प्रोफेसर फिरदौस अजमत : मुस्लिम महिलाओं की छवि और अधिकारों की सच्चाई

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 20-04-2026
Professor Firdaus Azmat: The Image of Muslim Women and the Reality of Their Rights
Professor Firdaus Azmat: The Image of Muslim Women and the Reality of Their Rights

 

आवाज द वाॅयस / नई दिल्ली

मुस्लिम महिला की पहचान अक्सर समाज द्वारा तय किए गए कुछ गिने-चुने पैमानों तक ही सीमित कर दी जाती है। उसे अक्सर एक बेबस और दबी-कुचली छवि के रूप में पेश किया जाता है। लेकिन क्या वाकई हकीकत यही है? 'आवाज़ द वॉयस' के विशेष पॉडकास्ट 'दीन और दुनिया' में इसी गहरी गुत्थी को सुलझाने की कोशिश की गई। इस चर्चा में जामिया मिलिया इस्लामिया की प्रोफेसर फिरदौस अजमत ने इतिहासकार साकिब सलीम के साथ विस्तार से बात की।

उन्होंने बताया कि कैसे मुस्लिम महिलाओं को आज 'दोहरी पितृसत्ता' का सामना करना पड़ रहा है। एक तरफ उन पर अपने ही समुदाय और परिवार की प्रतिष्ठा का बोझ है, तो दूसरी तरफ बाहरी दुनिया उन्हें अपने नजरिए से देखना चाहती है।

प्रोफेसर फिरदौस के मुताबिक मुस्लिम महिलाओं को एक खास ढांचे में कैद कर दिया गया है। समाज उनके लिए एक स्टैंडर्ड तय करता है और फिर उसी आधार पर उन्हें परखता है। सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वे खुद भी कई बार परिवार और समाज की इज्जत के नाम पर संवेदनशील मुद्दों पर बोलने से हिचकिचाती हैं।

लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं है कि उन्हें हमेशा किसी के सहारे या मार्गदर्शन की जरूरत रही है। अगर हम इतिहास को पलटकर देखें तो मुस्लिम महिलाओं की एक बहुत ही ताकतवर और सक्रिय छवि सामने आती है। उन्होंने हर दौर में अपनी आवाज बुलंद की है और समाज की दिशा बदलने में अहम भूमिका निभाई है।

ऐतिहासिक सच्चाई और महिलाओं के संघर्ष की बात करें तो यह धारणा पूरी तरह गलत है कि वे हमेशा हाशिए पर रहीं। 1930के दशक के दौरान जब गोलमेज सम्मेलन हुए तो आरा शाहनवाज ने वहां महिलाओं के अधिकारों की पुरजोर वकालत की।

उन्होंने महिलाओं के वोट देने के हक और उनके प्रतिनिधित्व के लिए मजबूती से अपनी बात रखी। यह संघर्ष सिर्फ व्यक्तिगत नहीं था बल्कि इसका एक संगठित स्वरूप भी था। 1914और 1916के आसपास अंजुमन खवातीन-ए-इस्लाम और अंजुमन खवातीन-ए-हिंद जैसे संगठनों ने अखिल भारतीय स्तर पर काम करना शुरू कर दिया था। इससे भी पहले लाहौर और दिल्ली में महिलाओं के छोटे समूहों ने शिक्षा और सामाजिक सुधारों पर बहस छेड़ दी थी।

19 वीं सदी के सुधार आंदोलनों में भी मुस्लिम महिलाओं का नाम सुनहरे अक्षरों में दर्ज है। सर सैयद अहमद खान की माता अजीजुन-निसा बेगम इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं। उन्होंने उस दौर में विधवा विवाह और बाल विवाह जैसी कुरीतियों के खिलाफ जागरूकता फैलाई।

उन्होंने महिलाओं को समझाया कि विधवा विवाह कोई गुनाह नहीं है बल्कि यह इस्लामी शिक्षाओं का ही हिस्सा है। उस समय जब महिलाओं ने अपने अधिकारों की मांग की तो उन्होंने किसी बाहरी विचारधारा का सहारा नहीं लिया। उन्होंने कुरान और हदीस की ही रोशनी में यह साबित किया कि इस्लाम ने उन्हें जो हक दिए हैं उन्हें समाज ने दबा रखा है।

