भारत के भविष्य के लिए शांति, बंधुत्व और बहुलतावाद क्यों अनिवार्य हैं

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 28-02-2026
Why peace, fraternity and pluralism are essential for India's future
Why peace, fraternity and pluralism are essential for India's future

 

 

डॉ. ख्वाजा इफ्तिखार अहमद

इक्कीसवीं सदी में भारत की प्रगति का आकलन केवल उसके एक्सप्रेसवे की लंबाई, अर्थव्यवस्था के आकार या प्रौद्योगिकी की उन्नतता से नहीं किया जा सकता। उतना ही महत्वपूर्ण उसके नागरिकों का नैतिक और सामाजिक चरित्र भी है। भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश के लिए स्थायी विकास तभी संभव है जब वह शांति, बंधुत्व, अंतरधार्मिक सद्भाव और मजबूत सामाजिक एकजुटता पर आधारित हो। ये कोई अमूर्त आदर्श नहीं हैं, बल्कि वही आधारशिला हैं जिन पर भारत की एकता, अखंडता और उसकी विशिष्ट धर्मनिरपेक्ष पहचान का औचित्य टिका हुआ है।

भारतीय संविधान की परिकल्पना स्पष्ट और दूरदर्शी थी। इसके निर्माताओं ने ऐसे गणराज्य की कल्पना की थी जहां विभिन्न धर्मों, भाषाओं और संस्कृतियों के नागरिक समान गरिमा, अधिकार और परस्पर सम्मान की भावना के साथ साथ रहें। भारतीय संदर्भ में धर्मनिरपेक्षता का अर्थ कभी भी आस्था का निषेध या धर्म का विरोध नहीं रहा। बल्कि इसका उद्देश्य सभी आस्थाओं के प्रति सम्मान सुनिश्चित करना और राज्य को निष्पक्ष तथा न्यायपूर्ण बनाए रखना था। इसी बहुलतावादी ढांचे ने असाधारण विविधता के बावजूद भारत को एकजुट बनाए रखा है। इस नाजुक संतुलन में किसी भी प्रकार की कमजोरी सामाजिक सद्भाव को क्षीण कर सकती है और अंततः शासन संस्थाओं में जनता के विश्वास को भी प्रभावित कर सकती है।

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इतिहास इस बात का पर्याप्त प्रमाण देता है कि जो समाज धार्मिक, जातीय या सांस्कृतिक आधार पर विभाजित हो जाते हैं, वे सतत विकास प्राप्त करने में संघर्ष करते हैं। आंतरिक संघर्ष संसाधनों को नष्ट करते हैं, संस्थाओं को कमजोर करते हैं और शिक्षा, स्वास्थ्य तथा आधारभूत संरचना जैसे क्षेत्रों से ध्यान भटका देते हैं। भारत के अपने अनुभव भी बताते हैं कि साम्प्रदायिक तनाव के दौर में हिंसा आर्थिक गतिविधियों को बाधित करती है, निवेश को हतोत्साहित करती है और सामाजिक विश्वास को नुकसान पहुंचाती है। इसलिए शांति केवल नैतिक आवश्यकता ही नहीं, बल्कि आर्थिक अनिवार्यता भी है। ऐसे देश में जहां लगभग सभी प्रमुख विश्व धर्मों की ऐतिहासिक जड़ें मौजूद हैं, समुदायों के बीच सद्भाव को बढ़ावा देना स्थिरता और प्रगति के लिए अत्यंत आवश्यक है।

सामाजिक विज्ञान के अध्ययन निरंतर यह दर्शाते हैं कि जिन समाजों में विश्वास, सहयोग और समावेशन की भावना प्रबल होती है, वे नवाचार, उत्पादकता और मानव विकास में बेहतर प्रदर्शन करते हैं। बंधुत्व, जो संविधान का एक मूल मूल्य है, भारतीय लोकतंत्र का शायद सबसे कम आंका गया स्तंभ है।

यदि नागरिकों में साझा अपनत्व और सामूहिक भविष्य की भावना न हो, तो राजनीतिक अधिकार और आर्थिक अवसर भी अपना महत्व खो देते हैं। बंधुत्व सहानुभूति को पोषित करता है, अतिवादी प्रवृत्तियों को सीमित करता है और लोकतंत्र को केवल बहुमतवाद तक सिमटने से बचाता है। भाईचारे और बहनापे की भावना के बिना लोकतांत्रिक संस्थाएं खोखली हो सकती हैं।

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आज के तेजी से बदलते वैश्विक परिवेश में सामाजिक जुड़ाव और भी अधिक महत्वपूर्ण हो गया है। वैश्वीकरण, शहरीकरण और डिजिटल संचार ने भारतीय जीवन और पारस्परिक संबंधों को बदल दिया है। जहां इन परिवर्तनों ने अपार अवसर दिए हैं, वहीं इन्होंने गलत सूचना, ध्रुवीकरण और पहचान से जुड़ी चिंताओं को भी बढ़ाया है। जब विभाजनकारी कथानक बिना नियंत्रण के फैलते हैं, तो वे समुदायों के बीच भय और वैमनस्य पैदा करते हैं और धीरे धीरे राष्ट्र की सामाजिक संरचना को कमजोर कर देते हैं।

