ओनिका माहेश्वरी/ नई दिल्ली
मानव सभ्यता के इतिहास में अंतरिक्ष की यात्रा सबसे बड़ी वैज्ञानिक उपलब्धियों में से एक मानी जाती है। पृथ्वी की सीमाओं को पार कर अंतरिक्ष तक पहुँचना केवल तकनीकी क्षमता का प्रदर्शन नहीं है, बल्कि यह मानव जिज्ञासा, साहस, शिक्षा और अथक परिश्रम का भी प्रतीक है। पिछले चार दशकों में मुस्लिम समाज के कई वैज्ञानिकों, इंजीनियरों, चिकित्सकों और सैन्य अधिकारियों ने अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान देकर यह सिद्ध किया है कि ज्ञान, अनुसंधान और नवाचार किसी धर्म या सीमा के मोहताज नहीं होते।
सऊदी अरब के प्रिंस सुल्तान बिन सलमान अल सऊद से लेकर सीरिया के मुहम्मद फ़ारिस, अफ़ग़ानिस्तान के अब्दुल अहद मोमंद, ईरानी-अमेरिकी उद्यमी अनुशेह अंसारी, मलेशिया के डॉ. शेख मुज़ाफ़र शुकोर तथा संयुक्त अरब अमीरात के हज़्ज़ा अल मंसूरी और डॉ. सुल्तान अल नेयादी तक अनेक मुस्लिम अंतरिक्ष यात्रियों ने अंतरिक्ष अन्वेषण के इतिहास में अपने नाम दर्ज कराए हैं। इन सभी ने न केवल अपने-अपने देशों का गौरव बढ़ाया, बल्कि पूरी दुनिया के लिए यह संदेश भी दिया कि शिक्षा, वैज्ञानिक सोच और दृढ़ निश्चय के बल पर कोई भी व्यक्ति अंतरिक्ष तक पहुँच सकता है।
मुस्लिम अंतरिक्ष यात्रियों की इस प्रेरणादायक यात्रा की शुरुआत वर्ष 1985 में हुई, जब सऊदी अरब के प्रिंस सुल्तान बिन सलमान अल सऊद अंतरिक्ष में जाने वाले पहले मुस्लिम और पहले अरब नागरिक बने। इसके बाद वर्ष 1987 में सीरिया के मुहम्मद फ़ारिस ने सोवियत संघ के इंटरकोस्मोस कार्यक्रम के अंतर्गत अंतरिक्ष की यात्रा की और अरब जगत के दूसरे अंतरिक्ष यात्री बने। इन ऐतिहासिक उपलब्धियों ने मुस्लिम देशों में अंतरिक्ष विज्ञान के प्रति नई जागरूकता और उत्साह का संचार किया। आगे चलकर अफ़ग़ानिस्तान, ईरान, मलेशिया और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों के नागरिकों ने भी अंतरिक्ष अभियानों में भाग लेकर इस गौरवशाली परंपरा को आगे बढ़ाया।
अफ़ग़ानिस्तान के एकमात्र अंतरिक्ष यात्री अब्दुल अहद मोमंद
अफ़ग़ानिस्तान के पहले और एकमात्र अंतरिक्ष यात्री: अब्दुल अहद मोमंद
अफ़ग़ानिस्तान के अंतरिक्ष इतिहास का सबसे गौरवपूर्ण नाम अब्दुल अहद मोमंद का है। वे आज भी बाहरी अंतरिक्ष की यात्रा करने वाले पहले और अब तक के एकमात्र अफ़ग़ान नागरिक हैं। उनका जन्म 1 जनवरी 1959 को अफ़ग़ानिस्तान के गज़नी प्रांत के सरदाह में हुआ था।
प्रारंभिक शिक्षा के बाद उन्होंने अफ़ग़ान वायु सेना में पायलट के रूप में अपना करियर शुरू किया। उनकी प्रतिभा और उत्कृष्ट प्रदर्शन के कारण उन्हें सोवियत संघ की प्रतिष्ठित गगारिन मिलिट्री एयर अकादमी में प्रशिक्षण प्राप्त करने का अवसर मिला। इसी प्रशिक्षण ने उनके जीवन की दिशा बदल दी और उन्हें अंतरिक्ष मिशन के लिए चुना गया।
