उर्दू इतिहास-लेखन के गुमनाम पुरोधा फसीहुद्दीन बल्खी और बिहार की अनकही दास्तान

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 21-05-2026
Fasihuddin Balkhi: The Unsung Pioneer of Urdu Historiography and the Untold Story of Bihar
Fasihuddin Balkhi: The Unsung Pioneer of Urdu Historiography and the Untold Story of Bihar

 

-राजीव कुमार सिंह

किसी भी राष्ट्र या प्रांत का इतिहास केवल घटनाओं का संकलन नहीं होता, बल्कि वह उन मनीषियों की साधना का प्रतिफल होता है जिन्होंने धूल-धूसरित पन्नों को अपनी स्याही से अमर कर दिया. बिहार के गौरवशाली इतिहास को अपनी लेखनी से समृद्ध करने वाले ऐसे ही एक अग्रिम इतिहासकार, प्रखर शोधकर्ता और स्वतंत्रता सेनानी थे- फसीहुद्दीन बल्खी.

ब्रिटिश काल और स्वतंत्रता-पूर्व भारत में उर्दू भाषा के माध्यम से इतिहास-लेखन में अपार योगदान देने के बावजूद, फसीहुद्दीन बल्खी (10फरवरी 1885 - 14मार्च 1962) आज अकादमिक जगत और जनमानस में काफी हद तक अज्ञात और उपेक्षित ही रहे हैं.

उनके जीवन, उनके अभूतपूर्व कार्यों और बिहार की ऐतिहासिक विरासत को सहेजने में मौजूदा साहित्य में लंबे समय से अनछुआ छोड़ दिया गया है.

जन्म, कुलीन पृष्ठभूमि और वैश्विक यात्राओं का कालखंड

फसीहुद्दीन बल्खी का जन्म उसी वर्ष हुआ था, जिस वर्ष भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना हुई थी, यानी 10फरवरी 1885को. उनका जन्मस्थान पटना शहर का ऐतिहासिक बख्शी मोहल्ला था. वे मूल रूप से फतुहा (पटना) स्थित अत्यंत प्रतिष्ठित आध्यात्मिक केंद्र ‘खानकाह बल्खिया फिरदौसिया’ से संबंध रखते थे.

प्रारंभिक शिक्षा एवं उच्च अध्ययन

घर पर ही बुनियादी तालीम हासिल करने के पश्चात, वे उच्च शिक्षा के लिए तत्कालीन सांस्कृतिक और राजनैतिक केंद्र कलकत्ता (अब कोलकाता) चले गए.अध्यापन कार्य: शिक्षा पूर्ण करने के बाद उन्होंने अध्यापन को अपनी आजीविका बनाया. उन्होंने प्रारंभ में पुणे सैन्य विद्यालय (पुणे मिलिट्री स्कूल) में और बाद में कलकत्ता के ऐतिहासिक फोर्ट विलियम में अध्यापन का कार्य किया.

प्रशासनिक एवं सैन्य सेवा: ज्ञान की पिपासा उन्हें यहीं तक सीमित नहीं रख सकी. उन्होंने कानून की परीक्षा उत्तीर्ण की और बिहार सरकार में प्रशासनिक सेवा में नियुक्त हुए. इसके बाद,  1914में उन्होंने सैन्य सेवा का विकल्प चुना.

इस सैन्य सेवा ने उनके दृष्टिकोण को वैश्विक विस्तार दिया, जिसके अंतर्गत उन्हें फिलिस्तीन, मिस्र, इराक और लेबनान जैसे विश्व के विभिन्न हिस्सों की यात्रा करने और वहां की संस्कृतियों को निकट से देखने का दुर्लभ अवसर मिला.

स्वतंत्रता संग्राम: जब ठुकरा दिया डिप्टी का पद

भारत में जब स्वतंत्रता आंदोलन की लहरें तीव्र हो रही थीं और राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के अनुयायियों की संख्या बढ़ रही थी, तब बल्खी भी स्वयं को इस राष्ट्र-यज्ञ से दूर नहीं रख सके. वर्ष 1921में वे सक्रिय रूप से असहयोग आंदोलन का हिस्सा बने.

राष्ट्र-भक्ति के प्रति उनकी प्रतिबद्धता इस बात से प्रमाणित होती है कि उन्होंने जौनपुर में ‘डिप्टी’ के प्रतिष्ठित पद को ठुकरा दिया. इस राजनैतिक निर्णय के कारण उन्हें अपने व्यक्तिगत जीवन में घोर आर्थिक और सामाजिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा. इसके बाद, वर्ष 1926-27के मध्य उन्होंने सराय केला राज्य में राजस्व अधिकारी और मजिस्ट्रेट के रूप में अपनी सेवाएं दीं.

