फ़ज़ल पठान
जब हर तरफ श्रीकृष्ण के जन्म का जश्न मनाया जा रहा था, तब छत्रपति संभाजीनगर के एक अस्पताल में भोर के अंधेरे में अचानक मौत ने साया डाल दिया। मासूम नवजात बच्चों की सांसें रोकने के लिए बेताब आग की खतरनाक लपटों से लड़ते हुए एक मुस्लिम डॉक्टर और उनकी टीम ने इन बच्चों को नया जीवन दिया।
छत्रपति संभाजीनगर के जालना रोड पर आकाशवाणी इलाके में मौजूद एशियन हॉस्पिटल (Asian Hospital) में शुक्रवार रात करीब 2:30 बजे यह दिल दहला देने वाला वाकया हुआ। दूसरी मंज़िल पर बने नवजात शिशु गहन चिकित्सा इकाई (NICU) में अचानक शॉर्ट सर्किट हो गया और एसी से धुआं निकलने लगा। महज़ दो मिनट में चिंगारियां उड़ीं और देखते ही देखते आग ने विकराल रूप ले लिया। इसी वार्ड में 9 नवजात बच्चे मौत के साए में फंसे हुए थे।

आधी रात का वो भयानक मंज़र
आधी रात को अचानक एसी से धुआं निकलने लगा। उसी एसी के ठीक नीचे वो नवजात बच्चे रखे हुए थे। उनमें से एक बच्चा प्री-मैच्योर होने की वजह से सीधे वेंटीलेटर पर था। अचानक फायर अलार्म बजा और पूरे अस्पताल में अफरा-तफरी मच गई। उस वक्त ड्यूटी पर मौजूद रेजिडेंट मेडिकल ऑफिसर डॉ. सैयद अब्दुल्ला और उनकी नर्सों की टीम ने बिना एक पल गंवाए बचाव काम शुरू कर दिया।
उस खौफनाक पल को याद करते हुए डॉ. सैयद अब्दुल्ला बेहद भावुक होकर कहते हैं, “हालात बहुत मुश्किल थे। पहले हमें लगा कि थोड़ा बहुत गैस लीक हो रहा है। लेकिन जैसे ही एसी से चिंगारी गिरी, हमने फौरन वॉर्मर को किनारे करने की कोशिश की, क्योंकि वेंटीलेटर पर रखा बच्चा ठीक उसके नीचे ही था। वो बच्चा बहुत सीरियस था, प्रीटर्म (समय से पहले जन्मा) था।”
वे आगे कहते हैं, “हम वॉर्मर हटाने ही गए थे कि आग बहुत तेज़ी से फैल गई। इसके बाद सिस्टरों ने तुरंत बच्चों को उठाकर बाहर निकालना शुरू किया। वेंटीलेटर वाले बच्चे को अंबू बैग (Ambu bag) से कृत्रिम सांस (artificial breathing) देनी पड़ रही थी। एक नर्स ने एक बच्चे को हाथ में पकड़ा और दूसरे वेंटीलेटर वाले बच्चे को भी संभाला, जबकि मैं उसे अंबू बैग से सांस दे रहा था। इस तरह हमने सभी बच्चों को सुरक्षित बाहर निकाल लिया।”
इस बचाव कार्य के बारे में आगे बात करते हुए डॉ. सैयद कहते हैं, “उन सभी बच्चों को बाहर निकालने के बाद मैं वेंटीलेटर भी बचाना चाहता था, क्योंकि वेंटीलेटर बहुत महंगी मशीन होती है। इसलिए मैंने वेंटीलेटर खींचने की कोशिश की, लेकिन वो लॉक था। आग लगातार बढ़ती जा रही थी, इसलिए मुझे वेंटीलेटर छोड़ना पड़ा और दूसरे बच्चे को बचाने में लग गया।”
वे आगे कहते हैं, “मुझे इस बात की खुशी है कि हम उन बच्चों को बचाने में कामयाब रहे। इतने कम सालों की नौकरी में कभी ऐसा मंज़र देखने को मिलेगा, यह मैंने सोचा भी नहीं था। लेकिन अल्लाह का लाख-लाख शुक्र है। अल्लाह के फ़ज़ल-ओ-करम से सब कुछ सुरक्षित रूप से निपट गया और सभी मरीज़ों की हालत अब बेहतर और स्थिर है। घाटी (Ghati) और दूसरे अस्पतालों में सभी बच्चों को सुरक्षित शिफ्ट कर दिया गया है।”
