बिहार में लाइब्रेरी और कंप्यूटर शिक्षा की चुनौती

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 25-06-2026
The Challenge of Library and Computer Education in Bihar
The Challenge of Library and Computer Education in Bihar

 

fचांदनी कुमारी

देश में नई शिक्षा नीति, डिजिटल शिक्षा और गुणवत्तापूर्ण पढ़ाई के स्तर को बेहतर बनाने के लिए सरकार लगातार प्रयास कर रही है, लेकिन आज भी ग्रामीण भारत के अनेक सरकारी स्कूल ऐसे हैं जहां बच्चे किताबों और तकनीक की दुनिया से पूरी तरह नहीं जुड़ पा रहे हैं। विशेषकर बिहार के ग्रामीण क्षेत्रों में स्थिति यह है कि स्कूलों में लाइब्रेरी और कंप्यूटर की सुविधा उपलब्ध तो है, लेकिन उनका उपयोग बच्चों की पढ़ाई में नहीं हो पा रहा है।

ऐसे में शिक्षा केवल पाठ्यपुस्तकों तक सीमित होकर रह जाती है और बच्चों को वह अवसर नहीं मिल पाता, जो आज के समय में उनकी जरूरत बन चुका है। बिहार के सीतामढ़ी जिले के ललितपुर गांव स्थित उच्च माध्यमिक विद्यालय की तस्वीर भी कुछ ऐसी ही है।

यहां लगभग 800 विद्यार्थियों को पढ़ाने के लिए केवल 14 शिक्षक हैं। विद्यालय में लाइब्रेरी भी है और कंप्यूटर कक्ष भी, लेकिन विद्यार्थियों के अनुसार इन सुविधाओं का वास्तविक लाभ उन्हें नहीं मिल पाता।

आठवीं कक्षा में पढ़ने वाली सोनाली बताती है कि स्कूल में लाइब्रेरी तो है, लेकिन वहां हमेशा ताला लगा रहता है। उसे कभी वहां जाकर किताबें पढ़ने का अवसर नहीं मिला। अगर लाइब्रेरी नियमित रूप से खुलती, तो पाठ्यपुस्तकों के अलावा उसे विज्ञान, इतिहास और सामान्य ज्ञान से जुड़ी दूसरी किताबें पढ़ने का मौका मिलता।

इसी विद्यालय के छात्र बबलू का कहना है कि स्कूल में कंप्यूटर कक्ष भी बना हुआ है, लेकिन छात्रों को वहां शायद ही कभी ले जाया जाता है। उसने कंप्यूटर को केवल दूर से देखा है। बबलू कहता है कि आज हर क्षेत्र में कंप्यूटर का महत्व बढ़ रहा है, लेकिन गांव के बच्चों को तकनीक सीखने का अवसर नहीं मिलने से वे शहर के बच्चों की तुलना में पीछे रह जाते हैं।

हालांकि इस संबंध में स्कूल का पक्ष उपलब्ध नहीं हो सका है कि आखिर सुविधा होने के बावजूद लाइब्रेरी तक सभी बच्चों की समान पहुँच क्यों नहीं मुमकिन हो रही है? शिक्षा मंत्रालय के यू-डाइस प्लस (UDISE+) के आंकड़े बताते हैं कि बिहार में केवल लगभग 53.6 प्रतिशत स्कूलों में ही पुस्तकालय की सुविधा उपलब्ध है, जबकि कंप्यूटर की सुविधा वाले स्कूलों की संख्या महज 20 से 25 प्रतिशत के आसपास है।

राष्ट्रीय औसत की तुलना में यह स्थिति काफी कमजोर है। राज्य के 94 हजार से अधिक स्कूलों में से लगभग 31 हजार स्कूलों में पुस्तकालय नहीं हैं और 70 हजार से अधिक स्कूलों में कंप्यूटर की सुविधा उपलब्ध नहीं है। यह आंकड़े साफ संकेत देते हैं कि ग्रामीण क्षेत्रों में डिजिटल शिक्षा और पठन संस्कृति अभी भी मजबूत नहीं हो पाई है।

विद्यालय के बच्चों के अभिभावक भी इस स्थिति से चिंतित हैं। रीना देवी कहती हैं कि सरकार की ओर से स्कूलों में कई सुविधाएं उपलब्ध कराई गई हैं, लेकिन उनका सही उपयोग नहीं हो रहा है। यदि बच्चों को नियमित रूप से लाइब्रेरी जाने दिया जाए, तो वे पाठ्यक्रम की किताबों से बाहर निकलकर नई जानकारियां हासिल कर सकते हैं।

