ओनिका माहेश्वरी/ नई दिल्ली
बिहार के पूर्णिया जिले का एक छोटा सा गाँव 'झील टोला' आज पूरे देश में फुटबॉल के प्रति अपनी अटूट दीवानगी के लिए एक बड़ी मिसाल बन चुका है। मुख्य रूप से आदिवासी समुदाय की आबादी वाले इस गाँव को अब लोग 'फुटबॉलर गाँव' के नाम से जानने लगे हैं, क्योंकि यहाँ फुटबॉल सिर्फ एक खेल नहीं बल्कि एक जीवनशैली बन चुका है। झील टोला में रहने वाले दो से तीन हजार लोगों की आबादी के हर घर में आपको कोई न कोई फुटबॉलर जरूर मिल जाएगा।
यहाँ फुटबॉल का क्रेज इस कदर हावी है कि यदि किसी परिवार में चार भाई हैं, तो उनमें से तीन भाई मैदान पर रोज़ाना जमकर पसीना बहाते और फुटबॉल खेलते नजर आते हैं, जबकि चौथा भाई, जो मैदान पर नहीं उतरता, वह फुटबॉल मैचों को देखने और उनका विश्लेषण करने में सबसे आगे रहता है। इस गाँव के बच्चे, नौजवान और यहाँ तक कि बुजुर्ग भी विश्व फुटबॉल के दो महानतम खिलाड़ियों, क्रिस्टियानो रोनाल्डो और लियोनेल मेस्सी के इतने बड़े प्रशंसक हैं कि वे उन्हें अपना आदर्श मानकर उनकी पूजा तक करते हैं। इस गाँव के युवाओं की आँखों में केवल एक ही सपना है मेस्सी और रोनाल्डो की राह पर चलना और उनकी तरह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नाम कमाना।
गाँव के स्थानीय फुटबॉल मैदान का एक लंबा इतिहास रहा है और स्थानीय ग्रामीण जैसे बिरेंद्र कुमार उरांव (आदिवासी समुदाय के प्रमंडलीय अध्यक्ष), शुभम आनंद और मायाराम उरांव के अनुसार, इसी मैदान से खेलकर अब तक लगभग तीन-चार खिलाड़ी नेशनल स्तर पर अपनी जगह बना चुके हैं, जबकि दर्जनों खिलाड़ी राज्य स्तरीय प्रतियोगिताओं में खेल रहे हैं। युवाओं और युवतियों में इस खेल के प्रति उत्साह और उनका मनोबल बनाए रखने के लिए, यहाँ हर साल 1 अगस्त से 15 अगस्त के बीच एक भव्य वार्षिक फुटबॉल प्रतियोगिता का आयोजन किया जाता है, जहाँ गाँव का हर नागरिक अपनी भागीदारी सुनिश्चित करता है। झील टोला के लोगों की दीवानगी का आलम यह है कि यदि उनके गाँव में कोई मैच न भी हो, और पूर्णिया शहर के किसी भी सुदूर कोने में कोई फुटबॉल मैच चल रहा हो, तो गाँव के लोग अपनी खेती-किसानी और काम छोड़कर मैच देखने ज़रूर पहुँच जाते हैं।
भारत में अंतरराष्ट्रीय फुटबॉलरों को भगवान का दर्जा देने और उनके प्रति ऐसी अदम्य आस्था दिखाने की कहानी केवल बिहार के इस गाँव तक ही सीमित नहीं है, बल्कि देश के कई अन्य राज्यों में भी यह जुनून सर चढ़कर बोलता है। यदि हम दक्षिण भारत के केरल राज्य के कन्नूर जिले में स्थित कतरूर गाँव की बात करें, तो वहाँ की तस्वीरें दुनिया भर में सुर्खियाँ बटोरती हैं। कतरूर गाँव में अर्जेंटीना के दिवंगत जादूगर डिएगो माराडोना और आधुनिक युग के महानायक लियोनेल मेस्सी को साक्षात 'फुटबॉल का देवता' माना जाता है।
फीफा वर्ल्ड कप के दौरान इस गाँव की सड़कें और चौराहे पूरी तरह अर्जेंटीना और पुर्तगाल के रंगों में रंग जाते हैं। यहाँ के फैंस इन खिलाड़ियों के विशालकाय कट-आउट्स और पोस्टरों को ठीक उसी तरह फूलों के हार पहनाते हैं और अगरबत्तियां जलाते हैं, जैसे किसी मंदिर में देवी-देवताओं की आराधना की जाती है। इतना ही नहीं, विश्व कप के समय तो यहाँ मेस्सी और रोनाल्डो के कट-आउट्स पर दूध चढ़ाकर उनका पारंपरिक दुग्धाभिषेक भी किया जाता है, जो भारतीय संस्कृति में सर्वोच्च सम्मान और भक्ति का प्रतीक है।
