प्रमोद जोशी
वैश्विक-राजनीति में आते बदलाव की रोशनी में पिछले हफ्ते जापानी प्रधानमंत्री की भारत-यात्रा और अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड-यात्रा के दूरगामी अर्थ हैं. यह यात्रा 11जुलाई तक चलेगी.
पिछले साल से अमेरिकी-नीतियों में आए बदलाव के कारण एशिया के देशों ने अपनी भावी नीतियों पर पुनर्विचार शुरू कर दिया है. यह विचार केवल सामरिक-दृष्टि से ही नहीं है, बल्कि इसका काफी बड़ा हिस्सा आर्थिक-सामाजिक सहयोग से जुड़ा है.
पिछले हफ्ते जापानी प्रधानमंत्री सनाए ताकाइची और पिछले अप्रैल में दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति ली जे-म्युंग की दिल्ली यात्राओं ने अमेरिका के दो प्रमुख एशियाई सहयोगियों, तोक्यो और सोल में अपने एशियाई संबंधों को व्यापक बनाने की तात्कालिकता को रेखांकित किया था.
प्रधानमंत्री की इंडोनेशिया-यात्रा और इस दौरान चर्चाओं और समझौतों से भारत और इंडोनेशिया का एक दूरदर्शी एजेंडा झलकता है, जिसमें समुद्री सहयोग, रक्षा उद्योग में साझेदारी, आर्थिक विस्तार, स्वास्थ्य सेवा और शिक्षा पर जोर दिया गया है. इस यात्रा ने हिंद-प्रशांत क्षेत्र में समुद्री पड़ोसी और रणनीतिक साझेदार के रूप में दोनों देशों के साझा दृष्टिकोण को और पुष्ट किया है.
सामरिक-महत्त्व
भारत का लगभग 40फीसदी समुद्री व्यापार दुनिया के सबसे व्यस्त जलमार्गों में से एक, मलक्का जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है. और इस रणनीतिक मार्ग के प्रवेश द्वार पर स्थित देश इंडोनेशिया है.
भौगोलिक और भू-राजनीतिक दृष्टि से इंडोनेशिया की इसमें बेहद महत्त्वपूर्ण भूमिका है. हिंद महासागर और प्रशांत महासागर के संगम पर स्थित, यह विश्व के सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक स्थानों में से एक है.
प्रधानमंत्री की यह यात्रा, 2018के बाद उनकी इंडोनेशिया की पहली द्विपक्षीय यात्रा है. यह भारत के समुद्री हितों को सुरक्षित करने, आर्थिक साझेदारी का विस्तार करने और तेजी से प्रतिस्पर्धी होते हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अपनी स्थिति को मजबूत करने से जुड़ी है.
उनकी 2018की यात्रा के दौरान, दोनों देशों ने एक साझा समुद्री दृष्टिकोण का अनावरण किया था, और हालिया चर्चाओं का उद्देश्य उस ढाँचे को आगे बढ़ाना है. वार्ता में आपसी समुद्री क्षेत्र जागरूकता, संपर्क और दोनों देशों के तटरक्षक बलों के बीच सहयोग बढ़ाने जैसे विषय शामिल है.

गहरी साझेदारी
इन पंक्तियों का प्रकाशन होने तक प्रधानमंत्री ने अपनी यात्रा के पहले चरण में इंडोनेशिया की यात्रा पूरी कर ली है, जिसके दौरान दोनों देशों ने व्यापक रणनीतिक साझेदारी को गहरा करने की घोषणा की है.
रक्षा-सहयोग की दृष्टि से ब्रह्मोस मिसाइल और हवा से हवा में मार करने वाली अस्त्र मिसाइल को लेकर दोनों देशों का सहयोग खासतौर से उल्लेखनीय है. समुद्री सहयोग की दृष्टि से क्षेत्रीय सर्विलांस, तटीय निगरानी, मानवीय सहायता, आपदा राहत, प्रदूषण नियंत्रण और खोज एवं बचाव पर समझौते शामिल हैं.
इंडोनेशिया के राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो भारत के 76वें गणतंत्र दिवस समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में आए थे. उसके बाद हुई इस यात्रा के भारत की एक्ट ईस्ट नीति के संदर्भ में व्यापक निहितार्थ हैं.
इस यात्रा के दौरान, प्रधानमंत्री का जकार्ता में राष्ट्रपति भवन, इस्ताना मर्देका में भव्य स्वागत किया गया. इसके बाद राष्ट्रपति प्रबोवो और प्रधानमंत्री मोदी के बीच द्विपक्षीय और प्रतिनिधिमंडल स्तर की वार्ता हुई. प्रधानमंत्री ने वहाँ की संसद को भी संबोधित किया.
व्यापारिक-सहयोग
भारत और इंडोनेशिया के बीच द्विपक्षीय व्यापार इस वर्ष 24.8अरब डॉलर (लगभग 2,07,000करोड़ रुपये) रहा. इंडोनेशिया, आसियान क्षेत्र में भारत का दूसरा सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार है. भारत मुख्य रूप से इंडोनेशिया से कोयला और पाम ऑयल का आयात करता है, जबकि परिष्कृत पेट्रोलियम, कृषि उत्पाद और इस्पात का निर्यात करता है.
