ज़ेबा नसीम
साहित्य के क्षेत्र में भारत को पहला नोबेल पुरस्कार दिलाने वाले गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर का दायरा सिर्फ कविता और किताबों तक सीमित नहीं था। वे एक महान दार्शनिक, प्रखर शिक्षाविद, चित्रकार और सांस्कृतिक राजदूत भी थे। टैगोर का हमेशा से मानना था कि दुनिया के अलग-अलग देशों के बीच असली और मजबूत रिश्ते राजनीतिक समझौतों या आर्थिक फायदों से नहीं बनते हैं। दो देशों को करीब लाने का काम ज्ञान, कला, सभ्यता और मानवीय मूल्यों का आदान-प्रदान करता है। इसी सोच के साथ उन्होंने दुनिया के कई देशों की यात्राएं की थीं ताकि वे वहां की संस्कृति को करीब से समझ सकें।
इसी सिलसिले में साल 1927 में हुई उनकी इंडोनेशिया यात्रा इतिहास के पन्नों में दर्ज एक बेहद महत्वपूर्ण घटना है। यह महज कोई आम सैर-सपाटा या यात्रा वृत्तांत नहीं था बल्कि दो बेहद प्राचीन सभ्यताओं के बीच सदियों पुराने रिश्तों की एक नई खोज थी। टैगोर असल में दक्षिण पूर्व एशिया के देशों में भारतीय संस्कृति और सभ्यता के उन निशानों को ढूंढना चाहते थे जो समय के साथ धुंधले हो गए थे।
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वे एशिया के देशों को एक साझी सांस्कृतिक पहचान के धागे में पिरोना चाहते थे। अपनी इस ऐतिहासिक यात्रा के दौरान टैगोर ने इंडोनेशिया के बेलवान, बटाविया, सुराबाया, सोलो, योग्याकार्ता, बाली और बांडुंग जैसे प्रमुख शहरों का दौरा किया था। वहां उन्होंने स्थानीय कलाकारों, विद्वानों और समाज के गणमान्य लोगों से मुलाकात की थी।
इस यात्रा ने गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर की सोच और उनकी कलात्मक दृष्टि को बिल्कुल नए आयाम दिए। इंडोनेशिया के जावा और बाली द्वीप की अनूठी संस्कृति, वहां की वास्तुकला, मनमोहक संगीत, पारंपरिक नृत्य और हस्तशिल्प ने उनके दिल पर एक गहरी छाप छोड़ी।
उन्होंने वहां की पारंपरिक बाटिक प्रिंटिंग कला, जावानीस वेशभूषा और स्थानीय नृत्य की सुंदरता की खुलकर तारीफ की। वे वहां की कला से इस कदर प्रभावित हुए कि भारत लौटने के बाद उन्होंने इन चीजों को शांतिनिकेतन में अपने विश्व भारती विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम और माहौल का हिस्सा बना लिया।
इसी यात्रा के दौरान उन्होंने दोनों देशों के बीच कलाकारों, शिक्षकों और छात्रों के आदान-प्रदान की एक मजबूत शुरुआत की थी। उनका मानना था कि आपसी मेलजोल ही स्थायी दोस्ती का असली आधार होता है।
भारत और इंडोनेशिया के बीच यह रिश्ता कोई नया नहीं था। टैगोर की इस यात्रा से सदियों पहले ही दोनों देशों के बीच गहरे ऐतिहासिक और व्यापारिक संबंध स्थापित हो चुके थे। पहली शताब्दी ईस्वी से ही भारत के बड़े व्यापारी, विद्वान और बौद्ध भिक्षु लगातार दक्षिण पूर्व एशिया की यात्राएं कर रहे थे।
इन्हीं पुराने संपर्कों के जरिए हिंदू धर्म, बौद्ध धर्म, संस्कृत भाषा, भारतीय वास्तुकला, संगीत और साहित्य जैसी समृद्ध परंपराएं इंडोनेशिया के कोने-कोने तक पहुंची थीं। आज भी इंडोनेशिया के मशहूर ऐतिहासिक स्मारक इस बात की गवाही देते हैं।
9वीं शताब्दी में बना दुनिया का सबसे विशाल बौद्ध स्तूप बोरोबुदुर और भव्य हिंदू मंदिर प्रंबानन इन प्राचीन ऐतिहासिक संबंधों के जीते-जागते सबूत हैं। जावा और बाली के लोक नृत्यों और नाटकों में आज भी भारतीय संस्कृति की साफ झलक देखने को मिल जाती है।
टैगोर ने जब इंडोनेशिया की धरती पर कदम रखा तो वे सबसे पहले जावा पहुंचे थे। जावा द्वीप हमेशा से अपनी समृद्ध प्राचीन सभ्यता और कला के लिए पूरी दुनिया में जाना जाता है। टैगोर ने वहां एक बेहद खूबसूरत बात गौर की।
उन्होंने देखा कि जावा की एक बहुत बड़ी आबादी मुस्लिम है लेकिन इसके बावजूद वहां के लोगों के रहन-सहन और स्थानीय संस्कृति पर हिंदू और बौद्ध सभ्यता का असर साफ दिखाई देता है। समाज के इस बेहतरीन सांस्कृतिक सामंजस्य और आपसी भाईचारे ने गुरुदेव को बहुत ज्यादा प्रभावित किया था।
