मंसूरुद्दीन फरीदी / नई दिल्ली
हज यात्रा सदियों से प्रेम, अटूट आस्था और आत्मत्याग की एक महान गाथा रही है। प्राचीन काल में जब संचार और परिवहन के साधन नहीं थे, तब तीर्थयात्री मक्का पहुंचने के लिए महीनों और कभी-कभी तो वर्षों तक यात्रा करते थे। कुछ लोग झुलसा देने वाले रेगिस्तान में ऊंटों पर सवार होकर निकलते थे, तो कई ऐसे भी थे जो अल्लाह के घर के दर्शन का आशीर्वाद पाने के लिए हजारों मील का सफर पैदल ही तय कर लेते थे।
इस लंबी राह में उन्हें भूख, प्यास, खतरनाक बीमारियां, डाकुओं के जानलेवा हमले और मौसम की मार जैसी अनगिनत कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था। मगर अल्लाह के घर के प्रति उनका सच्चा प्रेम इन सभी मुश्किलों पर हमेशा विजय प्राप्त कर लेता था। बाद में जब यह यात्रा पानी के जहाजों से शुरू हुई, तब समुद्र की तूफानी लहरों और हफ्तों के सफर ने तीर्थयात्रियों के धैर्य की कड़ी परीक्षा ली।

आज के आधुनिक युग में हवाई जहाजों ने भले ही इस यात्रा को बेहद आसान और छोटा बना दिया हो, लेकिन हज की पवित्रता और उसकी आध्यात्मिक प्रकृति आज भी वैसी ही बनी हुई है जैसी सदियों पहले थी। जब दुनिया भर से आए तीर्थयात्री 'लबैक अल्लाहुम लबैक' के स्वर में हरम शरीफ की ओर बढ़ते हैं,तो यह केवल एक शारीरिक यात्रा नहीं रह जाती, बल्कि यह आत्मा को शुद्ध करने और अपने रचयिता के करीब आने का एक जरिया बन जाती है।
पुराने समय में सऊदी अरब जाने वाले तीर्थयात्रियों के रास्ते न तो पक्के थे और न ही उन पर दिशा बताने वाले कोई स्पष्ट संकेत लगे होते थे। इन तकनीकी कमियों के कारण यात्रियों को पूरी तरह से आसमान की चाल पर निर्भर रहना पड़ता था।
उमराह और हज की इच्छा रखने वाले लोग रात के समय तारों की स्थिति और उनकी गति को देखकर मक्का तक पहुँचने का मार्ग निर्धारित करते थे। मानव इतिहास में तारों का उपयोग हमेशा से ही यात्रा मार्गदर्शन के एक बड़े साधन के रूप में किया जाता रहा है।
मध्य युग के दौरान मुस्लिम शासकों ने हज यात्रियों की सुरक्षा के लिए बड़े-बड़े कारवां आयोजित करने शुरू किए। ये ऐतिहासिक कारवां काहिरा, दमिश्क और कूफा जैसे महत्वपूर्ण शहरों से निकलते थे। यात्रियों को लुटेरों से बचाने के लिए इन कारवां के साथ हथियारबंद रक्षक भी भेजे जाते थे।
इसके बावजूद यह यात्रा खतरों से खाली नहीं थी। रास्ते के रेगिस्तानी इलाकों में रहने वाली खानाबदोश जनजातियां अक्सर इन काफिलों पर हमला करके मनमाना टैक्स वसूलती थीं। इतिहास के पन्नों में दर्ज है कि साल 1757में एक ऐसे ही बड़े हमले में पूरा हज कारवां तहस-नहस हो गया था और हजारों तीर्थयात्री मारे गए थे।

