हैं कि असली सशक्तिकरण केवल शारीरिक मजबूती या बाहरी संघर्ष नहीं है, बल्कि असली बदलाव मानसिकता और सोच में आता है। उनके अनुसार, इस बदलाव की शुरुआत घर से होनी चाहिए। वे यह भी कहती हैं कि समाज अक्सर महिलाओं को सशक्त बनाने के नाम पर संघर्ष और लड़ाई की दिशा तो दिखाता है, लेकिन असल जरूरत सोच, समझ और दृष्टिकोण को बदलने की होती है।
पेरेंटिंग और चाइल्ड डेवलपमेंट पर उनके विचार बहुत महत्वपूर्ण हैं। उनका मानना है कि माता-पिता बनने की प्रक्रिया केवल बच्चे के जन्म के बाद शुरू नहीं होनी चाहिए, बल्कि गर्भावस्था के समय से ही शुरू होनी चाहिए। इस चरण में ही बच्चे के विकास और मानसिक संरचना को समझने की जरूरत होती है। वे यह भी कहती हैं कि आज के समय में अधिकांश लोग अनुभव के आधार पर पेरेंटिंग करते हैं, जबकि वैज्ञानिक और प्रोफेशनल पेरेंटिंग शिक्षा की अत्यधिक आवश्यकता है।
वे “सेल्फलेस मदर” की पारंपरिक अवधारणा को भी चुनौती देती हैं। उनके अनुसार, पूरी तरह निस्वार्थ होना एक आदर्श विचार हो सकता है, लेकिन वास्तविक जीवन में हर व्यक्ति, यहां तक कि माता-पिता भी, कहीं न कहीं अपेक्षाएं रखते हैं। उनका मानना है कि माता-पिता की सबसे बड़ी जिम्मेदारी बच्चे को केवल सफल बनाना नहीं है, बल्कि उसे एक अच्छा इंसान बनाना है। इसके लिए बच्चे की भावनाओं, मानसिक स्थिति और उसकी व्यक्तिगत इच्छाओं को समझना बेहद आवश्यक है, न कि केवल अपने सपनों और अपेक्षाओं को उस पर थोपना।
अपने लंबे अनुभवों के आधार पर वे बताती हैं कि उन्होंने कई ऐसे मामलों पर काम किया है जहां मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं, नशे की आदतों या सामाजिक उपेक्षा से जूझ रहे बच्चों और परिवारों के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आया है। ऐसे अनुभव उनके लिए केवल पेशेवर उपलब्धियां नहीं हैं, बल्कि गहरा मानवीय संतोष भी प्रदान करते हैं। उनके अनुसार, किसी व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाना ही इस क्षेत्र की सबसे बड़ी सफलता है।
अंत में डॉ. उज़मा क़मर युवा लड़कियों को संदेश देती हैं कि उन्हें अपनी आंतरिक आवाज को सुनना चाहिए, अपने विज़न और मिशन को स्पष्ट रखना चाहिए और बिना रुके अपने लक्ष्य की ओर आगे बढ़ते रहना चाहिए। उनके अनुसार, जब कोई व्यक्ति अपने उद्देश्य के प्रति ईमानदार होता है, तो सफलता धीरे-धीरे उसका साथ देती है, और वही चुनौतियां जो कभी बाधा लगती थीं, आगे चलकर उसकी सफलता की कहानी का हिस्सा बन जाती हैं।
डॉ. उज़मा क़मर को शिक्षा, सामाजिक सेवा, महिला नेतृत्व और मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में उनके उल्लेखनीय योगदान के लिए अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों और जिम्मेदारियों से नवाज़ा गया है। उन्हें सामाजिक सेवा के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य के लिए सरोजिनी नायडू अवॉर्ड फॉर सोशल सर्विसेज़ तथा शिक्षा के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए रवीन्द्रनाथ टैगोर अवॉर्ड फॉर एजुकेशन एक्सीलेंस से सम्मानित किया जा चुका है। वर्ष 2023 में उन्हें आरबीटीसी (RBTC) उत्तर प्रदेश चैप्टर द्वारा प्रदेश की "100 मोस्ट इन्फ्लुएंशियल मुस्लिम वीमेन" की सूची में शामिल किया गया। इसके अतिरिक्त, यूएन वीमेन (UN Women) उत्तर प्रदेश की पहल "SHE Leads" के अंतर्गत उन्हें नेतृत्व क्षमता रखने वाली 52 चयनित राजनीतिक और गैर-राजनीतिक महिलाओं में स्थान मिला। वर्ष 2024 में उन्हें अमर उजाला नारी शक्ति सम्मान से भी सम्मानित किया गया।