ओनिका माहेश्वरी/ नई दिल्ली
“सच कभी परेशान हो सकता है, लेकिन पराजित नहीं”, इसी विश्वास को अपनी ताकत बनाकर आगे बढ़ने वाली नैश नुसरत अली आज सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि हौसले, संघर्ष और बदलाव की एक मजबूत पहचान बन चुकी हैं। एक समय क्रिकेट के मैदान पर अपनी तेज़ गेंदबाज़ी से पहचान बनाने वाली नुसरत अली आज राजनीति और समाज सेवा के ज़रिए देशभर की महिलाओं और युवाओं की आवाज़ बनकर उभरी हैं। उनका जीवन इस बात का सशक्त उदाहरण है कि अगर इरादे मजबूत हों, तो कोई भी लड़की अपने हालात से ऊपर उठकर समाज में बदलाव ला सकती है।

नैश नुसरत अली, जो एक पूर्व भारतीय राष्ट्रीय और रणजी ट्रॉफी क्रिकेटर रही हैं, आज अखिल भारतीय महिला कांग्रेस में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं और कश्मीर व कारगिल की प्रभारी के तौर पर सक्रिय हैं। एक तेज़ गेंदबाज़ के रूप में उनकी पहचान इतनी प्रभावशाली थी कि पूर्व भारतीय क्रिकेटर जवागल श्रीनाथ ने उन्हें “नैश” उपनाम दिया। उनकी गेंदबाज़ी शैली न्यूज़ीलैंड के खिलाड़ी डियोन नैश से मिलती-जुलती थी, और यही समानता उनके इस नाम की वजह बनी। लेकिन उनकी कहानी सिर्फ क्रिकेट तक सीमित नहीं रही. उन्होंने अपने जीवन को समाज और राजनीति के ज़रिए एक बड़े उद्देश्य से जोड़ दिया।
नुसरत अली का शुरुआती जीवन एक साधारण मुस्लिम परिवार में बीता, जहां वह पांच बहनों में सबसे छोटी थीं। आमतौर पर ऐसे माहौल में लड़कियों के लिए सीमाएं तय कर दी जाती हैं, लेकिन उनके पिता ने इस सोच को तोड़ते हुए उन्हें खुलकर आगे बढ़ने का अवसर दिया। उनके पिता खुद नेशनल लेवल के स्पोर्ट्स से जुड़े थे और उन्होंने नुसरत की प्रतिभा को बहुत जल्दी पहचान लिया। उन्होंने न सिर्फ उनकी ट्रेनिंग पर ध्यान दिया, बल्कि उन्हें मानसिक रूप से भी मजबूत बनाया। रोज सुबह 5 बजे से पहले उठकर ग्राउंड जाना, सख्त फिटनेस रूटीन अपनाना और अनुशासन में रहना, ये सब उनकी जिंदगी का हिस्सा बन गया।

यहीं से उनकी क्रिकेट यात्रा शुरू हुई, जो धीरे-धीरे जूनियर नेशनल टीम तक पहुंची। उन्होंने अंडर-15, अंडर-16, अंडर-19 और फिर ओपन लेवल तक खेलते हुए खुद को साबित किया। एक मुस्लिम लड़की के लिए इस मुकाम तक पहुंचना आसान नहीं था। समाज के ताने, परंपराओं की दीवारें और “लड़कियां ये नहीं कर सकतीं” जैसी सोच उनके रास्ते में कई बार आई, लेकिन उनके पिता का विश्वास उनकी सबसे बड़ी ताकत बना। उन्होंने हमेशा कहा कि “हमारी बेटियां बेटों से बढ़कर काम करेंगी,” और नुसरत ने इसे सच करके दिखाया।

