सबा अंजुम करीम: गजूते खरीदने को मां ने बेचा सामान, बेटी बनी हॉकी कप्तान
Story by ओनिका माहेश्वरी | Published by onikamaheshwari | Date 09-09-2026
Saba Anjum Karim: From a girl playing hockey with boys in the street to an Arjuna Awardee.
ओनिका माहेश्वरी/ नई दिल्ली
जिस लड़की के पास कभी हॉकी खेलने के लिए अपनी स्टिक तक नहीं थी, वह आगे चलकर भारतीय महिला हॉकी टीम की कप्तान बनी। जिस परिवार के लिए दो वक्त का खाना जुटाना भी आसान नहीं था, उसी परिवार की बेटी ने दुनिया के बड़े हॉकी मैदानों पर तिरंगा लहराया। यह कहानी है छत्तीसगढ़ के दुर्ग की सबा अंजुम करीम की जिन्होंने मोहल्ले की गलियों में लड़कों के साथ हॉकी खेलते हुए शुरुआत की और भारतीय महिला हॉकी की पहचान बनने तक का सफर तय किया।
सबा अंजुम करीम का जन्म 12 जून 1985 को दुर्ग, छत्तीसगढ़ में हुआ। दुर्ग के केलाबाड़ी इलाके से आने वाली सबा ने महज नौ साल की उम्र में हॉकी स्टिक थामी थी। उनके मोहल्ले में लड़के हॉकी खेलते थे और उन्हें देखकर सबा भी इस खेल का हिस्सा बन गईं।
शुरुआत किसी बड़े स्टेडियम या आधुनिक अकादमी से नहीं, बल्कि स्थानीय गलियों और सीमित संसाधनों से हुई। सबा के पिता स्थानीय मस्जिद में मुअज्जिन थे और परिवार आर्थिक रूप से बेहद साधारण परिस्थितियों में रहता था।
घर की आमदनी इतनी सीमित थी कि कई बार रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करना भी मुश्किल होता था। सबा ने एक इंटरव्यू में बताया था कि उनके लिए हॉकी के जूते खरीदने के लिए उनकी मां ने घर का सामान तक बेच दिया था। लेकिन आर्थिक परेशानियां उनके सपने के रास्ते में दीवार नहीं बन सकीं।
सबा के सामने केवल पैसों की समस्या नहीं थी। एक लड़की का लड़कों के साथ मैदान में उतरना भी उनके आसपास के लोगों को मंजूर नहीं था। स्थानीय लोगों ने उनके पिता पर बेटी को खेल से दूर रखने का दबाव बनाया, लेकिन उनके पिता ने बेटी के सपने का साथ दिया।
यही समर्थन आगे चलकर सबा की सबसे बड़ी ताकत बना। धीरे-धीरे गली की हॉकी ने उन्हें प्रतियोगी हॉकी तक पहुंचाया। वर्ष 2000 में उन्होंने भारत की अंडर-18 टीम के लिए एशियन हॉकी फेडरेशन कप में खेला और यहीं से उनका अंतरराष्ट्रीय सफर शुरू हुआ। उसी दौर में उन्होंने जूनियर स्तर पर अपनी प्रतिभा साबित की और राष्ट्रीय टीम की नजरों में आईं।
साल 2001 के जूनियर वर्ल्ड कप और इसके बाद अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं ने सबा को भारतीय महिला हॉकी के प्रमुख चेहरों में शामिल करना शुरू कर दिया। 2002 में मैनचेस्टर कॉमनवेल्थ गेम्स में वे भारतीय महिला हॉकी टीम की सबसे कम उम्र की खिलाड़ियों में थीं।
उस टीम ने इतिहास रचते हुए स्वर्ण पदक जीता। इसके बाद सबा ने 2002 एशियन गेम्स, 2004 एशिया कप, 2006 कॉमनवेल्थ गेम्स, जूनियर वर्ल्ड कप और कई अंतरराष्ट्रीय सीरीज में भारत का प्रतिनिधित्व किया। एक तेजतर्रार फॉरवर्ड के रूप में उनकी पहचान बनी। 2007 एशिया कप में उनके प्रदर्शन का खास तौर पर उल्लेख मिलता है, जहां उन्होंने छह गोल किए थे।
भारतीय टीम के लिए लगातार खेलने के साथ सबा ने नेतृत्व की जिम्मेदारी भी संभाली। 2011 में उन्हें भारतीय महिला हॉकी टीम की कप्तानी करने का मौका मिला। दुर्ग की गलियों से शुरू हुआ सफर अब भारतीय टीम के नेतृत्व तक पहुंच चुका था। सबा का करियर केवल पदकों और टूर्नामेंटों की सूची नहीं है। उनका महत्व इसलिए भी बड़ा है क्योंकि उन्होंने उस दौर में भारतीय महिला हॉकी को आगे बढ़ाया, जब महिला खिलाड़ियों के लिए खेल को करियर बनाना आज की तुलना में कहीं अधिक कठिन था। उनकी कहानी आर्थिक संघर्ष, लैंगिक भेदभाव और सीमित सुविधाओं के बीच अपने लिए रास्ता बनाने की कहानी है।
