इमाम हुसैन की याद में सज रहे फरीदाबाद के ताजिए

Story by  प्रेम खान | Published by  onikamaheshwari | Date 25-06-2026
Preparations for Muharram intensify in Faridabad; artisans work day and night on constructing Tazias.
Preparations for Muharram intensify in Faridabad; artisans work day and night on constructing Tazias.

 

प्रेम खान / नई दिल्ली  

हरियाणा के फरीदाबाद में मुहर्रम को लेकर तैयारियां तेज हो गई हैं। शहर के विभिन्न इलाकों में कारीगर पारंपरिक तरीके से ताजिया बनाने में जुटे हुए हैं। बकरीद समाप्त होते ही ताजिया निर्माण का काम शुरू हो जाता है और कारीगर कई दिनों तक लगातार मेहनत कर इन्हें अंतिम रूप देते हैं। मुहर्रम इस्लाम धर्म का एक महत्वपूर्ण महीना और पर्व माना जाता है, जिसे हजरत इमाम हुसैन की शहादत की याद में मनाया जाता है। इस अवसर पर निकलने वाले जुलूसों के लिए विशेष रूप से ताजिए तैयार किए जाते हैं। फरीदाबाद में भी कई स्थानों पर लकड़ी, कागज, रंगीन शीट, स्टार, फूल और अन्य सजावटी सामग्री की मदद से आकर्षक ताजिए बनाए जा रहे हैं।

मुहर्रम का त्योहार नज़दीक आने के साथ ही, इलाके में ताज़िया बनाने का काम तेज़ हो गया है। शहर और ग्रामीण इलाकों के कारीगर आकर्षक और रंग-बिरंगे ताज़िया बनाने के लिए दिन-रात काम कर रहे हैं। कई परिवारों ने घरों में ही ताज़िया बनाना और उन्हें बेचना शुरू कर दिया है। बाज़ार में ताज़िया की मांग बढ़ने के साथ ही, इनके उत्पादन में भी तेज़ी आ रही है।  

कारीगर मोहम्मद जमील और  मोहम्मद अशरफ़ी मौलाना ने बताया कि बकरीद के तुरंत बाद ही वे इस कार्य में लग जाते हैं। ताजिया निर्माण में काफी समय और मेहनत लगती है। छोटे और बड़े दोनों प्रकार के ताजिए बनाए जाते हैं। कुछ लोग अपनी मन्नतों के अनुसार छोटे ताजिए बनवाते हैं, जबकि बड़े ताजियों की ऊंचाई 8 से 10 फुट तक होती है।

बड़े ताजियों में विशेष सजावट की जाती है, जिससे वे देखने में बेहद आकर्षक लगते हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार मुहर्रम के दौरान केवल मुस्लिम समुदाय ही नहीं, बल्कि सभी समुदायों के लोग ताजिए देखने और जुलूसों में शामिल होने पहुंचते हैं। बल्लभगढ़, दिल्ली और आसपास के क्षेत्रों से भी बड़ी संख्या में लोग ताजिए देखने आते हैं। जुलूस निकलने के दौरान विभिन्न बिरादरियों के लोग इसका सम्मान करते हैं और अपनी श्रद्धा के अनुसार सहयोग भी करते हैं।

कारीगर ने बताया कि ताज़िया तीन हिस्सों में बनाया जाता है: गुंबद, रोज़ा (मकबरे जैसा ढाँचा) और तख़्त (प्लेटफ़ॉर्म)। हर कारीगर अपनी कारीगरी से ताज़ियों को देखने में आकर्षक बनाने में जुटा हुआ है। अलग-अलग इलाकों में सुंदर ताज़िये बनाए जा रहे हैं; थर्मोकोल से लेकर रंगीन कागज़ और सजावटी सामान जैसी चीज़ों का इस्तेमाल करके बारीक डिज़ाइन तैयार किए जा रहे हैं।  

ताजिया बनाने वाले कारीगरों ने बताया कि कई कारीगर बाहर से फरीदाबाद बुलाए जाते हैं। वे अपने नियमित रोजगार और घरेलू कार्यों से लगभग एक महीने का समय निकालकर मुहर्रम की तैयारियों में जुटते हैं। उनका मानना है कि मुहर्रम गम और सब्र का महीना है तथा इमाम हुसैन की याद में की गई सेवा उन्हें सवाब और नेकी प्रदान करती है। कारीगरों के अनुसार एक बड़े ताजिए को तैयार करने में 20 से 25 दिन का समय लग जाता है। मुख्य रूप से दो अनुभवी कारीगर काम करते हैं, जबकि उनकी सहायता के लिए दो से चार हेल्पर भी लगाए जाते हैं। ताजिया निर्माण में कई बारीकियां होती हैं, जिन्हें अनुभवी कारीगर ही सही तरीके से समझते और सिखाते हैं।

खर्च की बात करें तो 10 से 12 फुट ऊंचे दो ताजियों को तैयार करने में लगभग 10 हजार से 15 हजार रुपये तक की लागत आती है। यह खर्च मुख्य रूप से निर्माण सामग्री पर होता है। हालांकि कारीगरों का कहना है कि वे अपनी मेहनत का कोई पारिश्रमिक नहीं लेते। उनके अनुसार यह इमाम हुसैन की याद में की जाने वाली सेवा है, इसलिए वे केवल ताजिया बनाते हैं जबकि सामग्री का खर्च आयोजकों द्वारा वहन किया जाता है।

कारीगरों ने बताया कि ईद की नमाज के तुरंत बाद ही उन्हें मुहर्रम के ताजिए बनाने के लिए फोन आने लगते हैं। इसके बाद वे लगभग 20 दिनों की छुट्टी लेकर फरीदाबाद पहुंचते हैं और ताजिया निर्माण का कार्य पूरा करते हैं।

मुहर्रम के अवसर पर लोगों को संदेश देते हुए कारीगरों ने कहा कि यह महीना इमाम हसन और इमाम हुसैन की याद का महीना है, जिन्होंने दुनिया को सब्र और त्याग का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि मुहर्रम के जुलूस हमेशा शांति, धैर्य और आपसी भाईचारे के साथ निकाले जाते हैं।

उनके अनुसार हिंदू और मुस्लिम समुदाय के लोग एक-दूसरे के त्योहारों में शामिल होते हैं और सामाजिक सौहार्द की मिसाल पेश करते हैं। मुहर्रम नजदीक आने के साथ ही फरीदाबाद के बाजारों में भी रौनक बढ़ने लगी है। ताजिया बनाने वाले कारीगरों को उम्मीद है कि इस वर्ष भी बड़ी संख्या में लोग ताजिए देखने आएंगे और मुहर्रम के जुलूसों में भाग लेंगे। फिलहाल फरीदाबाद में मुहर्रम की तैयारियां पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ जारी हैं तथा कारीगर अपनी कला और मेहनत के जरिए धार्मिक आस्था को सुंदर स्वरूप देने में जुटे हुए हैं।

इस्लामिक कैलेंडर के अनुसार, नया साल मुहर्रम के महीने से शुरू होता है। इसी महीने में पैगंबर मुहम्मद के नवासे, हज़रत इमाम हुसैन, कर्बला में शहीद हुए थे। उनकी याद में हर साल मुहर्रम मनाया जाता है और ताज़िया जुलूस निकाले जाते हैं। इस मौके पर, खासकर शिया समुदाय मातम मनाकर उन्हें श्रद्धांजलि देता है। ताज़िया आयोजक साबिर अली शाह ने बताया कि इस साल भी मुहर्रम की तैयारियाँ ज़ोर-शोर से चल रही हैं।