इसी तरह, पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता को तो अनाधिकारिक रूप से 'भारतीय फुटबॉल का मक्का' कहा जाता है, जहाँ फुटबॉल प्रशंसकों की दीवानगी एक अलग ही स्तर पर है। कोलकाता के लोगों के दिलों में अर्जेंटीना के पूर्व महान खिलाड़ी डिएगो माराडोना के लिए जो सम्मान है, उसे शब्दों में बयां करना मुश्किल है। साल 2017 में जब माराडोना खुद कोलकाता के दौरे पर आए थे, तो उनके स्वागत में पूरा शहर उमड़ पड़ा था और उनके सम्मान में एक भव्य कांसे की मूर्ति (Statue) का अनावरण किया गया था, जिसे देखने आज भी हजारों प्रशंसक आते हैं। इसके बाद, साल 2020 में जब माराडोना का अचानक निधन हुआ, तो कोलकाता और केरल के अनगिनत फुटबॉल प्रेमियों के घरों और स्थानीय क्लबों में शोक की लहर दौड़ गई थी। फैंस ने उनकी तस्वीरों के आगे दीये जलाए, मोमबत्तियां जलाईं, फूल अर्पित किए और एक भगवान की तरह उनकी आत्मा की शांति के लिए विशेष प्रार्थना सभाएं आयोजित कीं।

दीवानगी का यह सिलसिला लियोनेल मेस्सी के साथ भी बदस्तूर जारी है। साल 2022 के फीफा वर्ल्ड कप में जब अर्जेंटीना ने ऐतिहासिक जीत दर्ज की, तो कोलकाता के इचापुर इलाके के फैंस ने मेस्सी के सम्मान में एक अद्वितीय कदम उठाया। उन्होंने वहाँ लियोनेल मेस्सी की 70 फीट ऊंची फाइबरग्लास की भव्य प्रतिमा स्थापित कर दी। आज यह जगह स्थानीय युवाओं और उभरते हुए फुटबॉलरों के लिए किसी पावन 'तीर्थ स्थल' जैसी बन चुकी है, जहाँ नए खिलाड़ी अपने किसी भी महत्वपूर्ण मैच या टूर्नामेंट में खेलने जाने से पहले इस प्रतिमा के सामने खड़े होकर जीत का आशीर्वाद और मन्नत मांगते हैं।
पुर्तगाल के स्टार फुटबॉलर क्रिस्टियानो रोनाल्डो (CR7) की लोकप्रियता भी भारतीय युवाओं के बीच किसी से कम नहीं है। रोनाल्डो की फिटनेस, उनकी खेल शैली और उनकी जर्सी की बिक्री भारत के हर कोने में सबसे ज्यादा है। युवाओं के बीच उनके इसी क्रेज को देखते हुए गोवा के कलंगुट (Calangute) में क्रिस्टियानो रोनाल्डो की एक विशालकाय कांस्य प्रतिमा स्थापित की गई है। इस प्रतिमा को लगाने का मुख्य उद्देश्य स्थानीय युवाओं को प्रेरित करना था, और आज गोवा के कई उभरते खिलाड़ी इस प्रतिमा को अपना प्रेरणास्रोत मानते हैं और रोनाल्डो की तरह कड़ा अनुशासन अपनाकर देश का नाम रोशन करने का संकल्प लेते हैं।
अंतरराष्ट्रीय सितारों के अलावा, यदि हम भारतीय घरेलू फुटबॉल परिदृश्य की बात करें, तो पूर्व भारतीय कप्तान सुनील छेत्री को देश के सबसे महान और पूजनीय फुटबॉल आइकन का दर्जा प्राप्त है, जिन्हें देश का हर फुटबॉल प्रेमी दिल से सम्मान देता है। भारत के अलग-अलग राज्यों जैसे बिहार, केरल, पश्चिम बंगाल और गोवा से आने वाली ये कहानियाँ और उदाहरण स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं कि यहाँ फुटबॉल केवल 90 मिनट का एक खेल या मनोरंजन का साधन नहीं है, बल्कि यह करोड़ों लोगों की आस्था, संस्कृति और एक गहरी आध्यात्मिक भावना का रूप ले चुका है, जहाँ मैदान के नायकों को साक्षात ईश्वर की तरह पूजा जाता है।