29 अगस्त 1988 को अब्दुल अहद मोमंद ने सोवियत संघ के प्रसिद्ध सोयुज टीएम-6 (Soyuz TM-6) मिशन के तहत अंतरिक्ष के लिए उड़ान भरी। वे सोवियत कमांडर व्लादिमीर ल्याखोव और अंतरिक्ष यात्री वेलेरी पोल्याकोव के साथ मीर अंतरिक्ष स्टेशन (Mir Space Station) पहुँचे। इंटरकोस्मोस कार्यक्रम के शोध अंतरिक्ष यात्री के रूप में उन्होंने लगभग नौ दिनों तक अंतरिक्ष में रहकर अनेक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक गतिविधियों में भाग लिया। इस दौरान उन्होंने पृथ्वी के विभिन्न क्षेत्रों की तस्वीरें खींचीं, विशेष रूप से अफ़ग़ानिस्तान के भू-भाग का अध्ययन करने के लिए विस्तृत फोटोग्राफी की, तथा चिकित्सा और वैज्ञानिक प्रयोग भी किए।
अब्दुल अहद मोमंद की अंतरिक्ष यात्रा केवल वैज्ञानिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और धार्मिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण रही। वे अपने साथ पवित्र कुरान की एक प्रति अंतरिक्ष में लेकर गए थे और पृथ्वी की कक्षा में रहते हुए उन्होंने कुरान की आयतों का पाठ भी किया।
यह घटना विश्वभर के मुस्लिम समाज के लिए विशेष महत्व रखती है। इसी मिशन के दौरान उन्होंने तत्कालीन अफ़ग़ान राष्ट्रपति डॉ. नजीबुल्लाह और अपनी माता से रेडियो के माध्यम से पश्तो भाषा में बातचीत की। इसके साथ ही पश्तो अंतरिक्ष में आधिकारिक रूप से बोली जाने वाली चौथी भाषा बन गई, जो अफ़ग़ानिस्तान के लिए गर्व का विषय था।
हालाँकि उनकी वापसी का सफर आसान नहीं था। पृथ्वी पर लौटते समय सोयुज टीएम-5 अंतरिक्ष यान के कंप्यूटर में तकनीकी खराबी आ गई, जिसके कारण वे और उनके साथी लगभग एक दिन तक बिना भोजन और पानी के अंतरिक्ष में फँसे रहे। बाद में तकनीकी समस्या दूर होने पर उनकी सुरक्षित लैंडिंग कज़ाख़स्तान में कराई गई। इस घटना ने उनके साहस और धैर्य की भी परीक्षा ली।
इस ऐतिहासिक मिशन की सफलता पर उन्हें सोवियत संघ के सर्वोच्च सम्मान 'हीरो ऑफ द सोवियत यूनियन' तथा 'ऑर्डर ऑफ लेनिन' से सम्मानित किया गया। अफ़ग़ानिस्तान ने भी उन्हें अपने सर्वोच्च राष्ट्रीय सम्मानों से नवाज़ा। वर्ष 1992 में नजीबुल्लाह सरकार के पतन और गृहयुद्ध के बाद उन्हें अपना देश छोड़ना पड़ा।
वे भारत के रास्ते जर्मनी पहुँचे और बाद में वर्ष 2003 में उन्हें जर्मनी की नागरिकता प्राप्त हुई। स्टटगार्ट में उन्होंने एक अकाउंटेंट के रूप में कार्य किया और शांत जीवन व्यतीत किया। लंबे समय तक कैंसर से संघर्ष करने के बाद 21 जून 2026 को स्टटगार्ट, जर्मनी में उनका निधन हो गया।
बाद में उनके पार्थिव शरीर को काबुल लाया गया, जहाँ पूरे राजकीय सम्मान के साथ उन्हें सुपुर्द-ए-खाक किया गया। अब्दुल अहद मोमंद का जीवन आज भी अफ़ग़ानिस्तान के वैज्ञानिक इतिहास और अंतरिक्ष अन्वेषण के सबसे गौरवपूर्ण अध्यायों में गिना जाता है।
अंतरिक्ष में जाने वाली पहली मुस्लिम महिला अनुशेह अंसारी
पहली मुस्लिम महिला अंतरिक्ष यात्री और पहली महिला अंतरिक्ष पर्यटक: अनुशेह अंसारी