क्रिकेट के साथ-साथ नुसरत अली ने एनसीसी में भी हिस्सा लिया, जहां उन्होंने सामाजिक जिम्मेदारियों को समझा। यही अनुभव आगे चलकर उनके जीवन की दिशा बदलने वाला साबित हुआ। एक दिल दहला देने वाली घटना—कठुआ केस—ने उन्हें अंदर तक झकझोर दिया। उस समय उन्होंने महसूस किया कि सिर्फ विरोध करने से बदलाव नहीं आता, बल्कि सिस्टम का हिस्सा बनना जरूरी है। यही सोच उन्हें राजनीति की ओर ले गई।
राजनीति में कदम रखने के बाद नुसरत अली ने खुद को एक जुझारू और बेबाक नेता के रूप में स्थापित किया। नागपुर महिला कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष के तौर पर उन्होंने अपने छोटे से कार्यकाल में करीब 128 कार्यक्रम आयोजित किए, जिनमें से 120 आंदोलन थे। उनका मानना है कि आंदोलन सिर्फ दिखावे के लिए नहीं, बल्कि लोगों की असली तकलीफ को सामने लाने के लिए होने चाहिए। उनके अनुसार, “सच्चा आंदोलनकारी वही है, जिसे कुछ खोने का डर न हो।”
उनकी सक्रियता सिर्फ राजनीति तक सीमित नहीं रही। समाज सेवा के क्षेत्र में भी उन्होंने कई महत्वपूर्ण काम किए हैं। खासतौर पर महिलाओं के मुद्दों पर वह बेहद संवेदनशील और सक्रिय हैं। घरेलू हिंसा, शिक्षा की कमी और आर्थिक तंगी जैसी समस्याओं से जूझ रही महिलाओं के लिए वह किसी सहारे से कम नहीं हैं। कई बार रात के 2 बजे भी उन्हें मदद के लिए बुलाया जाता है, और वह बिना समय देखे पहुंच जाती हैं। वह एनजीओ के साथ मिलकर बच्चियों की शिक्षा का खर्च उठाती हैं, उन्हें किताबें और जरूरी संसाधन उपलब्ध कराती हैं, लेकिन इन कामों का दिखावा करने में विश्वास नहीं रखतीं।
.jpeg)
भारत जोड़ो यात्रा में उनकी भागीदारी भी उनके राजनीतिक जीवन का एक अहम पड़ाव रही। इस यात्रा के दौरान उन्होंने देशभर की महिलाओं की समस्याओं को करीब से समझा और उन्हें राष्ट्रीय मंच तक पहुंचाया। उनके द्वारा उठाए गए मुद्दों को राहुल गांधी ने अपनी सभाओं में शामिल किया, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि उनकी आवाज़ प्रभावशाली और महत्वपूर्ण है।
कश्मीर और कारगिल में प्रभारी के रूप में काम करते हुए नुसरत अली ने वहां की महिलाओं के बीच नई जागरूकता पैदा की है। जहां पहले महिलाएं कैमरे के सामने आने से भी हिचकिचाती थीं, वहीं आज वे खुलकर अपने मुद्दे रख रही हैं। उन्होंने स्किल डेवलपमेंट प्रोग्राम्स के जरिए महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में काम किया है—जैसे सिलाई, ब्यूटी पार्लर ट्रेनिंग और सैनिटरी पैड्स का वितरण। उनका मानना है कि महिलाओं को सिर्फ सहायता नहीं, बल्कि अवसर देना ज्यादा जरूरी है।

नुसरत अली का व्यक्तिगत जीवन भी संघर्षों से भरा रहा है। उनके पिता का निधन 12 साल पहले हो गया और कुछ साल पहले उनकी मां को ब्रेन स्ट्रोक आया। इन परिस्थितियों ने उन्हें और मजबूत बनाया। उनकी बहनें उनका पूरा समर्थन करती हैं और उन्हें अपनी “बैकबोन” मानती हैं। एक राजनेता होने के साथ-साथ नुसरत अली एक संवेदनशील इंसान भी हैं। उन्हें लिखने का शौक है, खासकर मोटिवेशनल लेखन में उनकी रुचि है। संगीत सुनना, ड्राइविंग करना और खाना बनाना भी उन्हें पसंद है। लेकिन उनके जीवन का असली उद्देश्य समाज में बदलाव लाना है।
आज के युवाओं, खासकर महिलाओं के लिए उनका संदेश साफ है “सिर्फ शिकायत करने से कुछ नहीं बदलेगा, बदलाव के लिए आगे आना होगा।” वह सोशल मीडिया की भ्रामक जानकारी से बचने और सच्चाई की जांच करने पर जोर देती हैं। उनका सपना है कि अगर उन्हें बड़ा राजनीतिक मौका मिलता है, तो वह गरीब बच्चों के लिए फ्री यूपीएससी कोचिंग शुरू करेंगी और महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाएंगी। उनके लिए धर्म से ऊपर इंसानियत है, और यही विचारधारा उन्हें एक सच्चा नेता बनाती है।
ALSO WATCH:
नैश नुसरत अली आज उन तमाम मुस्लिम महिलाओं के लिए एक प्रेरणा हैं, जो अपने सपनों को समाज की बंदिशों में खो देती हैं। उन्होंने यह साबित कर दिया है कि पहचान, परंपरा और प्रगति—तीनों को साथ लेकर भी आगे बढ़ा जा सकता है। उनकी कहानी सिर्फ एक व्यक्ति की सफलता नहीं, बल्कि एक सोच की जीत है—एक ऐसी सोच, जो कहती है कि “अगर इरादा हो, तो हर लड़की अपनी तकदीर खुद लिख सकती है।”