स्लम बस्तियों के बच्चों तक क्यों नहीं पहुंच रही शिक्षा

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 23-05-2026
Why is education not reaching children in slum settlements?
Why is education not reaching children in slum settlements?

 

ffमहावीर

भारत तेजी से शहरीकरण की ओर बढ़ रहा है। गांवों से शहरों की ओर पलायन अब केवल रोजगार की मजबूरी नहीं, बल्कि बेहतर जीवन की तलाश बन चुका है। राजस्थान की राजधानी जयपुर भी इसी बदलाव का बड़ा केंद्र है। हर दिन सैकड़ों परिवार मजदूरी, निर्माण कार्य, घरेलू काम और छोटे रोजगार की उम्मीद में यहां पहुंचते हैं।

लेकिन शहर उन्हें रोजगार तो देता है, सम्मानजनक जीवन नहीं। यही कारण है कि शहर की चौड़ी सड़कों, ऊंची इमारतों और चमकदार बाजारों के किनारे बड़ी संख्या में झुग्गी-झोपड़ियां बसती जा रही हैं। इन झुग्गियों में रहने वाले परिवारों का संघर्ष केवल दो वक्त की रोटी तक सीमित नहीं है। सबसे बड़ी चिंता अपने बच्चों का भविष्य है। शिक्षा, जो किसी भी बच्चे के जीवन को बदल सकती है, वही इन बस्तियों में सबसे अधिक उपेक्षित दिखाई देती है।

भारत की जनगणना और विभिन्न सरकारी रिपोर्टों के अनुसार देश की शहरी आबादी का बड़ा हिस्सा अनौपचारिक बस्तियों में रहता है। नीति आयोग और यूडीआईएसई प्लस के आंकड़े बताते हैं कि देश में आज भी लाखों बच्चे नियमित शिक्षा से बाहर हैं।

खासकर प्रवासी मजदूरों के बच्चों में स्कूल छोड़ने की दर अधिक है। यूनिसेफ की रिपोर्ट के अनुसार आर्थिक अस्थिरता, बार-बार स्थान बदलना, अभिभावकों की अशिक्षा और सामाजिक असुरक्षा इसके प्रमुख कारण हैं।

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इन्हीं परिस्थितियों को समझने के लिए जयपुर के झालाना डूंगरी स्थित इंद्रा नगर क्षेत्र की बस्तियों और वहां संचालित विद्यालयों का अवलोकन किया। यह इलाका उन परिवारों का बसेरा है जो अलग-अलग जिलों और राज्यों से रोजगार की तलाश में यहां आए हैं। अधिकतर लोग दिहाड़ी मजदूरी करते हैं। उनके लिए हर दिन काम मिलना ही सबसे बड़ी प्राथमिकता है। ऐसे में बच्चों की पढ़ाई अक्सर पीछे छूट जाती है।

इंद्रा नगर स्थित श्री कल्याण माध्यमिक विद्यालय का दृश्य इस संघर्ष की एक झलक प्रस्तुत करता है। विद्यालय के प्रधानाध्यापक बाबूलाल कुमावत बताते हैं कि यहां पढ़ने वाले अधिकांश बच्चे मजदूर परिवारों से आते हैं। कई परिवार आर्थिक तंगी के साथ-साथ सामाजिक समस्याओं से भी जूझ रहे हैं। कुछ अभिभावकों में शराब की लत जैसी समस्याएं हैं, जिसका सीधा असर बच्चों की शिक्षा पर पड़ता है।

इस विद्यालय में कुल 266विद्यार्थियों का नामांकन है। यहां 13शिक्षक कार्यरत हैं, जिनमें 7महिला और 6पुरुष शिक्षक शामिल हैं। विद्यालय में पानी की टंकी, अलग-अलग शौचालय और अतिरिक्त कक्षाओं जैसी सुविधाएं उपलब्ध हैं। कक्षा 6से 10तक के विद्यार्थियों के लिए एक्स्ट्रा क्लास भी संचालित की जाती हैं। हालांकि इन अतिरिक्त कक्षाओं के लिए शुल्क देना पड़ता है, जो कई गरीब परिवारों के लिए कठिन हो जाता है।

