देस-परदेस : पश्चिम एशिया में करवट-करवट, ‘कभी हाँ, कभी ना’!

Story by  प्रमोद जोशी | Published by  [email protected] | Date 23-06-2026
Global Scene: Shifts in West Asia—‘Sometimes Yes, Sometimes No’!
Global Scene: Shifts in West Asia—‘Sometimes Yes, Sometimes No’!

 

प्रमोद जोशी

पश्चिम एशिया में दीर्घकालीन शांति-स्थापना का सपना, बड़ी तेजी से ‘कभी हाँ और कभी ना’ तब्दील हो रहा है. उसकी विसंगतियाँ बार-बार दरवाज़े पर दस्तक दे रही हैं.इसराइल की खुली बगावत ने समझौते के अंतर्विरोधों को उजागर किया है, जिसकी वजह से शुक्रवार 19जून को, स्विट्ज़रलैंड में बातचीत नहीं हो पाई, जो दो दिन बाद रविवार को होने पर उम्मीदें पटरी पर वापस भी आ गई हैं.

समझौते के प्रारंभिक प्रारूप पर चूँकि बुधवार को ही राष्ट्रपति ट्रंप और पेज़ेश्कियान के हस्ताक्षर हो गए हैं, इसलिए अब सब कुछ केवल कयास भर नहीं है. फिर भी लेबनान पर ईरान और इसराइल के रुख के बरक्स यह काम टेढ़ी खीर जैसा लगता है.

ईरान ने कहा है, होर्मुज़ पर ‘टोल’ वसूलेंगे, और ट्रंप ने कहा है, कत्तई नहीं. ट्रंप की धमकियाँ लगातार जारी हैं. ऐसी दर्जनों असहमतियाँ हैं, फिर भी लगता है कि समझौता-वार्ता जारी रहेगी. 

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होमवर्क पर सवाल

सवाल है कि अमेरिकी नेतृत्व ने क्या इसराइल और खाड़ी के अपने सहयोगी देशों को भरोसे में नहीं लिया है? बिन्यामिन नेतन्याहू खुलकर क्यों कह रहे हैं कि हम इससे बँधे नहीं हैं?साफ है कि अंतिम संधि तक का रास्ता बाधाओं से भरा है. वस्तुतः ‘शांति-स्थापना’ की अवधारणा स्पष्ट नहीं है. ज्यादातर पर्यवेक्षक ‘लड़ाई में किसकी जीत हुई’ जैसे सवालों में उलझे हैं.

इस समस्या के अनेक पहलू, अनेक प्रकार के असंतोष और वर्चस्व कायम करने की कई तरह की महत्त्वाकांक्षाएँ हैं. फौरी तौर ईरान के तेल निर्यात और वित्तीय लेनदेन पर लगे प्रतिबंध, जल्द ही हट जाएँगे. पर बात केवल होर्मुज़ और नाभिकीय-कार्यक्रम की नहीं है. इसके तमाम तात्कालिक और दीर्घकालीन निहितार्थ हैं. इसे कम से कम इन तीन कोणों से देख सकते हैं:

•              लेबनान पर ईरान और इसराइल के रवैये को देखते हुए क्या यह समझौता अंजाम तक पहुँचेगा?

•              इस पूरे समझौते के तात्कालिक और दूरगामी परिणाम क्या होंगे?

•              भारत की दृष्टि से इस समझौते का फलितार्थ क्या है?

लेबनान का काँटा

लेबनान को ईरान के खिलाफ अमेरिकी-इसराइली मोर्चा माना जाता था, वह अब समझौते के सामने प्रमुख बाधा है. ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ ने तीन राजनयिकों के हवाले से जानकारी दी है लेबनान में इसराइली हमलों के कारण ईरान ने वार्ता से नाम वापस लेने की धमकी दी थी.

लेबनान को ईरान, अपनी सुरक्षा का अभिन्न अंग मानता है. 2024 में हिज़्बुल्ला के खिलाफ इसराइल की पिछली कार्रवाइयों ने ईरान के साथ सीधे संघर्ष का रास्ता खुल गया था. ईरान किसी भी कीमत पर लेबनान से इसराइल की वापसी चाहता है.

19 जून को हुआ राजनयिक गतिरोध, हाल के हफ्तों में दूसरा ऐसा मौका था,  जब लेबनान-संघर्ष ने वार्ता में अड़ंगा लगाया. जून के शुरू में बेरूत के बाहरी इलाके में इसराइली हमलों के जवाब में ईरान ने इसराइल पर मिसाइलें दागी थीं, और इसराइल ने भी ईरान पर जवाबी कार्रवाई की.

समझौते के पहले बिंदु के रूप में लेबनान को शामिल करना ईरान की राजनयिक जीत है. अमेरिका ने फिलहाल दोनों पक्षों से लड़ाई रुकवा दी है, पर इसराइल ने साफ कहा है कि हम लेबनान पर समझौते से बँधे नहीं हैं. हमारी सेनाएँ लेबनान में हिज़्बुल्ला को खत्म करेंगी.

