विश्व जनसंख्या दिवसः क्या भारत में मुसलमान हिंदुओं से अधिक हो जाएंगे?

Story by  मंजीत ठाकुर | Published by  [email protected] | Date 11-07-2026
World Population Day: Will the Muslim population in India surpass the Hindu population?
World Population Day: Will the Muslim population in India surpass the Hindu population?

 

-मंजीत ठाकुर

खबर यह है कि साल 2026 में दुनिया की आबादी 8.3 अरब हो गई है. संयुक्त राष्ट्र के World Population Prospects 2024 के अनुसार, 2050 तक दुनिया की आबादी लगभग 9.7 अरब (970 करोड़) होने का अनुमान है. जो 2080 तक 10.8 अरब को पार कर जाएगी.इस रिपोर्ट में कहा गया है कि आज दुनिया के हर 100 लोगों में लगभग 18 लोग भारत में रहते हैं, यानी वैश्विक आबादी का लगभग 17.5–18 फीसद हिस्सा भारत में निवास करता है।

लेकिन हिंदुस्तान में तेजी से बढ़ती जनसंख्या का भय के धार्मिक पहलू भी हैं. यहां सवाल उठाया जाता है कि भारत में मुसलमान अधिक बच्चे पैदा करते हैं और इसलिए देश की आबादी बढ़ रही है. यह सवाल भ्रम और दहशत पैदा करने वाला है.

कई लोग ऐसे हैं जो मुसलमानों की आबादी बढ़ने की बात कहकर हिंदुओं से अधिक बच्चे पैदा करने के लिए कह रहे हैं, इससे जुड़े मेसेज सोशल मीडिया पर वायरल कराए जाते हैं. इस डर के पीछे इस्लामोफोबिया एक बड़ी वजह है.

भारत की आबादी में विभिन्‍न धर्मों की हिस्‍सेदारी पर जो आंकड़े हैं उसके विश्लेषण से पता चलता है कि अगले बीस साल में मुस्लिमों और हिंदुओं की प्रजनन दर में अंतर खत्‍म हो जाएगा. इसका मतलब यह हुआ कि जितने बच्चे हिंदुओं के पैदा होंगे इतने ही मुसलमानों के.बहरहाल, आम लोगों में यह धारणा बेहद मजबूत बना दी गई है कि मुस्लिमों की आबादी बढ़ने से हिंदुओं को खतरा है.
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डर, तथ्य और जनगणना की कहानी

भारत में समय-समय पर यह आशंका व्यक्त की जाती रही है कि मुसलमानों की आबादी इतनी तेजी से बढ़ रही है कि एक दिन वे हिंदुओं से अधिक हो जाएंगे. चुनावी भाषणों, सोशल मीडिया और टीवी बहसों में यह सवाल अक्सर उठता है. लेकिन क्या जनसंख्या विज्ञान भी यही कहता है? क्या सरकारी आंकड़े और अंतरराष्ट्रीय शोध इस आशंका की पुष्टि करते हैं?

इस प्रश्न का उत्तर भावनाओं से नहीं, बल्कि जनगणना के आंकड़ों, राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस) और प्यू रिसर्च सेंटर जैसे विश्वसनीय अध्ययनों से खोजा जाना चाहिए.

जनसांख्यिकी का आईना: 1947 से 2011 तक की यात्रा

भारत में 1951 के बाद से अब तक कोई भी जनगणना या जनसांख्यिकीय अध्ययन यह नहीं कहता कि मुसलमान भविष्य में हिंदुओं से अधिक हो जाएंगे.हाँ, यह अवश्य है कि स्वतंत्रता के बाद मुसलमानों की आबादी का प्रतिशत बढ़ा है, लेकिन उसी अवधि में हिंदू आज भी लगभग 80 प्रतिशत आबादी के साथ स्पष्ट बहुसंख्यक बने हुए हैं.1947 में देश के विभाजन के बाद यह माना जा रहा था कि भारत में अधिकांश मुसलमान पाकिस्तान चले जाएंगे. ऐसा नहीं हुआ.

1951 की पहली जनगणना में मुस्लिमों की आबादी करीब 10 फीसद थी. जो 2011 की जनगणना के मुताबिक बढ़कर देश की कुला आबादी का 14.2 फीसद हो गए.