यदि मुस्लिम महिलाओं की अंतरिक्ष यात्रा की बात की जाए, तो अनुशेह अंसारी का नाम सबसे पहले लिया जाता है। उन्होंने यह सिद्ध किया कि दृढ़ इच्छाशक्ति, शिक्षा और नवाचार के बल पर महिलाएँ भी अंतरिक्ष विज्ञान जैसे चुनौतीपूर्ण क्षेत्र में इतिहास रच सकती हैं। अनुशेह अंसारी का जन्म 12 सितंबर 1966 को ईरान के मशहद शहर में हुआ था। बाद में उनका परिवार संयुक्त राज्य अमेरिका चला गया, जहाँ उन्होंने अमेरिकी नागरिकता प्राप्त की।
उन्होंने जॉर्ज मेसन विश्वविद्यालय से इलेक्ट्रॉनिक्स एवं कंप्यूटर इंजीनियरिंग में स्नातक तथा जॉर्ज वाशिंगटन विश्वविद्यालय से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में स्नातकोत्तर की शिक्षा प्राप्त की। वर्ष 1993 में उन्होंने अपने पति हामिद अंसारी के साथ मिलकर टेलीकॉम टेक्नोलॉजीज (TTI) की स्थापना की। इस कंपनी की सफलता ने उन्हें तकनीकी उद्योग की अग्रणी महिला उद्यमियों में शामिल कर दिया। बाद में वे प्रोडिया सिस्टम्स (Prodea Systems) की सह-संस्थापक और अध्यक्ष (Chairwoman) बनीं, जहाँ उन्होंने वैश्विक डिजिटल प्रौद्योगिकी के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
18 सितंबर 2006 को अनुशेह अंसारी ने अपने निजी खर्च पर सोयुज़ TMA-9 अंतरिक्ष यान के माध्यम से अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) की यात्रा की। इसके साथ ही वे अंतरिक्ष में जाने वाली पहली ईरानी, पहली मुस्लिम महिला तथा दुनिया की पहली महिला अंतरिक्ष पर्यटक बनीं। उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पर दस दिनों से अधिक समय बिताया और विभिन्न वैज्ञानिक गतिविधियों तथा अनुसंधानों में सक्रिय रूप से भाग लिया।

अनुशेह अंसारी ने अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) पर अपने प्रवास के दौरान अनेक वैज्ञानिक गतिविधियों में भाग लिया और यह साबित किया कि निजी क्षेत्र से आने वाले लोग भी अंतरिक्ष अनुसंधान में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
उनकी यह यात्रा केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं थी, बल्कि इसने निजी अंतरिक्ष पर्यटन (Space Tourism) के नए युग की शुरुआत का भी प्रतीकात्मक मार्ग प्रशस्त किया। अंतरिक्ष विज्ञान, तकनीकी नवाचार और मानवता के प्रति उनके योगदान को देखते हुए उन्हें स्पेस पायनियर अवार्ड (Space Pioneer Award) और एलिस आइलैंड मेडल ऑफ ऑनर (Ellis Island Medal of Honor) सहित अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों से सम्मानित किया गया।
अंतरिक्ष यात्रा के बाद भी अनुशेह अंसारी विज्ञान और नवाचार के क्षेत्र में लगातार सक्रिय रहीं। वे वर्तमान में एक्सप्राइज़ (XPRIZE) फाउंडेशन की मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) हैं। यह प्रतिष्ठित संस्था विज्ञान, प्रौद्योगिकी, पर्यावरण, स्वास्थ्य और मानवता की प्रमुख चुनौतियों के समाधान के लिए वैश्विक स्तर पर नवाचार आधारित प्रतियोगिताओं का आयोजन करती है। इसके अतिरिक्त उन्हें विश्व आर्थिक मंच (World Economic Forum - WEF) द्वारा यंग ग्लोबल लीडर के रूप में भी मान्यता दी गई तथा वे यूनेस्को की सद्भावना राजदूत (UNESCO Goodwill Ambassador) भी रह चुकी हैं।