जीवन के अंतिम वर्ष और पांडुलिपि विभाग में नई जान: सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने अपना पैतृक घर त्याग दिया और वर्ष 1962तक पटना शहर के गुजरी बाजार स्थित अपने नए आवास में रहे (जो वर्तमान मोहम्मदियन एंग्लो अरेबिक स्कूल के ठीक पीछे स्थित है).

अपने जीवन के अंतिम दो वर्षों में उन्होंने पटना विश्वविद्यालय के पांडुलिपि विभाग में काम किया. उनकी असाधारण कर्तव्यनिष्ठा और संगठनात्मक क्षमता ने उस सुप्त विभाग में एक नई जान फूंक दी थी.

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इतिहास लेखन और साहित्यिक प्रतिभा

विभिन्न विद्वानों द्वारा लिखित रचनाओं का यदि सरसरी तौर पर अवलोकन किया जाए, तो यह कड़वी सच्चाई सामने आती है कि बिहार का इतिहास लेखन—विशेषकर उर्दू भाषा में—अकादमिक विमर्श के केंद्र में उस तरह नहीं आ सका, जिसका वह हकदार था. यद्यपि बिहार की धरती पर लिखने वाले लेखकों में तकी रहीम (1921-99) और शाद अजीमाबादी (1901-1978) के नाम उल्लेखनीय हैं, परंतु फसीहुद्दीन बल्खी का स्थान अद्वितीय है.

बिहार के प्रख्यात इतिहासकार सैयद हसन असकरी (1901-1199) ने भी बल्खी की विद्वत्तापूर्ण और साहित्यिक प्रतिभा को मुक्तकंठ से स्वीकार किया था. दुर्भाग्यवश, बल्खी की अधिकांश रचनाएँ अपने लक्षित पाठकों तक समय पर नहीं पहुँच सकीं और उनकी कई महत्वपूर्ण कृतियाँ आज भी अप्रकाशित अवस्था में धूल फाँक रही हैं.

फसीहुद्दीन बल्खी की कालजयी कृतियाँ और उनका ऐतिहासिक महत्व

बल्खी केवल इतिहासकार नहीं थे, बल्कि बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे. इसका अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि मात्र 25वर्ष की आयु में, वर्ष 1910में उन्होंने ज्योतिष शास्त्र पर उर्दू में एक अत्यंत दुर्लभ ग्रंथ लिखा, जिसका शीर्षक था ‘इल्म-ए-नजूम’.

इसके अतिरिक्त, शाद अजीमाबादी की काव्य-चेतना पर लिखित उनकी पुस्तिका ‘इंशाद-ए-शाद’ (क़ौमी प्रेस, बांकीपुर, पटना, 1939) उनकी सूक्ष्म और प्रखर आलोचनात्मक दृष्टि को प्रमाणित करती है.

उनके प्रमुख ऐतिहासिक कार्यों का विवरण निम्नलिखित है:

1. तारीख-ए-मगध (1944): बिहार के इतिहास का प्रामाणिक दस्तावेज़

यह वह पहली कृति थी जिसने बल्खी को एक स्थापित इतिहासकार के रूप में ख्याति दिलाई. ‘तारीख-ए-मगध’ का प्रकाशन 1944में ‘अंजुमन-ए-तरक्की-उर्दू-हिंद’ (दिल्ली) द्वारा किया गया था, जो उस समय ‘बाब-ए-उर्दू’ मौलवी अब्दुल हक के संरक्षण में कार्य कर रही थी.

विस्तार: यह पुस्तक 20अध्यायों में विभक्त है और प्राचीन काल (642ईसा पूर्व) से लेकर द्वितीय विश्व युद्ध (1943) तक के बिहार के प्रामाणिक इतिहास को समेटती है.

महत्व: पटना के प्रसिद्ध इतिहासकार इम्तियाज अहमद इसके महत्व पर टिप्पणी करते हुए कहते हैं, “यह पुस्तक अत्यंत प्रामाणिक और व्यावसायिक तरीके से लिखी गई है, जिसमें मूल फारसी ग्रंथों और स्रोतों से उचित संदर्भ दिए गए हैं.”*

2. वहाबी आंदोलन (1983): इतिहास की नई व्याख्या

बल्खी की मृत्यु के पश्चात 1983में प्रकाशित यह लघु पुस्तक भारत में वहाबी आंदोलन के इतिहास पर सबसे अधिक उद्धृत की जाने वाली कृतियों में से एक है. कबासुद्दीन अहमद की मौलिक कृति ‘द वहाबी मूवमेंट इन इंडिया’ के समांतर यह पुस्तक प्राथमिक स्रोतों (जैसे सैयद अहमद शाह के पत्र, कलकत्ता रिव्यू, विलियम विल्सन हंटर की पुस्तक ‘इंडियन मुसलमान्स’ और ‘तज़किरा-ए-सादिका’) पर आधारित है.