नर्सों की जांबाजी
एक तरफ एसी से धुआं और चिंगारियां उड़ रही थीं, वेंटीलेटर पर रखे गंभीर बच्चे को बाहर निकालने के लिए वेंटीलेटर के साथ वॉर्मर खींचने की कोशिश की गई। लेकिन वॉर्मर लॉक होने की वजह से वह निकल नहीं पाया। आग तेज़ी से फैल रही थी, ऐसे में डॉ. अब्दुल्ला के साथ नर्स कल्पना नलावडे, सुरेखा चव्हाण (मौसी), रेखा रगड़े, संध्या जाधव और अर्चना भालेराव ने बच्चों को हाथों पर उठाकर सुरक्षित बाहर निकालना शुरू किया।
मासूम बच्चों को बचाते हुए अपनी जान की बाज़ी लगाने वाली नर्स रेखा रगड़े की बातें सुनकर किसी की भी आंखें नम हो जाएंगी। अपने जज़्बात ज़ाहिर करते हुए नर्स रेखा रगड़े ने कहा, “मैं रोज़ की तरह ड्यूटी कर रही थी।
किस बच्चे को क्या चाहिए, क्या नहीं, यह सब काम चल रहा था। अचानक कुछ साथी एनआईसीयू के एक कोने की तरफ भागते दिखे। मैं देखती हूं तो क्या? वहां से धुआं निकल रहा था। जब तक मैं देखती, चिंगारी गिरी और तुरंत एसी में आग लग गई।”
वे आगे कहती हैं, “वो नज़ारा देखकर एक पल के लिए मैं भी डर गई, लेकिन तुरंत खुद को संभाला और साथियों की मदद से बच्चों को बाहर निकाला। मन में डर था। घबराहट से हाथ-पैर सुन्न हो गए थे। लेकिन अपनी जान पर खेलकर हमने बच्चों की जान बचा ली। मेरे भी तीन बच्चे हैं। एक मां होने के नाते मुझे बस इतना पता था कि वो नौ के नौ बच्चे मेरे हैं, और मुझे उन्हें बाहर निकालना है।”
तुरंत शुरू हुआ रेस्क्यू ऑपरेशन
आग लगने वाली मंज़िल पर एनआईसीयू के 9 बच्चों समेत जनरल वार्ड में 36 और स्पेशल रूम में 13, कुल मिलाकर 58 मरीज़ भर्ती थे। घटना की गंभीरता को समझते हुए तुरंत दमकल विभागऔर पुलिस को बुलाया गया। लेकिन जवानों के मौके पर पहुंचने से पहले ही डॉक्टरों और नर्सों ने फायर एक्सटिंग्विशर का इस्तेमाल कर आग पर काफी हद तक काबू पा लिया था।
इसके बाद सिडको, पदमपुरा और एन-9 दमकल विभाग की गाड़ियां मौके पर पहुंच गईं। मुख्य दमकल अधिकारी अशोक खांडेकर की अगुवाई में अधिकारी विजय राठौड़, लक्ष्मण कोल्हे, रमेश सोनवणे, दीपराज गंगावणे, छत्रपति केकान, विशाल निंबालकर, ड्राइवर विजय दुबेले ने पाइप के ज़रिए दूसरी मंज़िल पर चढ़कर महज़ कुछ मिनटों में ही पूरी आग पर काबू पा लिया।

सभी 9 'बालगोपाल' पूरी तरह सुरक्षित
अस्पताल प्रशासन, डॉक्टरों और दमकल विभाग की मुस्तैदी से 58 मरीज़ों की जान बच गई। एनआईसीयू के नौ बच्चों को एंबुलेंस के ज़रिए बहुत ही सुरक्षित तरीके से दूसरे अस्पतालों में शिफ्ट कर दिया गया। उनमें से चार बच्चों को सरकारी मेडिकल अस्पताल, तीन बच्चों को एमजीएम हॉस्पिटल, एक बच्चे को मुस्कान चिल्ड्रन्स क्लिनिकऔर एक बच्चे को डे केयर हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया है। फिलहाल सभी बच्चों की हालत पूरी तरह से स्थिर और सुरक्षित है।