बाबा ताजुद्दीन उर्स से गूंजा सद्भाव और राष्ट्रीय एकता का संदेश

Story by  मलिक असगर हाशमी | Published by  [email protected] | Date 11-07-2026
Message of harmony and national unity resonates from the Baba Tajuddin Urs.
Message of harmony and national unity resonates from the Baba Tajuddin Urs.

 

आवाज द वाॅयस/ नागपुर

महाराष्ट्र के नागपुर में स्थित हज़रत बाबा ताजुद्दीन औलिया की दरगाह बुधवार को देश की साझा सांस्कृतिक विरासत, आध्यात्मिक परंपरा और राष्ट्रीय एकता का केंद्र बन गई। 104वें वार्षिक उर्स मुबारक के अवसर पर आयोजित सूफ़ी इंटरफेथ कॉन्फ्रेंस में देश के विभिन्न धर्मों, संप्रदायों और आध्यात्मिक परंपराओं के प्रतिनिधि एक मंच पर जुटे। सम्मेलन का संदेश स्पष्ट था। भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी विविधता है। अलग अलग आस्थाओं के बावजूद दिलों की एकजुटता ही देश की असली पहचान है।

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उर्स के पहले दिन पारंपरिक परचम कुशाई की रस्म अदा की गई। इस ऐतिहासिक अवसर के साक्षी बनने के लिए एक लाख से अधिक श्रद्धालु दरगाह परिसर में पहुंचे। सुबह से ही दरगाह पर जायरीन की लंबी कतारें दिखाई दीं। लोगों ने बाबा ताजुद्दीन औलिया की दरगाह पर हाजिरी दी और देश में अमन, भाईचारे और खुशहाली की दुआ मांगी।

इस वर्ष आयोजित सूफ़ी इंटरफेथ कॉन्फ्रेंस भारतीय सर्व धर्म संसद के तत्वावधान में हुई। कार्यक्रम का नेतृत्व राष्ट्रीय संयोजक महर्षि भृगु पीठाधीश्वर श्री गुरुजी गोस्वामी सुशील जी महाराज ने किया।

सम्मेलन की मेजबानी बाबा ताजुद्दीन औलिया ट्रस्ट ने की। ट्रस्ट के अध्यक्ष और महाराष्ट्र राज्य अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष प्यारे ज़िया खान तथा ट्रस्ट के सचिव ताज अहमद ने देशभर से आए संतों, सूफ़ी संतों, धर्माचार्यों और अतिथियों का स्वागत किया।

सम्मेलन में अजमेर शरीफ से चिश्ती फाउंडेशन के गद्दीनशीन हाजी सैयद सलमान चिश्ती विशेष रूप से मौजूद रहे। उन्होंने अपने संबोधन में कहा कि दुनिया आज युद्ध, हिंसा, नस्लभेद और सत्ता के दुरुपयोग जैसी गंभीर चुनौतियों का सामना कर रही है। ऐसे समय में भारत अपनी सदियों पुरानी सूफ़ी परंपरा और संतों की शिक्षाओं के माध्यम से पूरी दुनिया को प्रेम, करुणा और इंसानियत का रास्ता दिखा सकता है।

उन्होंने कहा कि हज़रत बाबा ताजुद्दीन औलिया की दरगाह केवल एक धार्मिक स्थल नहीं है। यह सद्भाव, सहअस्तित्व और मानवीय मूल्यों की जीवंत पाठशाला है। यहां हर धर्म, हर भाषा और हर समुदाय के लोग बिना किसी भेदभाव के एक साथ आते हैं।

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यही भारत की वास्तविक आध्यात्मिक पहचान है। उन्होंने सूफ़ी संदेश को दोहराते हुए कहा कि सबसे मोहब्बत करो और किसी से नफ़रत मत करो। यही संदेश आज भी दुनिया की सबसे बड़ी जरूरत है।

भारतीय सर्व धर्म संसद के राष्ट्रीय संयोजक श्री गुरुजी गोस्वामी सुशील जी महाराज ने कहा कि भारत की संस्कृति विविधताओं को जोड़ने वाली संस्कृति है। उन्होंने कहा कि अलग अलग धर्म अलग रास्ते हो सकते हैं, लेकिन सभी का लक्ष्य मानवता की सेवा और सत्य की स्थापना है। नागपुर की इस पवित्र धरती से उन्होंने पूरे देश में राष्ट्रीय एकता और सामाजिक सद्भाव का संदेश देने का आह्वान किया।

योग मनीषी आचार्य श्री विवेक मुनि जी महाराज ने कहा कि प्रेम और अहिंसा सभी धर्मों का मूल आधार हैं। जब विभिन्न परंपराओं के संत एक मंच पर बैठते हैं तो समाज में विश्वास बढ़ता है और दूरियां कम होती हैं। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में ऐसे संवाद देश और दुनिया दोनों के लिए आवश्यक हैं।

दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के मुख्य सलाहकार और गुरुद्वारा श्री बंगला साहिब के पूर्व अध्यक्ष परमजीत सिंह चंडोक ने गुरु नानक देव जी की शिक्षाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि ईश्वर की एक ही ज्योति हर इंसान में विद्यमान है। बाबा ताजुद्दीन औलिया की दरगाह पर विभिन्न धर्मों के लोगों की उपस्थिति उसी संदेश को मजबूत करती है।

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अखिल भारतीय रविदासिया धर्म संगठन के राष्ट्रीय प्रेस सचिव स्वामी वीर सिंह हितकारी जी महाराज ने संत रविदास की शिक्षाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि समानता और सामाजिक न्याय पर आधारित समाज ही मजबूत राष्ट्र की नींव बन सकता है। उन्होंने कहा कि ऐसे आयोजन जाति, पंथ और भाषा से ऊपर उठकर लोगों को जोड़ने का काम करते हैं।

भारत तिब्बत सहयोग मंच के वरिष्ठ सलाहकार आचार्य येशी फुंटसोक ने कहा कि करुणा पूरी मानवता का साझा धर्म है। उन्होंने कहा कि चाहे हिमालय हो या दक्कन, हर आध्यात्मिक परंपरा का संदेश शांति, सहिष्णुता और मानवीय मूल्यों को मजबूत करना है।

हैदराबाद से आए सैयद आले मुस्तफा कादरी मूसवी ने कहा कि दक्कन की सूफ़ी परंपरा और नागपुर की आध्यात्मिक विरासत दोनों का मूल संदेश प्रेम और इंसानियत है। उनके अनुसार उर्स केवल धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि दिलों को जोड़ने वाला आध्यात्मिक उत्सव है।

कार्यक्रम के दौरान ट्रस्ट अध्यक्ष प्यारे ज़िया खान ने कहा कि बाबा ताजुद्दीन औलिया पूरी इंसानियत के हैं। उनकी दरगाह आज भी देश की गंगा जमुनी तहजीब का जीवंत प्रतीक है। यहां हर धर्म के लोग समान श्रद्धा के साथ आते हैं। उन्होंने कहा कि ऐसे आयोजन दुनिया को बताते हैं कि भारत की ताकत उसकी साझी विरासत और सामाजिक सद्भाव में है।

ट्रस्ट के सचिव ताज अहमद ने आयोजन को सफल बनाने में प्रशासन, स्वयंसेवकों और लाखों श्रद्धालुओं के सहयोग के लिए आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि उर्स का उद्देश्य समाज में भाईचारा, आपसी विश्वास और राष्ट्रीय एकता को मजबूत करना है।

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सम्मेलन से पहले सभी धर्मगुरुओं ने डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर की दीक्षाभूमि पहुंचकर श्रद्धांजलि अर्पित की। इस अवसर पर न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व जैसे संवैधानिक मूल्यों के प्रति सामूहिक प्रतिबद्धता व्यक्त की गई। उपस्थित वक्ताओं ने कहा कि भारत का संविधान और उसकी आध्यात्मिक परंपराएं दोनों समाज को जोड़ने का कार्य करती हैं।

सम्मेलन के दौरान सूफ़ी कव्वाली और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों ने पूरे वातावरण को आध्यात्मिक रंगों से भर दिया। कलाकारों ने भारत की साझा सांस्कृतिक विरासत और सूफ़ी परंपरा को संगीत के माध्यम से प्रस्तुत किया। श्रद्धालुओं ने देर तक इन प्रस्तुतियों का आनंद लिया और सूफ़ी संदेश के साथ अपनी सहभागिता दर्ज कराई।

कार्यक्रम के समापन पर सभी धर्मगुरुओं ने एक स्वर में यह संकल्प दोहराया कि देश में सामाजिक सद्भाव, धार्मिक सौहार्द, राष्ट्रीय एकता और मानवीय मूल्यों को मजबूत करने के लिए मिलकर कार्य किया जाएगा। वक्ताओं ने कहा कि आज जब दुनिया संघर्ष, नफ़रत और विभाजन जैसी चुनौतियों से जूझ रही है, तब भारत की सूफ़ी परंपरा और संतों की विरासत पूरी दुनिया के लिए आशा का संदेश बन सकती है।

नागपुर का यह आयोजन केवल एक धार्मिक सम्मेलन नहीं रहा। यह भारत की उस साझा विरासत का जीवंत उदाहरण बना, जिसमें अलग अलग आस्थाएं एक साथ खड़ी होकर इंसानियत, प्रेम और भाईचारे का संदेश देती हैं।

सम्मेलन के अंत में एक बार फिर वही संदेश गूंजा जिसने सदियों से सूफ़ी परंपरा को जीवित रखा है।सबसे मोहब्बत, किसी से नफ़रत नहीं।यही संदेश आज भी भारत की सभ्यतागत शक्ति और विश्व शांति की सबसे मजबूत पहचान माना जाता है।