ईमान सकीना
हर साल इस्लामिक कैलेंडर में एक ऐसा पवित्र महीना आता है जो अपने साथ इबादत, कुर्बानी, याद और रहमत का एक अनोखा माहौल लेकर आता है। ये ज़ुल-हिज्जा के शुरुआती दस दिन होते हैं जो दुनिया भर के मुसलमानों के दिलों को एक सूत्र में पिरो देते हैं। इन दिनों में लाखों की तादाद में लोग हज के लिए मक्का की मुकद्दर जमीन पर इकट्ठा होते हैं। वहीं दूसरी तरफ दुनिया के बाकी हिस्सों में रहने वाले मुसलमान नमाज़, रोज़े, दान और आत्म-मंथन के जरिए ईद-उल-अज़हा की तैयारियों में जुट जाते हैं।

ये दस दिन सिर्फ किसी एक जगह पर निभाई जाने वाली रस्मों के बारे में नहीं हैं। ये पूरी उम्मत के लिए एक आध्यात्मिक बुलावा हैं। कोई इंसान चाहे अराफात के मैदान में खड़ा हो या अपने घर में शांति से बैठा हो, अल्लाह की रहमत के दरवाजे हर किसी के लिए खुले रहते हैं।ज़ुल-हिज्जा के ये पहले दस दिन पूरे साल के सबसे महान दिनों में से एक माने जाते हैं।
पैगंबर मोहम्मद साहब ने फरमाया है कि इन दस दिनों में किए गए नेक काम अल्लाह को किसी भी दूसरे दिनों के मुकाबले सबसे ज्यादा प्यारे होते हैं। यह बात ही इन दिनों की अहमियत को बताने के लिए काफी है। जानकार अक्सर इन दिनों को रमजान की खूबसूरती और ईद-उल-अज़हा की कुर्बानी के जज्बे का एक बेहतरीन मेल बताते हैं।
ये दिन पैगंबर इब्राहिम और उनके परिवार की याद दिलाते हैं। उनका पूरा जीवन अल्लाह की आज्ञा मानने, सब्र रखने, भरोसे और त्याग की एक जीती-जागती मिसाल था। हज की पूरी प्रक्रिया पैगंबर इब्राहिम, बीबी हाजरा और पैगंबर इस्माइल के संघर्षों और उनके विश्वास से जुड़ी हुई है। ईद-उल-अज़हा की कुर्बानी इसी अटूट विश्वास की याद को आगे बढ़ाती है।
बहुत से लोगों को लगता है कि हज और ईद-उल-अज़हा दो अलग-अलग चीजें हैं, लेकिन असलियत में ये दोनों एक-दूसरे से बहुत गहराई से जुड़े हुए हैं।जब हाजी मक्का की मस्जिद-अल-हराम में हज की रस्में निभाते हैं और अराफात के मैदान में इकट्ठा होते हैं, तब दुनिया भर के बाकी मुसलमान भी रोज़े, नमाज़, इबादत और कुर्बानी के जरिए इस सफर का हिस्सा बनते हैं।
ज़ुल-हिज्जा की नौवीं तारीख यानी अराफात का दिन हज का सबसे भावुक और खास पल होता है। इस दिन हाजी अल्लाह के सामने पूरी विनम्रता के साथ खड़े होकर माफी और रहमत की दुआ मांगते हैं। जो लोग हज पर नहीं जा पाए हैं, उनके लिए इस दिन रोज़ा रखना बहुत बड़े सवाब का काम है। यह रोज़ा इंसान को अंदर से पवित्र कर देता है।
इसके बाद आती है ईद-उल-अज़हा यानी कुर्बानी का त्योहार। यह सिर्फ गोश्त बांटने या रिश्तेदारों से मिलने-जुलने का त्योहार नहीं है। यह अल्लाह के सामने खुद को पूरी तरह समर्पित कर देने की याद दिलाता है। पैगंबर इब्राहिम अल्लाह के हुक्म पर अपनी सबसे प्यारी चीज की कुर्बानी देने के लिए तैयार हो गए थे। बदले में अल्लाह ने उनकी इस कुर्बानी को आने वाली तमाम पीढ़ियों के लिए विश्वास का एक प्रतीक बना दिया।
हज हमें खुद को अल्लाह के हवाले करना सिखाता है और ईद हमें त्याग करना सिखाती है। ये दोनों मिलकर याद दिलाते हैं कि धर्म सिर्फ दिल में विश्वास रखने का नाम नहीं है बल्कि अमल में आज्ञाकारी होना भी है।इस्लाम की सबसे खूबसूरत बात यह है कि इबादत और बरकत के मौके सिर्फ उन लोगों तक सीमित नहीं हैं जो मक्का की यात्रा पर जाते हैं।
दुनिया भर के ज्यादातर मुसलमान हज पर नहीं होते, फिर भी अल्लाह उन सभी को इन पवित्र दिनों की बरकतों में शामिल होने का पूरा मौका देता है।घर पर रहकर भी कोई भी इंसान इन दिनों को बेहद फलदायी बना सकता है और अल्लाह के करीब पहुँच सकता है।

