मंसूरुद्दीन फरीदी/नई दिल्ली
इस्लाम के सबसे मुकद्दस मुकाम खाना-ए-काबा की एक झलक पाने के लिए सदियों से दुनिया भर के मुसलमान तड़पते रहे हैं। एक दौर था जब मक्का पहुँचकर अपनी आँखों से काबा को देखना ही दीदार का इकलौता जरिया था। लोग बरसों तक दुआएं करते थे और जिंदगी भर की पूंजी जमा करने के बाद जब वहाँ पहुँचते थे, तब जाकर उनकी रूह को शुकून मिलता था। लेकिन वक्त बदला और इंसान ने कैमरे का आविष्कार किया।
कैमरे की इस जादुई तकनीक ने दुनिया को देखने का नजरिया पूरी तरह बदल दिया। मक्का और हरम शरीफ की खूबसूरत तस्वीरें धीरे-धीरे उन लोगों के घरों की दीवारों तक पहुँचने लगीं जो वहाँ नहीं जा सकते थे। आज के इस डिजिटल दौर में स्थिति बिल्कुल अलग हो चुकी है।
अब सोशल मीडिया पर हरम शरीफ की लाखों तस्वीरें और वीडियो मौजूद हैं। लोग वहाँ जाकर अपनी सेल्फी लेते हैं और पूरी दुनिया के साथ तुरंत साझा कर देते हैं। विज्ञान ने इतनी तरक्की कर ली है कि अब अंतरिक्ष से भी काबा की तस्वीरें ली जा रही हैं।
अंतरिक्ष यात्रियों ने कई बार ऐसी तस्वीरें शेयर की हैं जिनमें रात के अंधेरे में हमारी धरती पर हरम शरीफ सबसे चमकदार रोशनी के केंद्र की तरह दिखाई देता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि तकनीक के इस सैलाब से बहुत पहले काबा की सबसे पहली तस्वीर कब और किसने ली थी? यह कहानी उसी पहली और ऐतिहासिक तस्वीर की है।

कौन थे पहली तस्वीर खींचने वाले मुहम्मद सादिक बे
काबा की सबसे पहली और पुरानी तस्वीर लेने का श्रेय मिस्र के एक सैन्य इंजीनियर मुहम्मद सादिक बे को जाता है। अल-अरबिया की एक ऐतिहासिक रिपोर्ट के मुताबिक उन्होंने यह कमाल का कारनामा साल 1881में किया था। मुहम्मद सादिक बे उस समय के ओटोमन साम्राज्य के अधीन मिस्र की सेना में एक ऊंचे पद पर तैनात थे। वे न केवल एक बेहतरीन फौजी अफसर थे बल्कि विज्ञान, इतिहास, कला और फोटोग्राफी में भी उनकी गहरी दिलचस्पी थी।
उनकी ड्यूटी मिस्र से मक्का जाने वाले हज यात्रियों के काफिले के साथ लगती थी। वे इस पूरे कारवां के खजांची यानी कोषाध्यक्ष के रूप में यात्रा करते थे। इस लंबी और पवित्र यात्रा के दौरान उनके जिम्मे सिर्फ पैसों का हिसाब-किताब रखना ही नहीं था बल्कि वे अपनी खोजी नजरों से पवित्र स्थलों की हर छोटी-बड़ी जानकारी भी जुटाते थे।
उनके पास उस दौर के सबसे आधुनिक कैमरे और फोटोग्राफी के उपकरण हुआ करते थे। जब वे मदीना से मक्का के लिए अपने कारवां के साथ रवाना हुए, तो उनके जेहन में एक बहुत बड़ा और नेक मकसद था। वे इस ऐतिहासिक सफर और इस्लाम के सबसे पवित्र स्थलों को तस्वीरों के जरिए हमेशा के लिए महफूज कर देना चाहते थे ताकि आने वाली नस्लें इसे देख सकें।

रेगिस्तान की तपिश में भारी भरकम कैमरों की चुनौती
आज के दौर में मोबाइल निकालकर एक बटन दबाते ही शानदार फोटो खिंच जाती है। लेकिन आज से लगभग डेढ़ सौ साल पहले फोटोग्राफी करना कोई आसान खेल नहीं था। उस जमाने में तस्वीरें खींचने के लिए 'वेट प्लेट कोलोइडियन' नाम की एक बेहद जटिल तकनीक का इस्तेमाल किया जाता था। यह कैमरा आज के कैमरों की तरह छोटा या हल्का नहीं होता था। यह भारी-भरकम लकड़ी के बक्से जैसा होता था जिसके साथ कांच की भारी प्लेटें और तमाम तरह के रसायन लेकर चलना पड़ता था।
सोचिए उस दौर में जब यातायात के आधुनिक साधन नहीं थे और तपते हुए रेगिस्तान से होकर गुजरना पड़ता था, तब इतने संवेदनशील सामान को संभालना कितनी बड़ी चुनौती रहा होगा। रेगिस्तान की झुलसाने वाली गर्मी, धूल भरी आंधियां और रास्ते की तमाम मुश्किलों के बाद भी मुहम्मद सादिक बे का हौसला नहीं डगमगाया। उन्होंने अपनी जिद और लगन के दम पर उस बेहद मुश्किल तकनीक को संभाला और मक्का की सरजमीं पर कदम रखा।