वर्ष 2010 में अनुशेह अंसारी ने अपने जीवन और अंतरिक्ष यात्रा पर आधारित संस्मरण "माई ड्रीम ऑफ स्टार्स (My Dream of Stars)" प्रकाशित किया। इस पुस्तक में उन्होंने अपने बचपन, ईरान से अमेरिका तक की यात्रा, उद्यमिता, संघर्ष, अंतरिक्ष तक पहुँचने की प्रेरक कहानी तथा अपने अनुभवों का विस्तार से वर्णन किया है।
आज अनुशेह अंसारी विज्ञान, तकनीक, महिला सशक्तिकरण, उद्यमिता और अंतरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र में विश्वभर के युवाओं, विशेष रूप से महिलाओं के लिए एक प्रेरणास्रोत मानी जाती हैं।
अंतरिक्ष में रोज़ा और नमाज़ अदा करने वाले पहले मलेशियाई अंतरिक्ष यात्री: डॉ. शेख मुज़ाफ़र शुकोर
अंतरिक्ष में इबादत का इतिहास रचने वाले डॉ. शेख मुज़ाफ़र शुकोर
मुस्लिम अंतरिक्ष यात्रियों के इतिहास में डॉ. शेख मुज़ाफ़र शुकोर का नाम अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाता है। वे न केवल मलेशिया के पहले अंतरिक्ष यात्री हैं, बल्कि अंतरिक्ष में रहते हुए रमज़ान के रोज़े रखने और नमाज़ अदा करने के कारण भी विश्वभर में चर्चित हुए। उन्होंने यह सिद्ध किया कि आधुनिक विज्ञान और धार्मिक आस्था एक-दूसरे के पूरक हो सकते हैं।
डॉ. शेख मुज़ाफ़र शुकोर का जन्म 27 जुलाई 1972 को मलेशिया की राजधानी कुआलालंपुर में हुआ था। चिकित्सा विज्ञान में उनकी रुचि बचपन से ही थी। उन्होंने भारत के प्रतिष्ठित मणिपाल विश्वविद्यालय के अंतर्गत कस्तूरबा मेडिकल कॉलेज (KMC) से चिकित्सा एवं शल्य चिकित्सा (MBBS के समकक्ष) की शिक्षा प्राप्त की। इसके बाद वे मलेशिया लौटे और यूनिवर्सिटी केबांगसान मलेशिया (Universiti Kebangsaan Malaysia) में अस्थि रोग विशेषज्ञ (ऑर्थोपेडिक सर्जन) के रूप में कार्य करने लगे।
वर्ष 2007 में मलेशिया और रूस के संयुक्त 'अंगकासवान अंतरिक्ष उड़ान कार्यक्रम' (Angkasawan Spaceflight Programme) के अंतर्गत उन्हें अंतरिक्ष मिशन के लिए चुना गया। 10 अक्टूबर 2007 को उन्होंने रूसी सोयुज़ TMA-11 अंतरिक्ष यान के माध्यम से अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) के लिए उड़ान भरी और इस प्रकार अंतरिक्ष में जाने वाले पहले मलेशियाई नागरिक बने।
अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पर लगभग दस दिनों के प्रवास के दौरान डॉ. शुकोर ने अनेक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक प्रयोग किए। इनमें लीवर कैंसर (Liver Cancer) और ल्यूकेमिया (Leukemia) कोशिकाओं के विकास का अध्ययन, भारहीन वातावरण में प्रोटीनों के क्रिस्टलीकरण (Protein Crystallisation) से संबंधित अनुसंधान तथा सूक्ष्मजीवों (Microbes) पर वैज्ञानिक परीक्षण प्रमुख थे। इन प्रयोगों का उद्देश्य चिकित्सा विज्ञान और जैव प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में नई संभावनाओं का अध्ययन करना था।