विद्यालय में शिक्षा का माहौल बनाने की कोशिश जरूर दिखाई देती है, लेकिन असली चुनौती स्कूल के बाहर मौजूद है। कई बच्चे नियमित रूप से स्कूल नहीं आ पाते क्योंकि माता-पिता सुबह मजदूरी पर निकल जाते हैं और छोटे भाई-बहनों की जिम्मेदारी बड़े बच्चों पर आ जाती है। कई बार बच्चों को घर संभालने, पानी भरने या काम पर जाने के लिए मजबूर होना पड़ता है।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में समावेशी शिक्षा और हर बच्चे तक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पहुंचाने की बात कही गई है। सरकार द्वारा शिक्षा का अधिकार, मध्याह्न भोजन योजना और निःशुल्क शिक्षा जैसी कई योजनाएं चलाई जा रही हैं। इसके बावजूद झुग्गी बस्तियों के बच्चों तक इन योजनाओं का पूरा लाभ नहीं पहुंच पा रहा।

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पास ही स्थित राजकीय प्राथमिक विद्यालय, इंद्रा नगर फेज-2का दृश्य एक अलग तस्वीर प्रस्तुत करता है। वहां बच्चे मिड-डे मील के तहत दूध पी रहे थे। बच्चों से बातचीत में यह बात सामने आई कि कई बच्चों के लिए स्कूल केवल पढ़ाई की जगह नहीं, बल्कि पोषण और अपनापन पाने का भी माध्यम है। एक बच्चे ने मुस्कुराते हुए कहा, “हमें स्कूल का खाना घर से भी अच्छा लगता है।”

यह एक साधारण वाक्य नहीं, बल्कि उन परिस्थितियों का आईना है जिनमें ये बच्चे जीवन जी रहे हैं। जब किसी बच्चे को घर से बेहतर भोजन स्कूल में मिले, तो यह केवल गरीबी नहीं बल्कि सामाजिक असमानता की भी कहानी कहता है।

इस विद्यालय में कुल 16 विद्यार्थी अध्ययनरत हैं। यहां इंटर्न और मिड-डे मील कार्यकर्ता बच्चों को दूध वितरित कर रहे थे। लेकिन इसी दौरान एक ऐसा व्यवहार भी सामने आया, जिसने सरकारी शिक्षा व्यवस्था की संवेदनशीलता पर सवाल खड़े कर दिए। विद्यालय की एक शिक्षिका बिना पूर्व सूचना के हमारे स्कूल विजिट और बच्चों से बातचीत को लेकर नाराज दिखाई दी। जो यह दर्शाता है कि शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता और संवाद की संस्कृति अभी भी कमजोर है।

असल सवाल केवल स्कूलों की संख्या का नहीं है। सवाल यह है कि क्या शिक्षा वास्तव में उन बच्चों तक पहुंच रही है जिन्हें इसकी सबसे अधिक आवश्यकता है? क्या केवल नामांकन कर देना पर्याप्त है? क्या ऐसे बच्चों के लिए अलग सामाजिक और मनोवैज्ञानिक सहायता की जरूरत नहीं है?

विशेषज्ञ मानते हैं कि प्रवासी और झुग्गी बस्ती के बच्चों के लिए सामान्य शिक्षा मॉडल पर्याप्त नहीं है। इनके लिए लचीली शिक्षा व्यवस्था, सामुदायिक शिक्षण केंद्र, स्थानीय स्वयंसेवी समूहों की भागीदारी और अभिभावकों में जागरूकता बेहद जरूरी है।

शिक्षा केवल किताबें और परीक्षा नहीं होती। यह आत्मविश्वास, सुरक्षा और अवसरों का रास्ता खोलती है। लेकिन जब बच्चा भूख, असुरक्षा और पारिवारिक संघर्ष के बीच बड़ा होता है, तब उसके लिए स्कूल तक पहुंचना भी किसी संघर्ष से कम नहीं होता।

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आज आवश्यकता केवल सरकारी योजनाओं की घोषणा की नहीं, बल्कि जमीन पर संवेदनशील क्रियान्वयन की है। झुग्गी बस्तियों के बच्चों को गरीब बच्चे मानकर सहानुभूति देने से आगे बढ़ना होगा। उन्हें बराबरी का अवसर देना होगा। क्योंकि इन्हीं बस्तियों से भविष्य के शिक्षक, खिलाड़ी, कलाकार और वैज्ञानिक निकल सकते हैं।

महानगरों की चमक के पीछे छिपी स्लम बस्तियों की यह दुनिया हमें बार-बार याद दिलाती है कि विकास केवल इमारतों से नहीं मापा जा सकता। किसी भी समाज का असली विकास तब माना जाएगा जब उसकी सबसे कमजोर बस्ती का बच्चा भी बिना डर, भूख और भेदभाव के स्कूल जा सके। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि शहर की चमकती सड़कों के किनारे बसी झुग्गियों में सपने केवल जन्म ही नहीं लेते हैं, बल्कि पूरे होने का अधिकार भी रखते हैं।

(यह लेखक के निजी विचार हैं)