अमीर सुहैल वानी
मुख्यधारा के नैरेटिव और ज़मीनी हकीकत का जब टकराव होता है तो प्रोपेगैंडा की दीवारें ढह जाती हैं। पाकिस्तान अधिकृत जम्मू कश्मीर यानी पीओजेके में इस समय कुछ ऐसा ही नजारा देखने को मिल रहा है। वहां की सड़कों पर उतरे आम लोग पाकिस्तान की उस कहानी को सीधे चुनौती दे रहे हैं जिसे इस्लामाबाद ने दशकों से बड़े जतन से पाल-पोसकर बड़ा किया था। पाकिस्तान खुद को हमेशा कश्मीरियों के अधिकारों का सबसे बड़ा अलमबरदार बताता रहा है। वह खुद को कश्मीरी जनता की आवाज़ कहता आया है। आज उसी पाकिस्तान का यह पूरा ढांचा और उसकी राजनीतिक पूंजी ताश के पत्तों की तरह बिखर रही है।
मुज़फ़्फ़राबाद से लेकर रावलकोट और मीरपुर तक की तस्वीरें इस बात की गवाह हैं। इन इलाकों से आ रही खबरें और वीडियो उस सच को बयां कर रहे हैं जिसे इस्लामाबाद की सरकार हर मुमकिन कोशिश करके दबाना चाहती है।
वहां का आम कश्मीरी आज किसी बड़ी क्रांति की बात नहीं कर रहा है। वे लोग अपने बुनियादी हक मांग रहे हैं। उनकी मांगें बहुत सीधी और जायज हैं। वे राजनीतिक प्रतिनिधित्व चाहते हैं। वे अपने संवैधानिक अधिकार मांग रहे हैं। वे प्रशासन में जवाबदेही की उम्मीद करते हैं। वे बस इतना चाहते हैं कि उनके अपने क्षेत्र के फैसलों में उनकी मर्जी शामिल हो। ये वही लोकतांत्रिक अधिकार हैं जिनका राग पाकिस्तान दुनिया के हर बड़े मंच पर गाता रहता है।
लेकिन हकीकत का सामना होने पर पाकिस्तान का रवैया बिल्कुल बदल गया है। बातचीत का रास्ता चुनने के बजाय वहां की हुकूमत ने प्रदर्शनकारियों पर दमन चक्र चला दिया है। लोगों की जायज शिकायतों को सुनने और उनका समाधान निकालने के बजाय इस्लामाबाद इस पूरे आंदोलन को दबाने में जुटा है।
जनता की आवाज़ को राज्य की सुरक्षा के लिए खतरा बताया जा रहा है। जो सरकार अंतरराष्ट्रीय मंचों पर मानवाधिकारों की भाषा का सबसे ज्यादा इस्तेमाल करती है वही सरकार आज अपने ही नियंत्रण वाले इलाके में घिर गई है। अपने ही लोगों के मुंह से अधिकारों की बात सुनकर पाकिस्तानी हुकूमत को बहुत बड़ी असहजता हो रही है।
यह केवल विरोधाभास नहीं है। यह तो सरकारी नीति के स्तर पर संस्थागत हो चुका पाखंड है। बीते सात दशकों से भी ज्यादा समय से पाकिस्तान ने कश्मीर को अपनी पूरी रणनीतिक बिसात का केंद्र बना रखा है। पाकिस्तान में सरकारें बदलती रहीं। सेना का शासन आया और गया।
लोकतांत्रिक ढंग से चुनी सरकारें भी आईं। लेकिन हर किसी ने अपने घरेलू फायदे के लिए कश्मीर मुद्दे का जमकर इस्तेमाल किया। घरेलू राजनीति में अपनी गद्दी बचाने और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खुद को नैतिक रूप से सही दिखाने के लिए कश्मीर का सहारा लिया गया। दुनिया को हमेशा यह घुट्टी पिलाई गई कि कश्मीर में पाकिस्तान का दखल वहां के लोगों के भले के लिए है।
पीओजेके के ताजा घटनाक्रम ने पाकिस्तान के इन सभी दावों की पोल खोलकर रख दी है। जब पाकिस्तान के नियंत्रण वाले कश्मीरी अपने हक के लिए खड़े होते हैं तो उन्हें कोई तवज्जो नहीं मिलती। उन्हें आज़ादी के दीवाने के रूप में नहीं देखा जाता। उन पर शक की सुइयां तान दी जाती हैं।