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1951 की जनगणना
हिंदू : 84.1%
मुसलमानः 9.8%
ईसाई : 2.3%
सिख : 1.8%

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2011 की जनगणना
हिंदू : 79.8%
मुसलमान : 14.2%
ईसाई : 2.3%
सिख : 1.7%


यानी, आंकड़ों के लिहाजसे हिंदुओं की हिस्सेदारी लगभग 4.3 प्रतिशत अंक घट गई जबकि मुसलमानों की हिस्सेदारी लगभग 4.4 प्रतिशत अंक बढ़ी. यह परिवर्तन हुआ जरूर, लेकिन उतना बड़ा नहीं जितना अक्सर बहसों में पेश किया जाता है.

लेकिन यह केवल मुसलमानों के साथ नहीं हुआ. भारत की पूरी आबादी ही तीन गुना से अधिक हो गई. आजादी के ठीक बाद भारत की आबादी 36.1 करोड़ थी जो बढ़कर 2011 में लगभग 121 करोड़ हो गई.तो फिर समाज में डर क्यों पैदा होता है? इसका कारण है जनसंख्या वृद्धि दर और जनसंख्या में हिस्सेदारी के बीच का अंतर. दोनों अलग बातें हैं.

उदाहरण के लिए, यदि हिंदुओं की वृद्धि दर 17 प्रतिशत है और मुसलमानों की 25 प्रतिशत, तो इसका अर्थ यह नहीं कि मुसलमान कुल संख्या में हिंदुओं से आगे निकल जाएंगे क्योंकि शुरुआती आधार (बेस पॉप्युलेशन) दोनों का बिल्कुल अलग है.

मान लीजिए 100 लोगों में 80 हिंदू हैं 15 मुसलमान हैं. यदि हिंदू 17 प्रतिशत बढ़ें तो वे 94 हो जाएंगे. यदि मुसलमान 25 प्रतिशत बढ़ें तो वे 19 होंगे. वृद्धि दर अधिक होने के बावजूद दोनों के बीच का अंतर बहुत बड़ा बना रहता है.यही कारण है कि जनसंख्या विज्ञान केवल वृद्धि दर नहीं देखता, बल्कि कुल आबादी, प्रजनन दर, आयु संरचना, शिक्षा और शहरीकरण को भी साथ लेकर चलता है.
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क्या मुसलमान सबसे तेजी से बढ़े?

इसका सीधा जवाब है- हाँ. लेकिन पूरी कहानी इससे कहीं अधिक दिलचस्प है.1951–61 के दशक में मुसलमानों की जनसंख्या लगभग 32.7 प्रतिशत बढ़ी थी. जबकि पूरे भारत की वृद्धि लगभग 21.6 प्रतिशत थी. लेकिन बाद के दशकों में यह अंतर लगातार कम होता गया.

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2001–2011 में जनसंख्या वृद्धि
भारत की कुल वृद्धि : 17.7%
मुसलमानों की वृद्धि : 24.7%
हिंदुओं की वृद्धि : 16.8%

केवल जनसंख्या के प्रतिशत को देखकर यह निष्कर्ष निकाल लेना कि भारत में मुसलमान जल्द ही हिंदुओं से अधिक हो जाएंगे, उपलब्ध जनसांख्यिकीय आंकड़ों से समर्थित नहीं है.1951 से 2011 तक मुसलमानों की आबादी का हिस्सा बढ़ा है, लेकिन उसी अवधि में हिंदू देश की लगभग चार-पाँचवें हिस्से की आबादी बने रहे हैं. जनसंख्या विज्ञान यह भी बताता है कि भविष्य का अनुमान केवल वर्तमान वृद्धि दर से नहीं लगाया जा सकता; इसके लिए प्रजनन दर, शिक्षा, स्वास्थ्य, शहरीकरण और सामाजिक-आर्थिक बदलाव जैसे कई कारकों का विश्लेषण आवश्यक है.
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प्रजनन दर का गिरता ग्राफ

प्रजनन दर (टोटल फर्टिलिटी रेट- टीएफआर) जनसंख्या वृद्धि का सबसे सटीक सूचक है. किसी भी समुदाय की जनसंख्या कितनी बढ़ेगी, यह उस समुदाय की महिलाओं की प्रजनन दर पर निर्भर करता है.
टीएफआर का अर्थ है कि एक महिला अपने पूरे प्रजनन काल (15–49 वर्ष) में औसतन कितने बच्चों को जन्म देती है.

यदि किसी देश की टीएफआर लगभग 2.1 है, तो इसे प्रजनन प्रतिस्थापन स्तर (Replacement Level Fertility) कहा जाता है. इसका अर्थ है कि अगली पीढ़ी लगभग पिछली पीढ़ी के बराबर रहेगी. इससे नीचे जाने पर, यदि प्रवास न हो, तो लंबे समय में आबादी स्थिर होने या घटने लगती है.

