Shifana Ajmal: She turned even her illness into a means of serving society.
ओनिका माहेश्वरी/ नई दिल्ली
“आगे बढ़ो। जिंदगी में बहुत कुछ है करने को। ऊपर वाले ने आपको इंसान बनाया है और एक ही जिंदगी का वादा किया है। पेड़ की तरह अपनी जड़ें एक ही जगह फिक्स करके नहीं रहना है, आगे बढ़ना है, खुद को एजुकेट करना है और मेहनत करते रहना है।” यह संदेश है सामाजिक कार्यकर्ता शिफाना अजमल का, जिन्होंने अपनी पूरी जिंदगी शिक्षा, महिला स्वास्थ्य, जरूरतमंदों की मदद और समाज के वंचित वर्गों के लिए काम करने में समर्पित कर दी है। शिफाना अजमल की कहानी सिर्फ एक सोशल एक्टिविस्ट की कहानी नहीं है, बल्कि यह संघर्ष, हौसले, परिवार के सहयोग और समाज के लिए कुछ कर गुजरने की इच्छाशक्ति की कहानी है।
हल्द्वानी से शुरू हुआ सफर, जिसने दिल्ली तक पहुंचाया
उत्तराखंड के हल्द्वानी में जन्मी शिफाना अजमल की शुरुआती जिंदगी एक छोटे शहर के सामान्य माहौल में शुरू हुई, लेकिन उनके सपने बड़े थे। वह बताती हैं कि उनकी शिक्षा को आगे बढ़ाने में उनकी मां का सबसे बड़ा योगदान रहा। उनकी मां ने गांव से शहर की ओर कदम बढ़ाने का फैसला किया ताकि बच्चों को बेहतर शिक्षा मिल सके। शिफाना कहती हैं कि उनकी मां ने हमेशा यही सोचा कि बच्चों को उनकी क्षमता के अनुसार जितना आगे जाना है, उतना पढ़ाया जाना चाहिए।
शिफाना की शुरुआती शिक्षा हल्द्वानी में हुई। खास बात यह रही कि उनकी स्कूली शिक्षा एक आरएसएस से जुड़े स्कूल में हुई, जहां वह पूरे स्कूल में अकेली मुस्लिम छात्रा थीं। वह अपने स्कूल के दिनों को याद करते हुए कहती हैं कि उनका अनुभव बेहद सकारात्मक रहा। उन्हें क्लास मॉनिटर, हेड गर्ल जैसी जिम्मेदारियां मिलीं। वह स्कूल में सरस्वती वंदना, गायत्री मंत्र और हनुमान चालीसा तक मंच पर प्रस्तुत करती थीं। उनके अनुसार, यह अनुभव उन्हें अलग-अलग संस्कृतियों को समझने और समाज को करीब से देखने में मददगार साबित हुआ।
परिवार में शिक्षा का माहौल नहीं था, लेकिन मां ने बदली सोच
शिफाना बताती हैं कि उनके रिश्तेदारों के यहां शिक्षा को लेकर बहुत ज्यादा जागरूकता नहीं थी। उनके पिता के भाइयों के परिवारों में पढ़ाई को केवल जरूरत भर तक सीमित माना जाता था। लेकिन उनकी मां की सोच अलग थी। वह चाहती थीं कि उनके बच्चे अपनी क्षमता की ऊंचाई तक पहुंचें। शिफाना कहती हैं कि उनके पिता उस समय सऊदी अरब में नौकरी करते थे, इसलिए मां ने अकेले ही बच्चों की परवरिश और शिक्षा की जिम्मेदारी संभाली। उनकी मां को समाज और रिश्तेदारों के दबाव का सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होंने अपनी बेटी की पढ़ाई को प्राथमिकता दी।
अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी ने दिया नया एक्सपोजर
हल्द्वानी से बाहर निकलकर शिफाना ने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU) जाने का फैसला किया। उनके पास हल्द्वानी या नैनीताल में पढ़ाई करने के विकल्प थे, लेकिन उन्होंने कुछ नया करने और बड़े अनुभव हासिल करने के लिए एएमयू को चुना। वह बताती हैं कि उस दौर में आज की तरह इंटरनेट और ऑनलाइन सुविधाएं नहीं थीं। एडमिशन फॉर्म से लेकर विषय चुनने तक हर चीज के लिए संघर्ष करना पड़ता था। उन्होंने एएमयू से फिलॉसफी और इकोनॉमिक्स में बीए ऑनर्स किया।
एएमयू में बिताए तीन साल उनके जीवन के सबसे महत्वपूर्ण वर्षों में रहे। वहां उन्हें अलग-अलग राज्यों और देशों से आए छात्रों के साथ रहने और सीखने का मौका मिला। वह कहती हैं कि हॉस्टल जीवन ने उनकी सोच को व्यापक बनाया। “मेंटल ग्रोथ के लिए बहुत जरूरी है कि आप घर से थोड़ा दूर रहें। फिर आपको चीजें पता चलती हैं। पर्सनालिटी डेवलपमेंट और स्किल डेवलपमेंट के लिए यह बहुत जरूरी है।”
