ईमान सकीना
ब्रह्मांड की असीमित गहराइयों और टिमटिमाते तारों को देखकर इंसानी मन हमेशा से हैरान होता रहा है। इस्लाम में भी इन आसमानी नजारों को अल्लाह की कुदरत और उसकी कारीगरी का बड़ा संकेत माना गया है। कुरान इंसानों को लगातार उकसाता है कि वे चांद, सूरज और दिन-रात के बदलने के पीछे छिपे विज्ञान को समझें।
आज इंसान सिर्फ जमीन से आसमान को देख नहीं रहा है, बल्कि वह अंतरिक्ष में रह रहा है। ऐसे में अंतरिक्ष यात्रा पर जाने वाले मुस्लिम वैज्ञानिकों और अंतरिक्ष यात्रियों के सामने कुछ बेहद अनोखे धार्मिक सवाल खड़े हो गए हैं। जब जमीन का कोई छोर न दिखे, तो किबला (मक्के में काबा की दिशा) कैसे तय हो? जहां चौबीस घंटे में 16बार सूरज उगे और डूबे, वहां पांच वक्त की नमाज का समय कैसे निकाला जाए? शून्य गुरुत्वाकर्षण यानी जीरो ग्रेविटी में वूज़ू (नमाज से पहले हाथ-मुंह धोना) और सिजदा कैसे मुमकिन है?
इन सभी पेचीदा सवालों के जवाब बताते हैं कि इस्लाम किसी एक खास जगह या माहौल तक सीमित नहीं है।यह एक ऐसा जीवन जीने का तरीका है जो इंसान की सहूलियत को सबसे ऊपर रखता है, चाहे वह जमीन पर हो या अंतरिक्ष स्टेशन में।

स्पेस स्टेशन पर नमाज और वूज़ू का तरीका
जमीन पर नमाज पढ़ते समय खड़े होना, झुकना (रुकू) और जमीन पर सिर टिकाना (सिजदा) जरूरी होता है। मगर अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) में गुरुत्वाकर्षण न के बराबर होता है। वहां चीजें और इंसान हवा में तैरते रहते हैं। ऐसी स्थिति में पूरे शरीर को एक जगह स्थिर रखना ही अपने आप में एक बड़ा काम है।
वैज्ञानिकों और इस्लामी विद्वानों ने इसका बहुत ही व्यावहारिक समाधान निकाला है। अंतरिक्ष यात्री नमाज के दौरान खुद को एक बेल्ट या पट्टे के सहारे बांधकर रखते हैं ताकि वे हवा में न तैरें। अगर कोई अंतरिक्ष यात्री जीरो ग्रेविटी की वजह से झुकने या पूरी तरह सिजदा करने की स्थिति में नहीं है, तो वह केवल अपने सिर और आंखों के इशारों से नमाज के सारे बुनियादी अरकान पूरे कर सकता है। इस्लाम का सीधा नियम है कि इबादत में नीयत और दिल का जुड़ाव सबसे महत्वपूर्ण है, न कि शरीर को बेवजह परेशानी में डालना।
इसके अलावा नमाज से पहले किए जाने वाले वूज़ू के लिए पानी की जरूरत होती है। अंतरिक्ष में पानी की एक-एक बूंद कीमती होती है। वहां पानी की बूंदें हवा में तैरने लगें तो स्पेस स्टेशन के महंगे और संवेदनशील उपकरणों को भारी नुकसान पहुंच सकता है।
इसलिए अंतरिक्ष यात्री गीले तौलिए या स्पंज की मदद से अपना चेहरा और हाथ साफ करते हैं। अगर पानी का इस्तेमाल बिल्कुल मुमकिन न हो, तो बिना पानी के साफ मिट्टी या पत्थर के जरिए किए जाने वाले 'तयम्मुम' की इजाजत दी गई है।
रफ्तार के बीच किबला की दिशा कैसे तय हो?