वहीं कंप्यूटर शिक्षा मिलने से बच्चे नई तकनीक को समझ पाएंगे और भविष्य में रोजगार के अवसरों के लिए बेहतर तरीके से तैयार हो सकेंगे। उनका मानना है कि केवल भवन और संसाधन बना देने से शिक्षा बेहतर नहीं होती, बल्कि उनका उपयोग भी उतना ही जरूरी है।

 नाम नहीं बताने की शर्त पर एक अन्य अभिभावक कहते हैं कि जब स्कूल में शिक्षकों की इतनी कमी है, तो गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की उम्मीद कैसे की जा सकती है। एक शिक्षक को कई कक्षाओं और विषयों की जिम्मेदारी निभानी पड़ती है। ऐसे में अतिरिक्त गतिविधियों, पुस्तकालय संचालन या कंप्यूटर शिक्षा के लिए समय निकालना मुश्किल हो जाता है।

हालांकि पिछले कुछ वर्षों में बिहार में बड़े पैमाने पर शिक्षक भर्ती की गई है। राज्य सरकार के अनुसार तीन लाख से अधिक शिक्षकों की नियुक्ति की जा चुकी है, जिससे छात्र-शिक्षक अनुपात में सुधार हुआ है। वर्तमान में राज्य के सरकारी स्कूलों में लगभग सात लाख शिक्षक कार्यरत हैं। इसके बावजूद हजारों पद अभी भी रिक्त हैं और सरकार लगातार नई नियुक्तियों की प्रक्रिया चला रही है। हाल में टीआरई-4 के माध्यम से लगभग 46 हजार से अधिक शिक्षकों की भर्ती की तैयारी की गई है।

शिक्षा विभाग और विधानसभा में हुई चर्चाओं के अनुसार माध्यमिक और उच्च माध्यमिक स्तर पर गणित, विज्ञान, अंग्रेजी तथा कंप्यूटर शिक्षा से जुड़े शिक्षकों की कमी सबसे अधिक महसूस की जा रही है।

कंप्यूटर शिक्षा की स्थिति विशेष रूप से चिंताजनक है। विधानसभा में यह मुद्दा उठाया गया कि राज्य में लगभग 26 हजार कंप्यूटर शिक्षकों की आवश्यकता है, जबकि उपलब्ध पदों की संख्या काफी कम है। कई स्कूलों में कंप्यूटर लैब तो हैं, लेकिन प्रशिक्षित शिक्षक नहीं होने के कारण वे बच्चों के लिए उपयोगी नहीं बन पा रहे हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि केवल स्कूल भवन, स्मार्ट क्लास या कंप्यूटर उपलब्ध करा देना पर्याप्त नहीं है। बच्चों में पढ़ने की आदत विकसित करने के लिए पुस्तकालय को जीवंत बनाना होगा। हर सप्ताह पुस्तकालय अवधि तय होनी चाहिए, जिसमें बच्चे अपनी पसंद की किताबें पढ़ सकें। इसी तरह कंप्यूटर लैब का उपयोग नियमित रूप से सुनिश्चित किया जाना चाहिए और इसके लिए प्रशिक्षित शिक्षकों की नियुक्ति आवश्यक है।

आज जब पूरी दुनिया डिजिटल युग की ओर बढ़ रही है, तब ग्रामीण बच्चों को किताबों और तकनीक से दूर रखना उनके भविष्य के साथ समझौता करने जैसा है। सरकार द्वारा उपलब्ध कराए गए संसाधनों का प्रभावी उपयोग, शिक्षकों की रिक्तियों को शीघ्र भरना, पुस्तकालयों को नियमित रूप से खोलना और कंप्यूटर शिक्षा को व्यावहारिक रूप से लागू करना समय की मांग है।

यदि ऐसा किया जाए, तो ललितपुर जैसे गांवों के हजारों बच्चों की प्रतिभा भी उसी तरह निखर सकती है, जैसे शहरों के बच्चों की। आखिर शिक्षा का उद्देश्य केवल परीक्षा पास कराना नहीं, बल्कि बच्चों के लिए ज्ञान और अवसरों की पूरी दुनिया के दरवाजे खोलना है।

(यह लेखिका की निजी राय है)