बदायूं में बबलू सिद्दीकी ने किया दीपांशी का कन्यादान, पेश की भाईचारे की मिसाल

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 12-07-2026
In Badaun, Bablu Siddiqui performed the Kanyadaan of Deepanshi, setting an example of brotherhood.
In Badaun, Bablu Siddiqui performed the Kanyadaan of Deepanshi, setting an example of brotherhood.

 

मधुकर पांडेय /लखनऊ 

 उत्तर प्रदेश की सामाजिक जमीन पर नफरत की तमाम कोशिशों के बाद भी मोहब्बत के फूल खिल रहे हैं। सूबे की गंगा जमुनी तहजीब को जिंदा रखने वाली एक बेहद भावुक करने वाली कहानी बदायूं जनपद से सामने आई है। यहाँ एक मुस्लिम नौजवान ने अपनी मुंहबोली हिंदू बहन का न सिर्फ पूरे धूमधाम से कन्यादान किया बल्कि समाज के सामने इंसानियत का एक बहुत बड़ा उदाहरण भी पेश किया है। शादी की तमाम रस्में पूरी तरह से हिंदू रीति रिवाज के साथ संपन्न हुईं। इस अनोखी शादी में मुस्लिम परिवार ने दिल खोलकर मेहमानों का स्वागत किया।
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यह पूरी कहानी बदायूं जिले के उझानी कस्बे की है। उझानी के रहने वाले रियासत उर्फ बबलू सिद्दीकी ने समाज में नफरत फैलाने वाली ताकतों को करारा जवाब दिया है। उन्होंने अपनी मुंहबोली बहन दीपांशी की शादी की पूरी जिम्मेदारी अकेले अपने कंधों पर उठाई।

दीपांशी के माता पिता का काफी समय पहले ही देहांत हो चुका था। माता पिता की मौत के बाद दीपांशी पूरी तरह अकेली पड़ गई थी। ऐसे मुश्किल वक्त में बबलू सिद्दीकी और उनके परिवार ने दीपांशी को सहारा दिया। उन्होंने दीपांशी को अपनी सगी बेटी की तरह पाला पोसा। बबलू ने हर सुख दुख में एक सगे भाई का फर्ज निभाया।

8 जुलाई बुधवार की शाम को उझानी कस्बे के एस एस ग्रीन पैलेस में एक अलग ही नजारा था। यहाँ दीपांशी और कमलकांत की शादी का भव्य आयोजन किया गया था। शादी समारोह में सबसे भावुक कर देने वाला पल वह था जब मुस्लिम भाई बबलू सिद्दीकी ने मंडप में बैठकर अपनी हिंदू बहन दीपांशी का कन्यादान किया।

इस दृश्य को देखकर वहां मौजूद हर शख्स की आंखें नम हो गईं। बबलू सिद्दीकी ने बिना किसी बाहरी मदद के अपनी बहन की शादी का पूरा खर्च खुद उठाया। उन्होंने 800 से ज्यादा मेहमानों के खाने पीने और स्वागत सत्कार का बेहतरीन इंतजाम किया था।

बबलू सिद्दीकी का कहना है कि दीपांशी उनके ही मोहल्ले में रहती है। बचपन से ही दोनों परिवारों के बीच गहरा लगाव रहा है। इसी मेलजोल के बीच दीपांशी उनकी छोटी बहन बन गई थी। बबलू कहते हैं कि हमारा रिश्ता भले ही खून का नहीं है लेकिन यह दिलों का रिश्ता है।

दिलों का रिश्ता दुनिया के किसी भी खून के रिश्ते से कहीं ज्यादा मजबूत होता है। उन्होंने शादी की तैयारियों में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। शादी का माहौल बेहद खुशनुमा था। मुस्लिम परिवार के सभी सदस्यों ने शादी की हर रस्म में बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया। उन्होंने दीपांशी को कभी यह महसूस नहीं होने दिया कि उसके माता पिता इस दुनिया में नहीं हैं।

उत्तर प्रदेश के इतिहास में यह कोई पहली घटना नहीं है। सूबे के कोने कोने में धर्म से ऊपर इंसानियत को रखने वाले तमाम परिवार आज भी मौजूद हैं। पिछले सालों में भी ऐसी कई मिसालें देखने को मिली हैं जिन्होंने समाज को जोड़ने का काम किया है।
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आजमगढ़ में रमजान के महीने में हुई थी हिंदू बेटी की शादी

साल 2023 में आजमगढ़ से भी ऐसी ही एक दिल छू लेने वाली खबर आई थी। वहां एक मुस्लिम परिवार ने पवित्र रमजान के महीने में अपने घर से एक हिंदू बेटी की शादी करवाई थी। पूजा नाम की इस लड़की के सिर से पिता का साया उठ चुका था। तंगहाली के कारण पूजा को लगता था कि उसकी शादी कभी नहीं हो पाएगी। लेकिन एक स्थानीय मुस्लिम परिवार उसकी मदद के लिए आगे आया। उन्होंने अपने घर में मंडप सजाया और पूरे हिंदू रीति रिवाज से पूजा के हाथ पीले किए।

मुजफ्फरनगर में मुस्लिम भांजी के लिए हिंदू मामा ने निभाई भात की रस्म

इसी तरह मुजफ्फरनगर जिले में भी सांप्रदायिक सौहार्द की एक बड़ी मिसाल देखी गई थी। वहां एक मुस्लिम परिवार की बेटी की शादी में उसके मुंहबोले हिंदू मामा पहुंचे थे। हिंदू मामा ने न सिर्फ भात की रस्म को पूरी शिद्दत से निभाया बल्कि अपनी भांजी को ढेर सारे उपहार भी दिए। उन्होंने दुल्हन की विदाई को बेहद यादगार और शाही बना दिया था। इस घटना की चर्चा पूरे इलाके में काफी दिनों तक होती रही थी।

बिजनौर में मुस्लिम व्यापारी ने कराया था हवन और सात फेरे

बिजनौर के किरतपुर कस्बे में भी एक ऐसी ही सुंदर तस्वीर सामने आई थी। वहां के एक मशहूर मुस्लिम व्यापारी सफदर नवाज खां ने एक अनाथ हिंदू लड़की की शादी का पूरा बीड़ा उठाया था। सफदर नवाज खां ने खुद पिता का फर्ज निभाते हुए लड़की का कन्यादान किया। उन्होंने बकायदा वैदिक मंत्रोच्चार के बीच हवन यज्ञ का आयोजन करवाया। दूल्हा दुल्हन ने अग्नि के सामने सात फेरे लिए। इसके बाद सफदर नवाज खां ने रोते हुए अपनी हिंदू बेटी को विदा किया था।

बदायूं की यह ताजा घटना साबित करती है कि भारत की मूल आत्मा आज भी सुरक्षित है। जब भी समाज को धर्म के नाम पर बांटने की कोशिश होती है तब बबलू सिद्दीकी जैसे लोग सामने आकर इंसानियत का परचम बुलंद कर देते हैं। दीपांशी और कमलकांत की इस शादी की चर्चा अब पूरे उत्तर प्रदेश में हो रही है। लोग बबलू सिद्दीकी के जज्बे को सलाम कर रहे हैं। यह कहानी हमें सिखाती है कि मजहब आपस में बैर रखना नहीं सिखाता। इंसानियत ही सबसे बड़ा धर्म है।