इमान सकीना
दुनियाभर में इन दिनों मेंटल हेल्थ और इमोशनल इंटेलिजेंस यानी भावनात्मक बुद्धिमत्ता को लेकर काफी चर्चा हो रही है। कॉर्पोरेट जगत से लेकर आम जिंदगी तक, हर जगह भावनाओं को काबू में रखने और दूसरों को समझने पर जोर दिया जा रहा है। आधुनिक मनोविज्ञान इसे 21वीं सदी की एक बड़ी खोज के रूप में पेश करता है। लेकिन इतिहास के पन्नों को पलटें तो एक अलग ही सच्चाई सामने आती है। आज से लगभग चौदह सौ साल पहले ही पैगंबर मोहम्मद साहब ने अपने जीवन से भावनात्मक बुद्धिमत्ता का सबसे बेहतरीन उदाहरण दुनिया के सामने रख दिया था।
इस्लाम में पैगंबर साहब के जीने के तौर-तरीकों और उनकी परंपराओं को सुन्नाह कहा जाता है। सुन्नाह केवल पूजा-पाठ का तरीका नहीं है। यह असल में जीवन जीने की एक पूरी कला है। इसमें इंसानी जज्बातों को समझने और उन्हें सही दिशा देने के बेहद व्यावहारिक तरीके बताए गए हैं। सुन्नाह का अध्ययन करने से पता चलता है कि एक आदर्श इंसान वही है जो अपने गुस्से, दुख और डर पर काबू रखना जानता हो।
आज के दौर में गुस्सा लोगों की सबसे बड़ी कमजोरी बन चुका है। घरेलू हिंसा से लेकर सड़क पर होने वाली लड़ाइयों तक, हर जगह अनियंत्रित गुस्सा ही तबाही का कारण बनता है। इस्लाम इंसानी जज्बातों को नकारता नहीं है। यह स्वीकार करता है कि गुस्सा आना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। लेकिन सुन्नाह हमें सिखाती है कि इस गुस्से को कैसे नियंत्रित किया जाए।
पवित्र कुरान में भी उन लोगों की तारीफ की गई है जो अपने गुस्से को पी जाते हैं और दूसरों को माफ कर देते हैं। पैगंबर मोहम्मद साहब के जीवन की एक मशहूर घटना इस बात को पूरी तरह साफ करती है। एक बार एक ग्रामीण व्यक्ति ने पैगंबर साहब की चादर को इतनी तेजी से खींचा कि उनकी गर्दन पर निशान पड़ गया।
इसके बाद उसने बहुत ही बदतमीजी से धन की मांग की। कोई आम इंसान होता तो शायद पलटकर हमला कर देता। लेकिन पैगंबर साहब ने ऐसा नहीं किया। वे केवल मुस्कुराए और अपने साथियों को आदेश दिया कि इस व्यक्ति को उसकी जरूरत का सामान दे दिया जाए।
यह घटना सिखाती है कि विपरीत परिस्थितियों में खुद पर नियंत्रण कैसे रखा जाता है। पैगंबर साहब ने कहा था कि असली ताकतवर वह नहीं है जो किसी को कुश्ती में हरा दे। असली ताकतवर तो वह है जो गुस्से के वक्त खुद पर काबू पा ले। आज का एंगर मैनेजमेंट विज्ञान भी इसी बात को दोहराता है।
दुख और अवसाद से निपटने का आध्यात्मिक रास्ताIbn ʿuthaymīn said:
“If a person were to make every supplication he makes accompanied by sending Ṣalawāt upon the Prophet ﷺ, then — as mentioned in the hadith — his worries would be sufficed and his sins would be forgiven.