इस आंदोलन की विरासत पर प्रकाश डालते हुए बल्खी ने एक अत्यंत क्रांतिकारी विचार प्रस्तुत किया था:

“यह अत्यंत रोचक और विचारणीय है कि तीन प्रमुख राजनैतिक हथियार—असहयोग, सत्याग्रह और समानांतर सरकार की स्थापना—जिन्हें बाद में कांग्रेस के शीर्ष नेताओं ने ब्रिटिश नौकरशाही के विरुद्ध अपने संघर्ष में अपनाया, वे मूल रूप से 1854में वहाबियों द्वारा ही प्रस्तावित और प्रचारित किए गए थे.”

3. तज़किरा निस्वान-ए-हिंद (1956): स्त्री-इतिहास का गौरवगान

महिला इतिहास-लेखन के क्षेत्र में यह पुस्तक एक मील का पत्थर है. इसमें बल्खी ने 13वीं शताब्दी की रजिया सुल्तान से लेकर आधुनिक काल तक की भारत की उल्लेखनीय महिलाओं के संक्षिप्त जीवन परिचय को सहेजा है.

इसमें उन्होंने लखनऊ की असकरी बेगम ‘हिजाब’, बंगाल की चंदर मुखी बोस, कश्मीर की महान संत-कवयित्री लाल डेड, राजस्थान और मुंबई की रजिया सज्जाद जहीर और बिहार की बीबी ‘ताहिरा’ जैसी विदुषियों को एक मंच पर लाकर खड़ा किया है.

4. पटना के काठ (शिलालेखों का अध्ययन - 1993): उपेक्षित धरोहरों की आवाज़

वर्ष 1993में पटना के प्रसिद्ध खुदा बख्श ओरिएंटल पब्लिक लाइब्रेरी द्वारा उर्दू में प्रकाशित यह लघु पुस्तिका बल्खी के सूक्ष्म शोध का जीवंत उदाहरण है. यह पुस्तक पटना में स्थित प्राचीन कब्रों, मस्जिदों और ऐतिहासिक मकबरों पर उत्कीर्ण शिलालेखों का एक अनूठा और अत्यंत बारीक पुरातात्विक अध्ययन प्रस्तुत करती है.

विडंबना यह रही कि बल्खी की रचनाओं को व्यापक पहचान उनकी मृत्यु के बाद ही मिल सकी. प्रसिद्ध उर्दू प्रकाशक नदीम भट्टी ने वर्ष 1962में उनकी एक महत्वपूर्ण रचना ‘तज़किरा-ए-हिंदू शोरा-ए-बिहार’ (बिहार के हिंदू उर्दू कवियों का इतिहास) प्रकाशित की. इसी संकलन में बल्खी की कुछ अन्य अप्रकाशित रचनाएँ जैसे दस्तूर-ए-सुखन और बिहार के ऐतिहासिक स्थलों पर उनके लेखों का संग्रह ‘आसार-ए-बल्खिया’ भी शामिल किया गया.

ऑल इंडिया रेडियो पटना के लिए अपने एक लेख में कय्यूम खज़ार ने बल्खी के व्यक्तित्व को सारांशित करते हुए कहा था, “फसीहुद्दीन बल्खी केवल एक महान इतिहासकार और निष्पक्ष शोधकर्ता ही नहीं थे, बल्कि वे एक अत्यंत संवेदनशील कवि भी थे.”

पुनर्मूल्यांकन की प्रतीक्षा में एक मनीषी

फसीहुद्दीन बल्खी का संपूर्ण जीवन और उनका विपुल साहित्य इस बात का गवाह है कि उन्होंने इतिहास के उन झरोखों को साफ करने का काम किया जो गर्द से ढके हुए थे.उर्दू भाषा में बिहार के इतिहास-लेखन को जो ऊंचाई उन्होंने दी, उसे आज के अकादमिक जगत में फिर से खोजने, उसकी समीक्षा करने और उसका पुनर्मूल्यांकन करने की महती आवश्यकता है. जब तक हम बल्खी जैसे विद्वानों के योगदान को रेखांकित नहीं करेंगे, तब तक बिहार के इतिहास का हमारा बोध हमेशा अधूरा और एकांगी ही रहेगा.