धरती पर किसी भी कोने से मक्के की तरफ मुंह करके नमाज पढ़ना आसान है। लेकिन अंतरिक्ष में कहानी बदल जाती है।अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन लगभग 27600किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से धरती के चक्कर लगाता है।इतनी तेज रफ्तार के कारण स्पेस स्टेशन के नीचे से कुछ ही मिनटों में पूरा काबा और सऊदी अरब गुजर जाता है।ऐसे में हर सेकंड दिशा बदलना किसी भी इंसान के लिए नामुमकिन है।
साल 2007में जब मलेशिया के पहले अंतरिक्ष यात्री डॉ.शेख मुजफ्फर शुकोर अंतरिक्ष में जाने वाले थे, तब इस मुद्दे पर कुआलालंपुर में 150से ज्यादा इस्लामी वैज्ञानिकों और विद्वानों की एक बड़ी बैठक हुई थी।इस ऐतिहासिक सम्मेलन के बाद एक खास गाइडलाइन जारी की गई।
इसके मुताबिक अंतरिक्ष यात्री को नमाज शुरू करते वक्त जितना संभव हो सके काबा की तरफ रुख करने की कोशिश करनी चाहिए।अगर रफ्तार के कारण दिशा बदल जाए या सटीक दिशा का पता न चले, तो वे पूरी पृथ्वी की तरफ मुंह करके भी नमाज पढ़ सकते हैं।अगर वह भी मुमकिन न हो, तो अंतरिक्ष यात्री का चेहरा जिस तरफ है, वह उसी तरफ मुंह करके अपनी नमाज पूरी कर सकता है, उसकी इबादत पूरी तरह कुबूल मानी जाएगी।

रमजान के रोजे और समय का तालमेल
धरती पर 24घंटे में एक बार सूरज उगता है और एक बार डूबता है, जिससे हम सहरी और इफ्तार का समय तय करते हैं।लेकिन अंतरिक्ष स्टेशन पर रहने वाले लोग हर 90मिनट में धरती का एक चक्कर पूरा कर लेते हैं।इसका मतलब है कि वे 24घंटे के अंदर 16बार सूर्योदय और 16बार सूर्यास्त देखते हैं।अगर अंतरिक्ष यात्री हर सूर्योदय पर रोजा रखने लगें, तो यह इंसानी शरीर के लिए नामुमकिन होगा।
इस समस्या के समाधान के लिए इस्लामी कानून में समय को बांधने की व्यवस्था की गई है। अंतरिक्ष यात्रियों को सलाह दी जाती है कि वे स्पेस स्टेशन की खिड़की के बाहर दिखने वाले सूरज को न देखें। इसके बजाय, वे धरती के किसी एक तय समय को अपना आधार बनाएं।
आमतौर पर अंतरिक्ष यात्री उस जगह के टाइम जोन का पालन करते हैं जहां से उनका रॉकेट लॉन्च हुआ था। उदाहरण के लिए, कजाकिस्तान के बैकोनूर या अमेरिका के फ्लोरिडा के समय के हिसाब से घड़ी देखकर सहरी और इफ्तार किया जाता है।
"अल्लाह तुम्हारे लिए आसानी चाहता है और वह तुम्हारे लिए तंगी या मुश्किल नहीं चाहता।" (कुरान 2:185)
यदि किसी वैज्ञानिक मिशन के दौरान रोजा रखने से अंतरिक्ष यात्री की सेहत पर बुरा असर पड़ने का खतरा हो या मिशन की सुरक्षा दांव पर लगी हो, तो उन्हें यात्रा के दौरान रोजा न रखने की छूट है। वे अंतरिक्ष से वापस धरती पर लौटने के बाद अपने छूटे हुए रोजों की कजा (भरपाई) कर सकते हैं।
विज्ञान और आस्था का खूबसूरत मेल
अंतरिक्ष की यात्रा करने वाले कई मुस्लिम अंतरिक्ष यात्रियों ने साझा किया है कि स्पेस में जाने के बाद उनका अपनी आस्था पर विश्वास और गहरा हो गया है। जब वे अंतरिक्ष की अनंत खामोशी से नीली और खूबसूरत धरती को देखते हैं, तो उन्हें अहसास होता है कि इंसानी वजूद कितना छोटा है और इस पूरी कायनात को चलाने वाली ताकत कितनी महान है।
यह अनुभव साफ करता है कि आधुनिक विज्ञान और धार्मिक आस्था एक-दूसरे के दुश्मन नहीं हैं। विज्ञान हमें ब्रह्मांड के काम करने के तरीके सिखाता है, जबकि अध्यात्म हमें उस रचना के पीछे के मकसद से जोड़ता है। अंतरिक्ष में इबादत के ये नियम साबित करते हैं कि समय और स्पेस बदलने के बाद भी इंसान और ईश्वर का रिश्ता कभी नहीं बदलता।
यदि आप इस विषय को और बेहतर ढंग से समझना चाहते हैं और देखना चाहते हैं कि अंतरिक्ष स्टेशन के भीतर यह सब कैसे व्यावहारिक रूप से काम करता है, तो आप इस वीडियो गाइड को देख सकते हैं:शेख मुजफ्फर - अंतरिक्ष में नमाज पढ़ने वाले पहले मलेशियाई मुस्लिम। यह वीडियो दिखाता है कि कैसे एक अंतरिक्ष यात्री ने शून्य गुरुत्वाकर्षण में अपनी धार्मिक जिम्मेदारियों को निभाया.