ब्रिक्स देशों की गुवाहाटी बैठक: सीमाओं से परे ड्रग्स के खिलाफ महामंथन

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 08-07-2026
BRICS Nations' Guwahati Meeting: High-Level Deliberations on Combating Drugs Beyond Borders
BRICS Nations' Guwahati Meeting: High-Level Deliberations on Combating Drugs Beyond Borders

 

पल्लव भट्टाचार्य

जब 6 और 7 जुलाई 2026 को ग्यारह ब्रिक्स देशों के प्रतिनिधि नशीली दवाओं के खिलाफ गुवाहाटी में जुट रहे हैं, तो वे एक ऐसे संकट का जवाब दे रहे हैं जो न तो सीमाओं को मानता है और न ही किसी राजनीतिक व्यवस्था को। आज के दौर में नशीले पदार्थों की तस्करी पहले से कहीं अधिक तेज हो चुकी है। कमजोर सीमाओं, एन्क्रिप्टेड डिजिटल नेटवर्क, क्रिप्टोकरेंसी के लेन-देन और गुप्त रासायनिक प्रयोगशालाओं के सहारे यह काला कारोबार फैल रहा है। यह अपने पीछे उजड़ते हुए परिवार, कमजोर होती संस्थाएं और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर खतरे छोड़ रहा है।

भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता के तहत नार्कोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो द्वारा आयोजित यह सम्मेलन केवल एक सामान्य बहुपक्षीय बैठक नहीं है। यह इस बात की स्पष्ट स्वीकारोक्ति है कि ड्रग्स के खिलाफ लड़ाई अब कोई भी देश अकेले दम पर नहीं जीत सकता है।

इसके लिए आपसी तालमेल, आधुनिक तकनीक, मानवीय पुनर्वास और मजबूत अंतरराष्ट्रीय सहयोग की जरूरत है। इस बैठक के लिए गुवाहाटी शहर का चयन भी बेहद रणनीतिक है। भारत के पूर्वोत्तर का प्रवेश द्वार होने और बदनाम 'गोल्डन ट्रायंगल' यानी स्वर्ण त्रिभुज के नजदीक होने के कारण यह शहर अंतरराष्ट्रीय ड्रग तस्करी के खिलाफ भारत की लड़ाई का मुख्य मोर्चा बन चुका है। यहाँ इस शिखर सम्मेलन का आयोजन वैश्विक समुदाय को एक कड़ा संदेश देता है कि इस समस्या का मुकाबला उसी जगह पर करना होगा जहाँ इसका असर सबसे ज्यादा महसूस होता है।

तीन रणनीतिक प्राथमिकताएं और छह विषयगत सत्र

दो दिनों तक चलने वाली इस बैठक का ढांचा आज के समय के ड्रग्स संकट की जटिलता को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। यह मुख्य रूप से तीन रणनीतिक प्राथमिकताओं पर आधारित है:

  • सिंथेटिक ड्रग्स और उनके निर्माण में इस्तेमाल होने वाले रसायनों की अवैध आपूर्ति को रोकना।
  • सदस्य देशों के बीच खुफिया जानकारी साझा करने और जमीनी तालमेल को मजबूत करना।
  • दीर्घकालिक सहयोग के लिए संस्थागत क्षमताओं का विकास करना।

इन प्राथमिकताओं को छह अलग-अलग विषयगत सत्रों के माध्यम से और अधिक विस्तार दिया गया है। इन सत्रों में वास्तविक समय में ड्रग्स को पकड़ने के लिए डिजिटल तकनीकों के उपयोग पर चर्चा होगी।

डार्कनेट के जरिए होने वाली तस्करी और बाजार में आ रहे नए नशीले पदार्थों से निपटने के तरीके खोजे जाएंगे। वैश्विक रसायन आपूर्ति श्रृंखला की सुरक्षा सुनिश्चित करने के उपाय तलाशे जाएंगे। नशीली दवाओं की मांग को कम करने के अभिनव तौर-तरीकों और लंबे समय तक साथ मिलकर काम करने के लिए मजबूत संस्थागत तंत्र बनाने पर भी गंभीर मंथन होगा।

इस विचार-विमर्श में कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी एआई, सैटेलाइट इमेजरी, ड्रोन से निगरानी, साइबर फोरेंसिक, क्रिप्टोकरेंसी ट्रैकिंग और वित्तीय खुफिया जानकारी का प्रमुखता से उपयोग किया जाएगा। इसके साथ ही इस बैठक का एक बड़ा फोकस मांग को कम करने और पीड़ितों के पुनर्वास पर भी है।

