आज के दौर में जब तकनीक हमारे हाथों में है, तो संवाद के तरीके भी बदल गए हैं। लेकिन क्या इस बदलाव ने हमारी समझ को भी बेहतर किया है? इसी गंभीर सवाल पर प्रोफेसर अख्तरुल वासे ने 'आवाज द वॉयस' के खास पॉडकास्ट 'दीन और दुनिया' में अपनी बात रखी। मेजबान साकिब सलीम के साथ उनकी यह बातचीत केवल एक साक्षात्कार नहीं थी। यह आज के समाज, धर्म की व्याख्या और सोशल मीडिया की हकीकत का एक आईना थी।
बातचीत की शुरुआत 'काफिर' जैसे शब्द के इस्तेमाल से हुई। प्रोफेसर वासे ने बड़े ही तार्किक अंदाज में बताया कि लोग अक्सर शब्दों की गहराई भूल जाते हैं। 'काफिर' शब्द आज नफरत और दूरी बढ़ाने का औजार बन गया है। उन्होंने समझाया कि शाब्दिक अर्थ में देखा जाए तो यह शब्द किसी के लिए भी इस्तेमाल हो सकता है।
लेकिन सोशल मीडिया पर लोग इसे बेहद गैर-जिम्मेदाराना तरीके से इस्तेमाल कर रहे हैं। इस संवेदनहीनता की वजह से समाज में अविश्वास की खाई चौड़ी होती जा रही है। उन्होंने जोर देकर कहा कि ऐसे संवेदनशील शब्दों के साथ खिलवाड़ करना बंद होना चाहिए।
प्रोफेसर वासे ने एक बड़ी बात यह कही कि धर्म पर चर्चा करना गलत नहीं है। लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब हर कोई खुद को धर्म का ज्ञाता समझने लगता है। उन्होंने साफ लहजे में कहा कि धर्म की व्याख्या करने का हक सिर्फ उन विशेषज्ञों को होना चाहिए जिन्होंने बरसों तक धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन किया है। कुरान, हदीस, तफ्सीर और न्यायशास्त्र की गहरी समझ के बिना किसी नतीजे पर पहुँचना समाज को गुमराह करने जैसा है। आज हर दूसरा व्यक्ति इंटरनेट के जरिए विद्वान बनने की कोशिश कर रहा है। यह प्रवृत्ति न केवल खतरनाक है बल्कि धर्म की मूल भावना को भी चोट पहुँचाती है।
सोशल मीडिया के इस दौर में खुद को सबसे अलग दिखाने की एक होड़ मची है। प्रोफेसर वासे ने इस पर कटाक्ष करते हुए कहा कि कुछ लोग धर्म को प्रोपेगेंडा का जरिया बना चुके हैं। इस दौड़ में इस्लाम के बारे में कई गलतफहमियां फैल रही हैं। इससे मुसलमानों के अंदर भी दो तरह के व्यवहार पैदा हो रहे हैं।
एक तबका खुद को श्रेष्ठ समझने लगा है, तो दूसरा हीन भावना का शिकार हो गया है। उन्होंने मनोवैज्ञानिक नजरिए से बताया कि श्रेष्ठता का घमंड अक्सर भीतर छिपी हीन भावना का ही एक बढ़ा हुआ रूप होता है। यह मानसिक द्वंद्व समाज के संतुलन को बिगाड़ रहा है।
बातचीत में आधुनिकता और लोकतंत्र के मुद्दे पर भी चर्चा हुई। आज भी कुछ लोग ऐसे हैं जो हर नई और आधुनिक चीज को गैर-इस्लामी या 'तागुती' करार देते हैं। प्रोफेसर वासे ने इसके लिए इतिहास का सहारा लिया। उन्होंने सर सैयद अहमद खान के दौर का जिक्र किया।
उस समय भी आधुनिक शिक्षा का जमकर विरोध हुआ था। लेकिन समय ने साबित किया कि शिक्षा और तरक्की के बिना कोई भी कौम आगे नहीं बढ़ सकती। उन्होंने समझाया कि हमें 'अकीदा' यानी अपने विश्वास और 'अकीदत' यानी अपनी श्रद्धा के बीच के अंतर को समझना होगा। किसी के फतवे देने से कोई व्यवस्था गैर-इस्लामी नहीं हो जाती। आधुनिक दुनिया की सच्चाइयों को स्वीकार करना ही समझदारी है।
प्रोफेसर वासे ने सहिष्णुता और आपसी भाईचारे पर भी दिल छू लेने वाली बातें कहीं। भारत जैसे देश में जहाँ सदियों से अलग-अलग धर्मों के लोग साथ रहते आए हैं, वहां एक-दूसरे का सम्मान ही सबसे बड़ी ताकत है। उन्होंने कहा कि पैगंबर मोहम्मद साहब दुनिया में लोगों को जोड़ने के लिए आए थे, न कि तोड़ने के लिए। मक्का की तकलीफें हों या मदीना का दौर, उन्होंने हर हाल में मोहब्बत और भाईचारे का पैगाम दिया। उनके 'अंतिम उपदेश' में भी मानवता को करीब लाने की ही बात थी। आज सोशल मीडिया पर भले ही सांप्रदायिकता ज्यादा दिखती हो, लेकिन प्रोफेसर वासे का मानना है कि जमीन पर कट्टरता कम हो रही है। लोग धीरे-धीरे उदारता और संतुलन के रास्ते पर लौट रहे हैं।
चार शादियों के विवादित मुद्दे पर भी प्रोफेसर वासे ने खुलकर राय रखी। उन्होंने इसे एक भ्रम करार दिया और कहा कि इसे बिल्कुल निराधार तरीके से पेश किया जाता है। इस्लाम में चार शादियों की अनुमति है, लेकिन इसे अनिवार्य नहीं बनाया गया है। इसकी सबसे बड़ी शर्त 'इंसाफ' यानी पूर्ण न्याय है।
कुरान खुद कहता है कि एक से ज्यादा पत्नी होने पर न्याय करना इंसान के लिए बहुत मुश्किल काम है। हकीकत तो यह है कि आज के दौर में न तो पुरुष चार शादियां कर रहे हैं और न ही महिलाएं अपनी जिम्मेदारियों से भाग रही हैं। इसे बेवजह मुसलमानों को निशाना बनाने के लिए मुद्दा बनाना गलत है। फैसले हमेशा जरूरत और हालात के हिसाब से होते हैं, इसे किसी एक समुदाय की पहचान से जोड़ना ठीक नहीं है।
बातचीत के अंत में उन्होंने एक बेहद जरूरी मशवरा दिया। उन्होंने कहा कि हमें अपने व्यवहार और दिखावे में सादगी अपनानी चाहिए। हमें उन तरीकों से बचना चाहिए जो पैगंबर साहब या उनके साथियों के आदर्शों से मेल नहीं खाते। धर्म की नुमाइंदगी ऐसी होनी चाहिए जो सच्ची और सीधी हो। प्रोफेसर वासे का संदेश स्पष्ट था कि समाज में मतभेद हो सकते हैं, लेकिन आपसी सम्मान बना रहना चाहिए।
प्रोफेसर अख्तरुल वासे की ये बातें आज के माहौल में एक ठंडी हवा के झोंके जैसी हैं। यह पॉडकास्ट उन लोगों के लिए एक सीख है जो सोशल मीडिया के शोर में अपनी जड़ों और अपनी तहजीब को भूलते जा रहे हैं।