जब वे अपने ऊपर थोपे गए राजनीतिक ढांचे और प्रशासनिक फैसलों पर सवाल उठाते हैं तो उन्हें देशद्रोही या कानून व्यवस्था बिगाड़ने वाला घोषित कर दिया जाता है। अपने ही भविष्य के निर्धारण में बड़ी भूमिका की मांग करने पर उन्हें प्रोत्साहन मिलने के बजाय सरकारी तंत्र के भारी दबाव का सामना करना पड़ता है।
यह दोहरा रवैया अब पूरी दुनिया के सामने आ चुका है। ऐसा लगता है कि पाकिस्तान के हुक्मरानों ने मन ही मन एक बात तय कर ली है। वे मानते हैं कि कश्मीरियों को अधिकार तभी तक मिलने चाहिए जब तक वे इस्लामाबाद के भू-राजनीतिक हितों को पूरा करते रहें।
जिस पल वहां के लोग अपनी स्वतंत्र राजनीतिक सोच दिखाने लगते हैं उसी पल वे पाकिस्तान के लिए एक बड़ी समस्या बन जाते हैं। जैसे ही वे पाकिस्तान की सरकार से अपनी बदहाली का हिसाब और जवाबदेही मांगने लगते हैं वैसे ही आज़ादी की बड़ी-बड़ी बातें अचानक बंद हो जाती हैं। उनकी जगह डंडे और दमन की भाषा शुरू हो जाती है।
यही वह कड़वा सच है जिसे भारत सालों से दुनिया के हर मंच पर पुरज़ोर तरीके से उठाता रहा है। पाकिस्तान की कश्मीर नीति का असल मकसद कभी भी वहां के लोगों की भलाई नहीं था। उसकी पूरी नीति हमेशा से रणनीतिक नफ़े-नुकसान और राजनीतिक गणित से तय होती आई है।
कश्मीर मुद्दे को पाकिस्तान ने हमेशा एक कूटनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल किया। उसने इसे एक राजनीतिक नारा बनाया ताकि देश की जनता को असल मुद्दों से भटकाया जा सके। अपनी आंतरिक विफलताओं को छिपाने का यह सबसे आसान जरिया रहा है। इस पूरी कवायद में अगर कुछ गायब रहा तो वह था अपने नियंत्रण वाले लोगों को सशक्त बनाने का सच्चा इरादा।
इस बार की अशांति पाकिस्तान के लिए बहुत भारी पड़ने वाली है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि यह विद्रोह किसी बाहरी उकसावे का नतीजा नहीं है। इसकी जड़ें खुद पाकिस्तान के भीतर और उसकी अपनी नीतियों में मौजूद हैं। इ
स्लामाबाद की सरकार इन विरोध प्रदर्शनों को हमेशा की तरह विदेशी प्रोपेगैंडा कहकर खारिज नहीं कर सकती। वह इसे बाहरी ताकतों की साजिश बताकर उन लोगों की समझदारी का अपमान नहीं कर सकती जिनके अधिकारों की रक्षा की कसमें वह खाता रहा है।
सड़कों पर उतरे ये प्रदर्शनकारी कोई बाहरी तत्व नहीं हैं। वे इसी ज़मीन के रहने वाले आम नागरिक हैं। उनकी शिकायतें उनके रोज़मर्रा के कड़वे अनुभवों से पैदा हुई हैं। उनकी मांगें खराब शासन और बुनियादी सुविधाओं की कमी से उपजी हैं।
इस पूरे घटनाक्रम के असर सिर्फ जम्मू कश्मीर तक ही सीमित नहीं रहने वाले हैं। इसके दूरगामी परिणाम होंगे जो पाकिस्तान की साख को पूरी तरह मटियामेट कर देंगे। सरकार की तरफ से की जाने वाली हर दमनकारी कार्रवाई पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय साख को कमजोर करती है।
🚨 यह जनरल, कर्नल नामंजूर
— Ashish rai (@journorai) June 11, 2026
🚨 यह शेलिंग-वेलिंग नामंजूर
🚨 यह रेंजर-वेंजर नामंजूर
पाकिस्तानी सैन्य शासन के अत्याचारों के खिलाफ सड़कों पर उतरे और नारे लगाते कश्मीरी। pic.twitter.com/dRU9e0nmlz
वहां होने वाली हर गिरफ्तारी उसके कूटनीतिक तर्कों की हवा निकाल देती है। राजनीतिक अभिव्यक्ति और बोलने की आज़ादी पर लगाया जाने वाला हर प्रतिबंध कश्मीर को लेकर पाकिस्तान के पुराने रुख पर गहरे सवालिया निशान लगाता है। दुनिया अब पाकिस्तान के बयानों को नहीं बल्कि उसके एक्शन को देख रही है।
पाकिस्तान सालों से संयुक्त राष्ट्र और अन्य अंतरराष्ट्रीय संगठनों से यह मांग करता रहा है कि वे कश्मीरियों की इच्छा का सम्मान करें। अब वक्त आ गया है कि दुनिया वाकई कश्मीरी जनता की आवाज़ पर ध्यान दे। लेकिन दुनिया को उन कश्मीरियों की बात सुननी होगी जो इस समय पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर की सड़कों पर अपनी जान जोखिम में डालकर खड़े हैं। ये लोग किसी और से नहीं बल्कि खुद पाकिस्तान की हुकूमत से गरिमापूर्ण जीवन, उचित प्रतिनिधित्व और अपने बुनियादी राजनीतिक अधिकार मांग रहे हैं।
इस मौजूदा संकट का सबसे बड़ा और गंभीर पहलू यह है कि इसने उस भ्रम को हमेशा के लिए तोड़ दिया है जिसे इस्लामाबाद की पीढ़ियां पालती आ रही थीं। पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर को आज़ादी और सुशासन का एक बेहतरीन मॉडल बताने का खोखला दावा अब पूरी तरह ध्वस्त हो चुका है।
वहां के नागरिकों की बुलंद आवाज़ों ने इस झूठ को बेनकाब कर दिया है। सबसे दिलचस्प बात यह है कि इस विरोधाभास को सामने लाने के लिए किसी विदेशी ताकत को मेहनत नहीं करनी पड़ी। किसी अंतरराष्ट्रीय अभियान ने इसे हवा नहीं दी। यह सब कुछ खुद पाकिस्तान के अपने कर्मों और उसकी नीतियों का सीधा नतीजा है।
इतिहास का एक बहुत सीधा सा नियम है। वह उन मुल्कों के साथ बेहद सख्त रवैया अपनाता है जो दुनिया को तो बड़े-बड़े सिद्धांतों का उपदेश देते हैं लेकिन अपने ही घर में उन सिद्धांतों का गला घोंट देते हैं। आज का पाकिस्तान ठीक इसी ऐतिहासिक दुविधा के चक्रव्यूह में फंस चुका है।
दशकों से जिस नैतिक बढ़त का वह ढिंढोरा पीटता आ रहा था वह ज़मीन अब उसके पैरों के नीचे से पूरी तरह खिसक चुकी है। इसके लिए उसे भारत पर दोष मढ़ने का मौका भी नहीं मिल रहा है। यह पूरी स्थिति पाकिस्तान के बड़े-बड़े वादों और उसके असल व्यवहार के बीच बढ़ते विशाल अंतर की वजह से पैदा हुई है।
इस्लामाबाद के लिए सबसे बड़ी त्रासदी और चुनौती अब भारत के तर्क नहीं हैं। भारत जो कहता है उसका मुकाबला करने के लिए पाकिस्तान के पास एक पुराना रटा-रटाया ढांचा था। लेकिन अब असली चुनौती वह दलीलें हैं जो उसके अपने ही प्रशासन के तले जी रहे कश्मीरी दे रहे हैं। जब अपने ही लोग आईना दिखाने लगें तो प्रोपेगैंडा के सारे औजार बेकार साबित हो जाते हैं। पीओजेके की सड़कें आज पाकिस्तान की इसी ऐतिहासिक नाकामी की कहानी चिल्ला-चिल्ला कर बयां कर रही हैं।