यह वैश्विक सोच में आ रहे एक बड़े बदलाव को दिखाता है। अब नशीली दवाओं के दुरुपयोग को केवल एक अपराध के रूप में नहीं देखा जा रहा है। इसे सार्वजनिक स्वास्थ्य, सामाजिक कल्याण, आर्थिक विकास और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी एक बहुआयामी चुनौती के रूप में स्वीकार किया जा रहा है।

भारत का विजन डॉक्यूमेंट 2026 से 2029

यह शिखर सम्मेलन भारत के नार्कोटिक्स कंट्रोल विजन डॉक्यूमेंट 2026 से 2029 को भी मजबूती देता है। भारत सरकार का यह नया विजन डॉक्यूमेंट एक एकीकृत ढांचा तैयार करने की बात करता है।

इसमें सख्त कानून प्रवर्तन, सिंथेटिक ड्रग्स के रसायनों पर कड़ा नियंत्रण, उपचार और पुनर्वास के अवसरों का विस्तार और नार्को कोऑर्डिनेशन सेंटर के माध्यम से बेहतर तालमेल शामिल है। भारत के ड्रग्स विरोधी अभियान ने हाल के दिनों में रिकॉर्ड जब्ती, दोषियों को सजा और संगठित आपराधिक नेटवर्क की वित्तीय जांच के जरिए बेहतरीन परिणाम दिखाए हैं।

इसके बावजूद सरकार ने यह सही ढंग से स्वीकार किया है कि कोई भी देश केवल पुलिसिया कार्रवाई के दम पर ड्रग्स की समस्या को पूरी तरह खत्म नहीं कर सकता है। अगर बाजार में नशे की लत और उसकी मांग बनी रहेगी, तो एक नेटवर्क के ध्वस्त होने पर दूसरा तुरंत उसकी जगह ले लेगा।

इसलिए गुवाहाटी की यह बैठक केवल कानून लागू करने के पारंपरिक रवैये से आगे बढ़कर एक व्यापक रणनीति की ओर कदम है। यह रणनीति ड्रग्स की आपूर्ति और उसकी मांग दोनों पर एक साथ हमला करती है।

सार्वजनिक स्वास्थ्य और नए सिंथेटिक ड्रग्स का खतरा

जब हम इस समस्या को सार्वजनिक स्वास्थ्य के नजरिए से देखते हैं, तो इसकी गंभीरता और साफ हो जाती है। अब दुनिया भर में ड्रग्स की लत को एक नैतिक या आपराधिक कमजोरी के बजाय एक पुरानी लेकिन इलाज योग्य बीमारी माना जाने लगा है।

नशीले पदार्थों से होने वाला नुकसान सिर्फ ओवरडोज से होने वाली मौतों तक सीमित नहीं है। नशीली दवाओं का दुरुपयोग असुरक्षित इंजेक्शन प्रथाओं के माध्यम से एचआईवी, हेपेटाइटिस बी और हेपेटाइटिस सी के प्रसार को बढ़ाता है।

यह मानसिक बीमारी को गंभीर बनाता है। इसके कारण दिल और तंत्रिका तंत्र से जुड़ी बीमारियां होती हैं। इससे देश की उत्पादकता कमजोर होती है और युवाओं की शिक्षा और रोजगार में बाधा आती है। अंततः यह हंसते-खेलते परिवारों को तोड़ देता है।

आजकल 'नाइटाजीन्स' जैसे अत्यधिक शक्तिशाली सिंथेटिक ओपिओइड और नए नशीले पदार्थों के आने से स्थिति और भी डरावनी हो गई है। ये पदार्थ अक्सर अवैध प्रयोगशालाओं में लगातार बदलते रासायनिक संयोजनों का उपयोग करके बनाए जाते हैं।

ये नए फॉर्मूले सरकारी नियमों और जांच एजेंसियों की पकड़ से बाहर निकल जाते हैं। इसके कारण इनका सेवन करने वाले यूजर्स अनजाने में ही मौत के मुंह में चले जाते हैं। इसलिए नशे की लत से जूझ रहा हर व्यक्ति सिर्फ एक मरीज नहीं है। उसके पीछे उसका पूरा परिवार है जो मानसिक आघात, वित्तीय संकट और सामाजिक कलंक का सामना कर रहा है।

आधुनिक नीति का मुख्य आधार: पुनर्वास और कौशल विकास

यही कारण है कि पुनर्वास को आधुनिक ड्रग नीति का सबसे मजबूत स्तंभ बनाना होगा। किसी भी पीड़ित की रिकवरी सिर्फ डिटॉक्सिफिकेशन या अल्पकालिक परामर्श के साथ खत्म नहीं हो सकती है।

टिकाऊ पुनर्वास का मतलब है कि उस व्यक्ति को शिक्षा, रोजगार और सम्मान के माध्यम से समाज में उसका खोया हुआ स्थान वापस दिलाया जाए। अंतरराष्ट्रीय अनुभव लगातार दिखाते हैं कि बेरोजगारी, सामाजिक बहिष्कार और आर्थिक असुरक्षा ही किसी व्यक्ति को दोबारा नशे की गर्त में धकेलने के सबसे बड़े कारण बनते हैं।