फौरी फलितार्थ

समझौते पर ट्रंप के दस्तखत होने के बाद से होर्मुज़ जलमार्ग से कॉमर्शियल आवागमन धीरे-धीरे बढ़ने लगा है. पर असहमति की खबरों से अंतरराष्ट्रीय बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड की कीमत में उतार-चढ़ाव भी दिखाई पड़ रहा है.

होर्मुज़ मार्ग का खुलना इस इलाके के लिए ही नहीं, वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए अच्छा है. यहाँ फँसे करीब 500जहाजों पर 20से 25हजार के बीच फँसे नाविकों के लिए, यातायात की सार्थक बहाली कई महत्वपूर्ण चिंताओं के समाधान पर निर्भर करेगी.

इनमें 18 से 20 हजार भारतीय नाविक हैं. समझौता ठीक से लागू हुआ, तो ईरान की अरबों डॉलर की संपत्ति, जिसे फ्रीज कर दिया गया है, जारी की जा सकती है. ट्रंप ने ईरान की अर्थव्यवस्था के पुनर्निर्माण और विकास में मदद के लिए 300अरब डॉलर का कोष स्थापित करने के लिए क्षेत्र के अन्य देशों के साथ काम करने पर भी सहमति जताई है.

ट्रंप की रणनीति

पहली बार, ईरान को नए राजस्व का स्रोत हासिल करने का मौका मिलेगा. दशकों बाद आर्थिक रूप से बहिष्कृत देश के रूप में ईरान का दर्जा बदलाव के मोड़ पर है. दुनिया मानती है कि ट्रंप, अविश्वसनीय व्यक्ति हैं. उनसे बात करना मुश्किल है.

यह अर्धसत्य है. तुनक-मिज़ाजी ट्रंप की रणनीति है. अंतर्विरोधी बातों में लपेट कर वे ऐसी डिप्लोमेसी को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं, जिसकी कोशिश उनसे पहले किसी अमेरिकी राष्ट्रपति ने नहीं की.

ईरान की लंबे समय से अमेरिका के साथ कट्टर दुश्मनी है. इस पृष्ठभूमि में उसपर लगे प्रतिबंधों और शत्रुता को समाप्त करने की इतनी व्यापक योजना पहले कभी सामने नहीं आई.

इस सकारात्मक माहौल को बनाए रखने में ईरानी नेतृत्व की समझदारी की जरूरत भी होगी. वह भी आसान नहीं है. इलाके में सहयोगी देशों का अमेरिका पर से भरोसा भी टूट रहा है. इसराइली नेतृत्व पहली बार इतना खुलकर बोल रहा है.

गुलाबी सपने

कुछ लोग मानते हैं कि पश्चिम एशिया में सकारात्मक बदलाव असंभव है. वहीं कुछ मानते हैं कि इलाके में गहरी जड़ें जमा चुकी प्रतिद्वंद्विता को दूर किया जा सकता है. इसमें संदेह नहीं है कि यह समझौता वाशिंगटन और तेहरान के बीच संबंधों को पुनर्परिभाषित कर रहा है, जो 1979की ईरान-क्रांति के बाद से टकराव की स्थिति में हैं.

इस नई अवधारणा में ईरान-इसराइल रिश्ते भी महत्त्वपूर्ण होंगे. इसके लिए 1990के दशक की ओस्लो शांति प्रक्रिया, 2003का इराक-आक्रमण, 2011के अरब स्प्रिंग और 2020के अब्राहम समझौते को भी ध्यान में रखना होगा.

खाड़ी में नए आर्थिक शक्ति केंद्रों का उदय, असाधारण पूँजी का संचय, बढ़ती स्वदेशी सैन्य क्षमताएँ और दशकों के संघर्ष से उत्पन्न थकावट इस इलाके के परिदृश्य को नया आकार दे रही हैं.

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केवल सुरक्षा नहीं

यह केवल ट्रंप की बात नहीं है, अमेरिका की राजनीति में ‘लंबे समय तक चलने वाले युद्धों’ को समाप्त करने की माँग सभी पक्ष करने लगे हैं. इसके लिए ईरान और इसराइल को भी अपनी सुरक्षा-जनित चिंताओं और लड़ाकू अंदाज़ में बदलाव करना पड़ेगा.युद्ध से प्रभावित इलाकों में पुनर्निर्माण की गतिविधियों का वैसा ही असर हो सकता है, जैसा दूसरे विश्वयुद्ध के बाद यूरोप या जापान में हुआ था.

ईरान की तुलना में सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात ने स्थिरता और आर्थिक परिवर्तन को प्राथमिकता देना शुरू कर दिया है. वे तनाव कम करने में रुचि रखते हैं, और अपनी सांस्कृतिक-नीतियों को बदल रहे हैं. ऐसे में ईरान क्यों नहीं बदलना चाहेगा?

अमेरिका-ईरान रिश्तों को लेकर इसराइल को संदेह हैं. वह मानता है कि ‘नए पश्चिम एशिया’ की स्थापना के लिए ईरान को काबू में करना होगा. पर अमेरिकी नज़रिया किसी और दिशा में जाता दिखाई पड़ता है. 