साल 1876 में एक अंग्रेज पत्रकार चार्ल्स डौटी ने दमिश्क से निकले एक विशाल हज कारवां के साथ सफर किया था। उस कारवां में लगभग 6,000तीर्थयात्री और 10,000से अधिक जानवर शामिल थे। डौटी ने लिखा कि यदि यात्रा के दौरान किसी तीर्थयात्री की मौत हो जाती थी, तो उसे वहीं रेगिस्तान में दफना दिया जाता था और उसके कपड़े तथा कंबल उसकी कब्र पर ही रख दिए जाते थे।
उन्होंने कारवां के प्रस्थान का सजीव वर्णन करते हुए लिखा कि सुबह तंबू हटा दिए गए और ऊंटों को सामान के साथ कतार में खड़ा कर दिया गया। सभी लोग उस तोप की आवाज का इंतजार कर रहे थे जो यात्रा शुरू होने का संकेत देती थी। जैसे ही तोप चली, हजारों सवार बिना किसी अफरातफरी के चुपचाप आगे बढ़ चले।
ब्रिटिश संग्रहालय के दस्तावेजों के अनुसार पहले जमीन के रास्ते आने वाले काफिले मुख्य रूप से तीन बड़े केंद्रों पर इकट्ठा होते थे जिनमें इराक का कूफा, सीरिया का दमिश्क और मिस्र का काहिरा शामिल था। वहीं समुद्री मार्ग से आने वाले लोग जेद्दा बंदरगाह पर उतरते थे।
📍 Makkah | Hajj 1938
— Muslim Landmarks Explored (@MuslimLandmarks) May 15, 2026
What did Hajj look like 88 years ago?
This rare archive footage captures the Hajj of 1938 — a time when pilgrims travelled to Makkah by foot, camel, and car.
See what the Mataf looked like nearly 90 years ago, and the immense dedication of those who… pic.twitter.com/TyAgQ67ZTv
कूफा से मक्का जाने वाला मार्ग सबसे प्राचीन था जिसे अब्बासिद काल में विशेष रूप से विकसित किया गया और इसे 'दर्ब अल-जुबैदा' का नाम दिया गया। इतिहासकार इब्न जुबैर लिखते हैं कि इस मार्ग पर तीर्थयात्रियों के नहाने और आराम करने के लिए विशेष जल स्रोत बनाए गए थे जो यात्रियों के लिए किसी वरदान से कम नहीं थे।
इसी तरह अफ्रीका से आने वाले तीर्थयात्रियों का मुख्य केंद्र काहिरा हुआ करता था। पश्चिम अफ्रीका के महान बौद्धिक केंद्र टिम्बकटू से भी लोग अपनी यात्रा शुरू करते थे और सिनाई रेगिस्तान जैसे बेहद दुर्गम क्षेत्रों को पार करते हुए मक्का पहुंचते थे।
साल 1517में जब मिस्र पर ओटोमन साम्राज्य का नियंत्रण हुआ, तो उन्होंने हज मार्गों की सुरक्षा और पवित्र स्थलों की देखरेख का जिम्मा अपने हाथों में ले लिया। ओटोमन काल में इस्तांबुल से निकलने वाले कारवां का मुख्य पड़ाव दमिश्क ही था। इस शाही काफिले को पूरे मान-सम्मान के साथ विदा किया जाता था और इसे 'सरे' कहा जाता था।
भारत और दक्षिण एशिया के संदर्भ में देखें तो सदियों पहले हिंद महासागर को पार करके हज यात्रा करना सबसे जोखिम भरा सफर माना जाता था। प्राचीन काल में भारत, चीन और इंडोनेशिया के तीर्थयात्री पाल वाली पारंपरिक नावों से यात्रा करते थे।

यह लंबी यात्रा पूरी तरह से मानसूनी हवाओं के भरोसे होती थी जिसमें हफ्तों या महीनों का समय लग जाता था। इस दौरान समुद्री तूफान और डाकुओं का डर हमेशा बना रहता था। यही वजह थी कि जब कोई तीर्थयात्री सुरक्षित घर लौट आता था, तो पूरे इलाके में जश्न मनाया जाता था।
भारत से निकलने वाले अधिकांश हज काफिले मुख्य रूप से गुजरात के सूरत और महाराष्ट्र के बंबई बंदरगाहों से रवाना होते थे। ये जहाज अरब सागर और लाल सागर को पार करते हुए पहले यमन के मुखा शहर पहुंचते थे और वहां से जेद्दा बंदरगाह आते थे। जेद्दा से मक्का तक की अंतिम 40मील की दूरी ऊंटों पर बैठकर या पैदल चलकर दो दिनों में पूरी की जाती थी। उन्नीसवीं सदी में भाप से चलने वाले स्टीमशिप के आने से इस समुद्री यात्रा के समय और लागत में भारी कमी आई।

बीसवीं सदी की शुरुआत में इस सफर में एक और क्रांतिकारी बदलाव आया। साल 1900में ओटोमन सुल्तान अब्दुलहमीद द्वितीय ने दुनिया भर के मुसलमानों से एक विशेष अपील की। उन्होंने दमिश्क को मदीना और मक्का से जोड़ने वाली एक महत्वाकांक्षी रेलवे लाइन के निर्माण की योजना बनाई।
जनता से मिले दान और जर्मन इंजीनियरों की तकनीकी मदद से यह परियोजना साल 1908में मदीना तक पहुंच गई। इस्तांबुल के हायदरपासा स्टेशन से ट्रेन पकड़कर तीर्थयात्री अब सीधे मदीना जा सकते थे। इस रेल सेवा ने रेगिस्तान के 40दिनों के थका देने वाले सफर को महज 5दिनों में समेट दिया। रूस, मध्य एशिया, ईरान और इराक के हजारों तीर्थयात्री इस ट्रेन का लाभ उठाने के लिए दमिश्क पहुंचने लगे।
आज के आधुनिक युग में हज यात्रा का पूरा स्वरूप ही बदल चुका है। अब धूल उड़ाते रेगिस्तान, पहाड़ या समंदर की डरावनी लहरें तीर्थयात्रियों का रास्ता नहीं रोकतीं। लोग हजारों मील की दूरी हवाई जहाज से उड़कर कुछ ही घंटों में तय कर लेते हैं।

मौजूदा समय में हर साल लगभग 15 लाख से अधिक लोग हवाई मार्ग के जरिए हज करने सऊदी अरब पहुंचते हैं। जेद्दाह का किंग अब्दुलअज़ीज़ अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा इस दौरान करीब 5,000 विशेष उड़ानों की मेजबानी करता है। अब ऊंटों की कतारें और महीनों तक चलने वाले पानी के जहाज गुजरे जमाने की बातें बन चुके हैं
। मगर तकनीक के इस बदलाव के बाद भी हज की रूहानी अहमियत कम नहीं हुई है। यह केवल एक सफर नहीं बल्कि जीवन को भीतर से बदल देने वाली एक महान इबादत है। चाहे सदियों पहले तपते रेगिस्तान में चले कारवां हों या आज वातानुकूलित हवाई जहाजों में बैठे आधुनिक यात्री, सबके दिलों में आज भी वही एक गूंज बाकी है जो इंसानों को खुदा से जोड़ती है।