AI तकनीक से बदलेगी रामपुर रजा पुस्तकालय की पहचान : डॉ. पुष्कर मिश्र

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  onikamaheshwari | Date 25-06-2026
A detailed conversation with Dr. Pushkar Mishra, Director of the Rampur Raza Library.
A detailed conversation with Dr. Pushkar Mishra, Director of the Rampur Raza Library.

 

आवाज द वॉयस/ नई दिल्ली  

उत्तर प्रदेश के रामपुर स्थित रजा लाइब्रेरी अब कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) तकनीक से लैस होने जा रही है। इससे न केवल लाइब्रेरी को, बल्कि आम पाठकों और शोधकर्ताओं को भी कई तरह के लाभ मिलेंगे। लाइब्रेरी के भविष्य की योजनाओं और एआई तकनीक के उपयोग को लेकर 'आवाज़ द वॉयस' के साकिब सलीम ने रजा लाइब्रेरी के निदेशक डॉ. पुष्कर मिश्र से विस्तृत बातचीत की। डॉ. मिश्र से हुई पूरी बातचीत नीचे दिए गए यूट्यूब लिंक पर देखी जा सकती है। यहां प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश।
 
प्रश्न: रामपुर रजा पुस्तकालय की आठ मीनारों और इसकी बहुसांस्कृतिक पहचान के बारे में बताइए।
 
उत्तर: रामपुर रजा पुस्तकालय की आठ मीनारों का प्रतीकात्मक महत्व है। इनमें पहला भाग मस्जिद का, दूसरा गिरजे का, तीसरा गुरुद्वारे का और चौथा मंदिर का प्रतीक दर्शाता है। यह इसकी स्थापत्य कला में ही बहुसांस्कृतिकता को दिखाता है। इसके संग्रह भी बहुभाषिक, बहुविषयक और बहुसांस्कृतिक हैं। यहां 21 से अधिक भाषाओं के संग्रह मौजूद हैं, जिससे यह संस्थान आरंभ से ही बहुभाषिक और बहुसांस्कृतिक पहचान रखता है।
 
प्रश्न: क्या पुस्तकालय की पहचान को लेकर आरोप लगते हैं कि इसकी मूल प्रकृति बदली जा रही है?
 
उत्तर: ऐसे आरोप लगते रहते हैं, लेकिन मैंने इसे गलत अर्थ में नहीं देखा। रामपुर के नवाब कभी भी एकांगी या एक्सक्लूसिविस्ट नहीं थे। वे पीढ़ी दर पीढ़ी समावेशी और बहुसांस्कृतिक दृष्टिकोण रखते थे। हम उसी दृष्टि को आगे बढ़ा रहे हैं। हमने किसी भी भाषा, संग्रह या परंपरा को हटाया नहीं है, बल्कि उसका विस्तार किया है। जो पहले था, वह वैसा ही है, केवल नई चीजें जोड़ी गई हैं।
 
प्रश्न: रामपुर की सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान कैसी है?
 
उत्तर: रामपुर के लोग शालीन, मृदुभाषी और तहज़ीबदार हैं। यहां की अदबी संस्कृति ने लोगों के स्वभाव को प्रभावित किया है।
 
प्रश्न: पहले यह पुस्तकालय सीमित शोधकर्ताओं तक ही जाना जाता था, अब इसका दायरा कैसे बढ़ा?
 
उत्तर: पहले यह केवल एडवांस शोधकर्ताओं तक सीमित था, विशेषकर ईरान से आने वाले विद्वानों तक। जब मैंने कार्यभार संभाला, तब हमने इसका व्यापक प्रचार-प्रसार किया और विभिन्न दूतावासों से संपर्क किया। आज कई देशों के राजदूत यहां आ चुके हैं, जिनमें ताजिकिस्तान, अज़रबैजान, लेबनान और यूरोपीय देशों के प्रतिनिधि शामिल हैं।
 
प्रश्न: अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संपर्क कैसे बढ़ाया गया?
 
उत्तर: हमने भारत सरकार के सांस्कृतिक आदान-प्रदान कार्यक्रमों के तहत विभिन्न देशों से संपर्क किया। कजाकिस्तान, सऊदी अरब, इंडोनेशिया, ईरान और यूएई जैसे देशों के साथ संवाद हुआ है। सऊदी अरब के म्यूजियम विभाग के साथ ऑनलाइन वार्ता भी हुई है।
 
प्रश्न: भारत में पुस्तकालय को कैसे लोकप्रिय बनाया गया?
 