इस व्यापार को विस्तार देने की जरूरत दोनों देश महसूस करते हैं. भारत खासतौर से फार्मास्युटिकल्स, फूड प्रोसेसिंग, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र के क्षेत्र में अग्रणी है. भारत की ‘विश्व के औषधालय’ के रूप में प्रतिष्ठा है.
दोनों देशों के बीच आर्थिक सहयोग को एक प्रमुख स्तंभ के रूप में रेखांकित किया गया. दोनों नेताओं ने आसियान-भारत व्यापार समझौते की समीक्षा को शीघ्र पूरा करने की आवश्यकता पर बल दिया.
VIDEO | Yogyakarta, Indonesia: Prime Minister Modi and Indonesian President Subianto visited "majestic" Prambanan Temple complex, a UNESCO World Heritage Site, and inaugurated its restoration project.
— Press Trust of India (@PTI_News) July 8, 2026
PM Modi (@narendramodi) says, “Today is the third day of my visit. In the life… pic.twitter.com/KZ8jNcCa6E
अनेक समझौते
खनिज और इस्पात आपूर्ति शृंखलाओं के समझौते पर भी हस्ताक्षर किए गए, जिसमें स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड और पीटी क्राकाटाऊ स्टील के बीच इंडोनेशिया में स्टेनलेस स्टील स्लैब निर्माण सुविधा स्थापित करने की संभावनाओं का पता लगाने के लिए एक रणनीतिक संयुक्त उद्यम भी शामिल है.
उच्च शिक्षा के क्षेत्र में, इंडोनेशिया में इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट बेंगलुरु परिसर की प्रस्तावित स्थापना का स्वागत किया गया, साथ ही अकादमिक आदान-प्रदान और संस्थागत साझेदारी को बढ़ावा देने का भी समर्थन किया गया.
भारत-इंडोनेशिया व्यापक रणनीतिक साझेदारी को और प्रगाढ़ बनाने के लिए कई द्विपक्षीय दस्तावेजों पर हस्ताक्षर और आदान-प्रदान किए गए. साथ ही राजनीतिक जुड़ाव, रक्षा एवं सुरक्षा सहयोग, समुद्री सहयोग, व्यापार एवं निवेश, डिजिटल अर्थव्यवस्था, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष आदि से जुड़े तमाम विषयों पर विचार हुआ.
क्वॉड का विकल्प
पीएम मोदी जिन तीन देशों के दौरे पर गए हैं, उन तीनों को देशों को पता है कि एशिया और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीनी शक्ति एक वास्तविकता है जिसे नियंत्रित करना आवश्यक है. इसके पहले पिछले हफ्ते जापानी प्रधानमंत्री की भारत-यात्रा के दौरान इस पृष्ठभूमि पर भी चर्चा जरूर हुई होगी.
ऐसा नहीं लगता कि एशिया के देश अमेरिका से पूरी तरह मुँह मोड़ लेंगे. सच यह भी है कि चीन की सैन्य शक्ति का मुकाबला करना आसान नहीं है. इसी वजह से जापान, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड आपसी सहयोग से सुरक्षा साझेदारी को मजबूत कर रहे हैं. इसमें भारत की भूमिका भी है.
अलबत्ता ट्रंप के शासनकाल की अनिश्चितता ने इन देशों को सोचने के लिए प्रेरित किया है. प्रधानमंत्री की इस यात्रा के दौरान ऑस्ट्रेलिया-भारत-जापान त्रिपक्षीय गठबंधन को पुनर्जीवित करने पर भी चर्चा हो सकती है.
ऑस्ट्रेलिया-भारत-जापान त्रिपक्षीय वार्ता ने ही ‘क्वॉड’ की बुनियाद डाली थी. इसकी पहल हिंद-प्रशांत क्षेत्र में खुली, समावेशी और नियम-आधारित व्यवस्था को बनाए रखने के लिए हुई थी. इस त्रिपक्षीय पहल की शुरुआत 2015में हुई थी.
कालांतर में इसी साझेदारी को आधार बनाकर और अमेरिका को शामिल करके 'क्वॉड' की अवधारणा आगे बढ़ी थी. उपरोक्त तीनों देश मालाबार और ऑस्ट्राहिंद जैसे संयुक्त अभ्यासों के माध्यम से अपने सहयोग का विस्तार कर रहे हैं.
इसका उद्देश्य चीन-विरोधी गठबंधन बनाना नहीं है, बल्कि मध्यम शक्तियों के बीच औद्योगिक, तकनीकी और समुद्री सहयोग बढ़ाना है. जापान के पास उन्नत टेक्नोलॉजी है. दक्षिण कोरिया के पास पोत निर्माण, सेमीकंडक्टर और अन्य तकनीकों की विश्व स्तरीय क्षमताएं प्रदान करता है. ऑस्ट्रेलिया की पूर्वी हिंद महासागर की सुरक्षा में महत्त्वपूर्ण भूमिका है. न्यूजीलैंड, छोटा देश है, पर वह उच्च शिक्षा और हाईटेक सहयोग प्रदान कर सकता है.