शादी के बाद भी जारी रखा शिक्षा और करियर
शिफाना की शादी उनकी योजनाओं से पहले हो गई। उस समय वह मास्टर्स की पढ़ाई कर रही थीं। उन्होंने बताया कि वह पहले अपने कई सपने पूरे करना चाहती थीं और शादी उनकी प्राथमिक सूची में काफी बाद में थी। लेकिन जिंदगी के फैसले कभी-कभी अलग रास्ते चुनते हैं। शादी के बाद भी उनके पति और ससुराल वालों ने उनकी पढ़ाई और करियर को पूरा समर्थन दिया।
उन्होंने दिल्ली के इंस्टीट्यूट ऑफ ह्यूमन बिहेवियर एंड एलाइड साइंसेज (IHBAS) से इंटर्नशिप की और बाद में जामिया में अपनी पहली नौकरी शुरू की। उनके ससुर हाजी एम सुलेमान ने उन्हें हमेशा आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। शिफाना कहती हैं कि उनके परिवार के सहयोग ने उन्हें अपने सपनों को पूरा करने का अवसर दिया।
नौकरी ने दी NGO चलाने की समझ
शिफाना मानती हैं कि सामाजिक कार्य करने से पहले नौकरी का अनुभव बहुत जरूरी है। उनके अनुसार, किताबों में पढ़ी चीजों को जमीन पर लागू करने के लिए व्यावहारिक अनुभव चाहिए। वह कहती हैं “पहले आपको एम्प्लॉई होना पड़ेगा, तभी आपको पता चलेगा कि चीजों को प्रैक्टिकली कैसे हैंडल करना है।” उन्होंने अपना NGO शुरू करने से पहले काम किया और समाज की वास्तविक समस्याओं को समझा। उनका मानना है कि NGO चलाना आसान काम नहीं है, खासकर तब जब कोई संस्था सरकारी फंड के बजाय खुद के संसाधनों और क्राउड फंडिंग से चल रही हो।
इब्तदा: महिलाओं और जरूरतमंदों के लिए सेवा का मिशन
शिफाना अजमल ने “इब्तदा” नाम से सामाजिक कार्यों की शुरुआत की। उनकी संस्था महिलाओं के स्वास्थ्य, शिक्षा और जरूरतमंद लोगों की मदद के लिए काम करती है। वह बताती हैं कि उनकी संस्था शिक्षा और स्वास्थ्य दोनों क्षेत्रों में काम करती है। महिलाओं के स्वास्थ्य को उन्होंने विशेष प्राथमिकता दी। उनकी संस्था महिलाओं को मेंटल हेल्थ, फिजिकल हेल्थ, पर्सनल हाइजीन और स्वास्थ्य संबंधी जागरूकता प्रदान करती है। उन्होंने कई जगहों पर वर्कशॉप आयोजित कीं, खासकर ग्रामीण इलाकों और मदरसा छात्राओं के बीच।
वह एक अनुभव साझा करते हुए कहती हैं कि कुछ लड़कियां ऐसी थीं जिन्होंने अपनी जिंदगी में कभी सैनिटरी पैड तक नहीं देखा था। उनका मानना है कि भारत का असली बदलाव गांवों से आएगा। “इंडिया का रियल इंडिया आपको गांव में देखने को मिलता है। गांव से ही एजुकेशन शुरू करनी है। वहां अगर आप लोगों को एजुकेट और एम्पावर करेंगे तो शहरों की हालत भी बदलेगी।”
महिलाओं के लिए स्वास्थ्य जागरूकता और सम्मान की लड़ाई
शिफाना ने महिलाओं के स्वास्थ्य से जुड़े कई संवेदनशील मुद्दों पर काम किया है। उन्होंने मेंस्ट्रुअल हाइजीन को लेकर जागरूकता अभियान चलाए और महिलाओं को व्यक्तिगत स्वच्छता के बारे में जानकारी दी। उनका कहना है कि सिर्फ बीमारी का इलाज जरूरी नहीं है, बल्कि बीमारी को पहचानना और उसके बारे में जागरूक होना भी जरूरी है। उन्होंने ऑनर किलिंग जैसे संवेदनशील मुद्दों पर भी काम किया है। हरियाणा में उनका एक प्रोजेक्ट नेशनल कमीशन फॉर विमेन से जुड़ा रहा, जिसमें उन्होंने इस गंभीर सामाजिक समस्या को समझने और समाधान खोजने की कोशिश की।
महिलाओं की सुरक्षा और NGO चलाने की चुनौतियां