उत्तर: हमने जामिया हमदर्द, जेएनयू और जामिया मिल्लिया इस्लामिया जैसे संस्थानों में कार्यक्रम किए। इससे अकादमिक समुदाय में इसकी पहचान बढ़ी।
 
प्रश्न: क्या शोधार्थियों की संख्या बढ़ी है?
 
उत्तर: हां, अब जापान, अमेरिका और मंगोलिया तक से शोधकर्ता यहां आ रहे हैं। पहले जानकारी की कमी थी, अब जागरूकता बढ़ी है।
 
प्रश्न: पुस्तकालय की बहुसांस्कृतिकता को इतना महत्व क्यों दिया जा रहा है?
 
उत्तर: आज वैश्विक परिस्थितियों में संघर्ष और विभाजन बढ़ रहा है। ऐसे समय में "भी-मनीषा" यानी मेरा सत्य भी सही है और आपका भी सही है—इस विचार की आवश्यकता है। इसके विपरीत "ही-मनीषा" संघर्ष और हिंसा को जन्म देती है। यह संस्थान उसी समावेशी दृष्टि का प्रतीक है।
 
प्रश्न: पुस्तकालय को अंतरराष्ट्रीय पहचान कैसे मिली?
 
उत्तर: इसे "ताजमहल ऑफ बुक्स" कहा जाता है। एक अंतरराष्ट्रीय सूची में इसे दुनिया की आठवीं सबसे सुंदर लाइब्रेरी बताया गया है। इतिहासकार सैम डैलरिम्पल ने इसे भारत की सर्वश्रेष्ठ संरक्षित लाइब्रेरी बताया है।
 
प्रश्न: यहां कितनी भाषाओं का संग्रह है?
 
उत्तर: यहां 21 से अधिक भाषाओं के संग्रह हैं। अरबी, फारसी, उर्दू, हिंदी, संस्कृत प्रमुख हैं। इसके अलावा तमिल, तेलुगु, कन्नड़, सिंहली, तुर्की और पश्तो की पांडुलिपियां भी हैं।
 
प्रश्न: क्या यहां दुर्लभ ऐतिहासिक सामग्री भी है?
 
उत्तर: यहां मुगल काल के फरमान, मुहरें और मिनिएचर पेंटिंग्स का दुर्लभ संग्रह है, जो कला और इतिहास के शोधकर्ताओं के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।
 
प्रश्न: क्या पहले इसकी बहुसांस्कृतिक पहचान उजागर नहीं थी?
उत्तर: यह पूरी तरह सही नहीं है कि यह पहचान नहीं थी, लेकिन यह सीमित रूप से ज्ञात थी। हमने इसे व्यापक रूप से प्रस्तुत किया है। हमने किसी पुराने संग्रह को नहीं हटाया, केवल विस्तार किया है।
 
प्रश्न: क्या पहले इसे यूनिकल्चरल माना जाता था?
 
उत्तर: कुछ लोगों की ऐसी धारणा हो सकती है, लेकिन वास्तविकता यह है कि नवाबों की दृष्टि हमेशा बहुसांस्कृतिक थी।
 
प्रश्न: नवाबों की भूमिका इस संस्कृति में कैसी थी?
 
उत्तर: नवाबों ने 21 भाषाओं को बढ़ावा दिया और होली जैसे त्योहारों का भी साहित्य में उल्लेख किया। भवन की संरचना में ही मंदिर, मस्जिद, चर्च और गुरुद्वारे का प्रतीकात्मक समावेश उनकी सोच को दर्शाता है।
 
प्रश्न: रामपुर की गंगा-जमुनी तहज़ीब का आधार क्या है?
 
उत्तर: 1857 के बाद जब दिल्ली और लखनऊ में साहित्यकारों को कठिनाई हुई, तब रामपुर ने उन्हें शरण दी। ग़ालिब भी यहां आए थे। इससे यहां की अदबी संस्कृति विकसित हुई।
 
प्रश्न: क्या नवाबों को लेकर प्रचलित धारणाएं सही हैं?
 