हालाँकि डॉ. शुकोर की यह यात्रा केवल वैज्ञानिक उपलब्धियों तक सीमित नहीं रही। उनका अंतरिक्ष मिशन उस समय रमज़ान के महीने के दौरान हुआ था। अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पृथ्वी की परिक्रमा लगभग 90 मिनट में पूरी करता है, जिसके कारण वहाँ प्रत्येक 24 घंटे में लगभग 16 बार सूर्योदय और 16 बार सूर्यास्त होते हैं। ऐसी स्थिति में रोज़ा रखने और नमाज़ अदा करने का समय निर्धारित करना एक बड़ी चुनौती थी।
इस चुनौती को ध्यान में रखते हुए मलेशिया सरकार ने लगभग 150 इस्लामी विद्वानों की सहायता से विशेष दिशा-निर्देश तैयार किए। "Guidelines for Performing Islamic Rites at the International Space Station" नामक इस मार्गदर्शिका में यह स्पष्ट किया गया कि अंतरिक्ष यात्री किस प्रकार नमाज़, रोज़ा और अन्य धार्मिक कर्तव्यों का पालन करेंगे।
डॉ. शेख मुज़ाफ़र शुकोर ने इन दिशा-निर्देशों के अनुसार प्रक्षेपण स्थल बैकोनूर (Baikonur Cosmodrome) के समय का अनुसरण करते हुए अपने रोज़े पूरे किए और अंतरिक्ष में नमाज़ भी अदा की। यह उपलब्धि विश्वभर के मुस्लिम समाज के लिए अत्यंत प्रेरणादायक मानी गई।
अंतरिक्ष यात्रा के बाद डॉ. शेख मुज़ाफ़र शुकोर विश्वभर में एक लोकप्रिय मोटिवेशनल स्पीकर (Motivational Speaker) के रूप में भी जाने जाने लगे। वे विज्ञान, चिकित्सा, नेतृत्व और शिक्षा से जुड़े अनेक अंतरराष्ट्रीय मंचों पर युवाओं को प्रेरित करते रहे हैं।
उनके योगदान को देखते हुए उन्हें संयुक्त राष्ट्र के वैश्विक शांति (Global Peace) कार्यक्रम से जुड़े एंबेसडर, 'मेक-ए-विश (Make-A-Wish)' फाउंडेशन के एंबेसडर तथा कैलिफ़ोर्निया के शूराह इस्लामिक काउंसिल द्वारा 'पीस अवार्ड' (Peace Award) सहित अनेक प्रतिष्ठित सम्मान प्रदान किए गए। डॉ. शेख मुज़ाफ़र शुकोर का जीवन यह संदेश देता है कि चिकित्सा विज्ञान, अंतरिक्ष अनुसंधान और मानवीय मूल्यों का समन्वय समाज के लिए नई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है।
आईएसएस पर स्पेसवॉक पूरा करने वाले पहले अरब अंतरिक्ष यात्री बने सुल्तान अलनेयादी
स्पेस वॉक करने वाले पहले अरब अंतरिक्ष यात्री: डॉ. सुल्तान अल नेयादी
यदि आधुनिक दौर में अरब जगत के सबसे चर्चित अंतरिक्ष यात्रियों का उल्लेख किया जाए तो डॉ. सुल्तान अल नेयादी का नाम सबसे प्रमुखता से सामने आता है। संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के इस वैज्ञानिक और अंतरिक्ष यात्री ने न केवल अपने देश को अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में नई पहचान दिलाई, बल्कि पूरे अरब विश्व के लिए एक नया इतिहास भी रचा। वे अंतरिक्ष में स्पेस वॉक (अंतरिक्ष चहलकदमी) करने वाले पहले अरब नागरिक हैं और अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) पर छह महीने तक रहने वाले पहले अरब अंतरिक्ष यात्री भी हैं।