मौलवी मुमताज अली और उनकी पत्नी मोहम्मदी बेगम ने इस दिशा में क्रांतिकारी काम किया। मौलवी मुमताज अली ने 'हुकूक-ए-निसवान' यानी महिलाओं के अधिकार नाम की एक किताब लिखी। इस किताब में उन्होंने उत्तराधिकार और बराबरी की ऐसी बातें की थीं जो उस समय के हिसाब से बहुत आगे की थीं।

जब उन्होंने यह किताब सर सैयद अहमद खान को दिखाई तो वे भी इसे देखकर हैरान रह गए थे। इस किताब में यहां तक कहा गया था कि इस्लाम में आए सवा लाख पैगंबरों में महिलाएं भी शामिल हो सकती हैं। यह उस जमाने में बहुत बड़ा बौद्धिक साहस था। प्रोफेसर फिरदौस कहती हैं कि असल समस्या मजहब नहीं बल्कि उसकी व्याख्या करने वाले लोग थे जिन्होंने समय के साथ महिलाओं के अधिकारों को सीमित कर दिया।

बौद्धिक जागृति फैलाने में साहित्य और पत्रिकाओं का भी बड़ा योगदान रहा। 'तहज़ीब-ए-निसवान' जैसी पत्रिकाओं ने महिलाओं को एक ऐसा मंच दिया जहां वे अपनी कहानियां और अपनी आपबीती लिख सकती थीं। छपाई की मशीनें आने के बाद महिलाओं ने डायरियों और आत्मकथाओं के जरिए अपनी दुनिया को लोगों के सामने रखा।

उर्दू साहित्य में भी बड़ा बदलाव आया। डिप्टी नजीर अहमद के बाद राशिद जहां और इस्मत चुगताई जैसी साहसी लेखिकाओं ने समाज के उन कड़वे सच को उजागर किया जिन्हें लोग परदे के पीछे रखना चाहते थे।

क्षेत्रीय स्तर पर देखें तो भोपाल की बेगमों का इतिहास मिसाल के तौर पर पेश किया जाता है। बेगम शाहजहां और बेगम सुल्तान जहां ने परदे में रहते हुए भी शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में जो काम किए वे आज भी याद किए जाते हैं।

उन्होंने स्कूल बनवाए, अस्पताल खोले और महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए संगठन खड़े किए। लेकिन आजादी के बाद हालात कुछ बदल गए। नए भारत के निर्माण और सुरक्षा जैसे बड़े मुद्दों के बीच महिलाओं के सवाल कहीं पीछे छूट गए।

1980 के दशक में शाह बानो मामले ने एक बार फिर मुस्लिम महिलाओं के मुद्दों को चर्चा के केंद्र में ला दिया। हालांकि यह मुद्दा बाद में धार्मिक पहचान और समान नागरिक संहिता की राजनीतिक बहस में उलझकर रह गया।

मौजूदा दौर की चुनौतियों का जिक्र करते हुए प्रोफेसर फिरदौस ने बुर्के के मुद्दे पर भी अपनी राय रखी। उन्होंने साफ कहा कि बुर्का सिर्फ एक धार्मिक लिबास नहीं है बल्कि इसके कई सामाजिक और सांस्कृतिक पहलू हैं। कपड़ों को किसी की तरक्की या पिछड़ेपन का पैमाना नहीं बनाया जाना चाहिए।

हर महिला को यह तय करने का पूरा अधिकार होना चाहिए कि वह क्या पहनना चाहती है। आज सबसे बड़ी जरूरत इस बात की है कि मुस्लिम महिला को किसी सांचे में ढालने की कोशिश बंद की जाए। उसे उसकी अपनी पहचान के साथ आगे बढ़ने दिया जाए ताकि उसकी असली और बेबाक आवाज दुनिया सुन सके। उसे एक 'पूर्ण मानव' के रूप में देखा जाना चाहिए जिसे अपनी स्वायत्तता और फैसले लेने का पूरा हक है।