अर्जुन अवॉर्ड तक का सफर
सबा अंजुम करीम को 2013 में हॉकी के लिए अर्जुन अवॉर्ड से सम्मानित किया गया। भारत सरकार की 2013 के राष्ट्रीय खेल पुरस्कारों की आधिकारिक सूची में उनका नाम हॉकी की अर्जुन अवॉर्ड विजेता के रूप में दर्ज है।
हॉकी इंडिया की आधिकारिक सूची भी 2013 में सबा अंजुम का नाम दर्ज करती है। 31 अगस्त 2013 को राष्ट्रपति भवन में तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने उन्हें अर्जुन अवॉर्ड प्रदान किया। यह सम्मान उस लड़की के लिए बेहद खास था, जिसने कभी अपने खेल के शुरुआती दिनों में जूते और दूसरी जरूरी चीजों के लिए भी संघर्ष किया था। सबा के लिए पुरस्कार अपने आप में मंजिल नहीं था। उन्होंने पुरस्कार मिलने के बाद भी इस बात पर जोर दिया कि उनकी असली खुशी तब होगी जब उनकी कहानी देखकर ज्यादा से ज्यादा लड़कियां हॉकी को अपनाएं। उन्होंने यह भी कहा था कि देश के लिए खेलना उनके लिए पुरस्कारों से ज्यादा महत्वपूर्ण रहा है।
सबा की सबसे प्रेरक कहानी
सबा अंजुम की कहानी का सबसे भावुक हिस्सा उनका शुरुआती संघर्ष है। एक छोटे से मोहल्ले में लड़कों के साथ हॉकी खेलना, परिवार की आर्थिक तंगी के बीच खेल के लिए जरूरी सामान जुटाना और समाज के सवालों के बावजूद मैदान पर बने रहना—इन सबने उनके व्यक्तित्व को मजबूत बनाया।
उनकी मां का त्याग भी इस कहानी का महत्वपूर्ण हिस्सा है। जब परिवार के पास हॉकी के जूते खरीदने के लिए पर्याप्त पैसे नहीं थे, तब मां ने घर का सामान बेचकर बेटी की जरूरत पूरी की। वहीं पिता ने समाज के दबाव के बावजूद बेटी को खेल जारी रखने दिया। यही वजह है कि सबा की सफलता केवल उनकी व्यक्तिगत जीत नहीं थी। यह उन माता-पिता की जीत भी थी, जिन्होंने सीमित साधनों के बावजूद बेटी के सपने पर भरोसा किया।
अर्जुन अवॉर्ड के बाद भी नहीं रुका सफर
अर्जुन अवॉर्ड के बाद सबा को 2015 में पद्मश्री से भी सम्मानित किया गया। छत्तीसगढ़ सरकार ने उन्हें पुलिस सेवा में नियुक्त किया और वे पुलिस विभाग में डिप्टी सुपरिंटेंडेंट ऑफ पुलिस (DSP) के पद तक पहुंचीं।
2023 में एक रिपोर्ट के अनुसार वे छत्तीसगढ़ में अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक (ASP) के पद पर कार्यरत थीं। खेल से जुड़ी अपनी पहचान को भी उन्होंने पीछे नहीं छोड़ा। वे युवा खिलाड़ियों से संवाद करती रही हैं और अपने अनुभवों के जरिए उन्हें मेहनत, अनुशासन और आत्मविश्वास का संदेश देती हैं। 2023 में उन्होंने ITBP के जवानों और अधिकारियों के बीच एक मोटिवेशनल सेशन में अपनी जीवन यात्रा साझा की और मेहनत तथा समर्पण को सफलता की कुंजी बताया।
आज सबा अंजुम करीम की पहचान केवल पूर्व भारतीय हॉकी खिलाड़ी के तौर पर नहीं है। वह एक ऐसी खिलाड़ी हैं, जिन्होंने खेल के मैदान से आगे बढ़कर प्रशासन और समाज में भी अपनी जगह बनाई।
उनकी कहानी आने वाली पीढ़ी की लड़कियों के लिए यह संदेश देती है कि शुरुआत छोटी हो सकती है, लेकिन सपनों की कोई सीमा नहीं होती। केलाबाड़ी की गलियों में लड़कों के साथ हॉकी खेलने वाली एक लड़की ने कभी शायद नहीं सोचा होगा कि एक दिन वही भारतीय टीम की कप्तान बनेगी, अर्जुन अवॉर्ड और पद्मश्री हासिल करेगी और देश की युवा खिलाड़ियों के लिए प्रेरणा बनेगी। सबा अंजुम करीम की कहानी यही बताती है—संसाधन कम हो सकते हैं, रास्ते मुश्किल हो सकते हैं और समाज सवाल उठा सकता है, लेकिन अगर परिवार का भरोसा और खिलाड़ी का हौसला मजबूत हो, तो एक छोटी-सी गली भी बड़े सपनों की पहली सीढ़ी बन सकती है।