Hon'ble Prime Minister Shri @narendramodi Ji was accorded a warm welcome at the Istana Merdeka in Jakarta.
— G Kishan Reddy (@kishanreddybjp) July 7, 2026
His visit marks another significant milestone in further strengthening the Comprehensive Strategic Partnership between India and Indonesia. Under the visionary leadership… pic.twitter.com/7Vr8UJgLV1
अमेरिकी पहल
अमेरिका के डिपार्टमेंट ऑफ वॉर ने जून में अपनी सबसे बड़ी हिंद-प्रशांत कमान (यूएस इंडो-पैसिफिक कमांड) का नाम बदलकर वापस 'यूएस पैसिफिक कमांड' कर दिया है. इस नाम से 'इंडो' शब्द हटा दिया गया है. इसके पहले इसका नाम 2018में पैसिफिक कमांड से बदलकर ‘इंडोपैकॉम’ किया गया था. अब पुराने नाम की बहाली के मतलब को समझना चाहिए.
मोटे तौर पर इस नाम परिवर्तन को ‘क्वाड’ नीति के बरक्स देखा जा रहा है. 2018में, अमेरिका के तत्कालीन रक्षामंत्री जिम मैटिस ने कहा था कि इंडोपैकॉम नाम हिंद महासागर, भारतीय उपमहाद्वीप और स्वयं भारत के ‘बढ़ते महत्व’की पहचान है. अमेरिका अब इन तीनों बातों को भुलाना चाहता है. ऐसे में भारत के सामने भविष्य के विकल्पों की चुनौती है.
राष्ट्रपति ट्रंप चीन और अमेरिका के नए ग्रुप ‘जी-2’ का हवाला दे रहे हैं. जनवरी 2024से भारत में प्रस्तावित ‘क्वॉड’ का शिखर सम्मेलन पता नहीं वह कब होगा, और होगा भी या नहीं. अमेरिकी विदेशमंत्री मार्को रूबियो ने हाल में कहा है कि अगले साल के शुरू में ट्रंप भारत आ सकते हैं. देखिए उस दिशा में होता क्या है.
हिंद महासागर की सुरक्षा
जून के अंतिम सप्ताह में प्रधानमंत्री मोदी ने सेशेल्स की यात्रा की. उनके साथ गए प्रतिनिधिमंडल में विदेशमंत्री एस जयशंकर, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल, विदेश सचिव विक्रम मिसरी और विदेश मंत्रालय के आधिकारिक प्रवक्ता रणधीर जायसवाल शामिल थे.
इस आकार का प्रतिनिधिमंडल इस यात्रा के महत्त्व को रेखांकित करता है. इस दौरान किसी ने विदेश सचिव विक्रम मिसरी से पूछा कि क्या भारत यहाँ अपना सैनिक बेस बनाने का प्रयास फिर करेगा? उन्होंने कहा, सेशेल्स सरकार पहल करेगी, तो हम भी विचार करेंगे.
भारत ने भी हाल के वर्षों में आसपास के तटवर्ती देशों में सैनिक सुविधाएं बढ़ाईं हैं. इनमें ओमान, मॉरिशस, मैडागास्कर, सेशेल्स, इंडोनेशिया, सिंगापुर वगैरह शामिल हैं. मैडागास्कर में रेडार लगाने के अलावा मालदीव, सेशेल्स और मॉरिशस में भारत के तटीय सर्विलांस रेडार तैनात हैं.
भारत का 'सागर' (सिक्योरिटी एंड ग्रोथ फॉर ऑल इन द रीज़न) कार्यक्रम, हिंद महासागर क्षेत्र में सुरक्षा और विकास को बढ़ावा देने की भारत की समुद्री पहल है. 2015में शुरू हुए इस ‘विज़न’ का अब 'महासागर' के रूप में विस्तार हो चुका है.
इस इलाके किसी भी अनहोनी के वक्त सबसे पहले मदद के लिए पहुँचने वाला देश भारत है. अराजकता की स्थिति में भी भारत सबसे पहले मदद के लिए पहुँचता है. 1986में सेशेल्स और 1988में मालदीव में सरकारों का तख्ता पलटने की कोशिशों को भारतीय नौसेना ने विफल किया था.
भारत ने हिंद महासागर क्षेत्र और पूर्वी अफ्रीका में अपनी डिप्लोमैटिक उपस्थिति का विस्तार किया है. पिछले कुछ वर्षों में भारत ने अफ्रीका महाद्वीप में 16नए राजनयिक मिशन खोले हैं और तंज़ानिया, इथोपिया, जिबूती व मोज़ाम्बीक जैसे देशों में नए रक्षा विंग नियुक्त किए हैं.