एक मुस्लिम महिला सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में उन्हें कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा। वह बताती हैं कि जब उनकी टीम रोहिंग्या समुदाय के साथ माइग्रेशन और एसाइलम प्रोजेक्ट पर काम कर रही थी, तब एक पुलिसकर्मी ने उन्हें शाम के बाद उस इलाके में न आने की सलाह दी क्योंकि वहां सुरक्षा का खतरा था। वह कहती हैं कि अगर पुरुषों की टीम होती तो शायद यह समस्या अलग होती। महिलाओं के साथ काम करने के लिए उनकी टीम में अधिकतर महिला ट्रेनर्स हैं।
अपनी बीमारी को बनाया ताकत
शिफाना अजमल की जिंदगी का सबसे बड़ा संघर्ष उनकी स्वास्थ्य यात्रा रही है। 2011 उनके लिए बेहद कठिन साल था। उसी साल उनकी बहन का निधन हुआ, फिर उनकी नानी और ससुर का भी इंतकाल हुआ। लगातार मानसिक तनाव के बीच उनका ब्लड प्रेशर बढ़ने लगा। 2012 में जांच के बाद पता चला कि उनकी किडनी ठीक तरह से काम नहीं कर रही है और उन्हें क्रॉनिक किडनी डिजीज (CKD) है।
उन्होंने इस बीमारी को हार नहीं बनने दिया। उन्होंने इस विषय पर अध्ययन शुरू किया और 2018 में चेक रिपब्लिक की यूनिवर्सिटी ऑफ ओस्ट्रावा में क्रॉनिक किडनी डिजीज और केयरगिवर्स पर पीएचडी रिसर्च शुरू की। वह कहती हैं “जब वो चीज हो गई है मेरे साथ और मुझे करेज मिला, तो मैंने सोचा क्यों नहीं इसी पर स्टडी करें ताकि दूसरे लोगों के काम आए।” आज उनका NGO किडनी मरीजों के लिए भी काम करता है।
डॉ. शिफाना अजमल NAPSWI और AIAMSWP जैसे संगठनों की सदस्य हैं; इसके अलावा, वह किडनी वेल्स और यूरोपियन किडनी एसोसिएशन जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से भी जुड़ी हुई हैं।
जरूरतमंद मरीजों के लिए फ्री डायलिसिस की पहल
किडनी मरीजों की सबसे बड़ी समस्या डायलिसिस का खर्च है। शिफाना बताती हैं कि डायलिसिस हर व्यक्ति के लिए संभव नहीं होता। मरीज को सप्ताह में कई बार डायलिसिस की जरूरत पड़ती है और परिवार की आर्थिक स्थिति प्रभावित होती है। इसी समस्या को देखते हुए उनकी संस्था ने जरूरतमंद मरीजों के लिए फ्री डायलिसिस की पहल शुरू की। वह कहती हैं कि मरीजों को पहले वेरिफाई किया जाता है और फिर उनकी मदद की जाती है।
स्वास्थ्य के प्रति उनकी सलाह
शिफाना लोगों को सलाह देती हैं कि स्वास्थ्य को लेकर लापरवाही न करें। वह कहती हैं कि सिर्फ क्रिएटिनिन पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं है। पोटेशियम, सोडियम, मैग्नीशियम और अन्य महत्वपूर्ण रिपोर्ट्स को भी समझना जरूरी है। उनका कहना है कि समय पर ब्लड टेस्ट और जांच कई गंभीर समस्याओं से बचा सकती है।
बच्चों की परवरिश और बराबरी की सोच
शिफाना मानती हैं कि घर में लड़के और लड़कियों को समान जिम्मेदारियां सीखनी चाहिए। उनके घर में उनके बच्चे खाना बनाना, सफाई और दूसरे घरेलू काम करते हैं। वह कहती हैं “घर दोनों का है और जिम्मेदारियां दोनों की बराबर हैं।” उनका मानना है कि लड़कों को घर के काम सिखाना कमजोरी नहीं बल्कि आत्मनिर्भरता है।
युवाओं के लिए संदेश
शिफाना अजमल का संदेश साफ है शिक्षा हासिल करें, मेहनत करें और दुनिया को समझने के लिए यात्रा करें। वह कहती हैं “जितना आप घूमते हैं, अलग-अलग तरह के लोगों से मिलते हैं, आप फिर लोगों को जज करना बंद कर देते हैं क्योंकि आपके अंदर टॉलरेंस आ जाता है।” उनका मानना है कि जीवन में सीमित सोच के साथ नहीं रहना चाहिए। “बाज बनकर उड़िए, अपने पंख फैलाइए।”
समाज के लिए समर्पित एक प्रेरणादायक सफर
शिफाना अजमल की कहानी बताती है कि एक व्यक्ति अपनी व्यक्तिगत परेशानियों को भी समाज की ताकत बना सकता है। एक छोटे शहर से निकलकर शिक्षा, स्वास्थ्य और महिला सशक्तिकरण के क्षेत्र में काम करने वाली शिफाना आज हजारों लोगों के लिए उम्मीद की किरण हैं। उनका सफर इस बात की मिसाल है कि बदलाव केवल बड़े संसाधनों से नहीं, बल्कि मजबूत इरादों और लगातार प्रयासों से आता है।