कौशल विकास और व्यावसायिक पुनर्वास कोई बाहरी कल्याणकारी उपाय नहीं हैं। ये ड्रग नियंत्रण नीति के अनिवार्य हिस्से हैं। हर नशामुक्ति कार्यक्रम को व्यवस्थित व्यावसायिक प्रशिक्षण, जीवन कौशल शिक्षा, उद्यमिता सहायता और रोजगार की व्यवस्था से जोड़ा जाना चाहिए।

जब ठीक हो रहे मरीजों को कृषि, खाद्य प्रसंस्करण, डिजिटल सेवाओं, निर्माण, आतिथ्य, हस्तशिल्प या नई तकनीकों में बाजार के अनुकूल कौशल मिलता है, तो वे आर्थिक रूप से स्वतंत्र हो जाते हैं। इससे उनका सामाजिक आत्मविश्वास वापस आता है और उनके हमेशा के लिए ठीक होने की संभावना बढ़ जाती है। निजी क्षेत्र को भी आगे आना होगा। उन्हें इन पुनर्वासित व्यक्तियों के लिए रोजगार के अवसर पैदा करने चाहिए। वहीं वित्तीय संस्थान आसान ऋण और मार्गदर्शन कार्यक्रमों के माध्यम से उन्हें उद्यमी बनने में मदद कर सकते हैं।

भारतीय प्रयास और वैश्विक अनुभवों से सीख

भारत ने इस दिशा में राष्ट्रीय नशामुक्ति कार्य योजना और 'नशा मुक्त भारत अभियान' के माध्यम से उत्साहजनक कदम उठाए हैं। आज देश भर में सैकड़ों नशामुक्ति केंद्र काम कर रहे हैं। सामुदायिक जागरूकता अभियानों का बड़े पैमाने पर विस्तार हुआ है।

राष्ट्रीय नशामुक्ति हेल्पलाइन उपचार के लिए एक महत्वपूर्ण माध्यम बनकर उभरी है। इलाज के लिए खुद आगे आने वाले लोगों की बढ़ती संख्या इन सरकारी प्रयासों में जनता के बढ़ते विश्वास को दिखाती है। फिर भी अगले चरण में हमारा पूरा ध्यान गुणवत्ता, पहुंच और दीर्घकालिक परिणामों पर होना चाहिए। पुनर्वास केंद्रों को अब एकीकृत रिकवरी हब के रूप में विकसित होना होगा जहाँ डॉक्टरों, मनोचिकित्सकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और प्लेसमेंट एजेंसियों की टीमें एक साथ मिलकर काम करें।

इस मामले में वैश्विक अनुभव हमें कई मूल्यवान सबक देते हैं:

  • पुर्तगाल का मॉडल:पुर्तगाल ने दिखाया कि लत के साथ जुड़े आपराधिक कलंक को कम करकेऔर इलाज तक पहुंच बढ़ाकर मौतों और एचआईवी के प्रसार को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
  • थाईलैंड का मॉडल:थाईलैंड ने स्थानीय स्वयंसेवकों और डिजिटल मॉनिटरिंग प्लेटफॉर्म के सहयोग से समुदाय आधारित उपचार प्रणालियाँ विकसित की हैं जो इलाज के बाद भी लगातार फॉलो-अप सुनिश्चित करती हैं।
  • यूएनओडीसी की पहल:संयुक्त राष्ट्र की स्केलअप पहल दिखाती है कि कैसे अंतरराष्ट्रीय सहयोग प्रभावी उपचारों को तेजी से लागू करने में मदद कर सकता है।
  • चीन का अनुभव:चीन का संस्थागत उपचार और सामुदायिक पुनर्वास का मिश्रण भी इलाज की क्षमता बढ़ाने में उपयोगी अंतर्दृष्टि प्रदान करता है।

भले ही किसी एक मॉडल को पूरी तरह से हर जगह लागू नहीं किया जा सकता है, लेकिन ये सभी एक सरल सत्य की पुष्टि करते हैं। लत को प्राथमिक रूप से एक स्वास्थ्य स्थिति के रूप में मानना केवल दंडात्मक उपायों पर निर्भर रहने की तुलना में अधिक टिकाऊ परिणाम देता है।

राष्ट्रीय सुरक्षा और ब्रिक्स देशों की भूमिका

गुवाहाटी शिखर सम्मेलन नशीले पदार्थों के नियंत्रण और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच बढ़ते जुड़ाव को भी रेखांकित करता है। आज ड्रग्स की तस्करी से होने वाली कमाई का इस्तेमाल संगठित अपराध, उग्रवादी आंदोलनों, आतंकवाद और मनी लॉन्ड्रिंग के लिए हो रहा है।

