मानव जीवन बनाम पशु प्रेम: समाधान कब निकलेगा ?

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 22-05-2026
Human Life vs. Love for Animals: When Will a Solution Emerge?
Human Life vs. Love for Animals: When Will a Solution Emerge?

 

gडॉ. अन‍िल कुमार न‍िगम

भारत में आवारा कुत्तों का मुद्दा अब केवल पशु-प्रेम और संवेदनशीलता का विषय नहीं रह गया है, बल्कि यह सीधे नागरिकों के जीवन, सुरक्षा और सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़ा गंभीर प्रश्न बन चुका है। हाल ही में सर्वोच्‍च न्‍यायालय की  खतरनाक आवारा कुत्तों को मारने की अनुमति देने संबंधी टिप्पणी और निर्देश ने इस बहस को फिर से राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में ला दिया है। पहली नजर में यह आदेश सामान्य प्रतीत हो सकता है, लेकिन इसके पीछे छिपी वास्तविकता अत्यंत भयावह है। देशभर में प्रतिवर्ष लाखों लोग कुत्तों के काटने का शिकार हो रहे हैं और सैकड़ों लोग रेबीज जैसी जानलेवा बीमारी के कारण अपनी जान गंवा रहे हैं।

भारत में पशुओं के प्रति दया और संवेदना की परंपरा रही है। संविधान के नीति-निर्देशक तत्व भी जीव-जंतुओं के प्रति करुणा रखने की बात करते हैं। लेकिन प्रश्न यह है कि यदि कोई पशु मनुष्य के जीवन और सुरक्षा के लिए खतरा बन जाए तो राज्य की जिम्मेदारी क्या होगी?

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क्या नागरिकों के मौलिक अधिकारों से ऊपर किसी भी प्रकार की भावनात्मक बहस को रखा जा सकता है? सुप्रीम कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में इसी संवैधानिक संतुलन की ओर संकेत किया है कि राज्य सरकारों और स्थानीय निकायों का पहला दायित्व नागरिकों के जीवन और सुरक्षा की रक्षा करना है।

देश में आवारा कुत्तों के हमलों की स्थिति लगातार गंभीर होती जा रही है। केंद्र सरकार द्वारा संसद में प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2023में भारत में कुत्तों के काटने के 30.43लाख मामले दर्ज किए गए और 286लोगों की मौत हुई। वर्ष 2024 में भी लगभग 21.95 लाख कुत्‍ता काटने के मामले सामने आए, जिनमें 5 लाख से अधिक पीड़ित 15वर्ष से कम आयु के बच्चे थे। ये केवल सरकारी आंकड़े हैं, जबकि वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक हो सकती है क्योंकि ग्रामीण क्षेत्रों और छोटे शहरों में अनेक मामले दर्ज ही नहीं हो पाते।

एक शोध अध्ययन के अनुसार भारत में प्रतिवर्ष लगभग 91लाख पशु काटने के मामले सामने आते हैं और अनुमानित 5726लोगों की मौत रेबीज से होती है। यह आंकड़ा इस ओर संकेत करता है कि समस्या केवल आवारा कुत्तों की संख्या तक सीमित नहीं है, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य तंत्र की कमजोरियों से भी जुड़ी हुई है।

दिल्ली, केरल, तेलंगाना और कर्नाटक जैसे राज्यों के आंकड़े स्थिति की गंभीरता को और स्पष्ट करते हैं। दिल्ली में पांच वर्षों के दौरान रेबीज से 37लोगों की मौतें हुईं। केरल सरकार ने उच्च न्यायालय को बताया कि अगस्त 2024से जुलाई 2025के बीच राज्य में 3.63लाख कुत्‍ता काटने के मामले सामने आए, जिनमें लगभग एक-तिहाई मामले आवारा कुत्तों से जुड़े थे। हैदराबाद में वर्ष 2022से 2025के बीच रेबीज से मौतों में चार गुना वृद्धि हो गई।