[…]
Therefore, my brother, increase in sending… pic.twitter.com/QjMhjpPogW— Abu yahya (@qurashite) June 12, 2026
इंसानी जिंदगी में दुख और नुकसान होना तय है। पैगंबर मोहम्मद साहब का जीवन भी भारी दुखों से भरा था। उन्होंने जन्म से पहले ही अपने पिता को खो दिया था। बचपन में मां का साया भी सिर से उठ गया। बाद में उनकी प्यारी पत्नी हजरत खदीजा और उनके कई बच्चों का भी इंतकाल हुआ। उन्होंने अपने कई करीबी दोस्तों को अपनी आंखों के सामने खोया।
इतने सारे दुखों के बाद भी वे कभी निराश नहीं हुए। उन्होंने कभी भी उम्मीद का दामन नहीं छोड़ा। सुन्नाह हमें सिखाती है कि दुख मनाना गलत नहीं है। रोना और दुखी होना इंसान का स्वभाव है। लेकिन इस दुख को कभी भी डिप्रेशन या डिपेयर में नहीं बदलने देना चाहिए। कुरान की एक आयत कहती है कि हर मुश्किल के बाद आसानी जरूर आती है। यही भरोसा इंसान को हर कठिन परिस्थिति से बाहर निकालता है।
आजकल की भागदौड़ भरी जिंदगी में एंग्जायटी यानी चिंता एक महामारी की तरह फैल रही है। भविष्य का डर और अनिश्चितता लोगों को अंदर से खोखला कर रही है। पैगंबर साहब ने अपने जीवन में भारी सामाजिक और मानसिक दबावों का सामना किया। उनके अपनों ने उनका बहिष्कार किया। उन्हें जान से मारने की धमकियां मिलीं। उन्हें युद्ध के मैदानों में उतरना पड़ा।
इन सब के बीच उनका सबसे बड़ा सहारा तवक्कुल था। तवक्कुल का मतलब होता है ईश्वर पर अटूट विश्वास रखना। पैगंबर साहब मुश्किल हालातों को नजरअंदाज नहीं करते थे। वे जमीनी स्तर पर पूरी तैयारी करते थे। लेकिन परिणाम को अल्लाह के भरोसे छोड़ देते थे।
पैगंबर साहब की दुआओं में भी मानसिक शांति की मांग साफ दिखती है। वे अक्सर भगवान से प्रार्थना करते थे कि उन्हें चिंता, उदासी और लाचारी से दूर रखा जाए। यह दिखाता है कि मानसिक समस्याओं को केवल दवा से नहीं बल्कि दुआ और सही सोच से भी ठीक किया जा सकता है।

भावनात्मक बुद्धिमत्ता का एक बहुत बड़ा हिस्सा यह है कि आप दूसरों के साथ कैसा व्यवहार करते हैं। पैगंबर साहब लोगों की बातों को बहुत ध्यान से सुनते थे। वे कभी किसी की बात को बीच में नहीं काटते थे। वे लोगों की छोटी-मोटी गलतियों पर उन्हें सरेआम शर्मिंदा नहीं करते थे। बल्कि अकेले में समझाते थे।
एक बार की बात है कि पैगंबर साहब नमाज पढ़ा रहे थे। अचानक एक बच्चे के रोने की आवाज आई। पैगंबर साहब ने नमाज को छोटा कर दिया ताकि उस बच्चे की मां को परेशानी न हो। यह दूसरों के प्रति संवेदनशीलता का सबसे बड़ा पैमाना है। वे बच्चों से बहुत प्यार करते थे और बुजुर्गों का पूरा सम्मान करते थे। मक्का की फतह के समय उन्होंने अपने उन कट्टर दुश्मनों को भी माफ कर दिया जिन्होंने सालों तक उन पर जुल्म ढाए थे। यह दिखाता है कि बदला लेने से कहीं ज्यादा ताकत माफ करने में होती है।
आधुनिक समाज के लिए सुन्नाह एक वरदान- The physical act of Sujud (prostration) is more than just spiritual submission; it is a profound physical reset for the nervous system.
- By placing the forehead below the heart, gravity helps flood the prefrontal cortex—the center for decision-making and anxiety control—with… pic.twitter.com/tomMk1o9E4— TheTraderist (@TTraderist) June 8, 2026
आज का समाज अकेलेपन और बिखरे हुए रिश्तों से जूझ रहा है। लोग सोशल मीडिया पर तो जुड़े हैं लेकिन दिल से दूर हैं। ऐसे में सुन्नाह का मॉडल हमें वापस इंसानियत की ओर लाता है। यह हमें सिखाता है कि जज्बात कोई कमजोरी नहीं हैं। ये अल्लाह की दी हुई अमानत हैं। हमें इनका सही इस्तेमाल करना आना चाहिए।
भावनात्मक संतुलन हासिल करने के लिए दिल का साफ होना जरूरी है। जब तक दिल में दूसरों के लिए नफरत रहेगी, तब तक मानसिक शांति नहीं मिल सकती। सुन्नाह हमें एक ऐसा रास्ता दिखाती है जहां धर्म और विज्ञान दोनों एक जगह आकर मिल जाते हैं। पैगंबर मोहम्मद साहब का जीवन हर दौर के इंसानों के लिए एक मार्गदर्शक की तरह है। उनके बताए रास्तों पर चलकर ही आज का इंसान मानसिक तनाव से मुक्ति पा सकता है।