डॉ. सुल्तान अल नेयादी का जन्म 23 मई 1981 को संयुक्त अरब अमीरात के अल ऐन शहर में हुआ था। बचपन से ही विज्ञान और प्रौद्योगिकी में उनकी विशेष रुचि थी। उच्च शिक्षा के लिए उन्होंने यूनाइटेड किंगडम के ब्राइटन विश्वविद्यालय (University of Brighton) से इलेक्ट्रॉनिक्स एवं संचार इंजीनियरिंग में स्नातक की डिग्री प्राप्त की। इसके बाद उन्होंने ऑस्ट्रेलिया की ग्रिफ़िथ यूनिवर्सिटी (Griffith University) से डेटा रिसाव रोकथाम तकनीक (Data Leakage Prevention Technology) विषय में पीएचडी की उपाधि हासिल की। अंतरिक्ष कार्यक्रम से जुड़ने से पहले उन्होंने संयुक्त अरब अमीरात की सशस्त्र सेनाओं (UAE Armed Forces) में नेटवर्क सुरक्षा इंजीनियर के रूप में कार्य किया, जहाँ सूचना सुरक्षा और संचार प्रणाली के क्षेत्र में उनका अनुभव आगे चलकर अंतरिक्ष कार्यक्रम में भी उपयोगी सिद्ध हुआ।
संयुक्त अरब अमीरात ने पिछले कुछ वर्षों में अंतरिक्ष विज्ञान को राष्ट्रीय विकास की प्रमुख प्राथमिकताओं में शामिल किया है। इसी नीति के अंतर्गत यूएई के पहले अंतरिक्ष यात्री हज़्ज़ा अल मंसूरी ने वर्ष 2019 में अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन की यात्रा कर इतिहास रचा। हज़्ज़ा अल मंसूरी की इस उपलब्धि ने देश के अंतरिक्ष कार्यक्रम को नई दिशा दी और उसी प्रेरणा को आगे बढ़ाते हुए डॉ. सुल्तान अल नेयादी को एक दीर्घकालिक मिशन के लिए चुना गया।
2 मार्च 2023 को डॉ. सुल्तान अल नेयादी ने नासा (NASA) और स्पेसएक्स (SpaceX) के क्रू-6 मिशन (Crew-6 Mission) के अंतर्गत अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन के लिए उड़ान भरी। वे एक्सपेडिशन-69 (Expedition 69) दल के सदस्य रहे और लगभग छह महीने तक अंतरिक्ष स्टेशन पर रहकर अनेक वैज्ञानिक अनुसंधानों में भाग लिया।
यह मिशन किसी भी अरब अंतरिक्ष यात्री का अब तक का सबसे लंबा अंतरिक्ष अभियान था। इस दौरान उन्होंने मानव स्वास्थ्य, सूक्ष्म गुरुत्वाकर्षण, जैव विज्ञान, सामग्री विज्ञान और अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी से जुड़े अनेक वैज्ञानिक प्रयोगों में योगदान दिया। इन प्रयोगों का उद्देश्य भविष्य के दीर्घकालिक अंतरिक्ष अभियानों तथा चंद्रमा और मंगल ग्रह की संभावित मानव यात्राओं के लिए नई वैज्ञानिक जानकारी जुटाना था।
डॉ. सुल्तान अल नेयादी की सबसे ऐतिहासिक उपलब्धि 29 अप्रैल 2023 को सामने आई, जब उन्होंने लगभग 7 घंटे 1 मिनट तक अंतरिक्ष स्टेशन के बाहर स्पेस वॉक (Extravehicular Activity) की। इस उपलब्धि के साथ वे अंतरिक्ष में चहलकदमी करने वाले पहले अरब नागरिक बन गए। स्पेस वॉक के दौरान उन्होंने अंतरिक्ष स्टेशन के बाहरी हिस्से में रखरखाव और तकनीकी कार्यों को सफलतापूर्वक पूरा किया। यह उपलब्धि न केवल उनके व्यक्तिगत साहस और प्रशिक्षण का प्रमाण थी, बल्कि संयुक्त अरब अमीरात के अंतरिक्ष कार्यक्रम की तकनीकी क्षमता का भी प्रतीक बनी।
लगभग छह महीने तक सफलतापूर्वक अंतरिक्ष में रहने के बाद वे सुरक्षित पृथ्वी पर लौटे। उनकी इस ऐतिहासिक यात्रा के सम्मान में जनवरी 2024 में संयुक्त अरब अमीरात सरकार ने उन्हें युवा मामलों का राज्य मंत्री (Minister of State for Youth Affairs) नियुक्त किया।