दूरगामी निहितार्थ

इस इलाके की समृद्धि के लिए ईरान के संयुक्त अरब अमीरात के साथ संबंध विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण हैं. ईरान के व्यापार, वित्त और व्यवसायों के लिए अमीरात महत्वपूर्ण केंद्र रहा है.ईरान के लिए सबसे बड़े आयात-स्रोतों में से एक है यूएई. दोनों देशों का द्विपक्षीय व्यापार कई अरब डॉलर का है. ईरान की अर्थव्यवस्था के लिए अमीरात, वैश्विक बाजारों तक पहुँचने का एक प्रमुख ट्रांज़िट हब है।

प्रतिबंधों के कारण ईरान की वैश्विक पहुँच सीमित हो गई है. हज़ारों ईरानी व्यवसायों ने यूएई के मार्फत व्यापारिक नेटवर्क को बनाने और आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है.

दोनों अपने-अपने बंदरगाहों, जैसे ईरान के चाबहार व शाहिद रजाई और यूएई के दुबई व जेबेल अली के माध्यम से एक मज़बूत क्षेत्रीय परिवहन और आपूर्ति नेटवर्क बनाने की दिशा में काम किया है.

आर्थिक-पुनर्जीवन

अमेरिकी प्रतिबंधों समाप्ति का मतलब है कि ईरानियों को आयातित वस्तुओं को मँगाने के लिए चोर-बाजार में पैसा बर्बाद नहीं करना पड़ेगा. तनाव में कमी का यह मतलब यह नहीं कि ईरान की आंतरिक समस्याएं अपने आप दूर हो जाएँगी. उसके इंफ्रास्ट्रक्चर को भारी नुकसान हुआ है.

वर्षों से निवेश और अन्य संसाधनों की भी देश में भारी कमी रही है. प्रतिबंधों के कारण ईरान को अपनी ज़रूरतों की चीजों के घरेलू स्तर पर उत्पादन करने के लिए मजबूर होना पड़ा. इससे अर्थव्यवस्था में विविधता आई, जो दीर्घकाल में उसके लिए लाभकारी सिद्ध होगी.ईरानी रियाल की कीमत इस समय काफी कम है, जिसके कारण वहाँ बनी वस्तुएँ बांग्लादेश, वियतनाम और चीन जैसे देशों से प्रतिस्पर्धा करेंगी.

भारतीय दृष्टिकोण

भारतीय नज़रिए से यह समझौता अच्छा है, क्योंकि हमें ईरानी तेल खरीदने में आसानी होगी और चाबहार जैसी परियोजनाओं पर काम करना संभव होगा, पर यह सब फौरन नहीं होने वाला.इस संघर्ष को खत्म करने की दिशा में उठाया गया कोई भी कदम भारत के लिए सौगात का काम करेगा. वह प्रवासी भारतीय कामगारों के हित हों या ऊर्जा सुरक्षा की अनिवार्यता.

कभी भारत के सबसे महत्त्वपूर्ण पेट्रोलियम-सप्लायरों में ईरान एक था, लेकिन अमेरिकी प्रतिबंधों ने इन रिश्तों को तोड़ दिया. 2009तक, भारत के खनिज तेल के आयात में ईरानी तेल का हिस्सा 14प्रतिशत था. ट्रंप के पहले कार्यकाल के दौरान उनके दबाव में, भारत ने ईरानी तेल खरीदना पूरी तरह बंद कर दिया.

ईरानी तेल

अमेरिकी प्रतिबंधों ने भारत को ईरानी खनिज-तेल से वंचित कर दिया. दूसरी तरफ चीन ने ईरानी तेल खरीदना जारी रखा और ईरान का सबसे बड़ा खरीदार बन गया. ऐसा चीन ने अपनी सामर्थ्य के सहारे किया. वह अमेरिकी-प्रतिबंधों के दबाव में नहीं है.

यूक्रेन-युद्ध के बाद रियायती रूसी कच्चे तेल ने कुछ समय के लिए भारत की आपूर्ति की कमी को पूरा किया, पर अमेरिका ने उसपर भी प्रतिबंध लगा दिया. वेनेजुएला के तेल पर पहले प्रतिबंध लगाया गया और फिर इस साल की शुरुआत में दोबारा अनुमति दे दी गई.

भारत की भौगोलिक स्थिति और रिफाइनरियों की उपलब्धता खनिज तेल की आपूर्ति बढ़ाने का मौका देगी. इसमें तेल की भारी श्रेणियाँ भी शामिल हैं, जिन्हें गहन प्रोसेसिंग की ज़रूरत होती है. ऐसे बहुत कम देश हैं जो हर तरह के खनिज तेल का उपभोग कर सकते हैं.

भारत की रिलायंस, दुनिया की सबसे बड़ी रिफाइनरी है, जो होर्मुज जलडमरूमध्य के ठीक सामने अरब सागर के पार स्थित है. खाड़ी देशों से तेल टैंकरों को चीनी रिफाइनरियों तक पहुँचने में दुगना-तिगुना समय लगता है. वे अब बहुत कम समय में भारत आ सकेंगे. 

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