‘राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण’ (एनएफएचएस-5, 2019-21) के आंकड़ों के अनुसार, भारत के सभी समुदायों में प्रजनन दर में भारी गिरावट आई है.हिंदू समुदाय की प्रजनन दर 2.1 से घटकर 1.94 हो गई है, जबकि मुस्लिम समुदाय की प्रजनन दर 2.6 से तेजी से गिरकर 2.36 हो गई है.

आंकड़ों से यह साफ होता है कि मुसलमानों की प्रजनन दर में गिरावट की गति अन्य समुदायों की तुलना में कहीं अधिक तेज है. जब प्रजनन दर 2.1 पर आ जाती है, तो इसे ‘प्रतिस्थापन स्तर’ (रिप्लेसमेंट लेवल) माना जाता है, जिसका अर्थ है कि जनसंख्या का स्थिरता की ओर बढ़ना. भारत के अधिकांश समुदाय इस स्तर या इससे नीचे आ चुके हैं.

हालांकि, एक तथ्य यह है कि भारत में मुसलमानों की टीएफआर सबसे अधिक है? आंकड़ों के मुताबिक, 1992 में एक मुस्लिम महिला औसतन 4.4 बच्चे, जबकि एक हिंदू महिला 3.3 बच्चे पैदा कर रही थी. दोनों के बीच 1.1 बच्चे का अंतर था.तो आज आज स्थिति क्या है? यही वह तथ्य है जो अक्सर सार्वजनिक बहसों में छूट जाता है.

2015–16 (एनएफएचएस-4) के उपलब्ध धर्मवार आंकड़ों के अनुसार, मुसलमानों की टीएफआर 4.4 से घटकर 2.6 हो गई और हिंदुओं की टीएफआर 3.3 से घटकर 2.1 रह गई.  सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मुस्लिम और हिंदू महिलाओं के बीच औसत बच्चों का अंतर 1.1 से घटकर केवल 0.5 रह गया.

एनएफएचएस-5 के आधार पर प्यू रिसर्च और अन्य जनसांख्यिकीय अध्ययनों के अनुसार यह गिरावट आगे भी जारी रही. 2019–21 के बीच की अवधि में मुसलमानों की टीएफआर लगभग 2.4, जबकि भारत की कुल टीएफआर लगभग 2.0 तक आ गई. यानी मुस्लिम समुदाय में भी जन्म दर लगातार घट रही है.
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मुसलमानों की जनसंख्या वृद्धि: मिथक बनाम सत्य

अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि मुस्लिम आबादी ‘विस्फोटक’ गति से बढ़ रही है. यदि हम 1991-2001 और 2001-2011 के दशकों की तुलना करें, तो मुस्लिम समुदाय की दशकवार वृद्धि दर में भी महत्वपूर्ण गिरावट आई है. 1991-2001 के बीच मुस्लिम आबादी की वृद्धि दर 29.5 प्रतिशत थी, जो 2001-2011 के दौरान घटकर 24.6 प्रतिशत रह गई.

यह वैज्ञानिक तथ्य है कि किसी भी समुदाय की जनसंख्या वृद्धि दर पर शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच, आर्थिक स्थिति और महिला सशक्तिकरण का सीधा प्रभाव पड़ता है. जैसे-जैसे इन समुदायों में साक्षरता बढ़ी है, विशेषकर महिलाओं की शिक्षा, उनकी प्रजनन दर में स्वतः ही गिरावट दर्ज की गई है.
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भारत में टीएफआर घटने का क्या कारण रहा?

कई लोग इसे केवल धर्म से जोड़ते हैं, जबकि अधिकांश जनसांख्यिकी विशेषज्ञ इससे सहमत नहीं हैं. अध्ययनों के अनुसार जन्म दर को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक हैं: महिलाओं की शिक्षा, विवाह की औसत आयु, शहरीकरण, आय में वृद्धि, स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच और गर्भनिरोधक साधनों का उपयोग. यानी गरीब, कम शिक्षित और ग्रामीण परिवार, चाहे वे किसी भी धर्म के हों, सामान्यतः अधिक बच्चे पैदा करते हैं. जैसे-जैसे शिक्षा और आर्थिक स्थिति बेहतर होती है, परिवार छोटे होते जाते हैं.