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अपनी जावा यात्रा के दौरान जब टैगोर विश्व प्रसिद्ध बोरोबुदुर मंदिर पहुंचे तो वहां की नक्काशी देखकर दंग रह गए। पत्थरों पर उकेरी गई भगवान बुद्ध के जीवन की कहानियों और वहां की बेजोड़ वास्तुकला को देखकर उन्होंने इसे दक्षिण पूर्व एशिया में बौद्ध दर्शन का सबसे चमकता हुआ प्रतीक बताया था।
इसके बाद उन्होंने ब्रह्मा, विष्णु और महेश को समर्पित प्रंबानन मंदिर श्रृंखला का भी दौरा किया। वहां की मूर्तियों और जावानीस कलाकारों की कला ने उन्हें मंत्रमुग्ध कर दिया था। टैगोर ने जावा के पारंपरिक नृत्य और गैमेलन संगीत का भी आनंद लिया। उन्हें लगा कि इस कला में जो आध्यात्मिकता, गरिमा और संतुलन है वह भारतीय शास्त्रीय संगीत और नृत्य से काफी हद तक मेल खाता है।
जावा के बाद रवींद्रनाथ टैगोर बाली द्वीप पहुंचे जिसे आज भी अपनी अनूठी संस्कृति के लिए जाना जाता है। बाली में टैगोर को एक ऐसा समाज देखने को मिला जहां धर्म, कला और रोजमर्रा की जिंदगी आपस में पूरी तरह घुले-मिले थे।
Rabindranath Tagore brsm keluarga Jawa saat berkunjung ke Indonesia. Konon stlh itu, ia membawa kain batik ke India. pic.twitter.com/bw5fVSvqow
— India in Indonesia (@IndianEmbJkt) October 2, 2013
बाली में आज भी हिंदू धर्म को मानने वाले लोग बड़ी संख्या में रहते हैं। वहां के लोग अपने प्राचीन मंदिरों, धार्मिक रीति-रिवाजों और त्योहारों को बेहद श्रद्धा और पवित्रता के साथ मनाते हैं। टैगोर वहां के लोगों की सादगी, प्रकृति के प्रति उनके प्रेम और उनकी आध्यात्मिकता से बहुत प्रभावित हुए थे।
उनके लिए बाली एक ऐसा आदर्श उदाहरण बन गया था जो यह सिखाता है कि आधुनिक समय में भी अपनी पुरानी सांस्कृतिक पहचान को कैसे बचाकर रखा जा सकता है। बाली के पारंपरिक नृत्य में नर्तकों के हाथों की थिरकन, चेहरे के हाव-भाव और अद्भुत संगीत के तालमेल को टैगोर ने एक आत्मिक अनुभव बताया था।
टैगोर की यह यात्रा केवल इंडोनेशिया को देखने तक सीमित नहीं रही बल्कि वे वहां से प्रेरणा लेकर कई सांस्कृतिक विधाएं अपने साथ भारत ले आए। जावा की मशहूर बाटिक प्रिंटिंग कला में उनकी गहरी रुचि थी।
उनके साथ गए सहयोगियों ने वहां रहकर इस कला की बारीकियों को सीखा। बाद में शांतिनिकेतन आकर उन्होंने भारतीय कपड़ों और बंगाली डिजाइनों के साथ मिलाकर एक नई शैली तैयार की जिसे आज दुनिया भर में 'शांतिनिकेतन बाटिक' के नाम से जाना जाता है। इसी तरह जावा और बाली के लोक नृत्यों से प्रेरित होकर टैगोर ने अपनी खुद की नृत्य शैली 'रवींद्र नृत्य' में कई नए स्टेप्स और शैलियों को शामिल किया था।
शिक्षा के क्षेत्र में भी टैगोर की इस यात्रा का एक बड़ा असर देखने को मिला। शांतिनिकेतन के उनके अनूठे शैक्षिक विचारों से प्रभावित होकर इंडोनेशिया के पहले शिक्षा मंत्री की हाजर देवंतारा ने अपने देश में 'तमन सिस्वा' यानी गार्डन स्कूल की स्थापना की थी।
टैगोर ने वहां के शिक्षाविदों के साथ मिलकर दोनों देशों के बीच ज्ञान के लेन-देन की एक मजबूत व्यवस्था बनाई थी। टैगोर ने अपने संस्मरणों में लिखा था कि इंडोनेशिया एक ऐसा खूबसूरत देश है जहां कला, प्रकृति और आध्यात्मिकता का एक दुर्लभ संगम देखने को मिलता है। इस देश ने दुनिया को दिखाया है कि कैसे कोई राष्ट्र आधुनिक विकास की दौड़ में शामिल होकर भी अपनी प्राचीन सभ्यता और संस्कृति को जिंदा रख सकता है।
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आज रवींद्रनाथ टैगोर की उस ऐतिहासिक यात्रा को लगभग एक सदी बीत चुकी है। लेकिन भारत और इंडोनेशिया के बीच साझा सांस्कृतिक विरासत और अकादमिक सहयोग के रूप में इसकी गूंज आज भी उतनी ही साफ सुनाई देती है।
उनकी यह यात्रा दो महान सभ्यताओं को जोड़ने वाला एक ऐसा पुल साबित हुई जिसने आने वाली पीढ़ियों को शांति, सम्मान और आपसी सहयोग का एक नया रास्ता दिखाया। टैगोर के विचार आज के दौर में भी हमें याद दिलाते हैं कि दुनिया के देशों के बीच असली और टिकाऊ संबंध व्यापार से नहीं बल्कि एक-दूसरे की संस्कृति के सम्मान से मजबूत होते हैं।