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इन आंकड़ों के पीछे केवल संख्याएं नहीं, बल्कि भयावह मानवीय त्रासदियां छिपी हैं। कई मामले ऐसे सामने आए हैं जहां छोटे बच्चों को आवारा कुत्तों ने घेरकर हमला किया और उनकी मौत हो गई। उत्तर प्रदेश, केरल, तेलंगाना और दिल्ली में पिछले कुछ वर्षों में ऐसी घटनाओं ने समाज को झकझोर दिया।

समस्या का सबसे दुखद पहलू यह है कि गरीब और सामान्य नागरिक को कुत्ता काटने के बाद सरकारी अस्पतालों में एंटी रेबीज इंजेक्शन लगवाने के लिए कई बार चक्कर काटने पड़ते हैं। कई जिलों में रेबीज इम्यूनोग्लोबुलिन की उपलब्धता नहीं होती। मजबूर होकर लोगों को निजी मेडिकल स्टोर से महंगे इंजेक्शन खरीदने पड़ते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में तो समय पर इलाज न मिलने से मौत का खतरा और बढ़ जाता है।

यह भी गंभीर प्रश्न है कि आखिर सुप्रीम कोर्ट को इस मामले में हस्तक्षेप क्यों करना पड़ा। क्या राज्य सरकारों और नगर निकायों की यह जिम्मेदारी नहीं थी कि वे समय रहते प्रभावी कदम उठाते? नगर निगमों द्वारा नसबंदी और टीकाकरण अभियान अक्सर कागजों तक सीमित रह जाते हैं। अनेक शहरों में वर्षों से कुत्तों की वास्तविक गणना तक नहीं हुई है। परिणामस्वरूप आवारा कुत्तों की संख्या तेजी से बढ़ती जा रही है।

हालांकि इस मुद्दे का समाधान केवल हिंसा या सामूहिक हत्या नहीं हो सकता। पशु-प्रेमियों की चिंताओं को भी पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। जरूरत इस बात की है कि समस्या का वैज्ञानिक, मानवीय और संतुलित समाधान निकाला जाए। बड़े स्तर पर नसबंदी अभियान, एंटी रेबीज टीकाकरण, कचरा प्रबंधन और डॉग शेल्टर जैसी व्यवस्थाओं को मजबूत करना होगा। जिन कुत्तों का व्यवहार अत्यधिक आक्रामक और जानलेवा हो चुका है, उनके संबंध में कानून के तहत उचित कार्रवाई करनी होगी।

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पशु-प्रेमियों को भी यह समझना होगा कि केवल भावनात्मक अपील से समस्या का समाधान संभव नहीं है। यदि किसी गरीब परिवार का बच्चा आवारा कुत्तों के हमले में घायल हो जाता है या उसकी मृत्यु हो जाती है, तो यह केवल एक आंकड़ा नहीं बल्कि पूरे परिवार के लिए आजीवन पीड़ा बन जाता है। इसलिए मानव जीवन और पशु संरक्षण के बीच संतुलन बनाना ही वास्तविक संवेदनशीलता होगी।

आज आवश्यकता इस बात की है कि राज्य सरकारें, नगर निकाय, स्वास्थ्य विभाग और पशु कल्याण संगठन मिलकर एक समन्वित नीति तैयार करें। हर जिले में पर्याप्त एंटी रेबीज वैक्सीन उपलब्ध हो, अस्पतालों में उपचार आसान बनाया जाए, और आवारा कुत्तों की निगरानी के लिए प्रभावी तंत्र विकसित किया जाए। साथ ही नागरिकों में भी जागरूकता बढ़ाई जाए कि कुत्ता काटने की स्थिति में तुरंत चिकित्सा सहायता लेना क्यों जरूरी है।

सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप वास्तव में शासन-प्रशासन की विफलता पर एक गंभीर टिप्पणी है। यदि स्थानीय निकाय और सरकारें समय रहते अपनी जिम्मेदारियां निभातीं तो शायद अदालत को इस विषय में दखल देने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती।

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अब समय आ गया है कि संवेदनशीलता, वैज्ञानिक सोच और संवैधानिक जिम्मेदारी के साथ इस समस्या का स्थायी समाधान खोजा जाए, ताकि नागरिकों का जीवन सुरक्षित रह सके और बार-बार अदालत को हस्तक्षेप न करना पड़े।

(लेखक स्‍वतंत्र टिप्‍पणीकार है।)