म्यांमार में राजनीतिक अस्थिरता ने स्वर्ण त्रिभुज में नशीले पदार्थों के उत्पादन को और बढ़ा दिया है। इसका सीधा दबाव भारत के पूर्वोत्तर राज्यों पर पड़ रहा है। यहाँ का कठिन भूगोल, खुली सीमाएं और सीधे-सादे स्थानीय समुदाय संगठित तस्करी नेटवर्क के लिए अनुकूल परिस्थितियां बनाते हैं। असम इस वजह से एक पारगमन गलियारा और रणनीतिक युद्धक्षेत्र दोनों बनकर उभरा है।

आपूर्ति को प्रभावी ढंग से रोकने के लिए केवल नियमित पुलिसिंग से काम नहीं चलेगा। इसके लिए समन्वित सीमा प्रबंधन, आधुनिक निगरानी तकनीक, अवैध प्रयोगशालाओं को नष्ट करने, रसायनों के सख्त नियमन और तस्करों की अवैध संपत्ति को जब्त करने वाली वित्तीय जांच की आवश्यकता है। इसके साथ ही उन समुदायों के लिए स्थायी आजीविका के विकल्प तैयार करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है जो आर्थिक रूप से इस अवैध खेती या तस्करी पर निर्भर हो चुके हैं।

यही वह मोर्चा है जहाँ ब्रिक्स देश एक क्रांतिकारी योगदान दे सकते हैं। साथ मिलकर ये देश दुनिया की दो-तिहाई से अधिक आबादी का प्रतिनिधित्व करते हैं। इनमें प्रमुख उत्पादक, पारगमन और उपभोक्ता क्षेत्र शामिल हैं।

तकनीक, वित्तीय खुफिया जानकारी और सीमा प्रबंधन में उनकी सामूहिक क्षमताएं वैश्विक सहयोग के लिए एक असाधारण आधार प्रदान करती हैं। रीयल-टाइम खुफिया जानकारी के आदान-प्रदान के लिए एक स्थायी ब्रिक्स एंटी-ड्रग संपर्क अधिकारी तंत्र बनाया जा सकता है।

नए नशीले पदार्थों के लिए एक साझा अर्ली वार्निंग सिस्टम इनके अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फैलने से पहले ही इन्हें विनियमित करने में मदद करेगा। साइबर जांच और डार्कनेट निगरानी में संयुक्त प्रशिक्षण कार्यक्रम प्रवर्तन क्षमताओं को मजबूत करेंगे। इसके साथ ही ब्रिक्स को पुनर्वास पर भी सहयोग को संस्थागत बनाना चाहिए ताकि ग्लोबल साउथ की वास्तविकताओं के अनुकूल समाधान विकसित किए जा सकें।

 कार्यान्वयन ही सफलता की कुंजी है

अंततः गुवाहाटी पहल की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि फैसलों को जमीन पर कितने प्रभावी ढंग से लागू किया जाता है। ड्रग नियंत्रण केवल पुलिस थानों और अदालतों तक सीमित नहीं रह सकता है।

इसे स्कूलों की कक्षाओं, स्वास्थ्य संस्थानों, कार्यस्थलों और परिवारों तक पहुँचना होगा। निवारक शिक्षा की शुरुआत स्कूलों में जल्दी होनी चाहिए। मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को नशामुक्ति उपचार का अभिन्न अंग बनना होगा। सरकार को तस्करों का बेरहमी से पीछा करना चाहिए, लेकिन इसके साथ ही लत से जूझ रहे नागरिकों के प्रति करुणा और अवसर की भावना भी रखनी होगी। पुनर्वास का समापन केवल नशा छोड़ने में नहीं बल्कि एक उत्पादक नागरिक बनने में होना चाहिए।

गुवाहाटी में ब्रिक्स देशों की यह बैठक एक बेहद महत्वपूर्ण मोड़ पर हो रही है। यह नशीले पदार्थों के खिलाफ भारत के नए घरेलू संकल्प और इस सोच के साथ मेल खाती है कि लत और तस्करी आपस में जुड़ी चुनौतियां हैं।

यदि गुवाहाटी इस साझा चिंता को निरंतर सामूहिक कार्रवाई में बदलने में सफल रहता है, तो यह साबित होगा कि नशीले पदार्थों के खिलाफ सबसे प्रभावी हथियार केवल सख्त कानून नहीं हैं बल्कि मजबूत समाज हैं। ऐसे समाज जो सतर्कता के साथ अपनी सीमाओं की रक्षा करते हैं, जागरूकता के साथ अपने समुदायों को बचाते हैं और करुणा, अवसर और आशा के साथ अपने नागरिकों का हाथ थामते हैं।