ओनिका माहेश्वरी/ नई दिल्ली
केरल की राजनीति में एक ऐतिहासिक बदलाव देखने को मिला है, जहां फातिमा थाहिलिया ने सोमवार को इतिहास रचते हुए इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (IUML) की पहली महिला विधायक बनने का गौरव हासिल किया। उन्होंने पेराम्ब्रा विधानसभा क्षेत्र से चुनाव जीतकर न सिर्फ अपनी पार्टी के इतिहास में नया अध्याय जोड़ा, बल्कि केरल की सियासत में भी एक बड़ा संदेश दिया।
34 वर्षीय अधिवक्ता फातिमा थाहिलिया ने कोझिकोड जिले के पेराम्ब्रा क्षेत्र में, जिसे लंबे समय से वामपंथ का गढ़ माना जाता रहा है, सत्तारूढ़ लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (LDF) के संयोजक और कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी) के वरिष्ठ नेता टी पी रामकृष्णन को हराकर ‘जायंट किलर’ के रूप में उभरकर सामने आईं। उन्होंने 5,087 वोटों के अंतर से जीत दर्ज की। थाहिलिया को कुल 81,429 वोट मिले, जबकि टी पी रामकृष्णन को 76,342 वोटों से संतोष करना पड़ा।
यह जीत इसलिए भी खास मानी जा रही है क्योंकि इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग ने ऐतिहासिक रूप से महिलाओं को चुनावी राजनीति में सीमित अवसर दिए हैं। 2026 के विधानसभा चुनाव में पार्टी ने सिर्फ दो महिला उम्मीदवारों को मैदान में उतारा था। इससे पहले पिछले चुनाव में केवल एक महिला उम्मीदवार को टिकट मिला था, और उससे पहले 1996 में आखिरी बार किसी महिला को मौका दिया गया था।
फातिमा थाहिलिया की राजनीतिक यात्रा लंबे सामाजिक और राजनीतिक सक्रियता से जुड़ी रही है। उन्होंने महिलाओं से जुड़े कई अभियानों में अहम भूमिका निभाई है, खासकर हरिता के माध्यम से। वह वर्तमान में मुस्लिम यूथ लीग की राज्य सचिव भी हैं।
चुनाव प्रचार के दौरान उन्हें खासकर महिलाओं और युवाओं का जबरदस्त समर्थन मिला, जिन्होंने उन्हें एक ऐसे बदलाव के रूप में देखा जो परंपरागत रूप से पुरुष-प्रधान राजनीति और पार्टी संरचना में नई सोच लेकर आया है।
हालांकि, उनका चुनावी सफर विवादों से भी अछूता नहीं रहा। प्रचार के दौरान उन्हें बड़े पैमाने पर साइबर हमलों और ऑनलाइन दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ा। उनके सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर अश्लील और आपत्तिजनक टिप्पणियों की बाढ़ आ गई। इसके अलावा, हिजाब पहनने वाली महिला होने के कारण उनकी क्षमता पर भी सवाल उठाए गए।
चुनाव अभियान के दौरान उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा था, “एक महिला के रूप में जीना ही चुनौतीपूर्ण है, और हिजाब में जीना उससे भी अधिक कठिन। एक महिला, एक मुस्लिम महिला और हिजाब पहनने वाली मुस्लिम महिला होने के नाते मैं पहले ही कई बाधाओं को पार कर यहां तक पहुंची हूं।”
पेशे से वकील और कोझिकोड म्युनिसिपल कॉरपोरेशन की पार्षद रह चुकीं फातिमा थाहिलिया की यह जीत इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पेराम्ब्रा सीट पर कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी) 1980 से लगातार जीत दर्ज करती आ रही थी।
चुनाव से पहले यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (UDF), जिसमें कांग्रेस, IUML और अन्य दल शामिल हैं, ने चुनाव आयोग से शिकायत की थी कि LDF थाहिलिया के खिलाफ सांप्रदायिक अभियान चला रहा है।
IUML के 27 उम्मीदवारों में फातिमा थाहिलिया उन दो महिला उम्मीदवारों में शामिल थीं जिन्हें इस बार टिकट दिया गया। केरल के चुनावी इतिहास में इससे पहले IUML ने केवल दो अन्य महिलाओं को उम्मीदवार बनाया था, और उनमें से कोई भी जीत हासिल नहीं कर सकी थी।
थाहिलिया 2022 में पार्टी के भीतर लैंगिक न्याय की मांग उठाने के बाद IUML में प्रमुखता से उभरीं। उन्हें पार्टी में एक सुधारवादी आवाज के रूप में जाना जाता है। वह मुस्लिम स्टूडेंट्स फेडरेशन की महिला इकाई हरिता की संस्थापक राज्य अध्यक्ष भी रही हैं। 2012 में स्थापित हरिता ने कॉलेज परिसरों में IUML समर्थक छात्राओं को एक मंच प्रदान किया और उनके नेतृत्व में इस संगठन ने कैंपस राजनीति में अपनी मजबूत पहचान बनाई।
उनकी राजनीतिक यात्रा में एक बड़ा मोड़ तब आया जब हरिता की नेताओं ने MSF के कुछ वरिष्ठ नेताओं पर यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए। जब पार्टी नेतृत्व पर इस मामले को दबाने के आरोप लगे, तो फातिमा थाहिलिया ने खुलकर आवाज उठाई। इसके बाद उन्हें MSF के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष पद से हटा दिया गया और हरिता की राज्य समिति को भंग कर दिया गया। इस पूरे घटनाक्रम के बाद भी उन्होंने स्पष्ट किया कि उनका उद्देश्य पार्टी नेतृत्व को चुनौती देना नहीं, बल्कि राजनीति में महिलाओं के लिए सम्मान और स्थान सुनिश्चित करना था।
2021 में IUML के भीतर यौन उत्पीड़न के आरोप लगाने वाली महिलाओं में भी वह शामिल थीं। इस विवाद के बाद उन्हें छात्र संगठन से हटाया गया था। उनकी पार्टी में वापसी को लेकर भी सवाल उठे थे।
फातिमा थाहिलिया आज केरल की राजनीति में एक नई तरह की नेता के रूप में उभर रही हैं—युवा, स्पष्टवादी और निडर। वह न केवल अपने विरोधियों, बल्कि अपनी ही पार्टी के भीतर भी जरूरी मुद्दों पर सवाल उठाने से पीछे नहीं हटतीं। उनकी यह जीत IUML के भीतर भी एक बड़े बदलाव का संकेत मानी जा रही है, जहां अब लैंगिक समानता, महिला प्रतिनिधित्व और आंतरिक लोकतंत्र जैसे मुद्दे अधिक मजबूती से उभर रहे हैं।