उत्तर: यह धारणा गलत है कि नवाब केवल मनोरंजन में रुचि रखते थे। उन्होंने शिक्षा, संस्कृति और पुस्तकालय को भी बहुत महत्व दिया। उन्होंने अपनी संपत्ति का बड़ा हिस्सा पुस्तकालय को दिया।
 
प्रश्न: क्या यहां रामायण की पांडुलिपियां भी हैं?
 
उत्तर: हां, यहां 1627 की मसिह पनीपती की रामायण, 18वीं सदी की रामायण और उर्दू रामायण जैसी कई दुर्लभ पांडुलिपियां मौजूद हैं।
 
प्रश्न: क्या स्थानीय भाषाओं को भी महत्व मिला?
 
उत्तर: हां, ब्रज, अवधी और खड़ी बोली की परंपरा मजबूत रही है। नवाब रजा अली खान ने स्वयं ब्रज भाषा में कविताएं लिखी हैं।
 
प्रश्न: अयोध्या संग्रहालय से क्या सहयोग हुआ?
 
उत्तर: राम कथा संग्रहालय ने हमारी रामायण पांडुलिपियों की मांग की थी, लेकिन कानून के अनुसार हम मूल पांडुलिपियां बाहर नहीं भेज सकते। इसलिए हमने फैक्स प्रतियां और संयुक्त प्रदर्शनियों का निर्णय लिया।
 
प्रश्न: अन्य संस्थानों के साथ क्या सहयोग चल रहा है?
 
उत्तर: हमने कई संस्थानों के साथ एमओयू किए हैं, जिनमें ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती विश्वविद्यालय, वृंदावन रिसर्च इंस्टिट्यूट, कश्मीर विश्वविद्यालय और जेएनयू शामिल हैं। अन्य कई संस्थानों से भी बातचीत चल रही है।
 
प्रश्न: क्या पुस्तकालय की मूल दृष्टि बदली है?
 
उत्तर: नहीं, नवाबों की दृष्टि वही है—समावेशिता और बहुसांस्कृतिकता। हमने केवल उसका विस्तार किया है।
 
प्रश्न: डिजिटाइजेशन की स्थिति क्या है?
 
उत्तर: हमने लगभग 70% संग्रह डिजिटाइज कर लिया है। हम AI, ब्लॉकचेन और मशीन लर्निंग का उपयोग कर रहे हैं। हम "टॉकिंग बुक्स" जैसी तकनीक विकसित कर रहे हैं, जिसमें पुस्तकें संवाद कर सकेंगी।
 
प्रश्न: भविष्य की क्या योजनाएं हैं?
 
उत्तर: रामपुर किले की 43 एकड़ भूमि पर विश्वस्तरीय अध्ययन और अनुवाद केंद्र बनाया जाएगा। यह परियोजना आगे बढ़ रही है और इसे सरकार का समर्थन भी मिला है।
 
प्रश्न: डिजिटल एक्सेस कैसे उपलब्ध होगा?
 
उत्तर: डिजिटल कॉपीज़ नियमों के अनुसार उपलब्ध कराई जाती हैं। हमारी वेबसाइट निर्माणाधीन है और जल्द शुरू होगी।
 
प्रश्न: क्या आज पुस्तकालयों की भूमिका बदल रही है?
 
उत्तर: हां, अब पुस्तकें ऑनलाइन उपलब्ध हैं, इसलिए पुस्तकालय ज्ञान केंद्र और सांस्कृतिक केंद्र बन रहे हैं, न कि केवल पुस्तक भंडार।
 
प्रश्न: फुटफॉल में क्या बदलाव आया है?
 
उत्तर: पहले लगभग 67,000 वार्षिक आगंतुक थे, जो अब बढ़कर लगभग 1,45,000 हो गए हैं।
 
प्रश्न: गंगा-जमुनी तहज़ीब के भविष्य पर आपका विचार क्या है?
 
उत्तर: भविष्य "भी-मनीषा" में है, न कि "ही-मनीषा" में। केवल अपनी ही सत्यता को सही मानना संघर्ष पैदा करता है, जबकि समावेशिता शांति लाती है।
 
प्रश्न: अंत में आपका संदेश क्या है?
 
उत्तर: मेरा संदेश है कि मेरा सत्य भी सही है और आपका भी सही है। हम दोनों अपने-अपने मार्ग पर चलते हुए एक बेहतर, शांतिपूर्ण और समृद्ध भविष्य बना सकते हैं।
 
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