वह ऐतिहासिक पल जब इतिहास कैमरे में कैद हुआ
साल 1881के उसी सफर के दौरान मुहम्मद सादिक बे ने आखिरकार वह ऐतिहासिक फोटो खींची जिसकी चर्चा आज भी होती है। उन्होंने अपने कैमरे के सामने काबा की जो तस्वीर ली, उसमें काबा का काला गिलाफ यानी आवरण बिल्कुल साफ नजर आ रहा था। उस गिलाफ पर कुरान की पवित्र आयतें सुनहरे अक्षरों में लिखी हुई थीं। ब्लैक एंड व्हाइट होने के बावजूद उस तस्वीर में एक गजब का रूहानी नूर और शांति दिखाई देती थी।
यह सिर्फ एक फोटो नहीं थी बल्कि इंसानी इतिहास और फोटोग्राफी की दुनिया का एक बहुत बड़ा मील का पत्थर थी। यह सऊदी अरब की सरजमीं पर ली गई सबसे शुरुआती तस्वीरों में से एक मानी जाती है। जब यह तस्वीर दुनिया के सामने आई, तो लोगों की आँखों में खुशी के आँसू आ गए। जो लोग कभी मक्का जाने का सोच भी नहीं सकते थे, उन्होंने पहली बार अपने मुकद्दस काबा को साक्षात अपनी आँखों के सामने देखा।

दुनिया भर में मिली सादिक बे के काम को पहचान
मुहम्मद सादिक बे का जन्म और उनका इंतकाल मिस्र की राजधानी काहिरा में हुआ था। उनके द्वारा ली गई तस्वीरें इस्लामी इतिहास और कला के क्षेत्र में आज भी एक अमूल्य खजाना मानी जाती हैं। जब कोई आज उस 1881की तस्वीर को देखता है तो ऐसा लगता है मानो वक्त वहीं ठहर गया हो। ऐसा लगता है कि हम आज से करीब डेढ़ सौ साल पुराने मक्का के उस शांत और सादगी भरे माहौल को अपनी आँखों से देख रहे हैं।
सादिक बे के इस बेमिसाल काम की तारीफ सिर्फ मुस्लिम देशों में ही नहीं हुई बल्कि पूरी दुनिया ने उनके इस हुनर का लोहा माना। साल 1881में ही इटली के वेनिस शहर में एक बहुत बड़ी भौगोलिक प्रदर्शनी का आयोजन हुआ था। इस अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनी में मुहम्मद सादिक बे को उनके इस ऐतिहासिक काम और शानदार फोटोग्राफी के लिए गोल्ड मेडल यानी स्वर्ण पदक से सम्मानित किया गया। यह सम्मान इस बात का सबूत था कि उनके इस काम की अहमियत पूरी दुनिया के लिए कितनी बड़ी थी।
किताबों के जरिए इतिहास को किया हमेशा के लिए अमर
मुहम्मद सादिक बे सिर्फ तस्वीरें खींचकर ही शांत नहीं बैठे। उन्होंने अपनी इस ऐतिहासिक हज यात्रा के अनुभवों और तमाम जानकारियों को आने वाली पीढ़ियों के लिए दो किताबों में समेट दिया। उनकी पहली किताब का नाम था "अल-मशअल अल-महमल" जो साल 1881में छपकर सामने आई थी। इस किताब में उन्होंने हज के पूरे कारवां, रास्ते के हालात और उस पवित्र सफर के अनुभवों को बहुत ही सलीके से दर्ज किया था।
इसके बाद साल 1896में उनकी दूसरी किताब प्रकाशित हुई जिसका नाम था "दलील अल-हज"। यह किताब एक तरह से हज पर जाने वाले यात्रियों के लिए एक गाइड बुक जैसी थी। इसमें हज के रास्तों, ठहरने की जगहों और वहाँ की व्यवस्थाओं के बारे में बहुत विस्तार से जानकारी दी गई थी। इन किताबों और तस्वीरों के जरिए उन्होंने एक ऐसा रिकॉर्ड तैयार कर दिया जो आज के इतिहासकारों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है।
आज भले ही तकनीक आसमान छू रही है। हम हर रोज सोशल मीडिया पर काबा की नई और चमचमाती हुई तस्वीरें देखते हैं। लेकिन इतिहास के पन्नों में जो मुकाम मुहम्मद सादिक बे की उस पहली ब्लैक एंड व्हाइट तस्वीर का है, वह हमेशा सबसे अलग और अनमोल रहेगा। वह तस्वीर हमें याद दिलाती है कि जब सहूलियतें नहीं थीं, तब भी एक इंसान के पक्के इरादे ने दुनिया को वह तोहफा दिया जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता।