हरजिंदर
खाड़ी की ताजा जंग में अमेरिका ने उनसे खासी उम्मीद बांधी थी। अमेरिका चाहता था कि हौती विद्रोही ईरान के खिलाफ लड़ाई में उसका साथ दें। बरसों तक अमेरिका विरोध का परचम बुलंद करने वाले हौती विद्रोहियों के लिए यह हजम होने वाली बात नहीं थीं। सो उन्होंने अमेरिका का साथ नहीं दिया। लेकिन इस राजनीति ने हौती विद्रोहियों के बारे में एक जिज्ञासा जरूर दे दी है कि इन हौती का इतिहास क्या है?
यमन के सादा इलाके में रहने वाले शिया जैदी समुदाय के लोगों को हैती कहा जाता है। इनका एक दूर का रिश्ता भारत और पाकिस्तान में रहने वाले जैदी समुदाय से भी जुड़ता है। मगर यह दूर का ही रिश्ता है। दक्षिण पूर्व एशिया में रहने वाले जैदी इराक के वासित शहर से आए हैं लेकिन हम यहां जिन जैदी की बात कर रहे हैं वे मूल रूप से यमन के ही रहने वाले हैं।

हालांकि ये जैदी यमन की कुल आबादी का 35 फीसदी हिस्सा हैं, लेकिन उन्होंने सदियों तक यमन पर राज किया है। दुर्भाग्य से यह राज 1962 में खत्म हो गया और यमन में सुन्नी शासन की शुरुआत हुई और जैदी समुदाय के शासन का अंत हो गया। सदियों तक सत्ता में रहे समुदाय जब पूरी तरह सत्ता से बाहर कर दिया जाते हैं तो उनके मन में बीते हुए युग को वापस लाने की एक ग्रंथी बन जाती है। यह बात सिर्फ यमन की नहीं है बल्कि पूरी दुनिया में यही होता है।
यहां एक और चीज साफ समझ लेनी चाहिए। हौती हालांकि यमन की एक बड़ी आबादी है लेकिन ये सभी विद्रोही नहीं है। किसी भी विद्रोही समूह की ताकत यह होती है कि उसके समुदाय में उसे कितना समर्थन प्राप्त है। कितने लोग हैं जो उसके सपने मे विश्वास रखते हैं। और यह भी नहीं कहा जा सकता कि जैदी समुदाय की पूरी आबादी ही हौती विद्रोहियों के साथ खड़ी है।
यमन की सत्ता से जैदी समुदाय भले ही बाहर हो गया हो लेकिन सादा शहर और आस-पास के इलाकों में उसकी सरकार चलती रही। साथ ही पूरी यमन पर फिर परचम लहराने का सपना भी पलता रहा। तीन दशक बाद इसी इलाके में एक संगठन बना- द बिलीविंग यूथ। इसे हौती विद्रोह की नींव माना जाता है।
हालांकि कुछ लोगों का यह भी कहना है कि यह संगठन इस इलाके में लगातार हो रहे विदेशी हस्तक्षेप के विरोध में बना था। धीरे-धीरे इस समूह की विद्रोही गतिविधियां बढ़ती गईं। एक समय के बाद इरान और हेजबुल्लाह का सहयोग भी मिलना शुरू हो गया। इस बीच कईं अरब देशों से उनकी झड़पे भी होती रहीं और छोटे मोटे युद्ध भी।
यमन में 2014 के आस-पास जब राजनैतिक अस्थिरता हुई तो हौती विद्रोहियों ने राजधानी सना पर कब्जा जमा लिया। सना को विद्रोहियों से मुक्त कराने के लिए पश्चिम एशिया के कईं देश तो उतरे ही अल कायदा और आईएसआईउस जैसे संगठन में मैदान में आ गए। यह कहना मुश्किल है कि इन सबमें कोई आपसी तालमेल था या नहीं। या फिर किस स्तर का था लेकिन सबने सना का मुक्त कराकर ही दम लिया।

मीडिया में जिस तरह से दिखाया जाता है हौती उस तरह से कोई लड़ाका कौम नहीं है। वह एक सभ्य समाज है जिसके लोग स्थानीय राजनीतिक जटिलताओं और इससे उपजी एक खास मनोदशा के कारण एक ऐसी लड़ाई में उलझे हैं जिसे आखिर में शायद कोई नहीं जीतेगा। इस बात को भी याद रखना जरूरी है कि जो लोग जंग में उलझते हैं उनकी खूबियों पर कोई ध्यान नहीं देता।
( लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)