1. अपनी इबादत को बढ़ाएं
इन दस दिनों को आम दिनों की तरह नहीं गुजारना चाहिए। हमें अपनी नमाज़ें बढ़ानी चाहिए, कुरान की तिलावत करनी चाहिए, सच्चे दिल से दुआ मांगनी चाहिए और अल्लाह से अपने गुनाहों की माफी मांगनी चाहिए। इन बरकत वाले दिनों में छोटे-छोटे नेक काम भी बहुत मायने रखते हैं।
2. रोज़ा रखें, खासकर अराफात के दिन
शुरुआती नौ दिनों में रोज़ा रखना बहुत सवाब का काम है, खासकर अराफात के दिन का रोज़ा। पैगंबर साहब ने सिखाया है कि इस दिन रोज़ा रखने से इंसान के पिछले एक साल और आने वाले एक साल के गुनाह माफ हो जाते हैं।
3. अल्लाह का जिक्र करें
पैगंबर साहब के साथी इन दिनों में अपना पूरा वक्त अल्लाह को याद करने में बिताते थे। सुभानअल्लाह, अल्हम्दुलिल्लाह, अल्लाहु अकबर और ला इलाहा इल्लल्लाह जैसे पाक शब्दों को बार-बार दोहराने से दिल को एक नई जिंदगी मिलती है।
4. खुलकर दान-पुण्य करें
ये दिन दयालुता और दरियादिली दिखाने के दिन हैं। गरीबों की मदद करना, भूखों को खाना खिलाना, तंगी से जूझ रहे लोगों का सहारा बनना और अपनी खुशियों में दूसरों को शामिल करना इस्लाम में बहुत पसंद किया गया है। ईद-उल-अज़हा हमें सिखाती है कि हमारी खुशियों में दूसरों का ख्याल भी शामिल होना चाहिए।
5. समझदारी के साथ कुर्बानी दें
कुर्बानी सिर्फ एक जानवर को कुर्बान करने की रस्म नहीं है। यह अल्लाह के सामने पूरी तरह झुक जाने और अपनी निजी प्राथमिकताओं से ऊपर अपने विश्वास को रखने का प्रतीक है। कुरान हमें याद दिलाता है कि न तो कुर्बानी का गोश्त और न ही उसका खून अल्लाह तक पहुँचता है। अल्लाह तक सिर्फ आपके दिल का तक़वा यानी आपकी नीयत की सच्चाई और परहेज़गारी पहुँचती है। एक सच्ची कुर्बानी सबसे पहले उस इंसान को बदलती है जो कुर्बानी दे रहा होता है।

6. अपने खुद के त्याग पर विचार करें
ज़ुल-हिज्जा का महीना हर मुसलमान को खुद से कुछ कड़वे सवाल पूछने का मौका देता है। जैसे कि मैं अपने ईमान के लिए क्या छोड़ रहा हूँ? मुझे अपनी किन बुरी आदतों को पीछे छोड़ना होगा? कौन सी ऐसी चीजें हैं जो मुझे ईश्वर से दूर कर रही हैं? मैं कैसा इंसान बनना चाहता हूँ? कोई भी बड़ा त्याग बाहर दिखने से पहले इंसान के अंदर जनम लेता है।
आज की जिंदगी बहुत तेज भाग रही है। लोग मोबाइल की स्क्रीन, दफ्तर के काम, मनोरंजन और अंतहीन व्यस्तताओं में खो चुके हैं। ज़ुल-हिज्जा का महीना इस भागदौड़ को रोकता है और इंसान को किसी बहुत बड़ी और जरूरी चीज की याद दिलाता है।
सफेद कपड़ों में लिपटे तमाम हाजी जब एक साथ अल्लाह के दरबार में खड़े होते हैं, तो वे इस बात का सबूत होते हैं कि दुनिया का रुतबा, दौलत, देश और रूप-रंग सब एक दिन खत्म हो जाएगा। अगर कुछ बचेगा, तो वह सिर्फ आपके दिल की सच्चाई होगी।
ईद की कुर्बानी हमें सिखाती है कि कभी-कभी जिंदगी में आगे बढ़ने के लिए अपनी प्यारी चीजों को छोड़ना पड़ता है। अराफात का रोज़ा भरोसा दिलाता है कि अल्लाह की रहमत हमेशा हमारे पास है। ज़ुल-हिज्जा के ये पहले दस दिन हमें याद दिलाते हैं कि जिंदगी के कुछ पल ऊपरवाले का खास तोहफा होते हैं। ये वो पवित्र झरोखे हैं जहाँ से इंसान का दिल वापस अपने बनाने वाले की तरफ मुड़ सकता है।