सरकार का उद्देश्य उनके अनुभव, नेतृत्व क्षमता और वैज्ञानिक दृष्टिकोण का लाभ देश के युवाओं तक पहुँचाना था। आज वे विज्ञान, नवाचार, शिक्षा और अंतरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र में नई पीढ़ी को प्रेरित करने वाले प्रमुख व्यक्तित्वों में गिने जाते हैं।
मुस्लिम अंतरिक्ष यात्रियों की उपलब्धियाँ: विज्ञान, शिक्षा और मानवता की साझा विरासत
पिछले चार दशकों में मुस्लिम अंतरिक्ष यात्रियों ने यह सिद्ध किया है कि अंतरिक्ष विज्ञान में सफलता केवल विकसित देशों तक सीमित नहीं है। सऊदी अरब के प्रिंस सुल्तान बिन सलमान अल सऊद ने मुस्लिम और अरब समाज के लिए इस यात्रा की शुरुआत की। सीरिया के मुहम्मद फ़ारिस ने इंटरकोस्मोस कार्यक्रम के माध्यम से इस विरासत को आगे बढ़ाया।
अफ़ग़ानिस्तान के अब्दुल अहद मोमंद ने वैज्ञानिक प्रयोगों, पश्तो भाषा में संवाद और अंतरिक्ष में कुरान ले जाकर एक नया इतिहास रचा। अनुशेह अंसारी ने पहली मुस्लिम महिला और पहली महिला अंतरिक्ष पर्यटक बनकर दुनिया भर की महिलाओं को नई प्रेरणा दी।
डॉ. शेख मुज़ाफ़र शुकोर ने अंतरिक्ष में वैज्ञानिक अनुसंधानों के साथ-साथ रोज़ा और नमाज़ का पालन कर विज्ञान और आस्था के संतुलन का अनूठा उदाहरण प्रस्तुत किया। वहीं हज़्ज़ा अल मंसूरी और डॉ. सुल्तान अल नेयादी ने संयुक्त अरब अमीरात को विश्व के अग्रणी अंतरिक्ष कार्यक्रमों की पंक्ति में खड़ा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
इन सभी अंतरिक्ष यात्रियों की जीवन यात्राओं में एक समान सूत्र स्पष्ट दिखाई देता है उच्च शिक्षा, कठोर प्रशिक्षण, वैज्ञानिक सोच, अनुशासन, दृढ़ संकल्प और अपने देश के प्रति समर्पण। किसी ने सैन्य पायलट के रूप में शुरुआत की, किसी ने इंजीनियरिंग या चिकित्सा को अपना क्षेत्र बनाया, तो किसी ने उद्यमिता के माध्यम से विज्ञान और अंतरिक्ष अनुसंधान को नई दिशा दी। लेकिन अंततः सभी ने यह सिद्ध किया कि अंतरिक्ष तक पहुँचने का मार्ग ज्ञान, अनुसंधान और निरंतर सीखने की प्रक्रिया से होकर गुजरता है।
मुस्लिम अंतरिक्ष यात्रियों की यह प्रेरक गाथा केवल कुछ व्यक्तियों की सफलता की कहानी नहीं है, बल्कि यह पूरी मानवता की वैज्ञानिक प्रगति का प्रतीक है। इन अंतरिक्ष यात्रियों ने अपने-अपने देशों का नाम विश्व मंच पर ऊँचा किया और आने वाली पीढ़ियों के लिए नए सपनों के द्वार खोले।
उन्होंने यह संदेश दिया कि विज्ञान और तकनीक किसी धर्म, भाषा या भौगोलिक सीमा में बँधे नहीं हैं। अंतरिक्ष तक पहुँचना केवल तकनीकी उपलब्धि नहीं, बल्कि शिक्षा, जिज्ञासा, नवाचार, साहस और मानवीय संकल्प की विजय है।
आज जब विश्व चंद्रमा, मंगल और उससे आगे के अभियानों की तैयारी कर रहा है, तब मुस्लिम समाज के इन अंतरिक्ष यात्रियों की उपलब्धियाँ नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी हुई हैं। उनकी विरासत यह विश्वास दिलाती है कि यदि लक्ष्य स्पष्ट हो, शिक्षा मजबूत हो और प्रयास निरंतर हों, तो आकाश भी अंतिम सीमा नहीं है। वास्तव में, अंतरिक्ष मानवता की साझा यात्रा है और उसमें मुस्लिम अंतरिक्ष यात्रियों का योगदान इतिहास के स्वर्णिम अध्यायों में सदैव दर्ज रहेगा।