सामाजिक स्थिरता और आर्थिक विकास गहराई से परस्पर जुड़े हुए हैं। विकसित अर्थव्यवस्थाएं केवल पूंजी और तकनीक पर नहीं, बल्कि समावेशी संस्थाओं पर भी आधारित होती हैं जो सभी को समान अवसर प्रदान करती हैं। यदि सामाजिक तनाव बने रहते हैं, तो भारत अपनी सबसे बड़ी शक्ति यानी अपनी युवा आबादी की पूरी क्षमता का उपयोग नहीं कर पाएगा।

धर्म, जाति, नस्ल या किसी भी पहचान के आधार पर बहिष्कार आर्थिक भागीदारी को सीमित करता है और सामूहिक संभावनाओं को कम करता है। वैश्विक विकास सूचकांक स्पष्ट रूप से दिखाते हैं कि समावेशी समाज मानव विकास, नवाचार और दीर्घकालिक वृद्धि में विभाजित समाजों से बेहतर प्रदर्शन करते हैं।

भारत की पांच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने की आकांक्षा निरंतर सामाजिक संघर्ष के बीच साकार नहीं हो सकती। विकास और सद्भाव परस्पर विरोधी लक्ष्य नहीं हैं, बल्कि एक दूसरे को सुदृढ़ करते हैं। आंतरिक कलह को नियंत्रित करने में खर्च किए गए संसाधन विकास से दूर चले जाते हैं। इसके विपरीत, शांत और एकजुट समाज आर्थिक और सामाजिक उपलब्धियों को कई गुना बढ़ा देता है।

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जो शक्तियां एकता और धर्मनिरपेक्ष मूल्यों को कमजोर करती हैं, उन्हें गंभीरता और तत्परता से संबोधित किया जाना चाहिए। इतिहास सिखाता है कि जब असहिष्णुता सामान्य बन जाती है, तो उसे पलटना अत्यंत कठिन हो जाता है। घृणास्पद भाषण, भेदभाव और साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण प्रारंभ में सीमांत पर दिखाई देते हैं, लेकिन समय के साथ वे मुख्यधारा की संस्थाओं में प्रवेश कर सकते हैं। यदि इन्हें रोका न जाए, तो भारत की सबसे बड़ी शक्ति यानी उसकी विविधता को ही कमजोरी के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है।

इस संदर्भ में शिक्षा की भूमिका निर्णायक है। संवैधानिक मूल्यों, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और नैतिक विवेक पर आधारित शिक्षा प्रणाली जिम्मेदार और सहानुभूतिपूर्ण नागरिक तैयार कर सकती है। भारत की साझा सांस्कृतिक विरासत से परिचित होना युवाओं को विविधता से भयभीत होने के बजाय उसे स्वीकार करने और सराहने के लिए प्रेरित करता है। जो समाज नागरिक शिक्षा में निवेश करते हैं, वे अधिक सहिष्णु, सामाजिक रूप से जिम्मेदार और सामूहिक हित के प्रति प्रतिबद्ध नागरिक तैयार करते हैं।

मीडिया और सार्वजनिक विमर्श की भी गहरी जिम्मेदारी है। त्वरित संचार के इस युग में गैर जिम्मेदार कथानक कुछ ही घंटों में सामाजिक तनाव को भड़का सकते हैं। जिम्मेदार पत्रकारिता, तथ्य आधारित बहस और जवाबदेह संचार सामाजिक स्थिरता बनाए रखने के लिए आवश्यक हैं। जो समाज सत्य और तर्क को महत्व देते हैं, वे उकसावे और अतिवाद से कम प्रभावित होते हैं।

नागरिक समाज की पहलें भी सामाजिक एकजुटता को मजबूत करती हैं। जमीनी स्तर पर अंतरधार्मिक संवाद, सामुदायिक सेवा और सांस्कृतिक आदान प्रदान सहयोग और समझ के साझा मंच तैयार करते हैं। ऐसे संवाद ‘दूसरे’ को मानवीय बनाते हैं, रूढ़ियों को तोड़ते हैं और रोजमर्रा के जीवन में एकजुटता के अनुभव पैदा करते हैं।

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इक्कीसवीं सदी में आगे बढ़ते हुए भारत को भौतिक प्रगति को नैतिक स्पष्टता के साथ संतुलित करना होगा। शांति, अंतरधार्मिक सद्भाव, बंधुत्व और सामाजिक एकता विकास में बाधा नहीं हैं, बल्कि उसकी पूर्वशर्त हैं। राष्ट्र के धर्मनिरपेक्ष चरित्र को सुरक्षित रखना और विविधता में एकता को सुदृढ़ करना केवल राज्य की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक का साझा कर्तव्य है।

( लेखक इंटर फेथ हार्मनी फाउंडेशन ऑफ इंडिया के अध्यक्ष हैं। उनसे [email protected] पर संपर्क किया जा सकता है।)