राज्यों की तस्वीर और भी दिलचस्प है. भारत में धर्म से अधिक राज्य और विकास स्तर जन्म दर को प्रभावित करते हैं. केरल में हिंदू और मुस्लिम, दोनों की टीएफआर राष्ट्रीय औसत से काफी कम है.  तमिलनाडु, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में भी यही प्रवृत्ति दिखाई देती है. इसके उलट, बिहार, उत्तर प्रदेश और झारखंड जैसे राज्यों में हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदायों में जन्म दर अपेक्षाकृत अधिक रही है. इससे स्पष्ट होता है कि भौगोलिक और सामाजिक परिस्थितियां धार्मिक पहचान जितनी ही महत्वपूर्ण हैं.
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2050 तक भारत की धार्मिक आबादी कैसी होगी? प्रोजेक्शन, मिथक और वास्तविकता

हमने पहले चर्चा की है कि 1951 से 2011 तक भारत की धार्मिक संरचना में बदलाव तो आया, लेकिन हिंदू देश में स्पष्ट बहुसंख्यक बने रहे और मुसलमानों की प्रजनन दर (टीएफआर) आज भी हिंदुओं से कुछ अधिक है, लेकिन पिछले तीन दशकों में इसमें सबसे तेज गिरावट भी मुसलमानों में ही दर्ज की गई है.

अब सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह हैः क्या भविष्य में मुसलमान भारत में हिंदुओं से अधिक हो जाएंगे? क्या किसी विश्वसनीय शोध संस्था ने ऐसा अनुमान लगाया है? इस प्रश्न का उत्तर खोजने के लिए हमें जनसंख्या विज्ञान के सबसे प्रतिष्ठित अध्ययनों की ओर देखना होगा.
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भारत की आबादी 2050 में कितनी होगी?

भारत सरकार धार्मिक आधार पर भविष्य की जनसंख्या का आधिकारिक प्रोजेक्शन जारी नहीं करती. लेकिन दुनिया की सबसे प्रतिष्ठित शोध संस्थाओं में से एक प्यू रिसर्च सेंटर ने संयुक्त राष्ट्र, भारत की जनगणना और अन्य जनसांख्यिकीय आंकड़ों के आधार पर भारत की धार्मिक संरचना के भविष्य का विस्तृत अध्ययन प्रकाशित किया है.

उपलब्ध जनगणना, एनएफएचएस, संयुक्त राष्ट्र और प्यू रिसर्च सेंटर के अध्ययनों का समग्र निष्कर्ष यह है कि भारत में मुसलमानों की आबादी का प्रतिशत आने वाले दशकों में कुछ बढ़ सकता है, जबकि हिंदुओं का प्रतिशत कुछ घट सकता है. लेकिन उपलब्ध वैज्ञानिक प्रक्षेपणों के अनुसार 2050 तक भी हिंदू भारत में स्पष्ट और बड़े बहुमत के साथ सबसे बड़ा धार्मिक समुदाय बने रहेंगे.

द फ्यूचर ऑफ वर्ल्ड रिलीजन्सः पॉप्युलेशन ग्रोथ प्रोजेक्शन्स, 2010-2050 नाम के इस अध्ययन में प्यू रिसर्च सेंटर ने अनुमान लगाया है कि भारत की आबादी में मुसलमानों का प्रतिशत बढ़ेगा और हिंदुओं का प्रतिशत कुछ घटेगा. लेकिन 2050 तक भी हिंदू भारत में लगभग चार गुना अधिक रहेंगे.

अध्ययन के मुताबिक, मुसलमानों की जनसंख्या अनुमानित रूप से 2050 तक 18 फीसद तक हो जाएगी यानी यह करीब 3.8 फीसद की बढ़ोतरी होगी, जबकि हिंदुओं की आबादी में 3.5 फीसद की कमी होगी और वह 76 फीसद हो जाएंगे.

डर से परे वैज्ञानिक समझ

अंकगणित और सांख्यिकी यह स्पष्ट करते हैं कि भारत में ‘जनसंख्या असंतुलन’ का डर केवल एक निराधार भय है. भारत की विकास यात्रा में सभी समुदायों ने अपने प्रजनन व्यवहार में परिवर्तन किया है. शिक्षा और जागरूकता के प्रसार ने सभी समुदायों को छोटे परिवार के लाभ समझने में मदद की है.

भारत में मुसलमानों के हिंदुओं से अधिक होने का दावा न केवल तथ्यात्मक रूप से गलत है, बल्कि यह जनसांख्यिकीय संक्रमण की वैज्ञानिक प्रक्रिया को भी अनदेखा करता है. भारत जैसे विविध और बड़े देश में जनसंख्या को धर्म के चश्मे से देखने के बजाय विकास के चश्मे से देखना आवश्यक है, ताकि हम एक राष्ट्र के रूप में वास्तविक चुनौतियों, जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार पर ध्यान केंद्रित कर सकें.

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